हम कोशिकाओं से नहीं, स्मृतियों से बने हैं

बातें ::

शिवेंद्र

से

अमित ओहलाण

बारिश के दिनों में किसी बेरोजगार लेखक को मुंबई में भीगते देखा है? उनके लिए बेडौल शहर के आसमान से स्मृतियों की बूंदें गिरती हैं. उन दिनों वे अपनी पहली कहानी पर हाथ आजमा रहे होते हैं, बिना यह जाने कि इसका क्या होगा? मैं यही किया करता था. मेरी कोशिश रहती कि बारिश में बार-बार भीग लिया जाए. वे लिखने के बारे में सोचने के दिन थे : कैसे लिखा जाए? शिवेंद्र उन्हीं दिनों मुझसे मिला था. पता चला कि ये ‘साहित्य’ वाला लड़का है और लेखक बनना चाहता है. सोचा कि ये लेखक कैसे हो सकता है? उसकी शक्ल लिखने वालों से नहीं मिलती थी. अब भी नहीं मिलती है. लेकिन उसने लिखना शुरू किया और अधिकार से लिखा. ढाई साल बाद जब मैं दुबारा उससे मिला तो वह कहानीकार हो चुका था. उसने बेरहम दौड़ में भागते शहर में लोक-कथाओं का रास्ता नापना शुरू किया. हम रात को बारिश में भीगते हुए या नहीं भीगते हुए निकलते और बातें करते थे. तब भी यही सवाल थे : क्यों लिखा जाए?

यह बातचीत एक जगह बैठकर या एक समय पर आधारित नहीं है. साथ घूमने से, अलग कॉल और ईमेल के जरिए भी सवाल-जवाब हुए हैं. मैं उसके समय में उतरने की कोशिश करता हूं, इसमें कहीं पहुंचने या कुछ स्थायी करने की कोशिश नहीं है. शिवेंद्र ने यही कहा कि लिखना निरंतर यात्रा में होना है. इसलिए ऐसे किसी लेखक से बातचीत भी किसी खास मंजिल पर नहीं पहुंचती है. यहां पहुंचने से ज्यादा जानने की प्रक्रिया भर है. शिवेंद्र का प्रकाशनाधीन उपन्यास ‘चंचला चोर’ इस बातचीत के लिए एक बहाना है. उसने कहा है, ‘‘ये एक शरारती लड़की को खोजने की कहानी है.’’ जब वह इसे व्यवस्थित रूप से लिखना शुरू कर चुका था, तब वह इस उपन्यास के कुछ अंशों को मुझसे साझा किया करता था.

[ अमित ओहलाण ]

इस उपन्यास में क्या है?

(इस सवाल पर वह हंसता है. जैसे अपनी कोई भी बात कहने से पहले हंसता है. उसे लगता है कि उसकी उम्र इतनी कम है कि उसे कोई भी बात गंभीरता से शुरू नहीं करनी चाहिए.)  

तुमने मुंबई छोड़ दिया पर लगता है, मुंबई ने अब तक तुम्हें नहीं छोड़ा है. याद है जब हम साल भर मेहनत करके कोई कहानी तैयार करते थे और किसी तरह जुगाड़ बिठाकर किसी फिल्म वाले (प्रोड्यूसर) से मिलते थे. वह भी ऐसे ही पूछता था : क्या है इस स्क्रिप्ट में, दो मिनट में बताओ जरा. शुरू-शुरू में ऐसे सवाल से बहुत घबराहट होती थी. तुमने भी इस डर को झेला है. जो आपने लिखा है उसमें से अगर एक शब्द भी कम कर दें तो वह नहीं कह सकते जो कहने के लिए आपने इतना समय दिया है. तब आप कहानी को कहानी के लिए नहीं बल्कि उसे बेचने के लिए सुना रहे होते हो.

मुंबई में तुम्हें छह साल हो गए, तुमने अब तक बेचना नहीं सीखा?

मुंबई से लड़ते-झगड़ते शायद थोड़ा-बहुत बेचना भी सीख ही लिया है. इसलिए तुम इस कहानी को ऐसे ही सुनो जैसे कोई प्रोड्यूसर सुनता है और देखो कि यह किसी काम की है या नहीं…

सुनाओ!

सर! ये कहानी मुंबई में रहने वाले एक स्ट्रगलर की है, जो (विजयदान देथा के राजकुमारों की तरह) यह मानता है कि सपने सूरज और चांद से भी अधिक सच्चे होते हैं. एक दिन उसे एक लड़की का सपना आता है. सर… लड़की सिर हिला रही है और उसकी दोनों चोटियां हवा में झूल रही हैं. दो लाल चोटियां, घेरेदार : बिल्कुल सिर से जुड़ी हुईं. जैसे कोई देहाती लड़की हो, लेकिन लड़की ने स्कर्ट पहन रखा है जैसे वह कोई बहुत ही मॉडर्न लड़की हो. वह अमरूद के जिस पेड़ पर बैठी है, उसके नीचे खड़े रहने पर गांव दिखता है और ऊपर चढ़ते जाने पर समंदर. लड़के को डर लग रहा है कि लड़की गिर जाएगी पर लड़की बिलकुल निडर है. वह पेड़ की आखिरी डाल पर बैठी हुई मजे में इमली खा रही है. अचानक से अमरूद की पतली डाल कमानी की तरह झुकने लगती है. लड़की एक बार जमीन को छूती है फिर उजले आकाश में खो जाती है. जब लड़का जागता है, तब उसके मन पर हथौड़े की चोट पड़ती है. आखिर कौन थी यह लड़की? यह सवाल उसे इतना परेशान करता है सर कि एक दिन वह अपनी नौकरी छोड़ देता है. वह लड़की की खोज में निकल पड़ता है. अपनी इस यात्रा में वह कई लड़कियों से मिलता है, उनमें से कोई भी उसके सपने वाली लड़की नहीं होती. लेकिन वह हिम्मत नहीं हारता, बिल्कुल भी नहीं क्योंकि वह मानता है कि सपने जिंदगी से भी अधिक सच्चे होते हैं. और सर अंत में उसे अपने सपने वाली लड़की मिलती है. वह विश्वास नहीं कर पाता… अगर आप भी ये पूरी कहानी सुनेंगे सर तो आप भी विश्वास नहीं कर पाएंगे कि किसी कहानी का ऐसा गजब का क्लाइमैक्स हो सकता है सर… (हंसते हुए) तो अब पूरी कहानी सुनाऊं सर…?

और इसे पढ़ने वालों के लिए इसमें क्या है?

अगर एक शब्द में कहूं तो स्मृतियां हैं और स्मृतियों को अक्सर ही हम बस ‘बहेंतु बच्चा’ समझते हैं, नाक बहाते हुए कहीं भी घूमते रहने वाला. लेकिन ज्योतिबा फुले और अंबेडकर को पढ़ते हुए मैंने यह समझा कि स्मृतियां हमारी रीढ़ हैं, कि हम मनुष्य कोशिकाओं से नहीं बल्कि स्मृतियों से बने हैं. इसलिए हर सत्ता हमारी स्मृतियों को अपने जरूरत के हिसाब से गढ़ने की कोशिश करती है. उपन्यास का नायक अपने सपने में आई लड़की को खोजते हुए यह पाता है कि कैसे वह किसी और द्वारा गढ़ा गया है, कि उसका सपना भी उसका अपना नहीं है. वह अपने बारे में जो कुछ भी सोचता है, सब गलत है, असल में उसे कोई और सोच रहा है, वह किसी और की कल्पना है.

इसकी रचना-प्रक्रिया क्या है?

इसके लिए हमें फ्लैशबैक में चलना होगा— अतीत में. वैसे वैज्ञानिकों के लिए टाइम मशीन अब भी एक पहेली है. वे अब तक समय से तेज चलने वाली मोटर नहीं बना पाए हैं. लेकिन मेरे पास एक ऐसा वाहन है जो समय से तेज चलता है— मन. क्या तुम टाइम ट्रैवल करने के लिए तैयार हो?

चलो!

असल में मुझे बचपन में सपने बहुत आते थे, शायद सभी बच्चों को बड़ों की तुलना में अधिक सपने आते हैं क्योंकि बचपन में हम बहुत सारी चीजों को समझ नहीं पा रहे होते और हमारे मन में बहुत से सवाल होते हैं. तब मैं मां को, बाबा को या जो भी सुनने को तैयार होता उसे अपने सपने सुनाता और उनका मतलब पूछता. उनके लिए सपनों की दो ही व्याख्याएं थीं— शुभ या अशुभ. पर चूंकि ये एक बच्चे के सपने थे, इसलिए वे यह मानते थे कि इनमें कुछ न कुछ सच्चाई है.

सपने सच होते हैं यह बीज मेरे भीतर बैठ गया था. बाद में ग्रेजुएशन के दिनों में फ्रायड को पढ़ा, फ्रायड भी यही कहते हैं कि सपने सच होते हैं, पर उन्होंने सपनों के प्रतीकों को मनोवैज्ञानिक दृष्टीकोण से खोलना सिखाया. अब मैं अपने सपनों को लिखता और उनके अर्थ समझने की कोशिश करता. तब मैंने सपनों की एक नई विशेषता जानी— सपनों में कोई बाउंड्री नहीं होती. सामजिक बंधन हट जाते हैं, पारिवारिक रिश्ते टूट जाते हैं. ऐसी जमीन पर कदम रखते आपको डर लगता है, लेकिन इसका एक बहुत ही पॉजिटिव पक्ष भी है— हमने अपनी वास्तिविक दुनिया में धर्म, जात-पात, ऊंच-नीच, स्त्री-पुरुष का जो खांचा बना लिया है, सपने में वह खांचा टूटता है. मतलब अगर हम अपने सपने को ठीक से पढ़ें तो वहां उस दुनिया को एक साथ पा सकते हैं जिसकी कल्पना अलग-अलग समय में और अलग-अलग ढंग से बुद्ध, कबीर, मार्क्स, सिमोन, अंबेडकर, भगत सिंह, बिरसा, ग्राम्सी, गैलियानो, मुक्तिबोध, परसाई और ऐसे बहुत से विचारक, लेखक और क्रांतिकारी करते रहे हैं— स्वतंत्रता, समानता और विश्व बंधुत्व वाली एक दुनिया.

सपने की यह ताकत समझ लेने के बाद मैं इसे लिखना चाहता था, लेकिन इसे लिखने के लिए एक कहानी चाहिए थी और एक दिन कहानी खुद ही मेरे पास चलकर आई. यह साल 2009 के आस-पास की बात है. कॉलेज में एक लड़की को एक सपना आया— चंचला चोर का सपना. उसकी चंचला उसके सीने पर चढ़ी हुई थी और उसका गला दबा रही थी और अपनी दोनों लाल चोटियां हिलाते हुए कह रही थी कि मैं चंचला हूं— चंचला चोर. यह सपना देखकर वह इतना डर गई कि वह अगले ही दिन ‘सपना समझाओ बाबा’ यानी मुझसे मिली. करीब साल भर लगा हमें यह पता करने में कि उसकी यह चंचला कौन है.

यहां से मुझे अपना ‘प्लॉट’ मिल गया और अगले तीन-चार सालों तक मैं अपनी चंचला को खोजता रहा और उसे पाना सचमुच में मेरे जीवन की सबसे बड़ी खोज है..

साल 2013 से मैंने इसे लिखना शुरू किया और इसे लिखने के बाद वह ‘जो खोई हुई अभिव्यक्ति है’ उसे पा लेने-सा सुख मुझे हो रहा है.

‘चंचला चोर’ शीर्षक के मायने क्या हैं?

यह निक नेम है— एक बहुत ही शरारती लड़की का. उसे स्कूल के सबसे सीधे लडके के साथ बिठाया जाता है, एक लड़का जिसके एक पैर में पोलियो है. ताकि वह कोई शरारत न कर सके. लेकिन वह लड़की इतनी शरारती है कि लड़के के पोलियो वाले पैर पर चिकोटी काटती है और उससे शरारत करवाती है. इससे लड़के को भी एक अजीब-सी खुशी होती है. वह महसूस करता है कि अपने पोलियो वाले पैरों के साथ तो वह भी भेदभाव करता रहा है. वह उन्हें हमेशा ही बेचारगी की नजर से देखता रहा है, लेकिन यह लड़की किसी भी चीज में भेदभाव नहीं करती. यह कहानी इसी लड़की को खोजने की कहानी है.

आपने यही उपन्यास क्यों लिखा?

यह एक सवाल है जिससे मैं बहुत लंबे समय तक जूझता रहा हूं कि मुझे क्या लिखना चाहिए और क्या नहीं.

तो क्या लिखना चाहिए और क्या नहीं?

हमें किसी भी विचार को समय देना चाहिए. जब समय दिया जाता है तो कमजोर विषय साथ छोड़ देते हैं. सिर्फ वही लिखा जाता है जिसे लिखा जाना चाहिए. अगर कोपर (डाल में पका आम) खाना है तो उसे पकने का समय देना होगा, आजकल हम लोग कार्बाइड (आम पकाने की दवाई) डालकर विचार पका लेते हैं. यह गलत तो नहीं है, लेकिन तब हम यह नहीं जान सकते कि कोपर खाने का सुख क्या होता है.

यह उपन्यास किस तरह के सवाल पैदा कर सकता है?

इस उपन्यास को लिखने के दौरान मैं अपने ननिहाल गया था और विशेष तौर पर इस उपन्यास के लिए ही कुछ दिन वहां रुका था. इस दौरान कहानियों को लेकर नाना से मेरी बहुत सारी बातें हुईं. वे एक तरह के किस्सागो हैं. उन्होंने एक अद्भुत बात कही. उन्होंने कहा कि हम सब कहानियों से बने हुए लोग हैं. हम सब जैसी कहानियां सुनते हैं, वैसे ही बन जाते हैं. मेरे मन में उसी समय यह सवाल आया कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हम सब गलत कहानियां सुनते आ रहे हैं? जिन लोक-कथाओं की हम तारीफ करते नहीं थकते, आखिर वे क्या हैं? उनके भीतर धर्म, ब्राह्मणवाद और पुरुषवाद कितना अधिक भरा हुआ है.

तो लोक-कथाओं में पक्षपात होता है?

हां बिल्कुल. क्या कुछ जातियों ने किस्से-कहानियों में खुद को श्रेष्ठ सिद्ध नहीं किया है? आदमी का औरत पर जोर यूं ही तो दिखाया जाता रहा है. सत्ता की चालाकियों और शक्तिशाली जातियों ने गैर-बराबरी पैदा की है. उसका खामियाजा हम भुगतते आए हैं. लोगों को लगता है कि मैं लोक-कथाओं का पुनर्लेखन कर रहा हूं. उन्हें पुनर्जीवित कर रहा हूं. मेरी कहानियों के बारे में बात करते हुए लोग ऐसी ही बातें करते हैं, जबकि ऐसा है नहीं. मेरा मकसद सवाल खड़े करना है. लोक-कथाओं में राजनीतिक और धार्मिक पक्षपात होता आया है. लोक-कथाएं मुझे धर्म की परछाई-सी दिखती हैं. उन्हें भी ताकतवर लोगों ने गढ़ा है या ताकतवर लोगों ने अपने विचार वहां भी घुसा दिए हैं. इसलिए लोक-कथाओं पर सवाल खड़े होने ही चाहिए. सब कुछ पर सवाल खड़े होने चाहिए और मैंने इसकी शुरुआत लोक-कथाओं से की है.

धर्म क्या है?

इस उपन्यास में जो नायक है. उसे रौशनी के धागे दिखाई देते हैं. यह उसकी कल्पना है. वह अपनी कल्पना में देखता है कि ये रौशनी के धागे हर किसी को हर किसी से जोड़ रहे है. निर्जीव, सजीव सब कुछ एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. हम सबमें कुछ कॉमन है, ऐसा वह महसूस करता है और विज्ञान कहता है कि यह पृथ्वी पहले सूरज से टूटी और फिर यहां कुछ निर्जीव गैसों से मिलकर एक कोशिकीय जीव बना और हम सब करोड़ों सालों में उसी एक कोशिकीय जीव के विकसित रूप हैं. मतलब हर किसी में किसी एक का अस्तित्व मौजूद है. धर्म उसे ईश्वर कहता है.

मुझे धर्म से यहां तक कोई दिक्कत नहीं है. शुरू-शुरू में हमने अपने आपको जिस (मनो)विज्ञान से समझा उसे हम धर्म कह सकते हैं. लेकिन बाद में वह विज्ञान भ्रष्ट हो गया. वह सच की जगह झूठ गढ़ने लगा. अस्तित्व की नींव पर वह सत्ता के महल खड़ा करने लगा. वैज्ञानिक से वह शासक बन गया. यह दुनिया भर में हुआ और यह धर्म को धर्म पुकारे जाने से पहले से शुरू हो गया था और तब से ही दुनिया के लिए धर्म से खतरनाक और कोई चीज नहीं है. यह कुछ ताकतवर लोगों का समूह है जो बहुसंख्यक जनता पर शासन करना चाहते हैं.

क्या आजीविका की जरूरत अवरोध पैदा करती है?

इससे लिखने की गति धीमी हो जाती है. कई बार बहुत झुंझलाहट हो जाती है, अपने आप पर बहुत गुस्सा आता है कि हम लोग कहां फंसे हुए हैं. सब कुछ तोड़-फोड़ देने का मन होता है. लेकिन फिर इन्हीं सबके बीच से कोई विचार आ जाता है और कुछ दिन तक दिल खुश रहता है. आजीविका की जरूरत अवरोध तो है, पर इसी अवरोध से लिखने की ऊर्जा भी मिलती है. मुक्तिबोध कहते हैं न :

‘‘विचार आते हैं
लिखते समय नहीं,
…पत्थर ढोते वक्त
पीठ पर उठाते वक्त बोझ
सांप मारते समय पिछवाड़े’’

मुंबई में रहना कैसा है?

यह डरावना है और मैं यह किसलिए कह रहा हूं, तुम इसे बहुत अच्छे से समझ सकते हो. यहां अपने आपको बचाए रख पाना सबसे बड़ी चुनौती है. हर समय इस बात का डर बना रहता है कि कहीं तुम सफल लोगों जैसे न बन जाओ. मुंबई में रहकर मैंने एक सच जाना कि यह सपनों की नहीं बल्कि मजदूरों की नगरी है. यहां बहुत सारा अकेलापन है और उसे दूर करने के लिए आपको बहुत सारा पैसा खर्च करना पड़ता है और अगर आपके पास पैसा नहीं तो बड़ी आसानी से आप इस निष्कर्ष तक पहुंच जाते हैं कि आपके पास कुछ नहीं है.

एक फिल्म है, उसमें एक लड़की स्कूल में एक पेंटिंग बनाकर ले जाती है. सबको कुछ न कुछ बनाकर ले जाना होता है. उसकी पेंटिंग में एक पेड़ पर एक चिड़िया चुपचाप और उदास बैठी हुई है. उसका शिक्षक उससे पूछता है कि यह चिड़िया पेड़ पर क्यों बैठी हुई है? और लड़की जो जवाब देती है, वह बहुत ही डरा देने वाला है. वह कहती है कि क्योंकि इसके पास पैसा नहीं है. इस फिल्म का नाम है— A Pigeon Sat on a Branch Reflecting on Existence. तुरंत हमारे मन में यह सवाल आता है कि मतलब जो बैठा है, जिसके पास पैसा नहीं है क्या उसका अस्तित्व नहीं है? मुंबई में रहते हुए इसका उत्तर हमेशा ‘हां’ होता है. यहां आकर मैंने बहुत कुछ खोया है, पर जीवन में खोना बहुत जरूरी है, यह भी यहीं सीखा है.

कैसा खोना?

हम जो लेकर आए हैं, उसे खोने का डर. हमारी मनुष्यता का गुण— मैं संवेदना की बात कर रहा हूं. जैसे परिवार से दूर होना. लोगों से जुड़ाव का टूटते जाना. शहरी उलझाव में हमारी संवेदना आहत होती है. शायद आप भाग सकते हैं, लेकिन भागते नहीं हैं. यह शहर की खासियत है या बढ़ती उम्र का असर कि हम झेलते चले जाते हैं. आप यहां बहुत सारा पैसा बना सकते हैं, बड़े बन सकते हैं, लेकिन आपकी संवेदना की पूंजी तो खत्म हो रही है न. एक समय के बाद आप सोचते लगते हो कि गरीबी और दुःख है और वह रहेगा. दुनिया जैसी है वैसी ही रहेगी और हम इसे बदल नहीं सकते और हमें इसे बदलने की क्यों पड़ी है… चलो हम तो फिल्म देखकर आते हैं या पार्टी करते हैं. इस तरह की जो असंवेदनशीलता हमारे भीतर आती चली जाती है या जो हालातों से भागना है— वही खोना है और यह बहुत ही डरावना इस मायने में है कि न केवल महानगर बल्कि हमारे कस्बे और गांव भी अब ऐसे ही बनते जा रहे हैं.

मैंने लोगों को बदलते देखा है. मैं अपनी संवेदनाओं को मरते हुए महसूस करता हूं और डरता हूं. मैं यह सोचकर डरता हूं कि मैं अपनी संवेदनाओं और स्मृतियों को कहीं पूरी तरह से खो न दूं और पाश के उस ‘खतरनाक आदमी’ की तरह न बन जाऊं जिसे अपने काम के अलावा और किसी चीज की फुर्सत नहीं है.

और बनारस की स्मृतियां?

बनारस से मैं कभी बहुत ज्यादा प्यार नहीं कर पाया, या इससे पहले कि मुझे बनारस से प्यार हो पाता मैंने बनारस छोड़ दिया. लेकिन बनारस की एक घटना कभी नहीं भूलती. स्कूल के दिनों में वहां मेरा एक दोस्त था— कामाख्या. एक दिन हम लोग घाट पर घूम रहे थे, वह बोला कि चलो तुम्हें जीवन का सत्य दिखाते हैं. वह मुझे हरिश्चंद्र घाट तक लेकर आया और जलती हुई लाशों को दिखाकर बोला कि वह देखो जीवन का सत्य.

मुंबई के लोगों को देखकर यह लगता है कि वे पूरी तरह से यह बात भूल गए हैं कि अंत में हम सब मरते हैं.

अगर यही जीवन का सत्य है तो फिर लिखते रहने का मतलब क्या है?

इसलिए तो लिखने की जरूरत है, क्योंकि हम मर जाते हैं. मनुष्य के रूप में हमारी यात्रा तो खत्म हो जाएगी. लेकिन इस दौरान हम बहुत कुछ सीखते हैं, अनुभव करते हैं, हमारी जो भावनाएं, कल्पनाएं और विचार हैं, वे मनुष्यता को समृद्ध करते हैं. अगर हम लिखेंगे नहीं तो यह सब खो जाएगा. लिखना इस पूंजी को पीढ़ियों तक सुरक्षित करना है. इस तरह से देखे तो हम कह सकते हैं कि लेखक हमारे समाज का इमोशनल बैंक होता है.

क्या समकालीन मुद्दों पर लेखक को मुखर होना चाहिए या उसे इंतजार करना चाहिए?

यह शायद लेखक के वश में नहीं होता. इस संबंध में वह भी किसी भी सामान्य व्यक्ति के समान ही रिएक्ट करता है. वह कुछ मुद्दों पर चुप रह जाता है, कुछ को इग्नोर करता है और कुछ के लिए लड़ता है या उनके लिए गुस्सा होता है. जिन मुद्दों से उसका जुड़ाव होगा, जो उसे झकझोर देंगे, या जिनसे उसे कुछ उम्मीद होगी उनमें शामिल होने के लिए, वह  इंतजार कैसे कर सकता है? अभी पिछले कुछ सालों में विश्वविद्यालय के छात्रों ने जो आंदोलन किए उनमें मुझे एक नई उम्मीद दिखी थी और उनमें शामिल होने से मैं खुद को रोक नहीं पाया था. कई बार मैं मुंबई से दिल्ली गया, बस एक ऐसी लड़ाई में मौजूद रहने के लिए जिसमें मुझे एक बड़े बदलाव की आहट दिखाई दे रही थी.

सामजिक लड़ाई में शामिल होने से क्या लेखन प्रभावित होने का खतरा रहता है?

मेरे ख्याल में इससे लेखन प्रभावित नहीं बल्कि समृद्ध होता है और लेखक होने का यह मतलब नहीं है कि वह बस लगातार लिखता ही रहे. वह तो रिपोर्टिंग हो जाएगी. जहां तक सामजिक लड़ाई में शामिल होने से लेखन के प्रभावित होने की बात है तो वह एक साथ किया जा सकता है. यह व्यक्ति-विशेष पर निर्भर करता है. हेमिंग्वे स्पेन गए, उन्होंने युद्ध में हिस्सा लिया और गजब लिखा. विनोद कुमार शुक्ल भी एक कमाल के लेखक हैं और मैंने सुना है कि वह कहीं भी नहीं जाते, अखबार भी नहीं पढ़ते. इसलिए इससे फर्क नहीं पड़ता कि हम किसी आंदोलन में शामिल होते हैं या नहीं, फर्क इससे पड़ता है कि हमारे भीतर कोई आंदोलन चल रहा है या नहीं. हम असंतुष्ट है या नहीं. मुझे लगता है कि एक संतुष्ट व्यक्ति कभी लेखक नहीं हो सकता. निश्चिंतता रचनात्मकता के लिए सुरसा है. अब कोई महावीर ही हो तो अलग बात है, उसे कोई सुरसा निगल नहीं सकती.

उपन्यास क्या है?

मेरे लिए तो उपन्यास भी एक कहानी ही है. कहानी और उपन्यास में उतना ही अंतर होता है जितना कि केक के एक टुकडे और पूरे केक में. हालांकि कोई अकादमिक शिक्षक इसे समझाने में पूरा साल खर्च कर सकता है.

साहित्य में तुम अकादमिक शिक्षकों की स्थिति को किस तरह से देखते हो?

अकादमिक शिक्षकों की स्थिति अपने यहां बहुत ही मजबूत है और यह बात मुझे बहुत ही मायूस करती है. साहित्य की पढ़ाई और साहित्य-रचना दोनों ही दो अलग-अलग बातें हैं. लेकिन हमारे यहां हिंदी का मास्टर हो जाना ही साहित्यकार हो जाना है. हिंदी की अकादमिक दुनिया साहित्य को मार रही है. वे यह मानकर चलते हैं कि बाहर के लोग उनसे बेहतर साहित्य रच ही नहीं सकते.

बीएचयू में एक प्राध्यापक हैं— रामाज्ञा शशिधर. जब मैं बीए थर्ड ईयर में था, एक रोज वह क्लास में घुसे और हमारे सामने एक पत्रिका पटकते हुए गुस्से से बोले कि तुम लोग क्या कर रहे हो? ये एमबीए का लड़का हिंदी वालों से इतनी बढ़िया कहानियां लिख रहा है… वे चंदन पांडेय की बात कर रहे थे. वह शायद हमें अच्छी कहानियां लिखने के लिए मोटीवेट करना चाहते थे, उनके इंटेशन अच्छे रहे होंगे, लेकिन उनके शब्द अकादमिक दुनिया की मानसिकता स्पष्ट करते हैं. तब मैं हिंदी वाला था और मैंने यह नहीं सोचा कि मुझे एक अच्छी कहानी लिखनी है बल्कि मैंने यह सोचा कि मैं सिद्ध कर दूंगा कि हिंदी वाले ही अच्छी कहानियां लिख सकते हैं… और जब तक मैं ऐसा सोचता रहा मैं केवल औसत कहानियां ही लिखता रहा… जो कुछ लिखा जा चुका है केवल उन्हें ही कुछ अलग शब्दों में दुहराता रहा… मैं केवल लिखने की कोशिश ही करता रहा… खुद को खोजने की नहीं…

क्या तुमने कभी लेखक होने का सपना देखा था?

धुंधला-सा. वह जो बनने-बिगड़ने की उम्र थी, जिसमें हम यह सोचते थे कि बच्चे भगवान जी देते हैं. तब मुझे यह भी लगता था कि सारी कविताएं-कहानियां लिखी हुई हैं— वे खुदाई में निकलती हैं. जो उन्हें खोजता है वही उसका लेखक हो जाता है. फिर एक दिन छोटे भाई के साथ अंताक्षरी खेलते हुए मैंने दो पंक्तियां अपने से बनाकर सुना दी और वह पकड़ नहीं पाया. वे क्षण महत्त्वपूर्ण थे. तभी मुझे पहली बार लगा कि कहानियां लिखने के लिए खुदाई करने की जरूरत नहीं है और वह कोई भी लेखक हो सकता है जो अपने मन से कुछ लिख सके.

क्या इसकी कोई खास ट्रिक है?

हम कहीं न कहीं से प्रेरणा लेते हैं, प्रभावित होते हैं. जो भी पढ़ते हैं उससे कुछ न कुछ सीखते ही हैं. मेरा एक दोस्त तो मस्तराम की किताबें पढ़ते हुए भी उसे अंडरलाइन करता था और हमें बताता था कि इससे हम क्या सीख सकते हैं. तो ट्रिक हर जगह है, प्रेमचंद को पढ़ना शुरू करने से लेकर दुनिया भर के लेखकों को पढ़ते हुए हम जाने-अनजाने अपने भीतर कोई न कोई ट्रिक भरते ही रहते हैं. इस उपन्यास में मैंने सपने का ट्रिक अपनाया है. हम जैसे सपना देखते हैं, मैंने इसे लगभग वैसे ही लिखा है. यह उपन्यास एक स्वप्न-कथा है.

‘चंचला चोर’ लिखने में समय कितना लगा?

लिखने की शुरुआत किस दिन से मानी जाए? उस दिन से जब इसे लिखना शुरू किया गया या उस दिन से जब पहली बार इसे लिखने का ख्याल आया? प्रेम की शुरुआत किस दिन से होती है? हमने किसी लड़की को देखा, वह हमारे मन में ठहर गई. हो सकता है कि तब वह हमारे लिए बिल्कुल अनजान हो या हम अपने बचपने में हों और हमें यह न पता हो कि प्रेम क्या होता है, लेकिन किसी समय हम एक साथ आते हैं, किसी लंबे समय के बाद जब हम विवाह करते हैं या एक प्रेमी-युगल बनते हैं और लोगों से भी यह छुपा नहीं रह जाता कि हम प्रेम में हैं तो क्या उस दिन से हमारे प्रेम की शुरुआत मानी जाए या उस दिन से जब हमने पहली बार एक दूसरे को देखा था और महसूस किया था. इस तरीके से यह एक बहुत लंबा वक्त है. किसी लेखक के लिए यह और दूर तक जाता है, क्योंकि वह इस प्रक्रिया में अकेला है. इसलिए किसी भी कहानी या उपन्यास के बारे में यह सही-सही नहीं कहा जा सकता कि उसे लिखने में कितना समय लगा.

एक बार मैंने आशीष त्रिपाठी से पूछा था कि वह कितने घंटे पढ़ते हैं. मैं उनसे आगे निकल जाना चाहता था. कॉलेज के दिनों में मुझमें यह भावना थी. मेरा लक्ष्य होता था कि मैं अध्यापकों से अधिक जानूं. तो आशीष सर ने कहा कि तीन-चार घंटे. मुझे हंसी आ गई, क्योंकि तब मैं बारह-तेरह घंटे पढ़ता था. मैंने उनसे कहा कि यह नहीं हो सकता, क्योंकि मैं तो आपसे तीन-चार गुना अधिक पढ़ता हूं और आपके आस-पास भी कहीं नहीं हूं, तब उन्होंने कहा कि मैं सात-आठ घंटे सोचता भी हूं. मुझे यह भी झूठ ही लगा था, लगा था कि कोई इतनी देर कैसे सोच सकता है? लेकिन जब धीरे-धीरे मेरा सोचना बढ़ता गया तो मैं इसे समझ पाया. मार्केज भी यही कहते हैं कि मैं दिन भर में एक पैराग्राफ से अधिक नहीं लिख पाता. मुझे पहले लगा कि यह बहुत ही आलसी लेखक होगा, लेकिन बाद में मैंने खुद पाया कि एक पैराग्राफ लिखने के लिए भी कई-कई दिन तक सोचना पड़ता है. इसलिए लिखना नहीं, बल्कि लिखने से पहले के वे क्षण जब हम सोचते और सहते हैं, कहीं अधिक महत्वपूर्ण होते हैं.

खास समय लिखने का?

यह मैंने सुना है कि कुछ लोग सुबह लिखते हैं, कुछ रात को. लेकिन मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं है. यह शायद इसलिए क्योंकि मेरे जीवन में भी खास टाइमिंग नहीं है. लेकिन एक बात तय है कि सोने के बाद उठने का समय कहीं ज्यादा रचनाशील होता है. फिर चाहे आप भोर में उठे या शाम सात बजे. जहां तक विचार की बात है, वे एकांत में कम और भीड़ में अधिक आते हैं.

सोचने के लिए क्या तुम्हें भी किसी खिड़की की जरूरत होती है?

मेरे बाबा टहलते हुए सोचते हैं, खुद से बतियाते हुए. वह एक जगह बैठकर नहीं सोच पाते. उन्हीं की तरह मुझे भी टहलते हुए सोचने की आदत है. हालांकि मैंने लेखकों के जो किस्से सुने हैं, उनमें हमेशा लेखकों के अपने कमरे होते हैं, उस कमरे में एक खिड़की होती है, जिससे बाहर देखते हुए वे सोचते हैं और लिखते हैं. मेरे पास कभी कोई अपना कमरा नहीं रहा, इसलिए मुझे लगता था कि मैं लेखक नहीं हो सकता. शुरू-शुरू में प्रेम कविताएं लिखते हुए बड़ा डर-सा लगता था, लगता कि घरवाले कहीं कुछ देख न लें. लेखक तो निडर होता है, पर मैं नहीं हूं. वह इतना जिद्दी होता है कि अपनी गलत बात को भी मनवाकर रहता है, मैं जिद्दी भी नहीं हूं. लेखक कुछ भी बर्दाश्त नहीं करता, वह अपना इस्तीफा जेब में रखकर घूमता है, लेकिन मैं अक्सर एडजस्ट कर लेता हूं. मैं सह लेता हूं, कोई सुनाता है तो सुन लेता हूं और उसे भूल भी जाता हूं. अपना ही मजाक उड़ा लेता हूं. मुझमें कुछ भी लेखक होने जैसा विशेष नहीं है और इसलिए मैं मानता था कि मैं लेखक नहीं बन सकता.

लेकिन अब मैं सोचता हूं कि लेखक को धीर-गंभीर होना चाहिए, देखने में प्रभावशाली और कॉन्फिडेंट. उसे दूसरों से दूरी बनाकर रखनी चाहिए या उसे अलग दिखना चाहिए. क्या ये सब एक लेखक के गुण हैं या फिर एक सामंती व्यक्ति के? कहीं ऐसा तो नहीं कि एक लेखक को विशेष होना चाहिए, यह गुण ब्राह्मणवादी व्यवस्था से आया हो?

अभी एक-दो साल पहले मैं नागपुर गया था— ‘संगमन’ के कार्यक्रम में. वहां मराठी लेखक भी आए हुए थे. वे बहुत ही सहज थे. हिंदी पट्टी के लेखकों की तरह वे कोई ऑरा क्रिएट नहीं कर रहे थे. उनसे संवाद करना, विचार साझा करना, असहमत होना सब कुछ बहुत आसान था. वहां पहली बार मुझे लगा था कि लेखक होने के लिए आपको विशेष होने की आवश्यकता नहीं. यह भी बर्तन धोने, पखाना साफ करने, किसी टीटीई की तरह फाइन काटने, खदान में उतरकर कोयला तोड़ने, बस या ट्रेन के लिए लाइन में लगे रहने, किसी पुजारी की तरह मंत्र पढ़ने जैसे कामों में से ही एक काम है. लेकिन यह एक ब्राह्मणवादी सोच है कि जब किसी काम को ताकतवर लोग करते हैं तो उसे विशेष बना देते हैं. नागपुर जाकर मुझे यह कहने का कॉन्फिडेंस आया कि सामान्य होकर भी लेखक हुआ जा सकता है, और इसके लिए मैं राजकुमार राकेश और प्रियंवद जी का हमेशा आभारी रहूंगा. हिंदी में ऐसे कार्यक्रम और भी होते रहने चाहिए. हमें ऐसे लोगों से मिलते रहना चाहिए जो हमसे अलग हैं.

तुम लिखते हुए सोशल साइट्स का कितना इस्तेमाल करते हो?

मैं फेसबुक पर हूं और बीच-बीच में इसे डी-एक्टिवेट कर देता हूं. मैंने महसूस किया है कि इससे लिखने में फायदा होता है. अभी नेरूदा के ऊपर एक फिल्म आई है, जिसमें अक्सर वह खिड़की के बाहर देखते रहते हैं. एक व्यक्ति उनसे पूछता है कि तुम हमेशा बाहर क्या देखते रहते हो. नेरूदा जवाब देते हैं कि पीपल… लोगों को… मुझे लगता है यह बहुत जरूरी है कि सोशल साइट्स के द्वारा हम पूरी दुनिया से जुड़े होते हैं, लेकिन केवल एक लेखक के तौर पर नहीं बल्कि एक व्यक्ति के रूप में भी हमें अपने पड़ोस को नहीं भूलना चाहिए. हमें अपने आस-पास देखते रहना चाहिए. सचमुच के लोगों से सचमुच में जुड़े रहना चाहिए. आज हम सोशल साइट्स का इस्तेमाल ही इसलिए करते हैं, क्योंकि अपनी जिंदगी में हम सचमुच के लोगों को खोते जा रहे हैं.

साहित्य की आवश्यकता के बारे में तुम क्या सोचते हो?

मेरे बाबा ने अब हमें कहानियां सुनानी बंद कर दी हैं. वे कहते हैं कि कहानियां बच्चों को भुलवाने के लिए होती है और तुम लोग अब बच्चे नहीं रहे.

मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो पाता हूं कि बाबा ने कहानियों के सामने कोई बड़ा उद्देश्य नहीं रखा. उन्होंने हम बच्चों में हमेशा यह गफलत बनाकर रखी कि कहानी सिर्फ मनोरंजन की चीज है. उन्होंने हमसे वह खुशी भी छुपाए रखी जो उन्हें कहानी सुनाने में मिलती थी, और इसलिए हमारा सारा बचपन यही सोचते गुजरा कि कहानियां हमें केवल सुख दे रही हैं, और हम कभी यह समझ ही नहीं पाए कि कहानियां हमें बदल रही हैं, और जब तक हम यह जानते बहुत देर हो चुकी थी. बाबा अपनी कहानियों के द्वारा हमें अपने आस-पड़ोस, गांव-देहात, मिथकों और इतिहास सब कुछ का ज्ञान करा चुके थे.

अगर साहित्य ऐसा हो, अगर हम अपने विचारों को किस्सा बना दें, भारी-भरकम ज्ञान को बातचीत की किसी साधारण उक्ति में पेश कर सकें, अपने शब्दों को लोगों की कल्पना से जोड़ सके और उन्हें यह महसूस करा सकें कि जो छवि उनके मन में बनती है वह टीवी और सिनेमा के परदे पर बनने वाली छवि से कहीं अधिक अपनी और सुंदर और उनकी है तो साहित्य को सब पढ़ेंगे. मुझे इससे भी अधिक अटपटा तब लगता है जब कोई लेखक कहता है कि मेरी कहानी पढ़ो. मैं सोचता हूं कि अगर बाबा हमसे यह कहते कि चलो कहानी सुनो, तो शायद हम कभी भी उनसे कहानी नहीं सुनते, या एक समय के बाद हम उनसे दूर भागते.

मुझे लगता है कि हर किसी के मन में एक एकांत होता है, जिसे भरने के उसके अपने तरीके होते हैं. कोई क्रॉसवर्ड भरता है, कोई कहानियां पढ़ता है, कोई रेप करता है, कोई सीरियल किलर हो जाता है. ‘मुझे चांद चाहिए’ में एक पंक्ति है कि हम अपना अकेलापन दूर करने के लिए शादी करते हैं, हालांकि हम कुछ भी कर लें हमारा यह अकेलापन हमारा साथ नहीं छोड़ता.

अकेलेपन का यह क्षण ही कला के आविष्कार का क्षण है. कला का जन्म ही हमारे अधूरेपन को भरने के लिए हुआ है और अगर आप पूर्ण हैं तो आपको बधाई हो, आपको साहित्य की आवश्यकता नहीं है. आप कविता को नकार सकते हैं, प्लूटो की तरह कवियों को देश-निकाला दे सकते हैं. फिर मैं सोचता हूं कि अगर प्रेम में से कला को निकाल दें तो हममें क्या बचा रह जाएगा? क्या कला के बिना प्रेम पोर्न नहीं हो जाएगा?

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[ शिवेंद्र हिंदी के बेहद अनूठे कथाकार हैं. क्यों हैं? यह इस संवाद को पढ़कर जाना जा सकता है और ‘चॉकलेट फ्रेंड्स’ शीर्षक से शाया शिवेंद्र के पहले कहानी-संग्रह की कहानियां पढ़कर भी. ये कहानियां अपने लोक-लगाव और विरल आख्यानमूलकता की वजह चर्चा और प्रशंसा के केंद्र में रही और बनी हुई हैं. ‘चंचला चोर’ शीर्षक से शिवेंद्र का एक उपन्यास प्रकाशन की राह में है. 

अमित ओहलाण कथा के इलाके में सक्रिय एक कर्मठ, लेकिन शोर से दूर रचनाकार हैं. कविताएं भी लिखते हैं. इनका एक उपन्यास ‘मेरा यार मरजिया’ शीर्षक से गए बरस प्रकाशित हुआ है.

शिवेंद्र से writershivendra@yahoo.in पर और अमित से amit.k.ohlan@gmail.com पर बात की जा सकती है. यह बातचीत देश निर्मोही द्वारा संपादित ‘पल-प्रतिपल’ के 81वें अंक में पूर्व-प्रकाशित और यहां वहीं से साभार है.]

सदानीरा

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