बातें ::
मनीषा जोषी
से
गोपिका जडेजा
अँग्रेज़ी से अनुवाद : सरिता शर्मा

साल 1971 में गुजरात के कच्छ में जन्मी मनीषा जोषी गुजराती कवयित्री और लेखिका हैं। उन्होंने बड़ौदा के एम.एस. विश्वविद्यालय से एम.ए. करने के उपरांत मुंबई और लंदन में मुद्रण और टेलीविजन पत्रकार के रूप में काम किया है। उनकी कविताओं की तीन किताबें प्रकाशित हैं, जिनमें तीसरा संग्रह (2013) का शीर्षक ‘कंदमूल’ है। ‘कंदमूल’ को गुजरात साहित्य अकादेमी द्वारा प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इन दिनों वह संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में कैलिफोर्निया में रह रही हैं।

मेरी मनीषा से कभी आमने-सामने मुलाक़ात नहीं हुई। जब मैंने पहली बार उनकी गुजराती कविताओं को पढ़ा, तो मेरे मन पर उनका गहरा असर हुआ। लंबे शोध के बाद, मुझे गुजराती में लिखने वाली एक स्त्री मिली जो ऐसी भाषा बोलती थी जो मुझे समझ आती है और जिसमें मैं बोलना चाहूँगी। मनीषा की आंतरिक आवाज़ और उनका अतियथार्थवादी संसार गुजराती भाषा में अपूर्व है। मनीषा स्वयं को ‘स्त्रीवादी’ नहीं बताती हैं मगर फिर भी, उनकी कविता में स्त्री शरीर और मानसिकता को केंद्रबिंदु बनाने से गुजराती साहित्य में नए विमर्श का मार्ग खुलता है, जिससे स्त्रियों के लिए एक नए स्थान का निर्माण होता है।

मैंने नवंबर 2010 में उन्हें पहला ई-मेल भेजने से बहुत पहले से उनकी कविताओं को अनुवाद करना और उन्हें उनकी कविताओं के अपने अनुवादों को भेजना शुरू कर दिया था। मैं उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलकर रोशनी से भरे कमरे में बैठकर बात करना चाहती थी। लेकिन हमारे पास साइबरस्थल से यात्रा करती हुई पत्रों की रोशनी है। मैंने ये प्रश्न नवंबर के अंत में शाम को, जो जल्दी ही रात में बदल जाती है, अपने लैपटॉप पर टाइप किए थे। मनीषा ने अपने ई-मेल को कैलिफोर्निया की धूप में शनिवार की सुबह खोला और जवाब दिया।

[गोपिका जडेजा]

Manisha Joshi gujrati writer
मनीषा जोषी

गोपिका जडेजा

मैं सबसे पहले कच्छ में आपके बचपन के बारे में बात करना चाहूँगी। मुझे याद है कि ई-मेल में आपने बताया था कि हम दोनों की कच्छ की साझा यादें हैं। आपने कच्छ कब छोड़ा?

मनीषा जोषी

मैंने शुरुआती पढ़ाई ख़त्म करते ही बड़ौदा में कॉलेज में दाख़िला ले लिया था। मैं अब कच्छ जल्दी-जल्दी नहीं जा पाती हूँ, मगर कच्छ की स्थलाकृति मुझे अमूर्त विचार के रूप में आकर्षित करती है जो मुझ में अचल हो गई है। मैं उस जगह को बहुत याद करती हूँ, मगर जब मैं उसके बारे में लिखती हूँ तो मुझे समझ आता है कि मैं सिर्फ़ एक बाहरी व्यक्ति हूँ। बीतते हुए हर साल के साथ मैं अपने सुदूर अतीत को और अधिक आतुरता से याद करती हूँ और मैं बचपन में कच्छ की जिन जगहों पर गई थी, उनकी याद मन में और अधिक उभरती है। अपने जन्म के स्थान के बारे में भावुक हुए बिना मैं यह कह सकती हूँ कि कच्छ के विशाल बंजर भू-दृश्य ने मुझे अपरिचित परिवेश में जीने की सहनशक्ति दी है।

मैं प्रतिक्रियावादी लेखक नहीं हूँ, इसलिए मैं 2001 में कच्छ में आए भयंकर भूकंप के समय कुछ भी नहीं लिख सकी, मगर मैंने हाल ही में कच्छ का समुचित चित्र बनाते हुए कुछ कविताएँ लिखी हैं। मैंने कच्छ को समर्पित फेसबुक पेज को लाइक किया है और बहुत दूर कैलिफोर्निया में रहते हुए वहाँ के गाँवों के सब नामों और मार्गों और वहाँ होने वाली रोज़मर्रा की समस्याओं की जानकारी रखी है। मैं स्वयं को स्थायी अप्रवासी मानती हूँ और यह मेरी समांतर सच्चाई है। इसने मुझमें कच्छ और कैलिफोर्निया की दो एकदम भिन्न दुनियाओं में काम चलाने की क्षमता दी है।

गोपिका जडेजा

आप कच्छी और गुजराती भाषाओं में अंतर के बारे में कितनी सजग थीं?

मनीषा जोषी

मैं अपने विस्तृत परिवार के सदस्यों से कच्छी सुनकर बड़ी हुई हूँ और लोहाना समुदाय के हमारे पड़ोसी कच्छी बोला करते थे। मुझे कच्छी पसंद है क्योंकि यह उसे बोलने वाले लोगों की संस्कृति और सादगी के साथ-साथ भाषा की अपरिमार्जित और खुरदरी आत्मीयता को दर्शाती है। मुझे सिंधी भाषा भी पसंद है जिसे हमारे पड़ोसियों का एक परिवार बोला करता था और मुझे अब भी वह बूढ़ी दादी याद आती हैं जो मुझसे सिंधी में पहेलियाँ पूछा करती थीं। कच्छ में बड़े होते हुए मुझे कच्छी में ‘जेसल तोरलनी समाधि’ जैसी कहानियाँ और अनेक कच्छी लोकगीत और कहावतें सुनना अच्छा लगता था। मुझे लगता है कि कच्छी और सिंधी ज़मीन से गहराई से जुड़ी हुई हैं और उनमें एक अलग तरह की दिलेर संवेदनशीलता है।

फिर भी, गुजराती मेरी शिक्षा की भाषा बन गई और मैंने जो सारा साहित्य पढ़ा, जिसमें बच्चों का साहित्य, ‘कच्छमित्र’ में प्रकाशित धारावाहिक उपन्यास और स्तंभ, अन्य लेखकों की रचनाएँ और विश्व साहित्य के अनुवाद शामिल हैं—सब कुछ गुजराती में था। इसलिए मेरे मन में यह धारणा बस गई थी कि गुजराती अधिक परिष्कृत थी! मुझे महसूस होता था कि कच्छी ‘क्षेत्रीय’ भाषा थी और गुजराती अधिक सुसंस्कृत थी। इसे कहते हैं भाषाओं की राजनीति!

गोपिका जडेजा

क्या आपको लगता है कि आप कच्छी को लेखन भाषा के रूप में चुन सकती थीं?

मनीषा जोषी

मैं इतनी बढ़िया कच्छी बोलती हूँ कि उसमें लिख सकती हूँ, मगर घर पर मेरे माता-पिता गुजराती बोला करते थे, इसलिए मातृभाषा होने के कारण मैं स्वयं को गुजराती के अधिक क़रीब महसूस किया करती थी। मैंने अपने बचपन में कच्छ में अलग-अलग समुदायों को अलग-अलग तरीक़े से बोलते हुए सुना था। पटेल, रबारी, मुसलमान… उन सबकी अपनी-अपनी गुजराती थी जबकि भाटिया समुदाय बनिया समुदाय से भिन्न कच्छी बोला करता था। इस तमाम भाषाई उलझन में मुझे विनेश अंतानी के ‘प्रियजन’ और ‘पलाशवन’ जैसे उपन्यासों में संबल मिला जिन्हें मैंने बहुत पहले 10-12 साल की उम्र में पढ़ लिया था और शायद मुझे अपनी भाषा उस समय मिल गई थी।

गोपिका जडेजा

क्या बड़ौदा में रहने से आपके लेखन पर कोई असर पड़ा? आप किन कवियों के संपर्क में आईं?

मनीषा जोषी

मैं एम.एस. विश्वविद्यालय में बिताए कॉलेज के वर्षों को बौद्धिक जागृति का समय कहती हूँ। सितांशु महेता, गणेश देवी और बाबु सुथार जैसे प्रोफ़ेसर अपने पुस्तक संकलन मुझे बहुत उदारता से पढ़ने के लिए दिया करते थे। मैं छात्र होते हुए गुलाम शेख, प्रबोध पारीख, लाभशंकर ठाकर, नितिन मेहता, जयदेव शुक्ला, भोलाभाई पटेल और कई अन्य अच्छे लेखकों और समीक्षकों से मिली। मैं फ़ाइन आर्ट्स फ़िल्म क्लब की सदस्य भी थी, जहाँ मैंने विश्व की श्रेष्ठ फ़िल्मों को देखा। मैं उस युवा प्रभाववादी मन को अब भी याद करती हूँ। मेरी सितांशु से गाढ़ी मित्रता थी और मुझे उनके साथ पढने, लिखने और विचारों पर बहस करने के दिनों की याद आती है।

गोपिका जडेजा

आप छात्र के रूप में बड़ौदा, और पत्रकार के रूप में मुंबई और लंदन में रहीं और अब कैलिफोर्निया में बस गई हैं। आप किस वजह से यात्रा करके एक शहर से दूसरे शहर चली जाती हैं?

मनीषा जोषी

आप मुझे बेचैन आत्मा कह सकती हैं! यह सच है कि मैं स्वभाव से सैलानी हूँ। मुझे नई शुरुआत करना पसंद है। मैं अज्ञात को खोजना चाहती हूँ और देखना चाहती हूँ कि मेरा भविष्य क्या होगा। जैसा कि मैंने अपनी ‘प्रवासी’ कविता में लिखा है, यह लगभग ऐसा ही है, मानो मैं किसी शहर को अपनी ओर लुभाती हूँ और फिर उसे धोखा देकर वहाँ से निकल जाती हूँ।

मेरी शुरुआत कच्छ के एक छोटे से गाँव में हुई और तभी से, मैं मुंबई, ऑकलैंड (न्यूजीलैंड) लंदन और न्यूयॉर्क समेत विश्व भर के विभिन्न शहरों में अकेली रही हूँ।

सबसे पहले मुझे कच्छ में अपना गाँव इसलिए छोड़ना पड़ा था, क्योंकि नवीं कक्षा के बाद वहाँ आगे की पढ़ाई नहीं होती थी और मैंने आँसू बहाए, मगर धीरे-धीरे अपने बलबूते पर मैं ख़ुश रहने लगी। इसके लिए कुछ हद तक मेरा कच्छ में जन्म ज़िम्मेदार है। कच्छ के लोगों के लिए प्रवास बड़ी बात नहीं है। मैं कच्छ में प्रवासी पक्षियों, विशेष रूप से हर सर्दियों में साइबेरिया से आने वाले फ्लेमिंगो को निहारा करती थी और मुझे लंबी यात्रा का विचार बहुत मोहित करता था। मैं किसी से न जुड़ने के विचार से मुग्ध हो जाया करती थी और फिर मैंने कुछ फ्रांसीसी दार्शनिकों को पढ़ा तो मेरा विचार और भी पक्का हो गया।

मेरे पति दीपक साहनी से मेरी मुलाक़ात लंदन में हुई और मैं शादी के बाद उनके साथ रहने के लिए अमेरिका आ गई। वह दर्शनशास्त्र के प्रोफ़ेसर हैं और चूँकि वह ख़ुद इंग्लैंड में जन्मे हैं, वह संबद्धता के इन मामलों को समझते हैं! उनके लिए भारत साउथाल में है, जिसे लंदन का छोटा भारत कहा जाता है।

गोपिका जडेजा

भ्रमण ने आपके लेखन को किस प्रकार प्रभावित किया है? ‘निर्वस्त्र शहर’ कविता में मुझे निर्वासन और घर की तलाश का बोध नज़र आता है।

मनीषा जोषी

विश्व भर में भ्रमण ने मुझे एक व्यक्ति के रूप में बदल दिया है और मेरे लेखन को प्रभावित किया है। शुरू में मैं एकाकी थी और अब मैं पक्की जोगिन हो गई हूँ। मैं न्यूजीलैंड में भी रही थी और मैंने तौपो झील और रोटोरुआ जैसे सुंदर स्थानों की अकेले यात्रा की है। मैं शहरी हूँ, मगर न्यूजीलैंड में प्रकृति की विपुलता में मैंने ख़ुद को इस धरती पर परिदर्शक महसूस किया। अब मुझे अपना ख़ूबसूरत निर्वासन पसंद आने लगा है। मुझे घर की तलाश ज़रूर है, मगर मुझे पता है कि कोई घर नहीं है। जैसा कि हेराक्लिटिस ने कहा था, ‘‘कोई भी आदमी एक ही नदी में कभी दुबारा क़दम नहीं रखता है।’’ दूसरे शब्दों में जब आप किसी स्थान को छोड़ देते हैं, आप उसी जगह पर लौट नहीं सकते हैं। ‘घर’ का विचार चयनात्मक भाव विरेचन है। लेकिन इसके साथ ही, मैं उस काल्पनिक भूमि को अपने आपसे अलग नहीं कर सकती हूँ।

जैसा कि आपने देखा होगा, ‘निर्वस्त्र शहर’ में देशवासी या ‘स्थानीय’ होने का व्यर्थ प्रयास किया गया है। हाल ही में, मैंने अपने पति के साथ यूरोप के विभिन्न शहरों की यात्रा की है। मुझे याद है कि हम सुदूरवर्ती फ्रांस में एक छोटे से गाँव की सराय में बैठे थे और वहाँ कुछ स्थानीय लोग मद्यपान कर रहे थे और हँस रहे थे। मैंने उनकी तरफ़ बहुत ईर्ष्या से देखा! वे उस छोटे से गाँव में अपना पूरा जीवन कैसे बिता सकते थे? मुझे नहीं लगता है कि मैं ऐसा कर पाती। मुझे अप्रवासी की यातना से प्रेम हो गया है। यहाँ कैलिफोर्निया में मुझे भारतीय किराने की दुकान पर जाना पसंद है। ये स्टोर यादों के ज़िंदा संग्रहालय हैं। मुझे साबुन, तेल के कुछ पुराने ब्रांड नज़र आते हैं और समूचा भारत भागता हुआ मेरे पास आ जाता है।

गोपिका जडेजा

क्या पत्रकार होने की वजह से आपका लेखन प्रभावित हुआ है?

मनीषा जोषी

मुंबई और लंदन में मुद्रण और टेलीविजन माध्यम के लिए काम करना अच्छा अनुभव था। उन वर्षों में, मैंने अनेक मशहूर लोगों से बातचीत की, लेकिन सबसे ज़्यादा ख़ुशी मुझे मुंबई जैसे विशाल शहर के गली स्तर के अनुभव से हुई थी। मुझे समाज की विभिन्न परतें बहुत क़रीब से देखने को मिलीं और उसने एक लेखक के रूप में मुझे समृद्ध किया है। पत्रकार के रूप में मुझे पत्रकारिता की कहानियाँ लिखने की विधा बहुत दिलचस्प लगती थी। हालाँकि, अब मैं मुक्त महसूस करती हूँ कि मैं पेशेवर लेखिका नहीं हूँ और मैं मूडी कवयित्री होने का आनंद उठा सकती हूँ। शायद किसी दिन मैं पत्रकारिता की कहानी के बारे में छोटा-सा लेख लिखूँ, क्योंकि अब मैं उसे अधिक निष्पक्षता से देखती हूँ।

गोपिका जडेजा

आपकी अधिकांश कविताओं में देह और स्मृतियों का अन्वेषण किया गया है। आपने देह के बारे में लिखने की भाषा किस प्रकार विकसित की?

मनीषा जोषी

आप सही कहती हैं। मैं शरीर में सीमित हूँ और मेरे लिए याद बस कल्पना की उड़ान है। जैसा कि आप जानती हैं, हम उन चीज़ों को भी याद कर सकते हैं जो कभी घटित नहीं हुईं। मुझे हैरानी होती है कि किस प्रकार बहुत पहले की उस समय मामूली दिखने वाली कुछ चीज़ें यादों की सतह पर उभरकर नया शब्द-रूप स्थापित कर लेती हैं। आप कभी कल्पना नहीं करेंगे कि ऐसी मामूली याद इतने वर्षों बाद आपके पास लौट आएगी और उस ख़ास वातावरण से जुड़ी अजीब यादें साथ लाएगी… और जब अस्पताल में याददाश्त ख़त्म हो जाती है, सब कुछ सही परिप्रेक्ष्य में दिखने लगता है कि वास्तव में क्या महत्वपूर्ण था और क्या नहीं।

कवयित्री के रूप में मैं मन की छुपी हुई सच्चाइयों और तन की विलक्षणता का अनुसंधान करना करना चाहती हूँ।

गोपिका जडेजा

आप देह की पड़ताल और जाँच देह से परे अवचेतन के माध्यम से करती हैं। ऐसा क्यों है?

मनीषा जोषी

मुझे लगता है हमें मानव शरीर मिला है, लेकिन हमारा अवचेतन पशुओं वाला है। गुजराती के सुप्रसिद्ध समीक्षक चंद्रकांत टोपीवाला ने मेरी कविताओं का वर्णन ‘आदमी से भेड़िया और फिर मनुष्य बनने’ की प्रक्रिया के रूप में किया है। मुझे अनेक मानव भावनाओं की अभिव्यक्ति पशु-बिंब के माध्यम से करना सरल लगता है। मुझे ‘नेशनल जियोग्राफी’ के कार्यक्रमों को देखते समय पशुओं और उनके व्यवहार को ध्यान से देखना पसंद है। कभी-कभी जब मैं चिड़ियाघर जाती हूँ तो मैं मगरमच्छ को इतनी देर तक टकटकी लगाकर देखती हूँ, मानो मैं उसके साथ उसके पानी के अंदर बने घर में जाना चाहती हूँ। इसलिए वास्तविक शरीर मेरे लिए महत्वपूर्ण नहीं है। मैं शरीर से दूर हटकर परीक्षण कर सकती हूँ कि खाल के अंदर क्या है।

गोपिका जडेजा

आपने एक बार कहा था कि आप स्त्रीवादी नहीं हैं।

मनीषा जोषी

मैं स्वयं को स्त्रीवादी की बजाय व्यक्तिवादी कहलाना ज़्यादा पसंद करूँगी। जीवन इतना जटिल है कि इसे महज़ स्त्री या पुरुष के ख़ानों में नहीं बाँटा जा सकता है। मुझे एक स्त्री का सिर्फ़ एक स्त्री होकर सोचना पसंद नहीं है। यह जीवन की बहुत संकीर्ण परिकल्पना है। स्त्रीवादी आंदोलन अतीत में अधिक प्रासंगिक था और विश्व के कुछ हिस्सों में अब भी है, लेकिन पश्चिमी देशों में स्त्रीवाद का सुविधाजनक रूप नजर आता है। भारत जैसे देश में भी, आजकल और अधिक स्त्रियों को वित्तीय क्षेत्र की प्रमुख के रूप में काम करते हुए देखा जा सकता है और उनमें से अधिकांश परंपरागत स्त्रियाँ हैं। वे ख़ुद को स्त्रीवादी नहीं बताती हैं, क्योंकि वे उससे ऊपर उठ चुकी हैं और उन्होंने अपनी प्रतिभा के बल पर अपना रास्ता बनाया है। मैं परपीड़क क्रूरता की पुरज़ोर निंदा करती हूँ और सिर्फ़ स्त्रियों के ही नहीं, बल्कि दलितों के और अल्पसंख्यकों और गरीब पृष्ठभूमि के सभी लोगों के लिए समान अधिकारों की हिमायती हूँ। फिर भी, मुझे उन हल्ला मचाने वाली स्त्रीवादियों की मुखर कविताएँ सिर्फ़ लेखिका होने के नाते पसंद नहीं हैं और मैं स्त्रीवादी लेखिका का ठप्पा नहीं लगवाना चाहती हूँ।

गोपिका जडेजा

आपने कविताएँ लिखना कब और कैसे शुरू किया?

मनीषा जोषी

मैंने किशोरावस्था में अमृता प्रीतम को पढ़ने के बाद कविताएँ लिखना शुरू किया था। आप जानती हैं कि गुजराती लोग अमृता के जीवन में प्रेम से बहुत आसक्त हैं। लेकिन मैं जल्दी ही आगे बढ़ गई और उन सब भावुक कविताओं को जला डाला। मैंने अधिक परिपक्व पुस्तकें पढ़ना शुरू कर दिया और मेरी लिखी पहली अच्छी कविता ‘हिंचको’ (झूला) 17 साल की उम्र में ‘परब’ में छपी थी। मैं अपने विद्यालय के खेल के मैदान में बैठी थी, जब मुझे ख़ाली झूले की खिझाने वाली आवाज़ सुनाई दी और इसलिए मैंने यह कविता लिखी। अब मुड़कर देखती हूँ तो मुझे यह सोचकर हँसी आ जाती है कि शायद सार्त्र का ‘अरुचि’ वाला क्षण यही होगा।

गोपिका जडेजा

आप पर किन कवियों का प्रभाव पड़ा है?

मनीषा जोषी

मुझे वाल्ट व्हिटमन की लिखी यह बात पसंद है, ‘‘मैं अपने स्वप्नों में अन्य स्वप्नदर्शियों के सब स्वप्न देखता हूँ, और मैं अन्य स्वप्नदर्शी हो जाता हूँ।’’ मुझे कविता के लिए प्रेरणा असंभाव्य स्रोतों से मिलती है। किसी जानवर का कोई फ़ोटो, अख़बार, विज्ञापन के होर्डिंग, व्यंजन विधि, किसी अजनबी का चेहरा… कुछ भी हो सकता है। जहाँ तक शैली की बात है, मैं सरलतम भाषा में महसूस करना, अवलोकन करना और लिखना चाहती हूँ। चाहे प्राचीन महाकाव्य के रचयिता होमर हों या चार्ल्स बुकोवस्की जैसा आधुनिक कवि हो, विचार का नयापन और गहराई महत्वपूर्ण है। मुझे वे कवि पसंद हैं जो अपने साथ ईमानदार हैं, जैसे यूनानी कवयित्री सैफो और हमारे देश की मीराँ। मुझे सादगी और ईमानदारी पसंद है।

गोपिका जडेजा

आपको गुजराती (और अन्य भाषाओं) के किन कवियों को पढ़ना पसंद है?

मनीषा जोषी

मेरे कुछ पसंदीदा लेखक कालजयी उपन्यासकार हैं और आजकल मुझे आधुनिक साहित्य को पढ़ना पसंद है चाहे वह गद्य, कविता या कोई अन्य साहित्यिक सिद्धांत हो… मगर मुझे दूर से आने वाले शब्द आकर्षित करते हैं जो मुझसे एक विश्वव्यापी आवाज़ में सीधे बात करते हैं। उदाहरण के लिए पोलिश कवयित्री विस्लावा शिम्बोर्स्का ने लिखा था, ‘‘मौत जब तक पहुँचती है, बहुत देर हो चुकी होती है।’’

दुर्भाग्यवश मेरे व्यस्त जीवन के चलते मैं पहले जितना नहीं पढ़ पाती हूँ, लेकिन भारतीय कवियों में से मुझे अरुण कोलटकर, मलिका अमर शेख जैसे मराठी कवियों और दिलीप झवेरी, भरत नायक, कमल वोरा, उदयन ठाकर, हरीश मीनाश्रु जैसे आधुनिक गुजराती कवियों को पढ़ना पसंद है।

गुजराती में मेरे पसंदीदा कवि अब भी सितांशु महेता हैं। उनके हाथों में गुजराती कविता बहुत ताक़तवर बन जाती है, वह सर्कस के रिंग मास्टर की तरह भाषा को नियंत्रित करते हैं। सितांशु की कविताओं में मुझे मनोभाजित रचनात्मकता का पुट मिलता है, जिसे मैं प्राप्त करना चाहती हूँ।

आजकल मेरी दिलचस्पी पाकशाला से जुड़े साहित्य में है और मैं सांद्रा गिल्बर्ट की किताब ‘द क्यूलिननेरी इमेजिनेशन’ पढ़ रही हूँ। अगर संभव हुआ तो मैं पाब्लो नेरुदा की ‘ओड टू कोंगर चाउडर’ जैसी रसोई से जुड़ी कविताओं और सितांशु की ‘बाजुना ब्लॉक मा’ जैसी कविता, जहाँ उन्होंने हींग की उपमा से सार्वजनिक और निजी के बीच महीन अंतर को बताया है, जैसी गुजराती कविताओं में पाकशाला के बिंबों पर किसी लेख में विस्तार से लिखूँगी।

गोपिका जडेजा

आपने ‘कंदमूल’ में अपने पिता के बारे में शोकगीत की शृंखला लिखी है। क्या आप अपने पिता के बहुत क़रीब थीं?

मनीषा जोषी

मुझे मेरे पापा की बहुत याद आती है। मुझे मेरी आवाज़ उन्हीं से मिली है। उनका जन्म एक परंपरावादी ब्राह्मण परिवार में हुआ था, लेकिन वह बहुत सुधारवादी, उदार और साहित्यिक रुझान के व्यक्ति थे। हमारे गाँव में सिर्फ़ हमारा घर ऐसा था, जहाँ जिन कपों का इस्तेमाल परिवार के लोग करते थे उन्हीं को मुसलमान, धोबी और हरिजन नौकर को इस्तेमाल के लिए दिया जाता था। उन्होंने मेरा पालन-पोषण अपनी युवा मित्र की तरह किया और मेरा परिचय विचारों और साहित्य की दुनिया से करवाया। वह अप्रतिरोधी साम्यवादी थे और उनके पास घर पर रूसी साहित्य का बढ़िया संग्रह था। मुझे यह भी लगता है कि वह स्त्रीवादी थे, क्योंकि उन्होंने मुझे कभी खाना नहीं पकाने दिया, और मुझे अपने बेटे की तरह माना। उनकी धर्म में कोई आस्था नहीं थी, मगर उन्होंने अपने आस-पास के लोगों की बहुत उदारता से मदद की थी। अब जब मैं उनकी पसंदीदा ‘गर्म हवा’ जैसी फिल्मों को देखती हूँ, तो मुझे महसूस होता है कि वह कितने सरल और श्रेष्ठ व्यक्ति थे। हाल ही में, जब मैंने टेलीविजन पर ‘वार एंड पीस’ देखी तो मुझे बहुत दिनों बाद बहुत रोना आया, जब मरने वाला सैनिक आकाश में गुज़रते हुए बादलों को देखता है। जब मैं छोटी बच्ची थी तो मेरे पिताजी मुझसे गुज़रते हुए बादलों के बारे में बात किया करते थे।

गोपिका जडेजा

क्या दिन में कोई ऐसा ख़ास समय है जब आप लिखती हैं? आपके लिए लिखने की प्रक्रिया क्या है?

मनीषा जोषी

नहीं, मैं समय की किसी प्रकार की व्यवस्था का पालन नहीं करती हूँ। गद्य लेखकों को इसकी ज़रूरत पड़ती है, मगर कवियों का काम इसके बिना चल जाता है। मेरी लेखन-प्रक्रिया थोड़ी पेचीदा है, क्योंकि मैं न लिखने की कोशिश करती हूँ! जब कोई उपमा या विचार मेरे दिमाग़ में आता है, तो सबसे पहले मैं उसे हटाने की कोशिश करती हूँ। यदि उपमा बार-बार दिमाग़ में उभरती रहे और शब्दों में ढल जाए, तब मुझे लगता है कि यह ऐसी चीज़ है जिसे मुझे लिखना चाहिए। ऐसे समय में मैं जहाँ भी होती हूँ, लिख डालती हूँ।

एक बार मैं एक कैफ़े में बैठी थी और मैंने कुछ पेपर नेपकिनों पर लिखा। इसी तरह से भारत आते हुए जहाज़ में टॉयलेट रोल पर लिखा। मैं शब्दों को खोने नहीं देती। इसलिए लिखने के बाद मैं उसे छपवाने की जल्दबाज़ी नहीं करती हूँ, बल्कि उसे समय की कसौटी पर खरा उतरने देती हूँ। जब मैं उस कविता को कुछ महीनों बाद देखती हूँ और मुझे वह पसंद नहीं आती है तो मैं उसे फेंक देती हूँ। कभी-कभी मेरा मन उसमें कुछ जोड़ने को करता है और वह मेरी विशेष कविता बन जाती है।

कविता छप जाने के बाद, मैं अक्सर उससे अनासक्ति महसूस करती हूँ मानो अनाथ बच्चे को जन्म दिया हो। जब मैं अपनी पुरानी कविताओं को देखती हूँ तो मुझे वे बहुत अजीब लगती हैं और मैं याद करने की कोशिश करती हूँ कि मैंने उन शब्दों को कब, कहाँ और क्यों लिखा था। समय गुज़रने के साथ, मैंने जान लिया है कि मैं बस अपना सामना करने के लिए या ख़ुद से बात करने के लिए लिखती हूँ।

गोपिका जडेजा

आपकी कविता की प्रेरक-शक्ति क्या है?

मनीषा जोषी

वैरागी जैसी उदासी। मैंने मार्कस ओरेलियस को बहुत जल्दी पढ़ लिया था और मैं वैराग्य से प्रभावित हूँ। मैं समझती हूँ कि मैं जो कुछ भी देखती हूँ, सब अस्थायी अवस्था है। मैं मात्र साक्षी हूँ। आपको यह साक्षी भाव मेरी कविताओं में नज़र आएगा। मैं कैलिफोर्निया में शान से रहती हूँ और जीवन के हर क्षण का आनंद उठाती हूँ, मगर दिल से जानती हूँ कि मुझ पर वास्तव में किसी बात का असर नहीं पड़ता है। मेरे अंदर उदासी की एक गहरी खाई है।

गोपिका जडेजा

आप गुजराती कविता में स्वयं को कहाँ पाती हैं?

मनीषा जोषी

मुझे लगता है कि मैंने गुजराती साहित्य में अपना स्थान बना लिया है। मुझे लोकप्रिय लेखिका नहीं बनना है, मगर मुझे उन लोगों से सराहना मिलने से ख़ुशी होती है जो मेरी कविताओं की ईमानदार तारीफ़ करते हैं और मेरे लिखे शब्दों से जुड़ पाते हैं। गुजराती साहित्य के अनेक विद्वानों ने मेरे लेखन की तारीफ़ की है, इसलिए मुझे पता है कि मुझे मेरे मरने के बाद भी लोगों के कुछ समूहों द्वारा याद किया जाएगा। मुझे अपनी कविताओं से भला और क्या चाहिए?

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मनीषा जोषी सुपरिचित गुजराती कवयित्री हैं। वह कैलिफोर्निया में रहती हैं। उनसे manisha71@gmail.com पर बात की जा सकती है। यह बातचीत हिंदी अनुवाद के लिए साहित्य अकादेमी के अँग्रेज़ी द्वैमासिक ‘इंडियन लिटरेचर’ के नवंबर-दिसंबर, 2016 अंक से ली गई है। गोपिका जड़ेजा गुजराती-अँग्रेज़ी कवि-अनुवादक हैं। उनका काम देश-दुनिया के कई प्रतिष्ठित प्रकाशन माध्यमों पर प्रकाशित है। वह सिंगापुर में रहती हैं। उनसे gopikajadeja@gmail.com पर बात की जा सकती है। सरिता शर्मा हिंदी लेखिका और अनुवादक हैं। गुरुग्राम (हरियाणा) में रहती हैं। उनसे sarita12aug@hotmail.com पर बात की जा सकती है। यह प्रस्तुति ‘सदानीरा’ के 20वें अंक में पूर्व-प्रकाशित।

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