बातें ::
अजंता देव

कविता की तरफ आना कैसे हुआ?

बचपन में कुछ छंद लिखती थी. बहर से बाहर गजलें लिखने का चाव था, गीत भी. दरअसल, मैं गाती थी तो लगता था कि लिखकर भी देखूं. लेकिन कविता की तरफ आने में कृष्ण कल्पित की मित्रता की अहम भूमिका है. जब हम पढ़ते थे, तो कुछ दोस्त मिलकर एक साप्ताहिक गोष्ठी करते थे. धीमे-धीमे बहुत लोग जुटने लगे. यहां गंभीर चर्चाएं होती थीं. मुझे अपना रास्ता मिल गया और मैंने कविता लिखना शुरू कर दिया.

आपके कविता-संसार में लय, छंद और सांगीतिकता इन तीनों का बाहुल्य है. कविता में गद्य को कम बरतना है, यह ख्याल आपको इस दौर में लिखते हुए कैसे आया?

इस दौर की वजह से ही. इतनी सपाट, इतनी बेस्वाद कविता का यह दौर मुझे मायूस करता रहा है. छंद, गीत, सांगीतिकता मेरी परवरिश में हैं. मेरे पिता शास्त्रीय गायक थे. मुझे यह लाभ हासिल है कि मैं अपनी इच्छा से छंद को भी साध सकती हूं और मुक्त छंद को भी. मुझे मालूम है कि इस दौर के ज्यादातर कवियों को यह सुविधा नहीं है. और फिर जब मैं दिल्ली में थी तो तब अब के बड़े कवि मंझोले कवि हुआ करते थे और उन्हें नजदीक से जानने के बाद छंद में उनके तंग हाथ ने मुझे अपनी ताकत का एहसास भी कराया. मुझे लगा कविता में गद्य का इस्तेमाल जब बेहद जरूरी हो तब ही किया जाए.

कुछ लिखने के लिए सबसे अच्छी ऋतु आपके लिए कौन-सी है?

सर्दियां. सर्दी का मौसम मुझे एकांत देता है. घर के लोग रजाई में होते हैं तो मुझे उन पर ध्यान नहीं देना पड़ता.

हिंदी की व्यावहारिक राजनीति को — जिसमें आपके जीवन-साथी और कवि कृष्ण कल्पित खासी दिलचस्पी लेते हैं — आप कैसे देखती हैं?

दिलचस्प है यह सारा दृश्य. हिंदी में जो राजनीति की जाती है, वह किसी बड़े सरोकार से नहीं जुड़ी है. इसके पीछे-नीचे व्यक्तिगत वजहें रहती हैं और आगे-ऊपर बड़ी-बड़ी बातें. कल्पित भी इसी का हिस्सा हैं, हालांकि मैं यह भी जानती हूं कि कल्पित की यह कटुता क्यों है. उन्हें लंबे समय तक जानबूझकर हाशिए पर रखा गया. कल्पित ने इस तरह खुद को मनवाया है. मुझे व्यक्तिगत तौर पर यह पसंद नहीं, लेकिन कल्पित के लिए शायद यह जरूरी था.

इन दिनों आपके सिरहाने कौन-सी किताब है?

तोलस्तोय की ‘बच्चों सुनो कहानी’ और फेसबुक के माध्यम से अंबर रंजना पांडेय की कविताएं.

इससे पहले कौन-सी थी?

‘कामिनी काय कांतारे’, ‘लवर्स डिस्कोर्स’, ‘लव स्टैंड्ज अलोन’ और हिंदी के कुछ युवा कवियों की किताबें.

आपके लिए यात्राएं कितनी जरूरी हैं?

मैने बहुत यात्राएं नहीं की हैं. मेरी जीवन-स्थितियां यात्रा के अनुकूल नहीं रहीं. लेकिन अब लगता है कि खूब यात्राएं की जाएं.

आप कहां बार-बार लौटना चाहती हैं?

पहाड़ों, जंगलों और खंडहरों में.

आपका पसंदीदा शहर कौन-सा है?

कोलकाता.

कहां जाना चाहती हैं, जहां अब तक नहीं जा पाई हैं?

फ्रांस.

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[ अजंता देव हिंदी की सुपरिचित कवयित्री हैं. उनसे ये बातें ‘सदानीरा’ ने ई-मेल के मार्फत संभव की  हैं. उनकी तस्वीरें सौदामिनी देव और शायक आलोक के सौजन्य से हैं.  अजंता देव से ajantadeo@gmail.com पर बात की जा सकती है.  यह प्रस्तुति ‘सदानीरा’ के 17वें अंक में पूर्व-प्रकाशित.]

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