पत्नी को पत्र ::
नवीन सागर

naveen sagar hindi writer
नवीन सागर

प्रिय छाया,

प्यार ही प्यार…

तुम्हारे बिना रहने का तरीक़ा खोजना अब मेरी सीमाओं में नहीं रहा। तुम्हें छोड़ने का निर्णय लेने के बाद से लेकर अब तक लगातार पछता रहा हूँ। सारे रास्ते ट्रेन में लेटे-लेटे यही सोचता रहा कि तुम साथ होतीं तो यह होता, वह होता।

घर पहुँचा तो इतना अजीब लगा कि बयान नहीं कर सकता। कमरे में अनायास चला गया—बिना किसी काम के, शायद अचेतन मुझे तुम्हारी आकांक्षा में वहाँ ले गया था और वहाँ तुम नहीं थीं। कानों में भयावह सनसनाहट हुई और मैं एक क्षण के लिए काल-निरपेक्ष हो उठा। यह मेरे लिए एक विलक्षण अनुभव था। मैं इसका विश्लेषण कर रहा हूँ उसी दिन से। लेकिन उस दुर्लभ अनुभूति का—उस भयावह सनसनाहट का—उस काल-निरपेक्षता का अर्थ मेरी समझ में नहीं आ सका।

हाँ, मुझे पछतावा था तुम्हें छोड़ने का, लेकिन उसके पीछे एक और बेतरह हाँफता हुआ पछतावा। यह किस बात का?

और तब मैंने सोचा, यानी मुझे सोचना पड़ा कि यह हाँफता हुआ पछतावा तुम्हारे साथ किए गए मेरे अन्यायों का बिंब है। मैं सोचकर चौंका, तब मैं खिड़की में बैठ चुका था। फिर कई दृश्य। और मैंने निर्णय लिया कि ये दृश्य फिर से ज़िंदा नहीं होंगे। इन्हें ज़िंदा नहीं होने दूँगा। दरअसल, अब मैं तुम्हारी आँखों को अभावग्रस्त नहीं होने दूँगा—चाहे वह प्यार का अभाव हो या चीज़ों का।

जब मैंने अपना अपराध निर्धारित किया—मेरा अपराध—मैंने तुम्हारी स्नेहिल आँखों को पहले सूखा और फिर अभावग्रस्त बनाया है। यह हत्या से भी बड़ा अपराध है। शायद इसी अपराध को गति देने वाले मेरे मन के किसी कोने में, तुम्हारी अनुपस्थिति से पैदा हुआ सन्नाटा चीख़ उठा था। उसी की वह सनसनाहट—उसी की थी वह काल-निरपेक्षता। तुम्हारे न होने का सन्नाटा, इतना गहरा सन्नाटा होगा सोचा नहीं था।

कमरे ही में सोता हूँ, बहुत कम नींद आती है। बड़ा अजीब लगता है। आज तुम्हारा पत्र मिला। पिछले दो दिन कानपुर में गुज़रे। कड़ाही लेने गया था। दो-तीन दिन में आ जाएगी। काम प्रारंभ होने में अभी भी कम से कम एक सप्ताह लग जाएगा। इधर सबके नाम तुम्हारे पत्र आए। अकेला मैं ही वंचित रह गया। क्या बताऊँ कैसा लगा। तुम्हारी पत्र-लेखन-क्षमता की यहाँ ख़ासी तारीफ़ हुई। मैंने भी सारे पत्र पढ़े थे। वास्तव में तुम्हारी भाषा, एवं सबके चरित्रानुरूप फ़तवे काफ़ी जानदार थे। लगता है कि तुम लेखिका हो रही हो।

आज तुम्हारे पत्र में एक बात बहुत ही संवेदनशील लगी, ‘‘प्रतीक्षा में बहुत आशाएँ होती हैं, तुमने कभी महसूस किया!’’ ‘प्रतीक्षा’ को इससे अधिक संपूर्णता से अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता, वाह री छाया! इधर मैं भी फिर से लेखन की तरफ़ प्रवृत्त हुआ हूँ और उधर तुम्हारी पकड़ भी मज़बूत हो रही है। अब तुम आओगी तो मुझे काफ़ी बदला हुआ पाओगी। मैंने लिखना शुरू कर दिया है। शाम को बस-स्टैंड पर जाना उसी दिन से संबद्ध है जिस दिन यहाँ आया था। पप्पी के सिवा किसी से नहीं मिलता-जुलता। पूरी शाम जो धीरे-धीरे रात हो जाती है, कमरे में गुज़ारता हूँ। सूने कमरे में। तुम आ जाओ छाया तो तुम्हारे साथ गुज़ारा करूँगा। अब तुम्हें कभी नहीं सताऊँगा, सब काम करूँगा, लिखूँगा, और तुम्हें और बच्चों को प्यार करूँगा, माँ-पिता को अधिकाधिक संतुष्ट रखूँगा, छोटे भाई-बहिनों का पूरा-पूरा ख़याल रखूँगा।

बस अब तुम जल्दी से आ जाओ छाया।

बाबू चाचा के साथ आ सको तो ठीक रहेगा।

रघु भा. सा. के बारे में कोई समाचार नहीं है।

समता और पांडु को बहुत-बहुत प्यार, उन दोनों बच्चों की बहुत याद आती है। पप्पी के रिसेप्शन पर पप्पी व उनके सभी रिश्तेदारों ने, तुम्हें मोदीनगर छोड़ने पर मुझे गालियाँ सुनाईं। सबने तुम्हें व गुड़िया को बेतरह याद किया। अच्छा होंठ बढ़ाओ…

तुम्हारा
नवीन सागर

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नवीन सागर (29 नवंबर 1948—14 अप्रैल 2000) हिंदी के एक अनूठे कवि-लेखक हैं, जिन्होंने उदय प्रकाश के शब्दों में कहें तो जीवट भर और जीवन भर ‘सबवर्सिव’ काम किया। यहाँ प्रस्तुत पत्र ‘कथादेश’ पत्रिका के उन पर एकाग्र विशेषांक (नवंबर 2007) से साभार है। नवीन सागर की तस्वीरें कवि-लेखक अनिरुद्ध उमट के सौजन्य से।

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