पाठ ::
एंड्र्यू स्पेसी
अँग्रेज़ी से अनुवाद : अनुराधा सिंह

टेड ह्यूज़ और ‘हॉक रूस्टिंग’

टेड ह्यूज़ की सुप्रसिद्ध कविता ‘हॉक रूस्टिंग’ यानी ‘बाज़ बसेरा’ पाठक को एक ऐसे बाज़ के काल्पनिक मानस में अवस्थित कर देती है, जो दिन ढले विश्राम किया चाहता है। यह कविता मानुषी सोच के एक शिकारी पक्षी का एकालाप है, यह उसका मानवीकरण है। यह ठेठ टेड ह्यूज़ शैली में लिखी गई एक प्राणी कविता है, लगभग अरसिक और व्यवहारिक। कवि एक अरण्य में बैठे हुए बाज़ के अस्तित्व और कार्यप्रणाली के विषय में सोचते हुए उसकी प्रभुत्वशीलता पर ध्यान एकाग्र करता है।

खाद्य-शृंखला में सबसे ऊपर होने के कारण शिकार करना इस पक्षी की सहजवृत्ति है। यह दूसरे प्राणियों की मृत्यु पर जीवनयापन करता है। अपनी प्राणरक्षा के लिए वध करता है। शायद मनुष्य के अलावा कोई इसका शत्रु भी नहीं इसलिए इसे शृंखला में नीचे के क्रम के प्राणियों से कोई भय नहीं।

प्राकृतिक संसार की अपरिष्कृति और स्वाभाविकता से उत्प्रेरित होने के कारण कवि ने साफ़गोई से परहेज़ नहीं किया है। बाज़ के सहजवृत्तिजन्य व्यवहार के ऐसे स्पष्ट चित्रण के कारण कविता की कुछ पंक्तियों पर विवाद भी उठा है।

कुछ टीकाकारों ने इस कविता में चित्रित हिंसा पर आपत्ति व्यक्त की है। जिस पर टेड ह्यूज़ ने यह बयान दिया था : ‘‘मेरी जिस एक कविता को बहुधा हिंसात्मक विवरण के लिए उद्धृत किया जाता है, वह ‘हॉक रूस्टिंग’ है, जिसमें एक उनींदा बाज़ जंगल में बैठा आत्मालाप कर रहा है। इस पक्षी पर फ़ासीवादी होने का अभियोग भी है, इसे एक दुर्दांत जातिसंहारक तानाशाह का प्रतीक तक बताया गया है। जबकि मैंने इस बाज़ के माध्यम से मात्र प्रकृति की सोच को मुखर किया है, इससे अधिक और कुछ नहीं।”

इस प्रकार इस कविता में जो सहजवृत्तिजन्य है, जो प्राकृतिक जगत में इंद्रियगोचर है और मानवीय चारित्रिक विशेषताओं से युक्त बाज़ की चिंतन प्रक्रिया के मध्य एक तनाव की स्थिति दर्शायी गई है। यह वस्तुनिष्ठ बनाम व्यक्तिपरक, जैविक बनाम राजनीतिक के मध्य उपस्थित तनाव है।

‘हॉक रूस्टिंग’ कविता पहली बार टेड ह्यूज़ की किताब ‘ल्यूपरकल’ में साल 1960 में प्रकाशित हुई, और तबसे ही चर्चा में है। यह कई संकलनों और स्कूल-कॉलेज के पाठ्यक्रमों में भी शामिल की जा चुकी है।

Ted-Hughes poet
टेड ह्यूज़

हॉक रूस्टिंग

बैठा हूँ अरण्य शीर्ष पर :
निमीलित नयन, निश्चेष्ट।
मेरे नत अंकुशाकार शीश और अंकुशाकार पंजों के मध्य
किसी मिथ्या स्वप्न का स्थान नहीं।
नींद में भी करता हूँ दक्ष आखेट और आहार का अभ्यास।

उन्नत वृक्षों का सुभीता,
प्रफुल्ल वायु और सूर्य की किरणें
अनुकूल हैं मेरे।
पृथ्वी है मेरे ही निरीक्षण हेतु उर्ध्वमुखी।

रूक्ष तने पर कसे हैं मेरे पाँव।
मेरे पाँवों और एक-एक पंख के सृजन में
खप गई है समूची सृष्टि।
अब अपने पाँवों में ही सम्हाले हूँ मैं सृष्टि।

ऊँचा उड़ता हूँ, घूमती है पृथ्वी मेरे सम्मुख मंथर
जिसे चाहता हूँ मारता हूँ क्योंकि सब है मेरा ही।
मिथ्या विवाद नहीं मेरी प्रवृत्ति
मेरा दस्तूर सिर को धड़ से अलग कर देना है।

मृत्यु का आवंटन :
स्पष्ट उद्देश्य है मेरी उड़ान का
जो प्राणियों की अस्थियों से होकर गुज़रती है।
मेरी सत्ता पर किसी तर्क का ज़ोर नहीं।

सूर्य मेरे पार्श्व में है।
मेरे उद्भव से अब तक कुछ नहीं बदला है।
आँखों ने किसी परिवर्तन की अनुमति नहीं दी है।
मैं चीज़ों को यथावत् रखूँगा।

‘हॉक रूस्टिंग’ कविता का विश्लेषण

‘हॉक रूस्टिंग’ शीर्षक यह कविता नैसर्गिक और मानवीय संसार के बीच एक विशिष्ट प्रकार का उत्तेजन उत्पन्न करती है। यह वही तनाव है जिसका अन्वेषण टेड ह्यूज़ अपनी प्राणी विषयक कविताओं में भरपूर करते हैं।

उनकी यह कविता विशेष तौर पर मानवीकरण पर आधारित है—कविता में यह पक्षी हिंसात्मक दृश्यों के बखान के ज़रिए अपने प्राबल्य को दर्शाता हुआ बिल्कुल एक मनुष्य की तरह अपने आपसे बात कर रहा है—इसका तात्पर्य यह है कि पाठक को उन विचारों का सामना करना पड़ता है जो प्राणी-जगत से परे मानवीय संप्रभुता के मनोवैज्ञानिक व राजनीतिक मुद्दों पर आधारित हैं।

उदाहरण के तौर पर कुछ समीक्षक बाज़ के करुणाशून्य व्यवहार में एक आततायी, एक तानाशाह को देखते हैं… यानी एक ऐसी शख़्सियत को जो केवल और केवल ताक़त की परवाह करती है। यह एक फ़ासीवादी प्रतीक है। टेड ह्यूज़ ने कभी नहीं चाहा होगा कि ऐसा हो, लेकिन जैसी मुखर हिंसा और देवतुल्य दंभ को प्रगट करती हुई भाषा का प्रयोग इस कविता में हुआ है, उसे पढ़कर पाठक ऐसी धारणा बनाने को विवश हो जाता है।

एक अरण्य में पेड़ की फुनगी पर बैठे हुए बाज़ को मानव-स्वर दिया गया है, जिसके परिणामस्वरूप घटित आत्मभाषण इस शिकारी पक्षी की आत्मा में झाँकने का और यह समझने का भी सीधा प्रयत्न है कि यह बाज़-तत्व आख़िर है क्या?

एकल वाक्यों के प्रयोग, ढेर सारे पूर्ण विराम, पंक्ति का अनुशासन तोड़ते हुए वाक्यों और पुनरावृत्तियाँ के प्रयोग से छंदों को नियंत्रित किया गया है, लेकिन ताल और तुक के अभाव ने इसे स्वतंत्र कर दिया है।

पहला छंद

पहली पंक्ति शुद्ध निष्कपटता है। संध्या के समय रात्रि विश्राम के लिए बाज़ पेड़ की फुनगी पर आ बैठता है, वृक्ष के शिखर पर उसका अपना स्थान सुरक्षित है, जहाँ से वह सब पर निगरानी रखता है। एक बात तय है कि यह बाज़ अपना स्वतंत्र विचार रखता है। यह मनुष्यों की तरह सोच सकता है।

दूसरी पंक्ति पाठक को भी सोचने के काम में लगा देती है, चार इकाइयों से बने शब्द फाल्सिफाइंग की अपनी प्रतिध्वनियाँ हैं। इस आरंभिक अवस्था में जब इस शब्द के जिसका अर्थ कपट करना है, इतर संदर्भ नहीं मिलते हैं, यह मनुष्यों के व्यवहार से तुलना की ओर ही इंगित करता है जो कपट करके एक दूसरे को गुमराह करने के लिए उद्यत रहते हैं क्योंकि यह एक चिड़िया तो विशुद्ध शिकारी पक्षी होने से इतर कुछ नहीं है।

एन्जाम्ब्मेंट अर्थात अपूर्णान्वय पाठक को सीधे पंक्ति तीन पर ले आता है, जहाँ एक आवर्ती शब्द हुक्ड यानी अंकुशाकार, बाज़ के शारीरिक रूप से प्रभावशाली व चौकस होने के वैशिष्ट्य पर प्रकाश डालता है। यदि यह बाज़ सो जाए तो उसकी यह अंकुशाकार देहाकृति और भी क्रियाशील हो उठेगी, मानो यह नींद में भावी आखेट और वध का कुशल अचेतन अभ्यास कर रहा हो।

दूसरा छंद

वृक्ष से लेकर भूमि तक, सब कुछ इस बाज़ की शारीरिक संरचना के अनुकूल है, सब उसके ही सुभीते के लिए बनाया गया है। उसके इतनी ऊँचाई पर अवस्थित होने का अर्थ है कि वह पृथ्वी का सिंहावलोकन करते रहने में सक्षम है, जो स्वाभाविक स्वामित्व की स्थिति है। वायु की उत्फुल्लता और गरमाहट सब उसके मनोनुकूल हैं। यहाँ तक कि पृथ्वी भी मुख ऊपर किए पड़ी है ताकि बाज़ को उसके विहंगावलोकन में असुविधा न हो।

तीसरा छंद

पुनः बाज़ के पंजों पर ध्यान केंद्रित है जो वृक्ष के तने को मज़बूती से जकड़े हुए हैं। ध्यान देने योग्य बात है कि छह में से पाँच छंदों की पहली पंक्तियाँ अपने आपमें संपूर्ण हैं, वे पूर्णविराम पर समाप्त होती हैं। यह प्रवृत्ति एक प्रकार के नैश्चित्य को दर्शाती है और त्वरित नियंत्रण प्रदान करती है।

स्वामित्व का मूलस्वर यहाँ भी अनुनादित होता है, इस बार इसमें यह नया विचार भी जुड़ जाता है कि यह समूची कायनात इस अत्यंत प्रभुत्वशाली पक्षी की गिरफ़्त में है।

• दसवीं और बारहवीं पंक्तियाँ इस कविता का केंद्रीय बिंदु हैं, क्योंकि वे यह प्रस्तावित करती हैं कि एक समय समूची सृष्टि इस पक्षी की निर्मिति में जुट गई थी, लेकिन अब भूमिकाएँ अदल-बदल गई हैं… यानी यह पक्षी इस सृष्टि का संचालन कर रहा है। वही सबका स्वामी है।

• यहाँ यह प्रश्न उठ खड़ा होता है कि क्या यह निर्माता की निर्मिति का विवरण है या विकास की उस प्रक्रिया का उल्लेख है, जहाँ मात्र शक्तिशाली को ही जीवन जीने का अधिकार है?

चौथा छंद

बाज़ के आत्मालाप के आगे बढ़ने के साथ-साथ परिदृश्य बदलता है। हम यह जानते हैं कि यह एकालाप कोई स्वप्न नहीं बल्कि सीधा भाष्य (कमेंटरी) है।

अब वह बाज़ उड़ रहा है, शिकार पर झपटने के लिए ऊपर और ऊपर उड़ते हुए पृथ्वी का घूर्णन निरख रहा है। इस कविता का सबसे दमदार चार अक्षरों से मिलकर बना शब्द ‘किल’ यहाँ फिर उपस्थित होता है, यानी मैं मारता हूँ—यह क्रिया जो किसी भी शिकारी के संसार में इतनी आम और सामान्य है, मानव संसार में अब भी बहुत ख़ौफ़नाक और अस्वीकार्य मानी जाती है।

यह अ-पीड़ा के साथ मारना है। बाज़ को शिकार करना ही है, उसे जीवनयापन का कोई दूसरा तरीक़ा नहीं मालूम और कविता में इस तथ्य को एक प्रकार की संवेदनहीनता के साथ प्रस्तुत किया गया है। भाषा लगभग अपर्याप्त होते हुए भी दंभ और निर्ममता से परिपूर्ण है। जब बाज़ हवा में शिकार पर झपटने के लिए तैयार होता है तो दुनिया की हर वस्तु उसके प्रभुत्व में प्रतीत होती है, इसमें कोई भ्रम नहीं, बचाव का कोई रास्ता नहीं, यहाँ तो सिर धड़ से अलग किए जाते हैं, यह इतना सरल है।

पाँचवाँ छंद

बाज़ हर प्राणी को उसके माक़ूल मौत तक़सीम करता है, उसके जीवन-मार्ग का उद्देश्य अडिग होता है, जब वह ‘हड्डियों से गुज़रते हुए’ झपटने के लिए तैयार होता है। यह एक बहुत ख़ौफ़नाक, लेकिन प्रभावशाली वाक्यांश है।

यहाँ किसी प्रकार के संशय या तर्क-वितर्क का स्थान नहीं। तथ्य ही महत्वपूर्ण है—यही संपूर्ण सत्य है। बाज़ की इस स्वतःप्रवृत्त हिंसात्मक कार्यप्रणाली के बीच कोई बाधा नहीं बन सकता। वह बिना किसी द्वेष के हत्या करता है; इसमें पक्षी संसार की सहमति का कोई अस्तित्व नहीं; पर्यावरणीय दिशा-निर्देश यहाँ बिल्कुल अप्रासंगिक हैं।

छठवाँ छंद

यदि बाज़ के लिए कुछ आवश्यक है तो वह है सूर्य। सूर्य अस्त हो रहा है, लेकिन बाज़ की सोच में कोई बदलाव नहीं आया है, कभी आएगा भी नहीं। जब तक बाज़ के पास अपनी यह आँख है, यह सर्वद्रष्टा आँख तब तक सब कुछ ऐसा ही अपरिवर्तनशील रहेगा।

अंतिम छंद जीवन और मृत्यु के प्रति बाज़ के दृष्टिकोण को दर्शाता है। देखा जाए तो यह विशुद्ध अहम् है जो बाज़ के रूप में बोल रहा है—मिलावट रहित, ख़ालिस, अपने प्रति ईमानदार।

बाज़ को मानव स्वर देकर टेड ह्यूज़ ने उसे उस मानव जगत में प्रविष्ट करा दिया है जो प्राणियों में सबसे अधिक विकसित, सबसे परिष्कृत है और नैतिक-अनैतिक के बीच फ़र्क़ करने का विवेक रखता है। कभी-कभी यह बाज़ दर्पण की तरह प्रतीत होता है—इस कविता को पढ़कर व्यक्ति जीवन और मृत्यु, सत्ता, नैतिक मूल्यों और प्रकृति के साथ अपने संबंधों आदि के बारे में सोचने लगता है।

बाज़ किस शक्ति के द्वारा संचालित है? विकास? रचयिता? यह पक्षी, जो अपनी दुनिया का मालिक है, सर्वश्रेष्ठ शिकारी है, क्या इसका मानवीकरण इसके प्रति हमारे सोचने के ढंग को बदल देता है?

‘हॉक रूस्टिंग’ की और विस्तृत व्याख्या

हॉक रूस्टिंग चार पंक्तियों वाले छह मुक्त छंदों की एक कविता है। इसकी कोई सुनिश्चित लय नहीं और पंक्तियों की लंबाई घटती-बढ़ती रहती है। पन्नों पर यह भाषिक रूप से बहुत कसी हुई, नियंत्रित तथा सुव्यवस्थित कविता दिखती है; मानो बाज़ के संतुलित व्यक्तित्व का ही प्रतिबिंब हो।

वाक्य-विन्यास

वाक्यांशों, विराम-चिह्नों, व्याकरण और वाक्यों के संयोजन को वाक्य-विन्यास कहते हैं और इस दृष्टि से यह कविता काफ़ी पारंपरिक है। इसमें लीक से हटकर किसी प्रकार का विचलन, पंक्ति-भंग या व्याकरणिक अव्यवस्था नहीं है।

इस तरह के सुव्यवस्थित वाक्य-विन्यास ने इस कुशलतापूर्वक इस कविता की रचना की है, जैसे बाज़ अपने क्रूर नियंत्रण और दक्षता से कुशलतापूर्वक जीवनयापन करता है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस कविता में पूर्णविरामों का प्रयोग भी बाज़ की कठोर नियंत्रण-प्रवृत्ति और सटीक कार्यप्रणाली की शैली को दर्शाता है।

भाषा/शैली

शब्दावली की आवृत्ति और विशेष उपयोग इस कविता के शक्तिशाली संदेश को रेखांकित करते हैं। उदाहरण के लिए, पहले चरण में हुक शब्द दो बार उपस्थित होता है और व्यावहारिकता और हिंसात्मकता का माहौल बनाता है। शिकारी पक्षियों के पास अविश्वसनीय रूप से तेज चोंच और पंजे होते हैं, जो हत्या के काम को पूरी तरह से अंजाम देते हैं।

चौथी पंक्ति में वाक्यांश ‘करता हूँ दक्ष आखेट और आहार’ इस पक्षी की प्रकृति और व्यवहार को समझने में सहायता करता है। मारना यानी किल शब्द पुनः चौथे छंद में उपस्थित होता है।

यह विचार कि बाज़ अजेय है और इसकी रचना एक विशिष्ट उद्देश्य के लिए की गई है, धीरे-धीरे बल पकड़ता जाता है। एक ऐसा पक्षी जिसका हर शै पर नियंत्रण है, जो समूची सृष्टि को अपने पंजों में जकड़े हुए है, जो अपनी मर्ज़ी से यह तय करता है कि किसी को मारना है या नहीं।

ध्यान दें कि अंकुशाकार/ जकड़े हुए/ खुरदुरा/ मारना/ फाड़ना/ मौत/ हड्डियाँ जैसे शब्द और वाक्यांश शारीरिकता का सुझाव देते हैं, इसके विपरीत मिथ्या/ स्वप्न/ नींद में करता हूँ अभ्यास/ मिथ्या विवाद नहीं मेरी प्रवृत्ति/ मेरी सत्ता पर किसी तर्क का ज़ोर नहीं/ अस्थियों से होकर गुज़रती है जैसे वाक्यांश अमूर्तिकरण के उदाहरण हैं।

यह कविता, उस भौतिक संसार जिसमें यह बाज़ निवास करता है और कवि द्वारा गढ़े गए मानसिक जगत के मध्य द्वंद्व की निर्मिति करती है।

मिथ्या आचरण और धोखाधड़ी जैसे शब्दों का उपयोग विशुद्ध प्राणी और मानव-जगत के बीच भेद को स्पष्ट करने में मदद करता है।

***

यह प्रस्तुति owlcation.com पर प्रकाशित आलेख Analysis of the Poem ‘Hawk Roosting’ by Ted Hughes पर आधृत है। टेड ह्यूज़ (17 अगस्त 1930-28 अक्टूबर 1998) अँग्रेज़ी के सुपरिचित कवियों में से एक हैं। एंड्रू स्पेसी कविता के सभी पहलुओं से गहरा लगाव रखने वाले काव्य-विश्लेषक और कवि हैं। अनुराधा सिंह हिंदी की चर्चित कवयित्री और अनुवादक हैं। उनका एक कविता-संग्रह ‘ईश्वर नहीं नींद चाहिए’ शीर्षक से प्रकाशित है। वह मुंबई में रहती हैं। उनसे anuradhadei@yahoo.co.in पर बात की जा सकती है। यह प्रस्तुति ‘सदानीरा’ के 21वें अंक में पूर्व-प्रकाशित।

Leave A Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *