पत्र ::
रवींद्रनाथ टैगोर
अँग्रेज़ी से अनुवाद और प्रस्तुति : गार्गी मिश्र

photo Tagore with wife
विवाह के समय—रवींद्रनाथ और उनकी पत्नी मृणालिनी देवी

सन् 1890 अगस्त में जब रवींद्रनाथ टैगोर का इंग्लैंड की यात्रा पर जाना हुआ, तब वह मन ही मन बहुत उदास थे।

एक पत्र में वह अपनी पत्नी मृणालिनी से कहते हैं, ‘‘रविवार की रात मुझे लगा मेरी आत्मा शरीर से बाहर निकलकर दूर वहाँ तुम्हें देखने गई है। यात्रा से वापस लौटकर मैं तुमसे पूछूँग, क्या तुमने भी मुझे देखा था?’’

उस समय उनकी जेष्ठ पुत्री माधुरीलता (डाक नाम : बेला) चार वर्ष की थी और पुत्र राठी दो बरस का। रवींद्रनाथ उसी साल नवंबर में वापस घर आ गए थे। घर लौटने के बाद जब वह बतौर ज़मींदार सियालदह गए तो परिवार को साथ न ले जा सके। उस समय उनके पास घर नहीं था। वहाँ वे एक पुराने पुश्तैनी नौकाघर में रहते थे जिसका नाम ‘पद्मा’ था।

रवींद्रनाथ ने अपनी पत्नी और बच्चों को शोलापुर महाराष्ट्र अपने भाई सत्येंद्रनाथ के पास भेज दिया था। वह हमेशा अपनी पत्नी को पत्र लिखा करते थे। उनके पत्रों को पढ़कर ऐसा लगता है कि पत्रों के उत्तर की प्रतीक्षा उनके अंतस में गहरे छिपी रहती थी। उनके पत्र बताते हैं कि रवींद्रनाथ पत्नी से कितने खुले संवाद करते थे और उन्हें हमेशा परिवार की ज़रूरत महसूस होती थी।

पहला पत्र

इंग्लैंड से मृणालिनी को,
29 अगस्त 1890

‘‘परिंदे अपना घर तिनकों से बनाते हैं। उनके लिए घर से दूर जाना कोई बड़ी बात नहीं। लेकिन हम अपने घर विवेक से बनाते हैं, जो हमारे लिए एक अदृश्य छाँव है। छाँव जहाँ हम अपने काम करते हैं, पढ़ते हैं, लिखते हैं और सोचते हैं। जिस तरह से घोड़ागाड़ी कच्ची सड़कों पर चलते हुए खाँचे बनाती चलती है, जिसे महसूस करते हैं हम—देह के डोलने से, उसी तरह से मस्तिष्क न चाहते हुए भी उन खाँचों में ढल जाता है, जिन्हें मस्तिष्क की आँखों ने बनाया है। हम उन खाँचों से तब भी बाहर नहीं निकलना चाहते, जब हमारे पास बाहर निकलने के मौक़े होते हैं।’’

तुम्हारा पत्र मेरी डाँट का फल है। नहीं? यह प्रत्यक्ष है। यह उम्र सौम्य होने की नहीं। विनती से मुझे यूँ भी कुछ नहीं मिलता। पर डाँटने से ज़रूर मिलता है।

सूरज उगने के समय से मैं वकीलों और शिक्षकों के साथ हूँ। इसलिए उनके सामने तुम्हारा पत्र खोल न सका। अपनी किताबों को विद्यालयों की सूची में अंकित कराने का प्रयास कर रहा हूँ। पर तुम जानती हो वे किताबें कहाँ हैं? वे अभी तक मुझे नहीं मिली हैं।

मैंने ‘राजश्री’ की प्रतिलिपि एक विद्यालय के निरीक्षण अधिकारी को दे दी है। मैंने उन्हें नाओ दीदी की, ‘गल्प्सल्पा’ भी दी है। उस अधिकारी को कुछ होम्योपैथिक गोलियाँ भी दी हैं। उसका गला ख़राब था। वह इससे ख़ुश हुआ होगा, हालाँकि उन मीठी गोलियों से कोई लाभ नहीं।

देखो मैं धन कमाने के लिए क्या-क्या कर रहा हूँ। मैं सुबह चिड़ियों के जागने के साथ ही लिखने बैठ गया था। मैं जानता हूँ इस लिखने से छपाई के पैसे भी नहीं वसूल होंगे फिर भी दस से बारह रुपए तो मिल ही जाएँगे। मेरे पास रुपए कमाने का यही एक साधन है, और तुम सिर्फ़ व्यय करना जानती हो। क्या तुम एक पैसा भी कमा सकती हो?

परसों मेरी साहेब से भेंट होगी। और मेमसाहेब से भी। हो सकता है कि वे रात का खाना मेरे साथ खाएँ या नहीं भी। हो सकता है कि वे कहें, ‘‘बाबू, मेरे पास समय नहीं है।’’ पर खाने की क़िस्में देख वे ज़रूर ख़ुश होते।

मेरा मन नहीं लगता जब बेली और खोका की स्मृतियाँ मुझे घेर लेती हैं। बेली की हथेली पर मेरी तरफ़ से कुछ पेड़े धर देना। मैं जानता हूँ, मेरे न होने पर वह अपनी मनपसंद चीज़ें नहीं खा पाती होगी। खोका को कहना मैं उसे याद करता हूँ।

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संदर्भ :

  1. नाओ दीदी : रवींद्रनाथ टैगोर की चौथी बहन। शुद्ध नाम, स्वर्णकुमारी देवी।
  2. खोका : रवींद्रनाथ टैगोर का पुत्र। शुद्ध नाम : राठी। खोका प्यार से पुकारने का नाम। बंगाली परिवेश में पुत्र को स्नेह से खोका पुकारते हैं।
  3. सत्येंद्रनाथ ठाकुर : रवींद्रनाथ के बड़े भाई। सत्येंद्रनाथ भारतीय प्रशासनिक सेवा में भर्ती होने वाले प्रथम भारतीय थे।

रवींद्रनाथ टैगोर (7 मई 1861–7 अगस्त 1941) प्रसिद्ध भारतीय-बांग्ला कवि, कहानीकार, गीतकार, संगीतकार, नाटककार, निबंधकार और चित्रकार हैं। यहाँ प्रस्तुत पत्र हिंदी अनुवाद के लिए उनकी आत्मकथात्मक पुस्तक My life in my words से चुना गया है। गार्गी मिश्र कविता, कला और अनुवाद के संसार से संबद्ध हैं। वह बनारस में रहती हैं। उनसे gargigautam07@gmail.com पर बात की जा सकती है।

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