बातें ::
बादल बसु
से
सुनील गंगोपाध्याय
बांग्ला से अनुवाद : रामशंकर द्विवेदी

दहीजुड़ी गाँव के दुरंत, लिखने-पढ़ने में धप्पा देने वाले जीवन से बोर्डिंग स्कूल तक का कड़ा अनुशासन। वहाँ से कलकत्ता में एक छापेख़ाने में नौकरी का ककहरा, उसके बाद साइकिल का हरकारा। काम सीखते-सीखते ‘आनंद पब्लिशर्स’ में आ गए। लंबा कर्म-जीवन, अनगिनत चौंकाने वाली घटनाएँ, कुल-मिलाकर यही हैं बादल बसु। इस घरेलू साक्षात्कार में उनके बहुरंगी जीवन की अनेक अनुभूतियाँ आ गई हैं। पढ़िए :

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बादल बसु

सुनील गंगोपाध्याय : जिसे प्रकाशक, लेखक एवं पाठक वर्ग में बादल बसु के नाम से जाना जाता है, उसका शुभंकर नाम द्विजेंद्रनाथ बसु है। इस बादल बसु को देखते हुए तो मुझे कई वर्ष हो गए, लगभग तीस-पैंतीस वर्ष तो हो ही गए होंगे। बादल क्या यह सच नहीं है?

बादल बसु : हाँ आपने ‘आत्मप्रकाश’ उपन्यास लिखा, थोड़ा उससे भी पहले से जान-पहचान है।

सुनील गंगोपाध्याय : ‘आत्मप्रकाश’ मैंने लिखा था 1966 में। इसका अर्थ है उसी छठे दशक से हमारा परिचय-आलाप है। उस समय बादल बसु छोटे-से लड़के थे। मैं भी कोई बहुत बड़ा था, ऐेसा नहीं है। ख़ैर जो भी हो, तो आप बड़े हुए हैं झाड़ग्राम के पास दहीजुड़ी गाँव में। अब झाड़ग्राम जाना बहुत सरल हो गया है। उन दिनों दहीजुड़ी जाना किस तरह होता था?

बादल बसु : झाड़ग्राम से या तो साइकिल रिक्शा अथवा बस द्वारा एक घंटा लगता था। अंततः डेढ़ घंटा भी लग जाता था। हमारा घर ज़रूर डामर रोड के ही ऊपर था।

सुनील गंगोपाध्याय : हाँ, उस घर में तो मैं भी गया हूँ—कच्चा घर, सरपत का छप्पर, कई कमरे थे उसमें। दहीजुड़ी से कलकत्ता कैसे आए?

बादल बसु : दहीजुड़ी में जन्म हुआ था 1937 में। हम लोग तो मूल रूप से किसान थे। हमारे यहाँ खेती करना ही व्यवसाय था, उसी से हमारा परिवार चलता था। बाबा भी विशेष कोई काम नहीं करते थे और हमारे बाबा झाड़ग्राम कोर्ट में हेड क्लर्क थे। ज़मीन-जायदाद से ही निर्वाह होता था। हम लोग कई भाई-बहन थे। बाबा को ढाका की एक अमेरिकन कंपनी में नौकरी करने भेजा गया था। उन लोगों ने एक दिन अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर कहा कि अमेरिका चलो। ठाकुर दा ने कहा नहीं, अमेरिका जाना नहीं होगा, गाँव लौट जाओ। तब बाबा छोटी-मोटी कॉन्ट्रेक्टरी करने लगे। वही सड़क ठीक कराना आदि और क्या… बाबा को डॉक्टरी पढ़ने के लिए भी परबाबा ने भेजा था, बाँकुड़ा मेडिकल कॉलेज में, तो वहाँ भी कुछ नहीं हुआ। मेरे परबाबा ही परिवार को चलाते थे।

सुनील गंगोपाध्याय : बाबा क्या जात्रा-थिएटर भी कुछ करते थे? अथवा गाने-बजाने में रुचि थी?

बादल बसु : नहीं। वैसा कुछ नहीं करते थे। ताश ज़रूर खेला करते थे। मैं क्लास वन से फोर तक वहीं एक स्कूल में पढ़ा करता था और साइकिल पर बैठकर घूमा करता था। हमारे घर के लोग जो काम करने जाया करते थे, उनके साथ मैं खेत में जाकर हल चलाता था और भैंसों की पीठ पर चढ़कर घूमा करता था…

सुनील गंगोपाध्याय : मछली नहीं पकड़ते थे?

बादल बसु : हाँ, ज़रूर। हम लोगों का एक पोखर था। वंशी या जाल फेंककर मछली पकड़ता था। उसके बाद तो वहाँ से बड़े स्कूल साइकिल से जाया करता था, बस से भी। छात्रों से कोई पैसा नहीं लेता था, फिर भी साइकिल से ही जाने में अधिक सुविधा रहती थी, कारण बस जाती थी सिर्फ़ झाड़ग्राम तक और वह जहाँ उतारती थी, वहाँ से स्कूल दो किलोमीटर दूर था। वहाँ बस नहीं जाती थी। अक्सर मैं स्कूल नहीं जाता था, हाथ-पैर तोड़ लेता था, बीड़ी पीता था और बदमाशी किया करता था। लिखने-पढ़ने में तो मन ही नहीं लगता था।

सुनील गंगोपाध्याय : अर्थात् गाँव की दृष्टि से जिसे आदर्श जीवन कहा जाता है, उसी तरह से समय बिताते थे।

बादल बसु : हाँ। एक बार साइकिल से गिर पड़ा और हाथ टूट गया। उस समय कक्षा पाँच-छह में शायद पढ़ता था। उपचार के लिये मुझे लाया गया कलकत्ता। कलकत्ते में मेरे एक काका, उनका शायद आपने नाम सुना हो, विनोद बसु रहा करते थे। उन्हीं के पास रहकर मेरी चिकित्सा हुई। उसके बाद मैं लौट आया। एक दिन काका आकर मेरे घर में हाज़िर हो गए। वहाँ पर मैं और काका का बेटा दोनों ही आवारा होते जा रहे थे, इसलिए उन्होंने हम लोगों को झाड़ग्राम के ‘सेवायतन’ नामक एक बोर्डिंग स्कूल में भर्ती करा दिया। कई महाराजाओं ने मिलकर उस स्कूल को तैयार किया था। वहीं पर रहकर मैं और मेरा भाई पढ़ाई-लिखाई किया करते थे। चूँकि मैं स्थानीय लड़का था, इसलिए वहाँ के बारे में मैं बहुत कुछ जानता था, इसलिए पढ़ाई के अलावा मैं दूसरे ही काम अधिक करता था। लिखने-पढ़ने के अलावा उन्हीं कामों में मेरा मन अधिक लगा रहता था। पढ़ाई-लिखाई भी तो करनी पड़ती थी, नहीं तो चाबुक की मार खानी पड़ती। शाम के समय नियमित रूप से पढ़ने बैठना पड़ता। यहाँ पर सातवें-आठवें दरजे तक पढ़ने के बाद भी माँ-बाप से कहा जाता था कि दोनों लड़के बिगड़ते जा रहे हैं। ठीक-ठाक कुछ भी नहीं हो रहा है। उन्हें कलकत्ता ले जाया जाए तो अच्छा हो।

सुनील गंगोपाध्याय : अर्थात् बीड़ी पीना आदि चला करता था?

बादल बसु : बीड़ी पीना, रँगे हाथों पकड़े जाना। एक दिन मास्टर मशाई ने कपड़े-लत्ते कंधे पर लादकर कहा कि घर चले जाओ। हाथ-पैर जोड़कर उस यात्रा से हम लोगों ने अपना बचाव किया, लेकिन इस घटना की ख़बर हम लोगों के घर पहुँच गई थी। उसके बाद हम लोग कलकत्ता की सिकदार बाग़ान स्ट्रीट में आ गए—उत्तर कलकत्ता में। हम लोगों को भर्ती करा दिया गया ‘ओरिएंटल सेमीनरी’ स्कूल में।

सुनील गंगोपाध्याय : वह तो बहुत दूर था।

बादल बसु : घर से दूर होने के कारण हमारी जान-पहचान का कोई व्यक्ति नहीं था, लेकिन उस स्कूल के हेडमास्टर के साथ हमारे बाबा-काका का परिचय था। उनका नाम था रासबिहारी राय।

सुनील गंगोपाध्याय : सुना है कि उन्हीं के पास ‘देश’ पत्रिका का संग्रह था—पहले अंक से। इसका अर्थ है उनकी पढ़ाई-लिखाई भी काफ़ी थी।

बादल बसु : हाँ, वह काफ़ी पत्र-पत्रिकाएँ और पुस्तकें पढ़ा करते थे। उन्हीं के माध्यम से भर्ती हो गया, फिर उसी स्कूल से स्कूल की अंतिम परीक्षा पास की 1957 में।

सुनील गंगोपाध्याय : यह जो गाँव से शहर चले आए, गाँव में तो एक तरह का आदर्श जीवन था—मछली पकड़ना, पेड़ पर चढ़ना, दोस्तों के साथ अड्डेबाज़ी, बीड़ी पीना, पढ़ाई-लिखाई में धप्पा देना… यह तो बड़ा चमत्कारपूर्ण जीवन था। वहाँ की तुलना में शहर का बँधा-बँधा, एक तरह का जड़ताग्रस्त जीवन! क्या शुरू-शुरू में इससे असुविधा नहीं हुई?

बादल बसु : बहुत असुविधा हुई थी। पहली बात तो घर से बहुत दूर रहना पड़ा। घर में बहुत अभाव और ग़रीबी थी। यहाँ तक कि कभी-कभी खाने को भी नहीं मिलता था, ऐसे दिन भी बीते हैं। यहाँ खाने को तो मिल रहा था, लेकिन मानसिक शांति एकदम नहीं थी। सच कहने में क्या, घर से दूर किसी दूसरी जगह अगर आप बड़े हो रहे हैं, तो वहाँ घर का प्यार और स्नेह-दृष्टि तो आपको नहीं मिलेगी।

सुनील गंगोपाध्याय : अपनी माँ के पास रहना एक बात है और काकी, ताई के पास रहना दूसरी बात है, यही है न?

बादल बसु : हाँ। कुछ वैसा ही मामला था। हम लोग कई भाई-बहन थे। चचेरे भाई-बहन भी थे। सभी लोग मिल-जुलकर किसी तरह रह रहे थे, इसीलिए वहाँ रहने को बाध्य हुआ था और क्या। वहाँ से पास करने के बाद कॉलेज में भर्ती हो गया, श्यामबाजार के ‘मणींद्र चंद्र कॉलेज’ में। रात में कक्षाएँ लगती थीं और दिन में एक छोटे-से छापेख़ाने में काम सीखने के लिए मेरे काका ने मुझे घुसा दिया। मशीन आदि पोंछता था। उन दिनों नई-नई लाइनो मशीन आई थी, वारमेन नामक जो लोग काम करते थे, उनसे काम-काज सीखकर एक-आध काम जान लिया। कंपोज़ करना भी सीख लिया।

सुनील गंगोपाध्याय : लाइनो मशीन क्या उस समय अच्छी तरह चालू हो गई थी?

बादल बसु : लाइनो और हैंडसेट दोनों ही उस समय समानांतर रूप से चल रही थीं। उसके बाद धीरे-धीरे हैंडसेट उठ गया। वहाँ काम-काज सीखने के बाद मुझे लाया गया ‘गौरांग प्रेस’ में। यहाँ पर मुझे दूसरी तरह का काम दिया गया। मुझे एक साइकिल ख़रीद दी गई। विभिन्न लेखकों के घर अथवा दूसरी जगह प्रूफ़ दे आना, फिर वहाँ से प्रूफ़ ले आने का काम मुझे करना पड़ता था। साइकिल-प्यून कहने का जो अर्थ होता है, मैं ठीक वही था। अधिकांश समय मुझे आनंद बाज़ार जाना पड़ता था। अनेक तरह के काग़ज़-पत्र रचनाएँ लेकर आना और दे जाना। आपके पास जिस तरह से बंकिम नामक एक लड़का साइकिल लेकर आता था। मैंने उसे देखा है। यही करते-करते एक दिन आनंद बाज़ार से मेरी साइकिल चोरी हो गई। मेरे पास अपनी तो कोई साइकिल थी नहीं, वह तो कंपनी की थी। बस, उसके बाद ही मुझे ‘गौरांग प्रेस’ में एक स्टूल पर बैठाल दिया गया। उन लोगों ने कहा कि तुम्हारी साइकिल चोरी चली गई है, अब क्या होगा? उन दिनों प्रभात बाबू मैनेज़र और फणीबाबू वहाँ एकाउंटेंट के पद पर काम करते थे।

सुनील गंगोपाध्याय : ये वही फणीभूषण हैं, आनंद पब्लिशर्स की पुस्तकों पर प्रकाशक के रूप में जिनका नाम रहता था?

बादल बसु : हाँ। इसी समय मैंने सोचा कि बैठे रहने से तो कोई लाभ है नहीं, मशीन का काम सीखना, कंपोज़ करना, किस तरह से छपाई होती है, इंपोज़ करना… ये सब काम सीख लिए।

सुनील गंगोपाध्याय : वहाँ पर निश्चय ही एक और बड़ी शिक्षा मिली, टाइपों को पहचानना। कारण, टाइप तो अनेक प्रकार के होते हैं, उन्हें पहचानना पड़ता है।

बादल बसु : हाँ, वह तो है ही। इस समय तो एक ही टाइप है। रोमन और बोल्ड, यही दो तरह के टाइप हैं। उन दिनों तो वर्जइस, पाइका, स्मॉल पाइका, 11 प्वाइंट, 14 प्वाइंट आदि अनेक टाइपों को जानना पड़ता था। वही सब काम सीखना प्रारंभ कर दिया। यही सब काम करते-करते उन लोगों की कैसी दया हुई कि उन्होंने मुझे चेयर-टेबिल देकर कहा कि अब से तुम बैठे-बैठे प्रूफ़ देखोगे। मशीन प्रूफ़ तैयार हो गया है या नहीं यह देखोगे। मैं भी काम करते-करते प्रूफ़ देखना सीखने लगा। और भी एक बात थी, नाइट ड्यूटी कोई करना नहीं चाहता था, मैं पूरे दिन काम करने के बाद, रात्रि में भी बैठा रहता था और सवेरे-सवेरे घर आकर, खा-पीकर पुन: पहुँच जाता था। घर की जगह अब काम की जगह ही अधिक अच्छी लगने लगी थी। इसी बीच नाइट ड्यूटी न कर मित्रों के साथ अड्डेबाज़ी करने लगा था। उसके बाद मैंने स्वयं एक साइकिल ख़रीद डाली। साइकिल से ही पूरा कलकत्ता घूम लेता था। बोई पाड़ा (पुस्तकों के मुहल्ले में) में मेरा नाम ही हो गया था—‘बंबई मेल’—मुझे देखकर सभी कहा करते थे कि वह देखो ‘बंबई मेल’ जा रहा है। भों-भों करता हुआ साइकल चलाता था। धीरे-धीरे काम भी सीख लिया था।

सुनील गंगोपाध्याय : फिर निष्कर्ष यह निकला कि एक ढीठ लड़का जो ग्रामीण जीवन के साथ जुड़ा हुआ था, एकदम आदर्श, सुंदर, सुखी जीवन था उसका, ऐसा कहा जा सकता है, उसे बैठाल दिया गया कलकत्ता शहर के एक कृत्रिम, उबाऊ, बँधे-बँधाए काम में और जिस लड़के को पुस्तकें पढ़ना ही पसंद नहीं था, पढ़ाई-लिखाई की ओर जिसकी प्रवृत्ति ही नहीं थी, वही लड़का पुस्तक छपाने के काम में लग गया।

बादल बसु : लिखना-पढ़ना तो उस अर्थ में कुछ किया ही नहीं।

सुनील गंगोपाध्याय : पुस्तक छपाने के साथ-साथ जो अनुभव हुआ, वह भी तो एक तरह की शिक्षा है?

बादल बसु : हाँ, निश्चय ही। वह भी तो एक तरह की बड़ी शिक्षा है।

सुनील गंगोपाध्याय : अच्छा, साइकिल से गाड़ी चलाना कब सीख लिया?

बादल बसु : मेरे काका के पास गाड़ी थी। ड्राइवर लोगों के साथ घूमते-घूमते, उन्हें बीड़ी आदि पिलाकर गाड़ी चलाना सीख लिया। मेरे पास ड्राइविंग लाइसेंस 1965 से है। गाड़ी तो नहीं थी, पर उसे चलाने का लाइसेंस था। उसके बाद कंपनी ने ही मुझे सबसे पहले गाड़ी दी।

सुनील गंगोपाध्याय : उस समय ‘गौरांग प्रेस’ बहुत ही नाम वाला प्रेस था। ‘आनंद पब्लिशर्स’ तो बहुत बाद में चालू हुआ था?

बादल बसु : ‘आनंद पब्लिशर्स’ चालू हुआ था 1958 में। उसका ऑफ़िस उसी ‘गौरांग प्रेस’ के भवन में था। एक मंज़िल पर उन्होंने एक कमरे को किराए पर ले रखा था। मैं दिन में काम करता था ‘गौरांग प्रेस’ में। पाँच बजे छुट्टी होने के बाद पार्ट टाइम काम करता था—‘आनंद पब्लिशर्स’ में… पुस्तकों का बिल बनाकर भेजना, पत्रों का उत्तर देना, पुस्तकों के बिकने से जो मुद्रा आए उसे जमा करना।

सुनील गंगोपाध्याय : इसका अर्थ यह हुआ कि ‘गौरांग प्रेस’ का ही भाग था ‘आनन्द पब्लिशर्स’?

बादल बसु : नहीं। वह अलग एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी थी। 1970 में इस समय जिस भवन में ऑफ़िस है, 45 बेनिया टोला लेन, उसमें ‘आनंद पब्लिशर्स’ चला आया।

सुनील गंगोपाध्याय : मुझे साफ़-साफ़ याद है, मेरी पहली पुस्तक ‘आत्मप्रकाश’ 1966 में ‘देश’ में धारावाहिक निकली थी। 1967 में पुस्तकाकार छपी और उसे ‘गौरांग प्रेस’ ने छापा था। उस समय मेरा संपर्क था फणी बाबू के साथ और मैं एक छोटे लड़के बादल को भी कभी-कभी वहाँ देखा करता था।

बादल बसु : एक समय गड़बड़ी शुरू हो गई। विशेषकर मेरे ऊपर यूनियन का दबाव आया कि आप दो जगह काम नहीं कर पाएँगे। इस समय जहाँ ‘आनंद’ का ऑफ़िस है, उसी भवन को किराए पर लेकर मेरी पहली शिफ़्ट कर दी गई। उसके बाद धीरे-धीरे ऑफ़िस बढ़ने लगा।

सुनील गंगोपाध्याय : ‘आनंद पब्लिशर्स’ में ज्वाइन करने के बाद छापे के काम का क्या हुआ?

बादल बसु : विभिन्न पांडुलिपियाँ ‘आनंद’ में जमा होती थीं और छपती थीं ‘गौरांग प्रेस’ में। प्रकाशन और मुद्रण संस्थान अलग-अलग थे। मेरा काम था पूरे व्यापार को समन्वित करना। धीरे-धीरे लेखकों के साथ योगायोग का काम भी आरंभ हो गया।

सुनील गंगोपाध्याय : इसका अर्थ है कि आपके ऊपर छापाख़ाने का दायित्व भी था?

बादल बसु : हाँ।

सुनील गंगोपाध्याय : और रचनाओं का जुगाड़ करना तथा लेखकों से योगायोग करने का काम शुरुआत में कौन करता था?

बादल बसु : शुरुआत में यह काम फणीबाबू करते थे। लेकिन यहाँ पर एक सुविधा थी, उस अर्थ में रचनाओं का जुगाड़ नहीं करना पड़ता था, कारण, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपी रचनाएँ अपने आप आ जाती थीं हमारे पास, उन्हीं को छापा जाता था। लेख अथवा रचना लेने जाने की कोई वैसी ज़रूरत नहीं पड़ती थी और कुछ रचनाएँ तो जमा रहती थीं—पब्लिसर्श के कमरे में।

सुनील गंगोपाध्याय : अच्छा, सागर दा क्या उस समय ‘आनंद पब्लिशर्स’ के साथ जुड़े थे?

बादल बसु : नहीं। यहाँ एक बात बता दूँ, ‘देश’ पत्रिका में ‘आनंद पब्लिशर्स’ के पच्चीस वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में एक सप्लीमेंट निकला था। पाठकों को वहाँ से अनेक तथ्य मिल जाएँगे। कई लोगों ने उसमें लिखा था—सत्यजित रे, और आपने भी तो लिखा था…

सुनील गंगोपाध्याय : हाँ, लिखा था। लेकिन मुझे याद है कि बाहर से भी उस समय रचनाएँ आती थीं। मैंने एक कहानी सुनी थी कि बनफूल ने अपनी एक साथ पाँच पुस्तकें दी थीं ‘आनंद पब्लिसर्श’ के द्वारा छपाने के लिए। उन्हें छापा जाए या न छापा जाए, इसका निर्णय कौन लेता था?

बादल बसु : उसका निर्णय करते थे फणी बाबू। सागर बाबू की राय ली जाती थी। सागर बाबू सुझाव देते थे, फिर भी सब कुछ थे—फणी बाबू।

सुनील गंगोपाध्याय : बहुत अच्छा, पर अशोक कुमार सरकार तो उस समय जीवित थे। वह क्या इन सब विषयों में अपना दिमाग़ लगाते थे?

बादल बसु : नहीं, वह अपना दिमाग़ एकदम नहीं लगाते थे। पर क्या छापा जा रहा है, इसकी जानकारी रखते थे।

सुनील गंगोपाध्याय : फिर आप प्रारंभ में प्रोडक्शन के कामकाज की देखभाल किया करते थे। आप अनुभवी जानकार होते जा रहे थे। प्रोडक्शन के तो अनेक पक्ष होते हैं, सिर्फ पुस्तकें छापना नहीं, कागज चुनने जैसे अन्य काम भी…

बादल बसु : उसे तो मैं ही चुनता था।

सुनील गंगोपाध्याय : आपकी क्या अपनी बाइंडिंग की व्यवस्था थी?

बादल बसु : नहीं, वह तो बाहर से ही करानी पड़ती थी। कई बाइडंरों को काम दिया जाता था।

सुनील गंगोपाध्याय : और कवर डिज़ायन?

बादल बसु : विभिन्न चित्रकारों के घर जाकर उस संबंध में बात करता था। बहुत-सा काम तो पूर्णेंदु पत्री किया करते थे।

सुनील गंगोपाध्याय : इसका अर्थ यह हुआ कि प्रोडक्शन के सारे कामों को आपको ही देखना पड़ता था। यही बात है न? और सिर्फ़ यही नहीं, ‘आनंद पब्लिशर्स’ के पुस्तक प्रोडक्शन में आपने एक नई दिशा खोल दी थी। अर्थात् बांग्ला पुस्तकों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाने के क्षेत्र में बादल बसु का विशेष अवदान है। मैं यहाँ यह ज़रूर कहूँगा कि अच्छे स्तर का सबसे पहले प्रोडक्शन शुरू किया था ‘सिगनेट प्रेस’ ने। एक और संस्थान जिसका नाम है—‘विश्वभारती’। खेद का विषय है कि ‘सिगनेट प्रेस’ अधिक दिनों तक चल नहीं पाया और ‘विश्वभारती’ वहीं का वहीं बना रहा, उसमें कोई बदलाव नहीं आया। उसके बाद ‘आनंद पब्लिशर्स’ ने आकर एक क्रांति मचा दी। उसके नेपथ्य में थे बादल बसु, और भी एक चीज़ लक्षित की है, कुछ लेखकों को हैंडिल करना मुश्किल होता है। कोई-कोई लेखक नुक़्ताचीनी करने वाले होते हैं। किसी की रचना प्राप्त करना कठिन होता है, जैसे : बुद्धदेव बसु। चिरकाल से ही हम सुनते आए थे कि बड़ी नुक़्ताचीनी करने वाले हैं—प्रूफ़ देखना, सब कुछ छान-बीनकर, गहरी दृष्टि से पढ़ना… इस संबंध में क्या आपका कोई अनुभव है?

बादल बसु : हाँ, उसे बड़ी सांघातिक अनुभूति कहा जा सकता है। बुद्धदेव बसु का काव्य-नाटक हम लोगों ने प्रकाशित किया था। उनमें पहला था—‘तपस्वी ओ तरंगिणी’। छोटी-सी पुस्तक, चार-पाँच फ़र्मे की। वह संभवतः उन दिनों रहते थे नाकतला में। मैं चूँकि एक साइकिल हरकारा का काम करता था, इसलिए बुद्धदेव बाबू को प्रूफ़ भेजने पड़ते थे—फर्स्ट प्रूफ़ से लेकर प्रिंट ऑर्डर तक, सभी तरह के प्रूफ़।

सुनील गंगोपाध्याय : इसका अर्थ है कि वह चार-पाँच प्रूफ़ देखा करते थे?

बादल बसु : चार-पाँच प्रूफ़ तो देखते ही थे और अनेक तरह की नुक़्ताचीनी भी किया करते थे। एक बार एक मज़ेदार घटना हुई। बार-बार प्रूफ़ भेजने पड़े। एक दिन मैंने ही अपनी बुद्धि से एक उपाय निकाला। सारे फ़र्मों का प्रिंट ऑर्डर जब रेडी हो गया, मैं आनंद बाज़ार गया। ‘देश’ पत्रिका के जो प्रूफ़ देखते थे, उन्हीं राधाकांत जी के पास जाकर उनके पैरों में पड़ गया। उनसे कहा कि इस रचना में कुछ भूलें आपको निकाल लेनी होंगी। उन्होंने कहा कि बुद्धदेव बसु का देखा हुआ प्रूफ़ है, इसमें कोई भूल नहीं है। मैं भूलें नहीं निकाल सकता। मैं फिर भी उन पर ज़ोर डालता रहा कि देखिए न दो-एक भूलें तो बिल्कुल होंगी। आपको ज़रूर मिल जाएँगी। मैं प्रूफ़ वहीं छोड़कर भाग आया। इसके दो-एक दिन बाद राधाकांत बाबू बोले कि प्रूफ़ देख लिया है, ले जाइए। मैंने देखा कि हर फ़र्मे में तीन-चार भूलें। समझ गए आप। मैंने तब क्या किया, प्रूफ़ों को तब बुद्धदेव बाबू के पास भेजकर कहा कि देखिए, वह एक अनाड़ी व्यक्ति है जिसने ये प्रूफ़ देखे हैं, ठीक-ठाक हैं या नहीं, पता नहीं, आप एक बार देख लें, ऐसा उसने कहा है। उन्होंने प्रूफ़ देखकर मुझे एक चिट्ठी लिखी कि भविष्य में मेरे सारे प्रूफ़ यही भद्र व्यक्ति देखेगा।

सुनील गंगोपाध्याय : इसका अर्थ है कि उनसे भी भूलें हो जाती थीं!

बादल बसु : भूल एकदम होगी ही नहीं, यह कभी नहीं कहा जा सकता है। उसके बाद भी बुद्धदेव बाबू की किसी रचना में कोई भूल नहीं हुई, यह भी नहीं कहा जा सकता है। काम करते-करते हम लोग यह समझ गए थे कि पूरी तरह से त्रुटिरहित रचनाओं को हम लोगों ने छापा, फिर भी उनमें कोई न कोई भूल रह ही जाती है।

सुनील गंगोपाध्याय : पहले तो ये सब भूलें काफ़ी अधिक होती थीं, टूटे टाइप, शायद आपको याद हों। आजकल तो टूटे टाइप जैसी कोई चीज़ है ही नहीं। उसके बाद संयुक्ताक्षरों की गड़बड़ी होने लगी… ख़ैर जो भी हो, और एक व्यक्ति के पास आपको नियमित रूप से जाना पड़ता था, अन्य लेखकों की तुलना में कई बार, उनका नाम है—सत्यजित रे, क्यों जाना पड़ता था?

बादल बसु : इस मामले में सत्यजित बाबू के बजाय हमारी ग़र्ज़ अधिक थी। मैं जाता था रात साढ़े नौ अथवा दस बजे, कारण, उसी समय उन्हें एकांत में पाया जा सकता था। उस समय वह बुरी तरह व्यस्त रहते थे और बाह्य जगत के साथ उनका कोई योगायोग था ही नहीं। पर कलकत्ता के क्या हालचाल हैं और नई पुस्तकों के बारे में रात के उसी समय सारी ख़बरें लिया करते थे। उन्हें पुस्तक ले जाकर दिखाया करता था। प्राय: बारह बजे तक नियमित रूप से बातचीत चलती रहती थी। मैं और एक व्यक्ति और उस समय रहते थे, वह थे—निमल्यि आचार्य। सिर्फ़ गपशप ही नहीं, बैठे-बैठे ही वह कवर डिज़ायन बना देते थे, दो लाइनें लिख भी देते थे, लिखने के अलावा भी तो उन्हें अनेक काम करने पड़ते थे।

सुनील गंगोपाध्याय : यह तो ठीक है, पूरा विश्व जब उन्हें एक विख्यात फ़िल्म निर्देशक के रूप में पहचान रहा हो, भारत के सर्वाधिक उल्लेख-योग्य निर्देशक, सिने संसार को नया मार्ग दिखाने वाले… उस समय भी उन्होंने वाशिंगटन में एक साक्षात्कार में यह कहा था कि मेरी घर-गृहस्थी तो पुस्तकें लिखकर चलती है। उनकी ख़ुद की पुस्तकों की असाधारण बिक्री थी—सुकुमार राय की पुस्तकों की रॉयल्टी इसका अर्थ है। पुस्तकों से उन्हें काफ़ी आमदनी होती थी। इसलिए पुस्तकों के बारे में उनका आग्रह तो रहेगा ही।

बादल बसु : तो फिर संक्षेप में मैं एक कहानी कहता हूँ। सत्यजित रे की पहली पुस्तक हम लोगों ने छापी थी—‘बादशाही अँगूठी’। उस समय उसकी क़ीमत थी तीन या चार रुपया। एक वर्ष की बिक्री के बाद चेक और पूरा ब्यौरा लेकर मैं उनके घर गया था। उन्होंने पूछा कि यह क्या है? मैंने कहा कि आपकी पुस्तक की बिक्री हुई है, उसके ही संबंध में चेक और उसका ब्यौरा है। यह कहते हुए कि लिखने से भी पैसा मिल सकता है, उन्होंने चेक ड्रॉअर में रख लिया और बोले कि जाने दो, मेरी एक छोटी-सी पत्रिका है, उसी के काम आएगा।

सुनील गंगोपाध्याय : संदेश?

बादल बसु : हाँ, उन्होंने ‘संदेश’ की ही बात कही थी। तो यही हुई उनके भुगतान की शुरुआत। शुरुआत में तो वह इसकी अवज्ञा करते रहे थे, पर बाद में—आपने जो कहा—उन्होंने वही कहा था कि पुस्तकें लिखकर ही उनका परिवार चलता है।

सुनील गंगोपाध्याय : सत्यजित रे के पास आपका जाना क्या बिना रोक-टोक होता था?

बादल बसु : कोई कम्पलसरी व्यापार नहीं था… जिस तरह से ‘देश’ पत्रिका का काम भी मुझे करना पड़ता था। सागर दा भेजा करते थे। ख़ूब मज़ा करते थे सत्यजित बाबू, कहा करते थे कि समझ गया, सागर दा ने चिट्ठी भेजी होगी। यही मेरा लास्ट इयर है। इस तरह की कितनी ही चिट्ठियाँ हैं मेरे पास—मानिक तुम अमुक तारीख़ तक अपना लेख दे दो। यही मेरा अंतिम वर्ष है। …और भी कई मज़ेदार कहानियाँ सुनाया करते थे। मेरी बातें भी वह मन से सुना करते थे। पुराने दिनों की बातें किया करते थे और जब कोई नई किताब उनके पास आ जाती थी तो मुझे दिखाया करते थे कि इस तरह का प्रोडक्शन होना चाहिए।

सुनील गंगोपाध्याय : ये सब चीज़ें तो वह जानते ही थे, कारण, स्वयं कमर्शियल आर्टिस्ट थे, विज्ञापन जगत से जुड़े हुए थे, प्रोडक्शन के बारे में उनकी जानकारी थी ही। इसके अलावा टाइपोग्रॉफी का भी…

बादल बसु : बड़ा गहरा ज्ञान था। टाइपोग्राफी तो वह स्वयं ही करते थे। रे-रोमन नामक उन्होंने एक टाइप तैयार किया था।

सुनील गंगोपाध्याय : ‘आनंद बाज़ार’ के प्रथम पृष्ठ पर छपने वाला मास्टर हेड भी तो उन्होंने ही बनाया था। क्या ऐसा नहीं है?

बादल बसु : नहीं। ‘आनंद बाज़ार’ का नहीं। ‘देश’ का मास्टर हेड, जो आजकल छापा जा रहा है, सत्यजित बाबू ने ही बनाया था ।

सुनील गंगोपाध्याय : अच्छा अब एक अन्य प्रसंग में आया जाए, आप ऑफ़िस किस समय जाते थे?

बादल बसु : वैसा कोई बँधा हुआ समय नहीं था, नौ भी हो सकता था और दस भी हो सकता था और लौटता था रात बारह बजे।

सुनील गंगोपाध्याय : इसी बीच में आपने विवाह कर लिया। ससुराल में किसी ने कहा था कि यह लड़का तो घर में ही नहीं रहता, रात होने पर ही घर लौटता है?

बादल बसु : हाँ, ऐसा तो कहा ही गया था और विवाह तो मैंने किया ही नहीं, इस समय तो यही कहना पड़ेगा। असल में घर में अशांति के कारण हमें विवाह करना पड़ा था। उस समय मुझे सात सौ रुपया महीना मिलता था, रहता था पाइका पाड़ा में। मेरी बहू के एक मौसा ने कहा था कि यह लड़का बड़े सवेरे निकल जाता है, चबूतरे पर अड्डाबाज़ी करता है, जल्दी-जल्दी घर बदलता है, कभी कहता है कि सिकदार बाग़ान में रहता है, कभी कहता है कि मिल्क कॉलोनी में रहता है, अब पाइका पाड़ा में आ गया है… इतनी जल्दी-जल्दी घर बदलना तो अच्छा नहीं है। उन्होंने कहा था कि इस लड़के के बारे अच्छी तरह से पता लगा लीजिए। ये सब बातें मुझे बाद में मालूम हुईं। पर बहू की माँ देश में ज़मीन-जायदाद है, यह सुनकर ख़ुश ही हुई थी।

सुनील गंगोपाध्याय : नई बहू ने घर आकर क्या कहा? यूँ नहीं कहा कि शाम को मुझे लेकर सिनेमा दिखाने चलो?

बादल बसु : नहीं। इस तरह की कोई बात मुझे नहीं सुननी पड़ी। फिर भी अगर मैं इतनी मेहनत न करता तो जीवित ही नहीं रह सकता था। अगर मैं दस से पाँच तक का ऑफ़िस करता, तो मुझे दूसरे जिस तरह जीवन बिता रहे हैं, मुझे भी उसी तरह से जीवित रहना पड़ता। मेरा भी एक्सट्रा एक स्वार्थ था, और उसके साथ-साथ कंपनी के लिए भी समय देता था… यही और क्या। इसी तरह से चलता रहा और अब तो दादू (पितामह) हो गया हूँ।

सुनील गंगोपाध्याय : आनंद से तो पहले बहुत थोड़ी संख्या में पुस्तकें प्रकाशित होती थीं, उसके बाद यह संख्या एकदम बढ़ जाती है, तब आप उसे कैसे सँभालते थे?

बादल बसु : शुरुआत में तो हमारे पास बहुत कम लोग थे। बाद में एक सुविधा हो गई, फ़ाइल-आइल समाप्त हो जाने पर जो डी.टी.पी. आ गया…। सब सुरक्षित बना रहता था। विशेषकर रिप्रिंट के समय यह बहुत काम देता था। कारण नई पुस्तक के स्थान पर रिप्रिंट अधिक होता था। एक सौ अगर नई पुस्तकें हों तो रिप्रिंट होंगी दो सौ। अगर यही काम पुरानी पद्धति से करना पड़े तो बड़ी समस्या खड़ी होती थी। अब प्रूफ़ देखने की स्थिति तक, सब कुछ मशीन में ही बना रहता है। लेखक यदि कुछ बदलाव करता है, वह आसानी से कर लिया जाता है। अब हालत यह हो गई है कि प्रूफ़ देखने का काम भी कंप्यूटर पर ही हो जाता है। वर्तनी तक चेक कर देगा। अँग्रेज़ी में तो है ही, बांग्ला में भी हमारे हाउस में यह प्रयास किया जा रहा है।

सुनील गंगोपाध्याय : पुस्तकों की संख्या, लेखकों की संख्या तो बढ़ने ही लगी है। इसके बाद कविताओं की पुस्तकें छापनी शुरू कीं, फिर कवि लोग तो थोड़े सख़्त और जटिल लोग होते हैं—थोड़े सनकी जैसे। कोई कहता है कि आधी छपाई ही ग़लत हो गई है, कोई कहता है कि यह रचना दूसरे प्रकार से प्रस्तुत की जाएगी। कवि लोगों ने कभी कोई ऐसी झंझट तो खड़ी नहीं की?

बादल बसु : अरे बाबा, यह कोई कहने की बात है। एक स्पेस यदि इधर-उधर हो जाए, तो यह नहीं चल पाएगा। कारण स्पेस का भी एक अर्थ होता है। फिर प्रिटिंग का भी तो एक विज्ञान होता है, नाप-तौल के अनुसार तो चलेगा नहीं। तो फिर कैंची से काटकर वहाँ चिपका दीजिए, ऐसी बातें भी कवि लोग कहा करते हैं। वैसा करना भी पड़ता है। शक्ति (चट्टोपाध्याय) की जब कविता-पुस्तकें निकलती थीं, फुटकर काव्य-संकलन नहीं, ‘पद्य समग्र’ जब निकला, शक्ति ने इसका पहले नाम रखा था—‘कविता समग्र’। वह अपनी कविता को पद्य कहता था और लिखता है कविता-समग्र। मैंने ही उससे कहा था, अगर इसका नाम ‘पद्य समग्र’ हो तो कैसा रहे। तत्काल कोई निर्णय न कर पहले अपनी स्त्री मीनाक्षी से उसने पूछा फिर उसी नाम को उसने निश्चित कर लिया।

सुनील गंगोपाध्याय : शक्ति ने आकर कभी रुपया नहीं माँगा?

बादल बसु : वह तो उसने कई बार माँगा है, और अनेक तरह से माँगा है। शराब पीनी है, यह कहकर भी रुपया लिया है। शुरुआत में तो दिया जाता रहा, पर बाद में देना संभव नहीं हुआ।

सुनील गंगोपाध्याय : अच्छा, किसकी कविता की पुस्तक छापी जाएगी, किसकी नहीं, इसका निश्चय किस तरह किया जाता था? एक समय ऐसा था, जब मुझसे ही पूछा जाता था, और मैं बता देता था कि किसकी छापनी है, किसकी नहीं।

बादल बसु : परिचित कवियों की पुस्तक छापी जाए या नहीं, इसका तो कोई विचार था ही नहीं। उनकी तो छपनी ही थी, वे जो भी पुस्तक देते थे, वही हम लोग छाप देते थे। नए कवियों के मामले में ही चुनाव किया जाता था। वह तो आज भी किया जाता है।

सुनील गंगोपाध्याय : तब इसका यह अर्थ हुआ कि इतना लंबा जीवन पुस्तकों को लेकर ही बीत गया। बहुत से लेखकों के साथ आपके व्यक्तिगत संबंध बन गए हैं।

बादल बसु : हाँ, वह तो बन ही गए हैं। आपके साथ तो पूरा पूर्वी यूरोप घूम डाला, हंगरी, पोलैंड… उसके बाद जब आप चुनाव कवर करने गए थे तो मैं भी आपके साथ गया था। उसी वक़्त शायद आप दहीजुड़ी भी गए थे।

सुनील गंगोपाध्याय : यह जो प्रोडक्शन है, पुस्तक प्रकाशित करने के संबंध में इतनी सारी जानकारी आपने एकत्र कर ली, नए लोगों को क्या वह सब सिखाया है?

बादल बसु : ये सब चीज़ें असल में ज़बरदस्ती नहीं सिखाई जा सकती हैं। मेरे ऑफ़िस में दो-एक लोग बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। फिर भी इस समय इतनी निपुणता की ज़रूरत नहीं पड़ती है। पहले जिस तरह से कवर-डिज़ायन अगर बनानी हो, तो ब्लॉक बनाना पड़ता था, वह ब्लॉक मिला या नहीं… यह देखना पड़ता था। अब इस समय तो स्कैनर ही आ गया है, जो चित्र बनाया जाता है, उसी को स्कैन कर लिया जाता है। चूँकि मैंने दोनों पद्धतियों से काम किया है, इसीलिए यह कह सकता हूँ कि पहले का सिस्टम अधिक कठिन था।

सुनील गंगोपाध्याय : पुस्तकों की मार्केटिंग करने का जो पक्ष है, उसकी देखरेख किस तरह की जाती थी?

बादल बसु : मार्केटिंग का असल में जो पक्ष था, वह ‘देश’ पत्रिका में विज्ञापन के द्वारा पूरा किया जाता था। बांग्ला पुस्तकों के बारे में वही किया जाता था। अब अवश्य ‘आनंद पब्लिशर्स’ की कई फ़्रेंचाइज़ी हो गई हैं, विभिन्न जगह पर इसके विक्रय केंद्र खोले गए हैं। आनंद के वर्तमान मैंनेजिंग डायरेक्टर सुबीर मित्र वह काम अच्छी तरह से कर रहे हैं।

सुनील गंगोपाध्याय : बांग्ला पुस्तकों का प्रचार सदा से ही कमज़ोर रहा है, इस समय भी वैसा ही है। पुस्तकों का व्यापक प्रचार करना होगा, जिससे चारों ओर पुस्तकें फैल जाएँ। सिर्फ़ कॉलेज स्ट्रीट जाकर लोग पुस्तकें ख़रीदें, यह स्थिति स्वाभाविक नहीं है। हर दुकान पर पुस्तकें रखनी होंगी। हम लोग जिसे पंसारी की दुकान कहते हैं, अमेरिका में उन सबमें—सुपरमार्केट में—भी पुस्तकें मिलती हैं।

बादल बसु : यहाँ पर भी कई डिपार्टमेंटल स्टोरों में पुस्तकें रहती हैं।

सुनील गंगोपाध्याय : फिर भी पाठकों की संख्या, विशेषकर बांग्ला पुस्तकों के पाठकों की संख्या कम होती जा रही है, क्योंकि अँग्रेज़ी की पुस्तकें पढ़ते हैं, इस वजह से?

बादल बसु : अँग्रेज़ी पढ़ते हैं, टी.वी. देखते हैं, बच्चों पर लिखने-पढ़ने का दबाव है, इसलिए उन्हें कहानियों की पुस्तकें पढ़ने का समय नहीं मिलता है।

सुनील गंगोपाध्याय : बाल साहित्य पर ज़ोर देना उचित है। मुझे लगता है कि प्लास्टिक की पुस्तकें तैयार हों जिससे बच्चे उन्हें फाड़ न सकें। थ्री डायमेंशनल पुस्तकें भी बच्चों को अच्छी लगेंगी। प्रकाशकों को इस तरफ़ भी दृष्टि डालनी चाहिए।

बादल बसु : यह तो ठीक ही है। इस तरह की पुस्तकों को बाज़ार में लाने पर जो ख़र्च होता है, उसकी वजह से हमारे देश में उन्हें कितने लोग ख़रीद सकेंगे?

सुनील गंगोपाध्याय : एक वर्ग ऐसा है, विशेषकर शहर में, जिसके पास काफ़ी पैसा है। वे लोग उन्हें ख़रीद लेंगे। इसके अलावा छोटी-छोटी फ़िल्म की सी.डी. निकलनी चाहिए। एकदम छोटी हो। उनकी कुछ तस्वीरें देखते ही पढ़ने का आग्रह बढ़ेगा। ‘कैच देम यंग’ अर्थात् किशोरावस्था में ही उन्हें पकड़ लीजिए, इस तरह की एक कहावत है न। इस संबंध में आपका क्या विचार है?

बादल बसु : आप क्या एनीमेशन की बात कर रहे हैं? इस तरह का प्रयास हम लोगों ने किया नहीं है, ऐसा नहीं है, अवनींद्रनाथ ठाकुर की पुस्तक ‘क्षीरेर पुतुल’ (क्षीर की गुड़िया) पुस्तक के साथ ‘आनंद’ एक सी.डी. देता है और सत्यजित रे के ‘बॉक्स रहस्य’ का एक रेडियो नाटक भी प्रसारित हुआ है, उसका कैसेट दिया जाता है—पुस्तक के साथ। बड़े स्तर पर कुछ नहीं किया गया है, फिर भी प्रयास तो चल ही रहा है।

सुनील गंगोपाध्याय : यह जो आपको इतना अनुभव हुआ, आप इतने लेखकों के सान्निध्य में आए, बहुत-सी घटनाएँ हैं जिनको जानने की इच्छा पाठकों में हो सकती है, उनके लिए आपको अपनी आत्मकथा लिखनी चाहिए, अभी तक लिखी है, या आगे लिखने की योजना है, या लिख रहे हैं?

बादल बसु : स्मृति-कथा जैसी एक पुस्तक लिख रहा हूँ। अर्थात् मन में जब जो चीज़ आ जाती है, किसी तरह के काल-क्रम का अनुसरण किए बग़ैर, उसे नोट करके रख रहा हूँ। इस संबंध में मैं इतना ही कह सकता हूँ। आगे चलकर एक पूरी पुस्तक ही रूपायित करने की इच्छा है। देखा जाए प्रयास करके।

सुनील गंगोपाध्याय : कोई दुख, कोई खेद, किसी चीज़ को न पाने की ताड़ना क्या आपका पीछा करती है?

बादल बसु : न, न। जीवन में बहुत कुछ पाया है। इतना सब पाने की बात ही नहीं थी। विशेषकर जो लड़का भैंस की पीठ पर चढ़कर घूमा करता था। जो किशोर मशीनों को पोंछा करता था, उसने यह सब सपने में भी नहीं सोचा था, फिर भी मेरा परिश्रम ही मेरे जीवन में विजयी हुआ है।

सुनील गंगोपाध्याय : और एक प्रश्न : क्या लेखक लोग आपको चिट्ठी नहीं लिखते थे?

बादल बसु : वह तो लिखते ही थे, लगभग सारी चिट्ठियाँ मेरे पास सुरक्षित रखी हुई हैं। कौन नहीं है उन चिट्ठियों में? नीरद सी. चौधुरी, लीला मजूमदार, सुभाष मुखोपाध्याय, सत्यजित रे, अमर्त्य सेन, आलोकरंजन दासगुप्त, शंख घोष, दिव्येंदु पालित, शीर्षेंदु मुखोपाध्याय, रमापद चौधुरी, आप एवं और भी कई लोग… इस संग्रह को भी काम में लाने की इच्छा है, अपनी उस आत्मा-कथा में।

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बादल बसु (1937–2015) ने बांग्ला में संस्मरणों की एक वृहद पुस्तक लिखी है, जिसमें बांग्ला के लगभग सभी लेखकों पर संस्मरण हैं। सुनील गंगोपाध्याय (1934–2012) सुपरिचित बांग्ला साहित्यकार हैं। यह बातचीत अपने मूल स्वरूप में ‘बोइएर देश’ (जनवरी-मार्च 2009) में प्रकाशित हो चुकी है। इस बातचीत का बांग्ला से यह हिंदी रूपांतर प्रियंवद संपादित ‘अकार’ के 50वें अंक में पूर्व-प्रकाशित है और यहाँ वहीं से साभार है। रामशंकर द्विवेदी ने बांग्ला से हिंदी में अनेक अनुवाद किए हैं। अभी उनकी पुस्तक ‘भगिनी निवेदिता के चुने हुए पत्र’ प्रकाशित हुई है। वह उरई (उत्तर प्रदेश) में रहते हैं। उनसे rn_dwivedi@yahoo.co.in पर बात की जा सकती है।

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