बातें ::
नीलाभ
से
अविनाश मिश्र

साल 2015 के दिसंबर का वह कोई एक रविवार था। सर्द वक़्त जल्द ही अँधेरे में डूबने वाला था, जब मैं उनके उस घर में दाख़िल हुआ जो किराए का था। अपनी तीसरी पत्नी भूमिका द्विवेदी से लड़ाई-झगड़े और मार-पीट के बाद वह अंकुर विहार, ग़ाज़ियाबाद वाले अपने घर से भागकर यहाँ रह रहे थे। ठीक-ठाक किताबें, कम्प्यूटर, दवा-दारू और ज़रूरत की क़रीब-क़रीब सारी चीज़ें उनके आस-पास मौजूद थीं। इन दिनों में ही यास्मीन ख़ान नाम की एक महिला भी मेरठ से उनके यहाँ आवाजाही कर रही थी, जिसे वह अपनी मित्र कहकर मिलवाते थे और कहते थे कि इसके लिए मैं मुसलमाँ होने को भी तैयार हूँ। बाद में वह नीलाभ को बकौल उनके ही बर्बाद करके गई। यहाँ पेश बातचीत उनकी इस बर्बादी और भूमिका के साथ उनकी सुलह से कुछ पहले की है। इसे और तवील करने के मौक़े हमें नहीं मिले। 23 जुलाई 2016 को हुए नीलाभ के देहांत के बाद उनकी अंत्येष्टि से लौटकर जब मैं अगले रोज़ अलस्सुबह इसे टाइप कर रहा था, उनके साथ हुईं अब तक की सारी मुलाक़ातें-बातें-बहसें, उनकी अब तक पढ़ीं सारी लिखावटें और उनका चेहरा, एक पूरा जीवन मन-मस्तिष्क और सजल आँखों के आगे घूम रहा था। संभवत: कवि-लेखक-अनुवादक-संपादक नीलाभ से उनके व्यक्तिव और कृतित्व पर की गई यह अंतिम बातचीत (रिकॉर्डेड) है। इसका प्रथम प्रकाशन कवि-पत्रकार सिद्धांत मोहन के ब्लॉग ‘बुद्धू-बक्सा’ पर नीलाभ के इंतिक़ाल के अगले रोज़ ही यानी 24 जुलाई 2016 को हुआ था। बाद में यह बातचीत वहाँ से कई जगहों पर लिफ़्ट की गई।

— अविनाश मिश्र

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नीलाभ │क्लिक : रौनक़ व्यास

एक लंबी आयु आप संसार और साहित्य में जी चुके हैं, ऐसे में एक बेहद प्रचलित और कुछ ग़ैरइंसानी-सा सवाल है आपसे जिसे कई संवाददाता अक्सर आपदाओं या अनहोनियों के बाद उत्तरजीवियों से पूछते हैं कि कैसा महसूस कर रहे हैं?

देखो, ऐसा है कि हमने कभी चाहा तो नहीं कि हमारे जीवन में आपदाएँ आएँ, कोई नहीं चाहता है। हमने बस अपने ढंग से जीवन जीने की कोशिश की। हमको इसका मलाल भी नहीं है। लेकिन दो चीज़ों में हमसे ग़लती हुई। जैसे, हमें अपना इलाहाबाद वाला घर नहीं बेचना चाहिए था। उस घर में जब हम साढ़े तीन बरस के रहे होंगे, तब आए। जब 2010 में हमने उसे बेचा तो समझो हम पैंसठ के थे। इसका मतलब उस घर में साठ बरस से भी ऊपर हम रहे, मगर पते मेरे बहुत रहे। एक दिन इधर मैंने लिस्ट बनाई तो मुझे पता चला कि बाईस जगहों पर मैं रह चुका हूँ, जहाँ बाक़ायदा मेरी डाक आती-जाती रही। मैं लंदन भी रहा। लेकिन इतने सारे ठिकानों में भी मेरा इलाहाबाद वाला घर था। केवल इधर तीन ठिकाने ऐसे रहे, जहाँ मैं उस घर को बेचने के बाद रहा। इनमें दो ठिकाने बुराड़ी और एक अंकुर विहार, ग़ाज़ियाबाद।

इलाहाबाद वाला घर बेचना इसलिए भी एक ग़लती था, क्योंकि अपना एक ठिया होना चाहिए। वह मेरा घर नहीं, मेरा क़िला था। मैं जहाँ भी जाता था, जब भी परेशाँ होता था, लौटकर उसी घर में आता था। जबकि ईस्ट ऑफ़ कैलाश वाला घर भी मेरे पास था। लंदन वाला घर भी था।

ये दोनों घर अब भी हैं?

लंदन वाला बेच दिया और ईस्ट ऑफ़ कैलाश वाला घर मेरी पत्नी का है। जैसे अंकुर विहार वाला घर अब भूमिका का है। मैं तो नहीं कहता उससे कि मैं अपने घर आऊँगा, मैं तो कहता हूँ कि मैं तुम्हारे घर आऊँगा।

ईस्ट ऑफ़ कैलाश वाला घर आपकी दूसरी पत्नी का है?

नहीं, मेरी पहली पत्नी का।

और बुराड़ी वाला?

वह तो मेरा था। मैंने और मेरी दूसरी बीवी ने मिलकर लिया था, लेकिन उसकी डेथ हो गई। बच्चों ने अपना हिस्सा लेकर बाक़ी एक तिहाई मेरे नाम कर दिया और मैंने भूमिका के। इसका कोई मलाल नहीं है।

दूसरी ग़लती?

भूमिका से शादी करना। वह भी बिना सोचे-समझे, बिना ज़्यादा वक़्त अदा किए। उस वक़्त मैं इमोशनली बहुत हिला हुआ था। अगर वह अच्छी निकल गई होती तो आज सारे लोग मुझसे रश्क कर रहे होते। लेकिन वह अच्छी नहीं निकली। इसमें दोष मेरा ही है। मुझे और ज़्यादा वक़्त देकर और ज़्यादा परखकर शादी करनी चाहिए थी उससे। बस अब यही और बहुत आज़ाद महसूस कर रहा हूँ। मैं तो उससे कई बार कहता हूँ कि तुम मुझसे तलाक़ लो और किसी अच्छे आदमी से शादी करो। तुम्हारी जो इच्छाएँ हैं, वे बहुत हैं। तुम उम्दा से उम्दा गहने चाहती हो। उम्दा से उम्दा घर चाहती हो। उम्दा से उम्दा घूमना-फिरना चाहती हो। कार-मोटर चाहती हो…। ये सब मैं एक सीमा तक ही दे सकता हूँ। तुम सोचकर आईं कि कोई बहुत मालदार आदमी होगा। वह तो मैं हूँ नहीं। तुमने जो कहा था उस पर तुम टिकी नहीं। तुमने कहा था कि मैं तो पेड़ के नीचे भी आपके साथ रह लूँगी। ठीक है, तुम्हारे पास अच्छा-ख़ासा दहेज़ हो गया है, अस्सी-नब्बे लाख का मकान हो गया है। अभी बिक नहीं रहा, लेकिन जब मार्केट उठेगी तब वह अस्सी-नब्बे लाख का घर है, बल्कि इससे ज़्यादा का ही। इसके अलावा गहने हैं बारह-पंद्रह लाख के। क़रीब चार-साढ़े चार लाख रुपए हैं। फ़र्नीचर है मेरा सारा वहाँ, वह भी आज बनवाने जाओ तो क़रीब दस-बारह लाख का होगा। तो तुम्हारे पास अच्छा-ख़ासा दहेज़ है, तुम दूसरे से शादी कर लो। मुक्ति दो मुझे और ख़ुद भी मुक्ति पाओ। इस अज़ाब में क्या रखा है।

बहरहाल, यही दो गलतियाँ हैं। महसूस तो मैं अच्छा करूँगा, अगर भूमिका मुझे तंग करना बंद कर दे।

आपने कहा कि आज़ाद महसूस कर रहे हैं अब?

आज़ादी से तो मैं कोई समझौता कर ही नहीं सकता। क्योंकि कभी मेरी आज़ादी में कोई ख़लल नहीं डाला गया। मैं सबसे छोटा था घर में। लेकिन मेरे पिता मुझे बहुत मानते थे। चूँकि उन्होंने और मेरी माँ ने शुरू से ही मुझे बहुत कर्तव्यनिष्ठ बनाया। छोटा होकर भी मुझे बहुत कुछ देखना पड़ता था। आज भी जब मेरे घरवालों को ज़रूरत पड़ती है तो मैं उनके काम आता हूँ। बहुतों को मैंने काम दिलाया। दिक़्क़त यह है अविनाश कि यह है प्रयोजनमूलक हिंदी का युग, तो निष्प्रयोजन कोई आपसे दोस्ती नहीं रखता और मैं निष्प्रयोजन दोस्ती का क़ायल हूँ। दूसरी चीज़ है कि दोस्ती में जो यार होता है, उसका अच्छा और बुरा आप दोनों स्वीकार करते हैं। यह तो नहीं होता कि अच्छा-अच्छा ले लें और बुरा-बुरा छोड़ दें। बहुत सारे हमारे दोस्तों में गड़बड़ियाँ रही हैं, लेकिन हम उनकी अच्छाइयों को याद करते हैं। दोस्त तो वही है जो आपको रोक दे।

एक बार मैं पाकिस्तान जाने के चक्कर में था तो मुझसे मेरे पुराने डायरेक्टर ने कहा कि ये इंदिरा गांधी पर दो डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में हैं, इनकी स्क्रिप्ट लिख दो और वॉयसिंग कर दो। मैंने कहा कि इंदिरा गांधी से तो हमारा झगड़ा है।

आपके डायरेक्टर कौन थे?

रमेश शर्मा जिनके साथ मैंने पहले एक सीरियल बनाया था ‘कसौटी’… तो मैंने उनसे कहा कि ये तो हमारे धर्म में ही नहीं है। वह बोले कि नहीं ये फ़िल्में सेकुलरिज़्म पर हैं। इंदिरा गांधी की आपको कोई तारीफ़ नहीं करनी है। हाँ, उनके परिप्रेक्ष्य में ये ज़रूर हैं। मैं यह काम करके लंदन से पाकिस्तान चला गया। लौटा तो मुझे आनंद स्वरूप वर्मा ने फ़ोन किया कि भई ये तुम क्या कर बैठे। मैंने कहा कि यार ये ग़लती हो गई मुझसे। दुबारा नहीं होगी। दुबारा ऐसा कुछ नहीं हुआ। इसलिए कम से कम दोस्त ऐसा हो जो ग़लती करने पर आपको डपट दे। हमदर्दी के साथ बता दे कि तुमने यहाँ ग़लती की। पर वे दोस्तियाँ अब हैं कहाँ? हैं नहीं। सारी महफ़िलें जा चुकी हैं।

मलाल होता है?

अपने किसी फ़ैसले पर मुझे कोई मलाल नहीं। बी.बी.सी. से लोग निकलना नहीं चाहते, मैं ख़ुद छोड़कर चला आया। वहाँ कोई इस्तीफ़ा नहीं देता है, इसलिए मैंने कहा कि ये रिकार्ड में दर्ज कर लीजिए कि नीलाभ इस्तीफ़ा देकर गया।

बी.बी.सी. में कोई इस्तीफ़ा नहीं देता?

नहीं देता। देखो, लोग पड़े हुए कार्यकाल पूरा होने के बाद भी। मैंने जब इस्तीफ़ा दिया तब मेरे दो साल बाक़ी थे और इसके बाद वे कह रहे थे कि परमानेंट कर देंगे।

वैसे मलाल होता है मुझे, संगीत न सीख पाने का। मुझे शुरू में ही संगीत सीखना चाहिए था। मेरे घर में बहुत सुंदर एक हारमोनियम था। आज भी है। भूमिका के पास छूट गया। वह जर्मन मेड है और मेरी माँ का है।

मैं अखाड़ेबाज़ी, बॉडी-बिल्डिंग, कुश्ती और न जाने क्या-क्या करता रहा। ये सब भी ठीक है, लेकिन इसके साथ-साथ मुझे संगीत भी सीखना चाहिए था। मैं देर से जाग्रत हुआ और वह भी मंगलेश डबराल की वजह से। मंगलेश की संगीत में दिलचस्पी बहुत थी। वह जब पड़ोस में रहने लगा, तब धीरे-धीरे हमने जाना कि शास्त्रीय संगीत क्या है। अँग्रेज़ी स्कूल में पढ़ा मैं तो जैज़ और अँग्रेज़ी संगीत सुनता था। जैज़ तो अब बिल्कुल क्लासिकल संगीत बन चुका है। लेकिन मैं अब महसूस करता हूँ कि मुझे अपना संगीत बहुत गहराई से सुनना और सीखना चाहिए था।

मंगलेश जी अच्छा गाते भी हैं?

हाँ, यही मानना चाहिए।

आपने सुना है?

हाँ, मैंने सुना है। कई बार सुना है। ठीक है कि वह दारू पीकर ही गाता है, जब एकाध पैग हो चुका हो।

और कोई मलाल नहीं?

नहीं। ये जो घर है किराए का है तो क्या हुआ हज़ारों-हज़ार लोग किराए पर रहते हैं। सुमित्रानंदन पंत ही सारी उम्र किराए पर रहे। हमारा तो बंगला इलाहाबाद वाला इतना बड़ा था कि एक पूरी कॉलोनी बस जाए। वह चौबीस सौ गज़ का था। फूल-पत्तियों का बहुत शौक़ है मुझे, लेकिन वह शौक़ भी अब जाता रहा। मलाल नहीं है लेकिन। यह शौक़ पूरा करना होगा तो किसी बाग़ में चले जाएँगे।

स्त्री-पुरुष संबंधों में आप वफ़ादारी या एकनिष्ठता को कैसे देखते हैं?

देखो, वफ़ादारी हमेशा दोहरी होती है। मैंने बहुत बदसूरत औरतों को बहुत ख़ूबसूरत मर्दों के साथ शादीशुदा रहते देखा है और इसमें पतियों को बहुत एकनिष्ठ भी पाया है। वह कौन-सी चीज़ है जो उन्हें बाँधे रखती है। ऐसा नहीं है कि उनके जीवन में अवसर नहीं आते। मैंने ही बहुत ख़ूबसूरत औरतों के पतियों को इधर-उधर मुँह मारते भी देखा है। इसलिए मैं समझता हूँ कि शादी का बंधन ही बेकार है। जब प्रेम रहेगा तो आदमी ख़ुद ही इतना बँधा हुआ रहेगा कि उसे दूसरी ओर जाने की ज़रूरत क्या है, जब तक कि वह कोई बिल्कुल ही पैथालॉजिकल केस नहीं है। मेरे तो बहुत सारे अफ़ेयर्स रहे पहली बीवी के ज़माने में जिसके साथ मैं अट्ठाईस साल रहा, बाक़ायदा शादीशुदा। दूसरी बीवी के साथ मैं अठारह साल रहा और मेरा एक भी अफ़ेयर नहीं हुआ, जबकि मैंने उसके साथ शादी भी नहीं की थी। हम लिव-इन में रहते थे।

पहली बीवी से आपके अलगाव की और उनके साथ रहते आपके दूसरे अफ़ेयर्स की वजहें क्या थीं?

देखो, जब तक मेरी बीवी मेरे प्रति एकनिष्ठ रही, यह ज़रूरी नहीं कि यह एकनिष्ठता किसी दूसरे मर्द से खंडित होती हो, जब उसने बच्चों को मुझसे ज़्यादा तवज्जोह देना शुरू की, तब मेरा महत्व घट गया। क्या ज़रूरत है फिर उसको मेरी। मेरे बच्चे उसके सामने ही मुझे कहने लगे कि आपको क्या समझ है। ठीक है फिर नहीं समझ है तो…। असल में दोष मेरी पहली पत्नी का नहीं था, उस परिवेश का था, जहाँ से वह आई थी। सवाल यह नहीं है कि वह कायस्थ थी और मैं ब्राह्मण था। सवाल यह था कि वह आई थी एक न्यूक्लियर फैमिली वाले सेट-अप से। सरकारी अफ़सर हो, कोई आई.ए.एस. हो, कोई सास-ससुर न हो, कोई सौतेलापन न हो कहीं। पति-पत्नी-बच्चे और उसी में रमना। पति आया ऑफ़िस से, रिलेक्स किया, चाय-वाय पी और फिर दोनों सौदा-सुलुफ़ लेने निकल गए। वहाँ से लौटकर आए खाना खाया, सो गए। लेकिन मेरी ज़िंदगी ऐसी नहीं थी। मैं एक कवि हूँ, लेखक हूँ। मेरी भिन्न दिलचस्पियाँ हैं। हालाँकि मेरी पहली बीवी बहुत गुणी थी। सारे स्त्रियोचित गुण थे उसमें, साथ ही वह बिजनेस भी मैनेज कर लेती थी। उसके साथ मेरी शारीरिक ज़िंदगी भी अच्छी थी। बस ज्वाइंट फैमिली सेट-अप में उसे दिक़्क़त होती थी। ज़ाहिर है कि जिस परिवार में आपका बड़ा भाई सौतेला हो और उसके साथ आपका अपने भाइयों जैसा संबंध हो, सौमनस्य हो तो यह तो होगा ही। हमारे घर में कुछ भी बँटा हुआ नहीं था और सबकी सारी ज़रूरतें पूरी होती थीं। लंदन जाने के बाद यह हुआ कि वहाँ वह मालकिन थी।

लंदन आप परिवार के साथ गए थे?

हाँ, पत्नी-बच्चे सब।

वहाँ आपकी पत्नी ख़ुश थीं?

हाँ, वहाँ तो वह एक लांड्री चलाती थी, उसकी मालकिन थी। बाद में उसे एक लाइब्रेरियन की भी जॉब मिली। लेकिन बाद में बहुत दिक़्क़तें हुईं। जब मैं सीरियल बना रहा था, तब वह बहुत क्रोनिक हो गई। क्योंकि मैं चाहता था कि वह यहाँ आकर रहे या कम से कम महीने में दस दिन तो रहे। लेकिन वह बिल्कुल भी नहीं आती थी। कभी बच्चे का ये देखना है, कभी बच्चे का वो देखना है, कभी फ़लाना, कभी कुछ… अरे वह बच्चा क्या था, अठारह-उन्नीस बरस का लड़का था अच्छा-ख़ासा।

बच्चों पर आप ध्यान नहीं देते थे?

ऐसा नहीं है, बच्चों पर मैं भी ध्यान देता था। लेकिन बच्चे आख़िर बच्चे होते हैं, उन्हें इस लायक़ बनाओ कि वे ख़ुद अपना ख़याल रख सकें। हमारी माँ कैसे बिजनेस करतीं, अगर इस सबमें ज़्यादा पड़तीं। हिंदी की पहली स्त्री प्रकाशक थीं वह। मेरी माँ खाना भी बहुत अच्छा बनाती थीं। उनसे अच्छा खाना और कोई नहीं बनाता। वह भी सब चीज़ों में माहिर थीं। मेरी पत्नी उनकी कॉपी थी एकदम। उसे तो किसी बड़े मिलिट्ररी अफ़सर की, किसी आई.ए.एस. की, किसी प्रिंसिपल की पत्नी होना चाहिए था। कहाँ वह पड़ गई मेरे जैसे फक्कड़ आदमी के पल्ले। ऐसे में दिक़्क़तें तो होनी ही थीं। कई बार बच्चों की वजह से होने वाली प्रॉब्लम्स को आप मुल्तवी भी कर देते हैं। लेकिन आप प्रेम तो ढूँढ़ते ही हैं, घर में नहीं तो बाहर। इससे एतराज़ नहीं होना चाहिए। आदमी किसी की प्रॉपर्टी नहीं होता है कि जिस पर हक़ जताएँ, उसके लिए लड़ें।

एक बार उसने मुझसे पूछा कि आप ये जो इधर-उधर इश्क़बाज़ी करते रहते हैं, अगर मैं करूँ तो…। मैं कहा कि पहली बात तो ये है सुलक्षणा कि अगर तुम्हारे ऊपर इतना ही इश्क़ सवार होगा तो तुम मुझसे पूछने नहीं आओगी। मैं तुम्हें अभी नहीं बता सकता कि तब मेरा क्या रिएक्शन होगा। हो सकता है कि मैं बिल्कुल नजरअंदाज़ कर दूँ, हो सकता है कि मैं बहुत नाराज़ हो जाऊँ। दरअसल, औरतें चाहती तो हैं बाज़ और शेर, लेकिन जब शेर मिलता है तो उसके गले में पट्टा पहना देती हैं। इसके बाद वह शेर नहीं रहता, कुत्ता बन जाता है और बाज भी पिंजड़े में आकर गौरैया से बदतर हो जाता है।

सर्कस का शेर भी नहीं?

सर्कस का शेर भी कुत्ता ही है, और बाज़ तो पिंजड़े में बुलबुल भी नहीं रह जाता, क्योंकि बुलबुल तो क़ैद में भी गाएगी। बाज़ नहीं गा सकता। उसकी फ़ितरत है उड़ना। यह दोनों के साथ है। एक लेडी बाज़ ले आइए और उसे पिंजड़े में डाल दीजिए, उसकी भी वही हालत होगी जो मर्द बाज़ की।

क्या आप हिंदीसाहित्यसंसार में ख़ुद को उपेक्षित महसूस करते हैं?

शिक़ायत तो ये लगभग सभी लेखकों को रहती है कि वे उपेक्षित हैं। मुझे भी है तो कौन-सी बड़ी बात है। क्या करिएगा। लेकिन मैं बिल्कुल ख़ुद को उपेक्षित महसूस करता हूँ। मैंने अपने साथियों से कमतर नहीं लिखा है। अगर निचोड़ सबका निकाला जाए तो मेरा बीस ही पड़ेगा। यहाँ तुम एक क़िस्सा सुन लो। मुझसे किसी ने एक दफ़ा पूछा कि भाई क्या करते हो? मैंने उससे कहा कि देखो भाई मैं सत्रह साल की उमर में एक औरत के भयंकर प्रेम में पड़ा। अज्ञेय से एक बार किसी ने पूछा था कि आप स्त्री में क्या देखते हैं? उन्होंने कहा था कि मैं उसे पीछे से देखता हूँ। उसकी गेट कैसी है, उसकी चाल कैसी है। जाहिर है कि यह उसके नितंबों के बारे में है। …तो मैंने एक औरत को अपने पास से गुज़रते देखा, सफ़ेद साड़ी में। मुझे वह बहुत मोहक-आकर्षक लगी। मैं उसके पीछे हो लिया कि देखूँ उसका चेहरा कैसा है। मैं तेज़ हो जाऊँ तो वह और तेज़ हो जाए। मैं धीमा हो जाऊँ तो वह भी धीमी हो जाए। बहुत दिनों तक यह चलता रहा। मैं ऊबिया गया। मैंने कहा कि ऐसी की तैसी में जाओ। मैं दारू में चला गया। फिर लौटकर आया तो देखा कि वह वहीं खड़ी है पेड़ के पास। फिर मैं उसके पीछे हो लिया। वह फिर आगे बढ़ गई। यह खेल चलता रहा। वह शक्ल दिखाने को राज़ी नहीं। मैंने कहा कि यार ये तो मानती ही नहीं। इससे क्या प्रेम करना। अबकी बार मैंने कहा कि चलो कहीं और लौंडियाबाज़ी-इश्क़बाज़ी करते हैं। उधर चले गए। लेकिन है वह बहुत ईर्ष्यालु, आपका इश्क़ कामयाब नहीं होने देती। फिर जब मैं उधर से घूम-फिरकर, तृप्त या अतृप्त जो कहो होकर आया, देखा फिर वह खड़ी है। फिर मैं उसके पीछे हो लिया। अगर मैं कहीं बैठ गया, तो वह भी बैठ गई। यह क्रम आज तक चल रहा है। वह मुड़कर देखती ही नहीं और हम कहते हैं कि बिना देखे तुम्हें हम मानेंगे नहीं। इसलिए समझो कि यह उपेक्षा उसी की है।

चेहरा नहीं देख पाए आप?

हाँ। समझो कि कौन है वह—दुर्गा और लक्ष्मी से ज़्यादा हठी। वह पूरा आदमी चाहती है। उसकी माँगें बहुत सख़्त हैं। उसकी चिंता से ऊपर आपने कोई और चिंता रखी तो वह बर्दाश्त नहीं करती है। वह चाहती है कि आप बस उसी के होकर रहें। फिर कहाँ जा सकता है भला आदमी, मर गया वह। बाक़ी साली ये कवि-संसार की उपेक्षा से मुझे क्या मतलब। तुम समझ गए न मैं किसकी बात कर रहा हूँ?

आपने उसे दुर्गा-लक्ष्मी से ज़्यादा हठी बताया है न, इससे सब समझ जाएँगे कि वह कौन है।

मैं उसे तंबूरेवाली कहता हूँ। अचानक एक रोज़ उसने अपने हाथों में तंबूरा पकड़ लिया। मेरे बाल पक गए हैं, लेकिन वह अब तक जवान है। अब इससे ज़्यादा क्या होगा भाई। अगर मेरी कविता में दम होगा तो पाठक मुझे जिला देंगे अविनाश। तुम्हें बताऊँ कि भास का ज़िक्र मिलता था, उनके नाटक कहीं नहीं मिलते थे। फिर 1912 के आस-पास तेरह नाटक मिले।

अभी सौ साल पहले मिले भास के नाटक?

हाँ, अभी। लोग दंग रह गए। कालिदास तो कवि हैं, नाटक तो भास के देखो। उनमें नाटकीय गुण कम हैं, लेकिन उनमें नाटक है। ‘उरुभंगम’, ‘पंचरात्रम्’, ‘स्वप्नवासवदत्ता’, ‘दरिद्र चारुदत्तम्’ जिसके शुरू के चार अंक हूबहू शूद्रक ने लिए ‘मृच्छकटिकम्’ में और आगे की कथा विकसित कर ली।

कालिदास के नाटक आपको पसंद नहीं हैं?

हैं, लेकिन उनके नाटकों में काव्य बहुत है, नाटक कम है।

आपकी नजर में मित्रता की परिभाषा क्या है?

हमारे पिताजी कहते थे कि मैत्री हमेशा एकतरफ़ा होती है। लेकिन हम इसे इस रूप में देखते हैं कि कुछ संबंध होते हैं जिन्हें आप बदल नहीं सकते। अब बाप-महतारी को आप क्या बदलेंगे। भाई-बहन, चाचा-चाची आदि को क्या बदलेंगे। लेकिन मित्र और बहुत संभव हो तो स्त्री आप ख़ुद चुनते हैं। इसलिए इन संबंधों को मैं बहुत बड़ा भी मानता हूँ। मित्रता में उसे बरतने और निभाने की सलाहियत होनी चाहिए। हालाँकि तुलसीदास मेरे प्रिय कवि नहीं हैं, लेकिन उनकी कुछ सूक्तियाँ मुझे बेहद पसंद हैं, जैसे कि ये : ”धीरज धरम मित्र अरु नारि/ आपद काल परिखिअहीं चारि।” ज़रूर ये सूक्ति उन्होंने संस्कृत से उठाकर पेली है। वह अद्भुत अनुवादक हैं। मतलब किसी को अनुवाद सीखना हो तो ‘श्रीरामचरितमानस’ से बेहतर कोई दूसरा ग्रंथ नहीं है। संस्कृत का मूल देख लो और देखो कि कैसे उसे अपना बनाकर तुलसी ने डाल दिया है। यह कौशल है। इसलिए कुशल कवि हैं तुलसी। बाक़ी तो ‘रामचरितमानस’ पॉलिटिकल ग्रंथ है, वह कोई धार्मिक किताब थोड़े ही है। तुलसीदास मामूली मेधा नहीं हैं। वह बहुत बड़े कवि हैं, लेकिन मुझे जायसी पसंद हैं। जायसी मुझे बहुत छूते हैं। उनकी अवधी, उनका विषय सब तुलसी से बहुत बेहतर है।

और ‘गीतगोविंद’?

ठीक है, थोड़ा पढ़कर देखा। छोड़ दिया। मन नहीं लगा उसमें। असल में बहुत ज़्यादा मीठा मैं खा नहीं पाता हूँ।

कैसी स्त्रियाँ आपको पसंद हैं?

बड़ा मुश्किल है यह बताना। निस्बतन अब मैं स्त्रियों का बड़ा पक्षधर हूँ। माँ से लेकर अब तक अगर इतनी स्त्रियों का प्यार न मिला होता तो मैं तो स्त्री-विरोधी हो गया होता। इसलिए मैं इस प्रश्न पर कह सकता हूं कि मुझे वे स्त्रियाँ पसंद हैं जो प्यार करना जानती हैं।

अकेलेपन से कितना डरते हैं?

मैं अकेले भी ठीक-ठाक रह सकता हूँ, लेकिन अकेले रहना अच्छा नहीं लगता।

मृत्यु से डरते हैं?

पता नहीं कैसे आएगी। अभी आई नहीं, जब आएगी तब देखा जाएगा। प्रेमचंद अचानक गए। लखनऊ में पी.डब्ल्यू.ए. की मीटिंग से लौटे और बीमार पड़ गए। शिवरानी देवी ने पूछा उनसे कि कुछ कहना है। उन्होंने कहा कि कुछ नहीं और मर गए। मेरे पिता बहुत तकलीफ़ में गए और नरेश मेहता हवा की तरह। पहली मृत्यु मैंने माँ के मौसा की देखी थी। दूसरी मृत्यु दूसरी जीवनसंगिनी की थी। उसे ब्लड कैंसर था। मैं उसे लेकर अस्पताल जा रहा था। उसने कहा कि राजा मैं बच तो जाऊँगी न? उसका नाम रानी था। मैं उसके ग़म से उबर नहीं पाया। वह अक्टूबर में गई, मैं मार्च तक नॉर्मल नहीं था।

आपसे आख़िरी सवाल भी पहले सवाल की तरह ही बहुत प्रचलित और रूढ़ है, इसे अक्सर पत्रकार किसी मामले में आदर्श बन चुकी शख़्सियतों से पूछते हैं कि आपकी ज़िंदादिली का राज़ क्या है?

मैंने अपने शरीर के साथ बहुत अत्याचार किया है, लेकिन इसे साधा भी बहुत है। कई दुःख हैं, लेकिन किससे कहूँ। रहीम याद आते हैं और नागार्जुन भी : ”चाहिए किसको नहीं सहयोग?/ चाहिए किसको नहीं सहवास?/ कौन चाहेगा कि उसका शून्य में टकराए यह उच्छ्वास?” यह वह कवि कह रहा है जो बौद्ध हो चुका है। मन कई बार बहुत अकेला पड़ जाता है। डिप्रेशन के दौर यूँ ही नहीं आते हैं। अचानक कभी फिर मन बहुत शांत होता है और अचानक फिर वही कोहराम। ये मन बहुत हिचकोले खाता है।

नीलाभ (16 अगस्त 1945-23 जुलाई 2016) हिंदी के समादृत साहित्यकार हैं।

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