कवितावार में नवनीता देवसेन की कविता ::
बांग्ला से अनुवाद : उत्पल बैनर्जी

nabaneeta sen POET

बारिश होने पर

बारिश होने पर लगता है
यह घर ही नीला होकर कांपते-कांपते झर गया है,
मानो अनंत समय ने कहीं से आकर
भर दिया है घर को,
मानो अजस्र हवाएं आकर
घर को नदी के तट पर ले गई हैं,
नाव बन कर मैं बही, भीगी
डोलती-डोलती, कांपती-कांपती चलने लगी,
वह दिख रही है मुहाने की रेखा,
मानो चारों ओर लहरें उफन रही हैं
मानो कहीं पर कोई नहीं है
जैसे गहरी रुलाई से रुंध आया हो गला
जैसे भयंकर कठोर रुलाई
रुद्ध कर देती है घर का कंठ,
कैसे अनोखे नए इंद्रजाल में
पल-भर में दसों दिशाएं कांप उठती हैं
कि मानो सभी कुछ बदल जाएंगे असली सूरत में,
कि जैसे सभी कुछ नृत्य है, छंद है सभी कुछ,
सभी कुछ रंगा हुआ उजाला,
नींद टूटते ही बारिश देखने पर
बीच-बीच में ऐसा ही होता है
तब प्रार्थना करती हूं
हे आकाश! घर को ढहाती और बारिश दो.

***

[ नवनीता देवसेन बांग्ला की समादृत साहित्यकार हैं. वर्ष 1999 में ‘नवनीता’ शीर्षक कविता-संग्रह के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित हो चुकी हैं. उत्पल बैनर्जी हिंदी के सुपरिचित कवि-अनुवादक हैं. उनकी कविताओं की एक किताब ‘लोहा बहुत उदास है’ शीर्षक से प्रकाशित है. बांग्ला के कई महत्वपूर्ण रचनाकारों को बांग्ला से अनुवाद के जरिए हिंदी में लाने का श्रेय उन्हें प्राप्त है. उनसे banerjeeutpal1@gmail.com पर बात की जा सकती है. कवयित्री का स्केच ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के सौजन्य से.]

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