शुरुआत ::
आग्नेय

मेरे एक युवा मित्र-लेखक हैं। कुछ रोज़ पहले मैंने उन्हें एक संदेश भेजा कि मेरे प्रदेश में सत्ता-परिवर्तन हो गया है और अगर वह चाहें तो सांस्कृतिक सत्ता प्रतिष्ठानों में उन्हें किसी उचित पद पर पदस्थ करने के लिए प्रयत्न किए जा सकते हैं। उन्होंने जो उत्तर दिया, उसने ही मुझे इस संपादकीय का शीर्षक चुनने में मदद की। उनका उत्तर था, ‘‘मैं जहाँ हूँ वहीं ख़ुश, दुखी और जागरूक एक साथ हूँ। मैं क्या करूँगा कोई पद लेकर जिनकी दिलचस्पी हो वे लें। मैं जो कर रहा हूँ, वह मेरी थकान दूर करता है और वह मेरी आत्मा का अन्न है।’’ वह कविता-केंद्रित एक पत्रिका का अवैतनिक संपादन करते हैं। उनके इस कथन से मुझे फ़्रांत्स काफ़्का की कहानी ‘हंगर आर्टिस्ट’ की याद आ गई। इस कहानी का नायक हमेशा भूखे रहने के प्रतिमान तोड़ता रहता है। जब उससे कोई पूछता है कि वह खाना क्यों नहीं खाता और क्यों लगातार भूखा रहता है, तब वह इस प्रश्न के उत्तर में कहता है कि ऐसा नहीं है कि वह भूखा रहना चाहता है। दरअसल, वह जो अन्न खाना चाहता है, वह अन्न उसे नहीं मिलता है। शायद, वह भी आत्मा के अन्न की तलाश में था।

देखा जाए तो हम सब आत्मा के इस अन्न की तलाश में रहते हैं, लेकिन हम में से ज़्यादातर लोग इसकी तलाश करते-करते थक जाते हैं, क्योंकि वह आसानी से नहीं मिलता। एक तरह से वह जीवन भर दुर्लभ और अप्राप्य ही बना रहता है, और इस वजह से कुछ लोग पूरी ज़िंदगी भूखे रहते हैं। जो लोग थक जाते हैं और भूख सहन नहीं कर पाते, ऐसे लोग आत्मा के अन्न की तलाश छोड़ देते हैं। वे सब कुछ खाने लगते हैं ताकि उनकी भूख मिट सके।

आख़िर यह आत्मा का अन्न आसानी से क्यों नहीं मिल पाता? वह इतना दुर्लभ और अप्राप्य क्यों है? यह एक ऐसी पहेली है जो जितनी सुलझती है, उससे अधिक उलझती जाती है… क्योंकि मनुष्य के मन में एक वीभत्स, हिंसक और घना बीहड़ है। उसमें वह तब तक भटकता रहता है, जब तक वह स्वयं दूसरे किसी व्यक्ति का आखेट नहीं कर लेता या स्वयं किसी का आखेट नहीं हो जाता। बुद्ध—मन के इस बीहड़ के उस पार जाना चाहते थे। वह इसकी तृष्णा को मारकर वहाँ जाना चाहते थे, जहाँ बीहड़ नहीं था, बस एक ख़ालीपन था, जहाँ सब कुछ उलीचकर सुखा दिया गया था, जहाँ सब कुछ निर्बीज हो चुका था, जहाँ कुछ भी उग नहीं सकता था—न वासना, न कामना। बुद्ध ने आत्मा का अन्न निर्वाण में खोज लिया था।

नीत्शे ने भी स्वीकार किया है कि आत्मा के अन्न की तलाश दुष्कर और दुर्गम है। मनुष्य अस्तित्वपरक हताशा, अवसाद और आत्मग्लानि से घिरा हुआ है। नीत्शे ने अपनी आख़िरी किताब Ecce Homo : How One Becomes What One Is में लिखा है कि किसी दिन या रात में कोई शैतान तुम्हारे एकांत में घुस आए और कहे कि यह जीवन जो तुमने अब तक जिया है और अब भी जी रहे हो, उसे अनगिनत बार जीना पड़ेगा और उसमें कुछ भी नया नहीं होगा; लेकिन तुम्हारे जीवन की प्रत्येक पीड़ा, प्रत्येक प्रसन्नता, तुम्हारे सारे विचार, तुम्हारी सारी साँसें, तुम्हारे जीवन में जो भी साधारण और महान रहा हो, सब लौट आएगा—उसी क्रम, उसी निष्कर्ष में—यहाँ तक कि यह मकड़ी और यह पूर्णिमा, यह पल और यह मैं…

संभवतः, नीत्शे हमें उस शैतान से परिचित कराना चाहते हैं जो हमारे उसी जीवन को बार-बार उसी तरह लौटा देना चाहता है जिसे हम जी रहे हैं। बार-बार उसी जीवन में लौट आना क्या हमारे लिए अभिशाप बन जाएगा? यहीं जीवन का बुनियादी सवाल उठ खड़ा होता है कि हम जो जीवन जी रहे हैं, उसका चयन किसने किया और हमने इसमें क्या चयन किया है? क्या हमने अपनी आत्मा के लिए उस अन्न की तलाश की है जो हमें भूखा नहीं रहने देगा? जो लोग आत्मा के इस अन्न की तलाश में हैं, वे बार-बार जीवन में लौट आने से नहीं हिचकेंगे।

यहाँ इतालो काल्विनो का यह कथन अप्रासंगिक नहीं होगा, ‘‘क़बलाई ख़ान के यह कहने पर कि सब कुछ व्यर्थ है, अगर हमारी अंतिम ख़ैर पाने की जगह नर्क ही हो सकता है जिसकी तरफ़ हम खिंचते ही चले जा रहे हैं।’’

इस पर मार्को पोलो ने कहा कि जीवन का नर्क ऐसी चीज़ नहीं, जो होगा, यह नर्क अब भी मौजूद है, जिसमें हम प्रतिदिन जी रहे हैं, जिसे हम मिल-जुलकर प्रतिदिन गढ़ते हैं। इससे बचने के दो ही रास्ते हैं। पहला रास्ता बहुत सारे लोगों के लिए आसान रास्ता है कि इस नर्क को स्वीकार कर लो और इसके हिस्से बन जाओ, ताकि फिर कभी इसे देख नहीं सको। दूसरा रास्ता जोखिम भरा है और निरंतर चौकन्नेपन और एहसास की माँग करता है कि हम उसको खोजें और सबक सीखें कि इस नर्क के बीच अब तक कौन और क्या इस नर्क का हिस्सा नहीं हो सका है। इस नर्क को बर्दाश्त करने में उनकी मदद करें और उनको हमारी इस दुनिया में जगह दें।

यहाँ आकर मुझे लगता है कि मेरा यह युवा मित्र-लेखक नर्क का हिस्सा नहीं बनना चाहता, और भी ऐसे कई लोग हैं जो नर्क का हिस्सा बनने के ख़िलाफ़ अपनी आत्मा के लिए अन्न की तलाश कर रहे हैं। इन्हें यह अन्न मिल सके इसके लिए हमें समाज में उन बीजों को अंकुरित करना है जो लहलहाती फ़सलें उगा सकें ताकि किसी को भूखा न रहना पड़े। अंत में अल्लामा इक़बाल का एक शे’र :

ऐ ताइर-ए-लाहूती1स्वर्गिक पक्षी। उस रिज़्क़2अन्न, ग़िज़ा, जीविका, रोज़ी। से मौत अच्छी
जिस रिज़्क़ से आती हो पर्वाज़3उड़ान। में कोताही 

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‘सदानीरा’ के 21वें अंक में प्रकाशित। आग्नेय हिंदी के समादृत कवि-अनुवादक और ‘सदानीरा’ के प्रधान संपादक हैं। उनसे agneya@hotmail.com पर बात की जा सकती है।

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