‘सदानीरा’ के बारे में

‘सदानीरा’ अपने पूर्व स्वरूप यानी जनवरी-मार्च 2013 से जनवरी-मार्च 2017 के दरमियान प्रकाशित 16 अंकों तक ‘विश्व कविता की पत्रिका’ रही है। संस्थापक-संपादक आग्नेय ने विश्व की महत्वपूर्ण कविता से हिंदी को परिचित कराने का अपना उद्यम बहुत कम संसाधनों के बीच क़रीब पाँच वर्षों तक जारी रखा। अब आग्नेय ‘सदानीरा’ के प्रधान संपादक हैं और संपादकीय ज़िम्मेदारी उन्होंने अविनाश मिश्र को दी है। संसाधन अब भी बहुत सीमित हैं, लेकिन वरिष्ठ दृष्टि के साथ युवा ऊर्जा के जुड़ने से नई राहें खुलेंगी, यह यक़ीन किया जा सकता है। नए संपादन और नई वेबसाइट के साथ ‘सदानीरा’ ने अपने स्वरूप को भी नया किया है, लेकिन ‘सदानीरा’ अब भी प्रथमतः और अंततः कविता से संबद्ध परिसर ही है। विश्व और अखिल भारतीय कविता की नई और ज़रूरी आवाज़ें यहाँ सुनाई दें, इस प्रकार के प्रयत्न ‘सदानीरा’ का संघर्ष हैं। इसके साथ-साथ नया बनता हुआ हिंदी गद्य और कलाओं की नई करवटें भी अब यहाँ नज़र आएँगी। हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता के रूढ़ और सिद्ध अध्याय के आगे के कुछ पृष्ठ रच-खुल सकें, ‘सदानीरा’ की यह आकांक्षा है। ‘सदानीरा’ सब प्रकार की प्रगतिशील दृष्टियों और रचनाधर्मिता का स्वागत करती है।

Agneya Sadaneera

आग्नेय

प्रधान संपादक, सदानीरा

आग्नेय हिंदी के समादृत कवि हैं। ‘पहचान सीरीज’ में प्रकाशित ‘अपने ही ख़िलाफ़’ और ‘मेरे बाद मेरा घर’, ‘लौटता हूँ उस तक’, ‘सिरहाने मीर के’ इनकी कविताओं की कुछ चर्चित किताबें हैं। वह ‘साक्षात्कार’ सहित कई पत्रिकाओं के संपादक रहे हैं और एक अनुवादक के रूप में भी उन्होंने उल्लेखनीय काम किया है।

Avinash Sadaneera

अविनाश मिश्र

संपादक, सदानीरा

अविनाश मिश्र हिंदी में कविता, आलोचना और पत्रकारिता के इलाक़े में सक्रिय हैं। उनकी कविताओं की पहली किताब ‘अज्ञातवास की कविताएँ’ शीर्षक से साहित्य अकादेमी से प्रकाशित है। वह क़रीब चार वर्षों तक साहित्यिक मासिक पत्रिका ‘पाखी’ के संपादकीय विभाग से संबद्ध रहे हैं।