वृत्तांत ::
प्रचण्ड प्रवीर

Prachand Praveer writer
प्रचण्ड प्रवीर │क्लिक : बसंत कुमार

भिन्न

आर्थर मैकेन को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए.

एक

समस्या

गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।
बंदऊं सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न।।

— बालकांड, रामचरितमानस, तुलसीदास

संदलपुर नाम के छोटे से कस्बे में बारह सौ साल से भी ज्यादा एक पुराना किला है, जो वक्त की मार से अब टूटा-फूटा और बेजान पड़ा है. कहते हैं इस पर कई बादशाहों और सुल्तानों ने हुकूमत की. इतिहास के भरोसेमंद पन्नों में, जैसे अबुल फ़ज़ल के ‘अकबरनामा’ और यहां तक कि मीर तकी मीर की आत्मकथा ‘जिक्र-ए-मीर’ में, इस किले के वैभव और मनहूसियत का जिक्र है. 1857 के गदर से सौ साल पहले बंगाल के नवाबों ने इसे जब अपनी अय्याशी का अड्डा बनाया था, कहते हैं अंग्रेजों ने इस किले में कत्ल-ए-आम मचाकर नवाबों का सितारा अस्त कर दिया, और उनके साथ सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण यह किला भी अपने सुनहले वक्त से गुमनामी के अंधेरे पन्नों में खो गया. बंगाल की उसी सुनहरी तवारीख के दस्तावेजों में यह दर्ज है कि नवाबों और उनके वफादार सिपहसालारों की बेचैन रूहें उस किले में मुद्दतों भटकती रहीं. फकीरों का अंदेशा था कि जो पहले खून-पसीने की कमाई के प्यासे थे, मर जाने के बाद खून के प्यासे रक्तपिशाच हो गए. किले की गिरती दीवारों पर उग आए पीपल के पेड़ों पर, सूखे कुओं के पास सदियों पुराने बरगद की झुरमुट में, इमली की टहनियों पर न जाने कितने पिशाच और उनके संगी-साथियों का डेरा था. रूहों के इल्म रखने वाले इस बात पर एकमत थे कि भेडि़यों और कुत्तों की लाशें जो किले के चारों तरफ फैली खाई में अक्सर पाई जाती थीं, वह किले में रहने वाले पिशाचों की कारस्तानी थी. उन बेरहम बुरी ताकतों पर पीर की ताबीज, ओझा की झाड़-फूंक बेअसर थी. यह माना गया कि बचकर रहना ही एकमात्र उपाय है. इसीलिए शाम-रात तो रहने दिया जाए, एक सदी तक दिन में भी कोई आदमजात उधर से गुजरने की हिमाकत नहीं करता था.

गदर के बाद अंग्रेजों ने इस किले में मौजूद न जाने कितने पुराने छह महलों के खंडहरों को ज्यादा तवज्जोह नहीं दी. कभी-कभी सिपहसालार उन महलों और उनके बेहाल बागों में छावनी बनाकर यदा-कदा रुका करते, पर जल्दी ही मनहूसियत के बदनाम साये से डरकर उन्होंने किले से बाहर के मैदान में अपनी शानदार छावनी बना ली, जो आज भी कायम है. किले की मनहूसियत की बदनामी के कारण वह इलाका पिछले ढाई सौ सालों से कभी आबाद न हो सका.

इतिहासकारों का मानना है कि 1934 के जलजले में किले के सारे रिहाइशी ठिकाने नेस्तनाबूद हो गए. किले के मुख्यद्वार पर नवाबों का बनवाया दो सौ साल पुराना घंटाघर एक झटके में मिट्टी में जा मिला. हजार साल पुराना किला अपने सारे वैभव की परछाईं की तरह एक सूखी अकड़ी लाश से ज्यादा कुछ न रह गया. वे छह पुराने महल और भी टूट-फूटकर भयावह और वीरान हो गए. जब संदलपुर दुबारा बनाया और बसाया जाने लगा, तब वहां के रायबहादुर ने उन्हीं महलों के पास एक नया आलीशान महल बनाया. आजादी के बाद रायबहादुर की बड़ी संपत्ति सरकार ने ले ली, पर इस महल पर उनका मालिकाना हक बरकरार रहा.

रायबहादुर विक्रम सिंह राठौड़ मरने के बाद अपनी खोखली राजशाही और यह महल अपने इकलौते बेटे पुरुषोत्तम सिंह राठौड़ के लिए विरासत में छोड़ गए थे. महल में काम कर रहे आज के नौकरों ने अपने दादा-परदादा से सुना था, जब वे रायबहादुर की चाकरी करते थे, उन दिनों उन्होंने महल में कई बार रातों में किसी बच्चे के रोने की डरावनी आवाज, किसी मजलूम औरत की चीखो-पुकार, किसी वहशी दरिंदे के खौफनाक ठहाके लगाने की आवाजें सुनी थीं. रायबहादुर विक्रम सिंह राठौड़ उन अजीब आवाजों के पीछे अपनी सामंती आन-बान में बिना डरे अपनी दुनाली लिए पीछा करते रहते, और काली रातों में उड़ते किंकियाते चमगादड़ों पर गोलियां दागते रहे. एक बदकिस्मत सुबह वह अपने ही आलीशान महल की छत की मुंडेर के पाए से फांसी पर लटके हुए पाए गए. उनकी लाश की खौफजदा आंखें बाहर निकली हुई थीं, जो महल की दक्षिण दिशा में बहती नदी की तरफ देख रही थीं. लोग यह कयास लगाते थे कि नवाबों के भूतों ने रायबहादुर की दुनाली की गुस्ताखी की माकूल सजा दी. इसलिए किले में आज भी उस महल के अलावा बहुत ही कम रिहाइशी ठिकाने हैं.

इस किले के इतिहास का सारांश यह समझा जाता है कि जो भी इस किले में रहने आया, उसका घर-परिवार हमेशा उजड़ता रहा.

पुरुषोत्तम सिंह राठौड़ को कभी राजशाही नसीब न हुई, पर वह इस बात का खास ख्याल रखते थे कि लोग उन्हें अदब के साथ ‘छोटे राजा साहेब’ या फिर केवल ‘राजा साहेब’ कहकर बुलाएं. अपने वालिद जैसी मोतियों जड़ी पगड़ी, रत्नजडि़त बटनों वाला सफेद अचकन पहनना, नुकीली जूतियां और महंगी अंगूठियां पहनना उनकी पहचान थी. पांच मील पूरब में राजमहल की काली पहाडि़यों में जाकर आखेट करना, अरबी घोड़े पर घुड़सवारी करना, दुनाली से उड़ती चिडि़यों को मारना, विदेशी महंगी गाडि़यां चलाना, उनके मशहूर शौक थे. तमाम ऐबों के बावजूद राजा साहेब औरतों के मामले में कमजोर न थे. राजसी आन-बान ओढ़ लेने से दिक्कत यह हुई कि उनकी पत्नी और उनके बेटे विश्वमोहन सिंह राठौड़ ने भी उनको हमेशा ‘राजा साहेब’ कहकर ही बुलाया. यह राजा साहेब का हुकुम था या सताई पत्नी का व्यंग्य या उनके खानदान की परंपरा, इसके बारे में ठीक-ठीक राजा साहेब की धर्मपत्नी ही बता सकती थीं, जो नदी में कार्तिक स्नान करते समय डूबकर अकाल मृत्यु को प्राप्त हुईं.

उन दोनों की एकमात्र संतान ने बोर्डिंग स्कूल में पढ़ाई की.

इस तरह विश्वमोहन पढ़-लिखकर वक्त के चलन के अनुसार बुद्धिमान बना और स्नातक की पढ़ाई करने के लिए भारत से सीधे अमेरिका जा पहुंचा. वहां वह किसी अमेरिकी लड़की से ही राजा साहेब को बिना सूचित किए विवाह बंधन में बंध गया. राजा साहेब को बेटे की शादी और अपने पोते होने की जानकारी एक ही साथ तब मिली जब उन्होंने सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अपना अकाउंट खोला और अपने बेटे को ढूंढ़ निकाला. यह जानकर उन्हें बड़ा धक्का लगा. उस वाकये के बाद बाप-बेटे में तब तक कोई संवाद न हुआ, जब तक राजा साहेब ने विश्वमोहन से पहली और आखिरी गुजारिश न की.

हाल ही में छोटे राजा साहेब का निधन हो गया था. यह सूचना राजा साहेब के महल के केयरटेकर ने विश्वमोहन को दी, पर तब भी वह भारत न आ सका.

अमेरिका जाने के सत्रह साल बाद जब विश्वमोहन भारत आया था, उसने बचपन के जहीन दोस्त जनमेजय को सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर ढूंढ़ निकाला. जनमेजय भी संदलपुर का रहने वाला था, पर अब उसने यह शहर छोड़ दिया था. एक अच्छी-भली सरकारी नौकरी छोड़कर अब वह पास के शहर में अपना व्यापार करता था.

“मैं बहुत खुश हूं कि तुम यहां आए, जनमेजय. मुझे नहीं लगा था कि तुम आ पाआगे!”

“कैसी बात करते हो? तुम कौन-सा बार-बार भारत आओगे. तुम्हारे लिए मैंने कुछ दिन की छुट्टी निकाल ली है. कुछ परेशान नजर आते हो. तुम ठीक तो हो, विश्वमोहन?”

“क्या कहूं? तुम अपनी सुनाओ? तुमने शादी क्यों नहीं की? तुमने सरकारी नौकरी क्यों छोड़ दी?”

जनमेजय ने गहरी सांस लेकर निराशा से कहा, ‘‘कोई मिली नहीं अपने ढंग की. मैंने सोचा था कि किसी ऐसी लड़की से विवाह करूंगा जो समर्पण के नाम पर बोझ न बने. मैं रक्षक के नाम पर उसका शोषक न बनूं. यहां विवाह से पहले बातचीत करना ही जरा मुश्किल है. खैर, अभी उम्र बाकी है. कोई मिल जाएगी. रहा सवाल नौकरी का, वह बदलते वक्त के साथ सामंतशाही का नमूना-सा ही है. मुझे उम्मीद है या तो यह बदलेगा या फिर नष्ट हो जाएगा.’’

दोनों मित्र विश्वमोहन के विशाल महल की छत पर चहलकदमी कर रहे थे. सूरज अभी पश्चिम में नदी के किनारे डूबने ही वाला था. सुदूर पूर्व में राजमहल की काली पहाड़ियां सुनसान-सी तक रही थीं. रह-रहकर वीरानों से, दूर जंगलों से कोई डरावनी आवाज भी कभी-कभी सुनाई देती थी, जिसे अक्सर सियार और लकड़बग्घे की गुर्राहट समझकर अनसुना कर दिया जाता था. विश्वमोहन अपने दोस्त की तरफ एकदम से मुड़ा और बोला, “मुझे इस तरह भारत आने की उम्मीद कतई न थी. यह भी नहीं सोचा था कि कभी लौटूंगा और तुमसे मिलना भी होगा.”

“क्यों? तुम्हारा बेटा यहां आकर बड़ा खुश लग रहा है. तुम्हें चंदन को पहले यहां लाना चाहिए था. वह हिंदी बोलता है या नहीं?”

“बहुत कम बोलता है. समझ सब कुछ लेता है, क्योंकि मैं उससे हिंदी में ही बात करता हूं.”

विश्वमोहन का चेहरा पीला पड़ गया. “मुझे यहां मजबूरी में आना पड़ा है. मैं यहां आया नहीं हूं, लाया गया हूं.” दुःख से उसका चेहरा पीला पड़ गया था था.

जनमेजय ने पूछा, “क्या हुआ? छोटे राजा साहेब के निधन के समय भी नहीं आए. किस बात का डर है? क्या बात है?”

“उस समय छुट्टी नहीं मिल पाई थी. उधर जूलिया को यह डर था कि मैं भारत जाऊंगा तो कभी वापस नहीं आऊंगा. वह भी अजब अंधविश्वासी है. न वह मुझे यहां आने दे रही थी, न ही मैं आ पा रहा था. तुम समझ नहीं सकते, इन दो देशों की दुनिया कितनी भिन्न है. मैं जो कुछ कहूंगा, पता नहीं तुम समझ भी सकोगे या नहीं. इंसान कई आदमियों से झूठ बोलता है, जरूरत पड़ने पर अपने कई दोस्तों को दगा दे सकता है, कई से दगा खा सकता है, लेकिन जो भरोसा उसे बचपन के दोस्त पर होता है, वह किसी और पर कभी नहीं हो सकता. उसी नाते मैंने तुम्हें बुलाया है. जनमेजय, मैं बड़ी उलझन में पड़ गया हूं.”

“भरोसा रखो विश्वमोहन. तुम तो हम सबसे कहीं ज्यादा धीरज वाले थे. ऐसे घबराना ठीक नहीं है. बताओ, क्या परेशानी है?”

जनमेजय ने विश्वमोहन के हाथों को थपथपाकर दिलासा दिया. “तुम तो ऐसे मायूस हो रहे हो, जैसे तुम्हारा सब कुछ लुटने वाला हो.”

विश्वमोहन के चेहरे पर पसीना आ गया. आंखें लाल होकर भर आईं. चेहरे की नसें तन गईं और उसने कहा, “ऐसा ही समझो. ऐसा ही है.”

इधर-उधर देखने के बाद विश्वमोहन ने कहा, ‘‘जानते हो, संसार की सबसे बड़ी दौलत क्या होती है?” जनमेजय के शून्य चेहरे को देखकर विश्वमोहन ने खुद ही उत्तर दिया, “आदमी का बेटा. बेटे से बड़ी कोई दौलत नहीं होती. मेरा आठ साल का बेटा जिंदगी और मौत की हारी हुई लड़ाई लड़ रहा है. अमेरिका के डॉक्टरों ने जवाब दे दिया है.”

“क्या कह रहे हो?” जनमेजय चौंक उठा.

“खून की असाध्य बीमारी है. शायद दस-पंद्रह दिन और जी सके.”

“मुझे बहुत अफसोस हुआ सुनकर.” जनमेजय ने अज्ञात अपराधबोध से भरकर कहा. भरी हुई आंखों को पोंछते हुए विश्वमोहन ने कहा, “अमेरिकी डॉक्टरों की तमाम सुविधा छोड़कर, बच्चे को अपनी मां से जुदा कर मैं यहां आ गया हूं.”

“तुमने कहा था कि लाए गए हो?”

“हां. मैं लाया गया हूं. अनजानी ताकतें मुझे यहां खींच लाई हैं. मुझे समझ नहीं आ रहा कि कैसे बताऊं? तुम मेरा यकीन करोगे भी या नहीं!” घबराहट में विश्वमोहन ने जनमेजय का हाथ पकड़ा.

“कहकर तो देखो.”

“तुम्हें शायद याद होगा. बचपन में जब भी मैं छुट्टियों में महल में लौटता, मुझे बड़े भयानक सपने आते थे. अजीब-अजीब आवाजें सुनाई देती थीं. जब तक मैंने यह देश नहीं छोड़ा, मुझे मन का चैन नहीं मिला था. परदेस जाकर मुझे सुकून मिला. अमेरिका में मेरी जिंदगी बड़ी खुशहाल चल रही थी. बीवी-बच्चे, दो वक्त का खाना, अच्छा घर… मुझे कभी वापस आने का ख्याल भी न आया. राजा साहेब का जब इंतकाल हुआ, उस समय मैं सोया हुआ था. एक भयानक सपने से जागने के बाद मुझे खबर मिली कि राजा साहेब नहीं रहे. मैं शायद आ भी जाता, लेकिन उस भयानक सपने से उपजे डर ने मुझे अंदर से हिला दिया था. मेरी नस-नस में खौफ समा गया. उसने ही मुझे कुछ करने न दिया. जैसे वह सपना नहीं हकीकत हो, जिसे मैंने जिया था.”

विश्वमोहन पसीने से तरबतर भीग गया. सहारा लेने के लिए छत पर रखी एक कुर्सी की बांह पकड़कर बैठ गया.

“सपने का सिरा याद करो तो ठीक से याद नहीं आता. जहां तक मुझे याद आता है न जाने किस कठिनाई से मैं किसी वीरान पहाड़ी इलाके में जा पहुंचा था. जैसे मीना बाजार में बड़ा झूला लगता है, वैसा ही चौबीस डोले वाले बहुत बड़ा, पर बदरंग टूटा-फूटा झूला दीख रहा था. अगले ही पल में राजा साहेब और मैं आमने-सामने उस टूटे-फूटे झूले के निचले हिंडोले में बैठे थे. उनकी आंखें भेड़िए की आंखों-सी लाल हैं, मुंह से लार टपक रही है. मुंह खोलते ही उनके सफेद दांतों में लकड़बग्घे जैसा पैनापन नजर आता है. सहसा राजा साहेब मेरी गर्दन पकड़कर उसे दबाना शुरू करते हैं. मेरी गर्दन पर उनके कसे हाथ बेहद ठंडे और सख्त हैं. मेरा दम घुटता जा रहा था और राजा साहेब क्रूर हंसी हंसते हुए कहते हैं कि तुम्हें आना ही होगा. झूले की तेज गति में मेरी नाक से और आंख के किनारों से खून निकलना शुरू होता है. अंदर के दबाव से मेरा पेट फट जाता है और खून के फव्वारे छूटने लगते हैं.” कहते-कहते विश्वमोहन हांफने लगा.

“जब उनके मरने की खबर मिली तो न जाने मैं कैसा कायर हो गया. मुझे लगा कि मेरी मौत मुझे बुला रही है. इसलिए मैंने भारत न आने बहाना बना दिया. वैसे भी पूछने वाला था कौन? लेकिन राजा साहेब को गुजरे महीना ही लगा था कि मेरा बेटा चंदन बीमार पड़ गया. दस महीने इधर-उधर दौड़ा. अस्पतालों के चक्कर लगाए. बहुत से डॉक्टरों को दिखाया. सबने जवाब दे दिया. बुखार में नीमबेहोशी में चंदन न जाने क्यों उसने संदलपुर जाने की जिद करने लगा. एक और विचित्र बात हुई. मेरा बेटा रातों में अक्सर बुरे सपने से उठ जाया करता है. बार-बार वह यह कहता है कि वह किसी वीरान पहाड़ी इलाके में है. बहुत से सफेद आदमी उसके साथ काले पत्थरों में नाच रहे हैं. वह हवा में तैर रहा है और सफेद आदमी दांत किटकिटा रहे हैं. कोई सफेद वालों वाली अंधी बुढ़िया उसे देखकर डरा देने वाला ठहाका लगाती है. इस सपने के बाद उसकी सांसें बहुत देर तक तेज चलती हैं. पसीने से बदन भीग जाता है. सपने से डर के मारे वह सोना नहीं चाहता. दिन भर गुमसुम रहता है. फिर भी न जाने क्यों उसने संदलपुर आने की रट लगाए रखी, मानो वह भी किसी से डरकर यहां पहुंचना चाह रहा था. एक बात और, वह बार-बार घर की दीवारों पर रंगों से गणित के निशान बनाता है. 1/1, 2/1, 3/2, 5/3, 8/5, 13/8… एक पूर्ण संख्या बटा दूसरी पूर्ण संख्या. इसका मतलब समझते हो?”

जनमेजय के मुंह से बरबस एक शब्द फूटा, “भिन्न!”

दो

निरूपण

सन्नाप्यसन्नाप्युभयात्मिका नो भिन्नाप्यभिन्नाप्युभयात्मिका नो।
सङ्गाप्यनङ्गप्युभयात्मिका नो महाद्भुतानिर्वचनीयरूपा॥

अर्थात् : वह न सत् है, न असत् है और न उभयरूप है न भिन्न है, न अभिन्न है और न उभयरूप है न अंगसहित है और न अंगरहित है और न उभयात्मिका ही है किंतु अत्यंत अद्भुत और अनिर्वचनीयरूपा है.

— विवेकचूड़ामणि, आदि शंकराचार्य

जनमेजय और विश्वमोहन बहुत देर तक इस पर विमर्श करते रहे कि किले और महल के मनहूस अतीत से इस घटना का कैसा संबंध हो सकता है.

अगले दिन सुबह-सुबह दोनों मित्र चंदन के साथ किले का मुआयना करने निकले. छह पुराने टूटे-फूटे महल के खंडहरों को देखकर वे आगे निकल गए. “इतने परेशान क्यों लग रहे हो! क्या हुआ? तुम्हें फिर से कोई बुरा सपना आया?” जनमेजय ने कुम्हलाए विश्वमोहन से पूछा, पर वह अनुसना करते हुए चंदन को आस-पास के पेड़ पर बैठे बंदर दिखाने लगा. कुछ दूर चलने के बाद चंदन ने चहकते हुए कहा, ‘‘वो रहा किले का दरवाजा. इससे ही किले के अंदर आते हैं क्या?”

“इस किले के चार दरवाजे हैं.” जनमेजय ने चंदन को बताया, ‘‘पूर्व में नारंगी दरवाजा, पश्चिम में बैंगनी दरवाजा, उत्तर में हरा दरवाजा और दक्षिण में लाल दरवाजा. कहते हैं कि यह दरवाजों का रंग सम्राट हर्षवर्धन की बड़ी बहन राज्यश्री ने रखा था. शायद यह किला राज्यश्री के पति ग्रहवर्मन का बनवाया हुआ था. कुछ पुरातत्वशास्त्री मानते हैं कि यह किला पृथ्वीराज चौहान के समय बना था. दरवाजों का रंग राजकुमारी संयोगिता ने अपने कंगन में मनकों के रंगों से मिलता-जुलता रखा था. इस किले के बाहर चारों तरफ गहरी खाई है, जिसमें पानी भरा है. पहले के जमाने में किले को दुश्मनों से बचाने के लिए ऐसी खाइयां बनाई जाती थीं.’’

बातों के क्रम में जनमेजय ने विश्वमोहन से पूछा, ‘‘राजा साहेब की मौत कैसे हुई? क्या उन्होंने भी फांसी लगाई?”

“नहीं. उनकी मौत भी शायद अप्राकृतिक ढंग से हुई थी. हमारे खानदानी नौकर दीपू ने जब मुझे खबर दी, तब यह बताया गया था कि आखिरकार उनकी किडनी फेल हो गई. मरते वक्त उनके हाथ काले पड़ गए थे.”

“आखिरकार से तुम्हारा क्या मतलब है?” जनमेजय ने पूछा.

‘‘राजा साहेब की किडनी खराब हो गई थी. शादी की बात पता चलने के बाद से वह मुझसे बात तो करते न थे. एक दिन उन्होंने मुझे फोन करके अपनी बीमारी के बारे में बताया. उनकी इच्छा थी कि मैं अपनी एक किडनी उन्हें दे दूं.”

“फिर?”

‘‘जूलिया नहीं चाहती थी.”

जनमेजय ने विश्वमोहन से आंखें मिलाते हुए पूछा, “और तुम?” विश्वमोहन ने नजर बचाकर कहा, “जनमेजय, जिंदगी में फैसले लेना इतना आसान नहीं है. बहुत सोचना-विचारना पड़ता है. मैंने पता किया था. हिंदुस्तान में दया के आधार पर अभी भी किडनी दी जाती है. मैं किसी किडनी देने वाले का इंतजाम कर रहा था. वैसे दो हजार डॉलर में यह काम हो जाता है. मैंने तो चार हजार डॉलर का बजट बना रखा था. लेकिन मेरी इस पेशकश को राजा साहेब ने ठुकरा दिया.’’

“क्या बोले?”

“वही राजसी अकड़! राजसी बदन में राजसी खून दौड़ेगा. किसी ऐसे-वैसे से खून या किडनी कैसे ली जा सकती है. इससे अच्छा है कि मौत आ जाए.”

जनमेजय ने गहरी सांस लेकर कहा, “और आ गई.”

“लेकिन उनकी मौत के बाद जो हुआ, वह बड़ा लोमहर्षक है.” विश्वमोहन ने कहा, “मैंने दीपू को कहा था कि उनके क्रिया-कर्म का सारा कारोबार मुझे वीडियो कैमरे पर लाइव दिखाए. इसके लिए उसने बाजार से कंप्यूटर जानने वाले लड़के को भी रखा. उस दिन जब चंदन और मैं श्मशान घाट पर उनके अंतिम संस्कार का लाइव शो देख रहे थे. अचानक दीपू को जैसे कुछ दौरा-सा पड़ा. लोग उसे उठाने दौड़े. फिर सिग्नल टूट गया. मैं फोन मिलाता रह गया, पर किसी से कोई संपर्क न हो सका. दो दिन बाद खुद ही दीपू का फोन आया. उसने रोते-रोते बताया कि उस दिन जबरदस्त तूफान आ गया था. नदी के किनारे श्मशान में जो लकड़ियां जलने को बिछी थीं, वे जलने से पहले सीली हो गईं. बारिश रुकने के इंतजार में राजा साहेब की लाश को जब लोग गीली लकड़ियों से उठाने के लिए जा रहे थे, न जाने कौन लोग आए और लाश पर अपना हक जताकर वहीं से उठाकर कहीं किनारे ले गए. चूंकि कोई पूछने वाला न था, इसलिए राजा साहेब की लाश उस दिन उस घाट पर नहीं जली. कोई नहीं जानता कि राजा साहेब की लाश को कौन लोग गायब करके ले गए.”

“और दीपू का क्या हुआ?”

“उस दिन के बाद से कभी दीपू से बात नहीं हुई. महल के केयरटेकर ने मुझे बताया कि राजा साहेब के चल बसने के दो महीने के बाद दीपू ने महल की छत की मुंडेर के पाए से गले में फांसी डालकर खुदकुशी कर ली. उसका चेहरा महल की दक्षिण दिशा में बहती नदी की तरफ था. जानते हो, मेरे दादा की मौत ठीक ऐसे ही हुई थी.”

“हमें दीपू के परिवार वालों से उसके बारे में पूछना चाहिए. शायद कोई रास्ता मिले.”

“अब कोई रास्ता मिलकर भी क्या होगा? जनमेजय, मुझे चंदन के लिए अफसोस होता है.” कहकर विश्वमोहन मायूस हो गया.

“घबराओ मत विश्वमोहन. दुनिया बड़ी विचित्र है. हमें आखिरी सांस तक आस नहीं छोड़नी चाहिए. क्या पता कोई रास्ता निकल आए और चंदन की जान बच जाए.”

चंदन उन दोनों से आगे किले के रास्ते पर चहलकदमी कर रहा था. सागवान और शीशम के सूखे पेड़ों को वह बड़े गौर से देखता जा रहा था. अचानक उसकी दिल को चीर देने वाली चीख निकल गई, जिससे दोनों दोस्त चौंक पड़े. भय से पीले पड़ गए चंदन ने उंगली के इशारे से विश्वमोहन को दिखाया, “पापा, वह देखिए.”

इमली के पेड़ के नीचे एक सफेद बिखरे बालों वाली अंधी पोपली बुढ़िया बैठी थी जिसके चेहरे पर कुटिल मुस्कुराहट तैर रही थी.

चंदन ने एकदम से बिलखते हुए कहा, “पापा, इसे मैंने सपने में देखा था.”

जनमेजय ने चंदन की पीठ थपथपाई, “तुम्हारा वहम होगा.” यह कहते हुए जनमेजय और विश्वमोहन उस मैली-कुचैली साड़ी पहनी अंधी बुढ़िया के पास पहुंचे. जनमेजय ने डपटकर कहा, “ऐ बुढ़िया, यहां क्या कर रही है?”

उस बुढ़िया के झुर्रियों से भरे चेहरे पर क्रोध की रेखाएं नजर आईं. उसने उलटे गुर्राकर पूछा, ‘‘कौन है तू?”

विश्वमोहन ने जवाब दिया, “हम महल के रहने वाले हैं. मैं छोटे राजा साहेब का लड़का हूं.”

यह सुनते ही बुढ़िया ठहाका मारकर हंसने लगी. कौए जैसी कर्कश आवाज में वह गुर्राई, ‘‘तू आ गया आखिर. तुझे तो आना ही था.” यह कहते-कहते बुढ़िया फिर हंसने लगी, ‘‘भाग सके तो भाग जा. कहीं भी चला जा, पर तुझे यहीं आना पड़ेगा. तेरी मौत यहीं लिखी है. हा हा हा…”

बुढ़िया की यह भयानक हंसी सुनकर न जाने किस डर से कांपते हुए जनमेजय ने विश्वमोहन के कंधे पर हाथ रख वापस चलने का इशारा किया.

उसी शाम जनमेजय और विश्वमोहन किले से बाहर की बस्ती में दीपू के घर जा पहुंचे. मरने के समय दीपू की उम्र पचास साल की रही होगी. उसके बाप-दादा ने भी राजा साहेब और रायबहादुर के जमाने में महल की नौकरी की थी. दीपू का बेटा मद्रास में काम करता था. दीपू की बीवी ने रोने-धोने के बाद बताया कि राजा साहेब के मरने से कुछ दिनों पहले दीपू कई-कई घंटों बाहर रहा करता था. उसने एक दिन बड़े डर से बताया था कि राजा साहब के हाथ पथरीले होते जा रहे हैं. चमड़े का रंग पत्थर जैसा काला और कलाई सख्त होती जा रही है.

अफसोस जताने के बाद जनमेजय ने दीपू का कमरा देखने के लिए इजाजत मांगी.

दीपू के कमरे की चौखट बड़ी नीची थी. सर झुकाकर जब विश्वमोहन और जनमेजय अंदर घुसे, तब कमरे में मामूली रोशनी आ रही थी. खिड़की खोलते ही सामने एक चमगादड़ लटका दिखाई दिया. कमरे में थोड़े उजाले में विश्वमोहन ने चारों तरफ नजर डालते हुए कहा, “जनमेजय यह देखो.”

दीवार के किनारों पर अलग-अलग रंगों में बहुत से अंक लिखे थे. 3/5, 5/7, 7/11, 13/17, 17/19, 19/23, 23/29, 29/31…

“भिन्न!” जनमेजय चिल्लाया.

विश्वमोहन की नजर टेबल पर जा पड़ी. वहां कुछ तंत्र-मंत्र की किताबें पड़ी थीं. उन किताबों के बीच में साल 2016 की डायरी मिली. डायरी को पलटते हुए विश्वमोहन ने जनमेजय को इशारा किया. इधर विश्वमोहन दीपू की बीवी से बात करता रहा और उधर उनकी नजरों से छुपाकर जनमेजय ने दीपू की डायरी अपने कोट के अंदर रख ली.

चंदन की तबीयत बिगड़ती जा रही थी. वह अक्सर दवाइयां लेकर सोया रहता. उस रात महल में चंदन को सुलाकर जनमेजय और विश्वमोहन महल के पहले तले पर बैठे थे. खुली खिड़की से नदी नजर आती थी. जनमेजय ने विश्वमोहन से कहा, “मैंने तुम्हारी परेशानी के बारे में बहुत सोचा. लेकिन जितना पता चलता है, उलझन और बढ़ती जाती है.”

“पहेलियां बुझाना छोड़ो. मुझे बताओ कि दीपू की डायरी में ऐसा क्या लिखा था?”

“यह किस्सा बहुत पुराना है. राजा साहेब ने किसी पुरानी सुरंग का पता लगा लिया था. यह फरवरी 28, 2016 का बयान पढ़ो.’’

विश्वमोहन ने दीपू की डायरी के कुछ निशान लगाए पन्ने पढ़ने शुरू किए :

फरवरी 28, 2016

आज मैं बड़ी वहशत में यह बयान दर्ज कर रहा हूं. मुझे पुख्ता यकीन हो गया है कि राजा साहेब जिस सुरंग में जाते हैं, वह जरूर भूतिया है. मुझे शक है कि ये उन पुराने छह महलों में से किसी एक की सुंरग है. शायद वहां नवाबों के प्रेत रहते हैं या कुछ ऐसी ताकतें तो इंसानी ताकतों से बढ़कर हैं. राजा साहेब की आंखें अक्सर लाल रहा करती हैं. उनके नाखून और उंगलियां पूरी तरह पत्थर की तरह काले और बेजान हो गए हैं. राजा साहेब की तबीयत गिरती जा रही है. जब भी उनका चेहरा देखता हूं, रह-रहकर ऐसा लगता है कि धीरे-धीरे मौत के साये उन्हें घेरते जा रहे हैं

मार्च 15, 2016

आज मैंने राजा साहेब का पीछा किया. किले के लाल दरवाजे के पास जिस खूफिया सुरंग के रास्ते राजा साहेब जाते हैं, वह सुरंग दक्षिण में बहुत आगे तक जाती है. मेरे ख्याल से वह नदी के अंदर चलती हुई किसी गुप्त जगह पर निकलती है. राजा साहेब के अंदर जाने के दस मिनट बाद मैं सुरंग में घुसा. सीढ़ियों से उतरने के बाद कुछ दूरी से ही गहरा अंधेरा शुरू हो गया. मैंने टॉर्च जलाई और नामालूमों की तरह बढ़ता रहा. सुंरग के अंदर बहुत दुर्गंध थी. मेरा ख्याल है यह वही सुरंग है जो श्मशान के पास टूटी पड़ी है, जिसे अंग्रेजों ने सील करवा दिया था. यह सुरंग का दूसरा रास्ता था. शायद मैं कुछ पांच सौ कदम ही चला था कि किसी खुरदरे हाथ ने मेरा हाथ पकड़ लिया. मैं डर से चीख पड़ा. मैंने टॉर्च की रोशनी उस पर डाली और मेरी रोशनी से महफूज अंधी भिखारिन सफेद बालों वाली बुढ़िया जोर से ठहाका लगाने लगी. उस सुनसान सुरंग में मनहूस बुढ़िया का ठंडा हाथ और खून सुखा देने वाले अट्टहास से मैं कांप उठा. किसी तरह खुद को संभालते हुए मैंने उसका हाथ झटक दिया. बुढ़िया ने मुझे आखिरी चेतावनी दी, ‘‘जान की सलामती चाहता है तो यहां से अभी चला जा. हाहा हा…” न जाने बुढ़िया ने मुझ पर कैसा जादू किया. मैं चुपचाप किसी बच्चे की तरह वापस पलटा और धीरे-धीरे सुरंग से वापस आ गया. मानो कोई भूतिया हथेली मेरी पीठ पर लगी हुए मुझे लगातार बाहर की ओर ढकेले जा रही हो.

मार्च 28, 2016

वह जगह शायद धरती से नर्क का द्वार है. मुझे बुढ़िया की बात मान लेनी चाहिए थी. वह जगह इस सारी दुनिया से भिन्न है. वहां हम हम नहीं रहते. जहां कोई सहारा नहीं, अपनी कोई शक्ति नहीं. अब मेरा बचना मुमकिन नहीं. फिर भी मैं एक आखिरी कोशिश करूंगा. राजा साहेब नहीं बचेंगे. मैं भी नहीं बचूंगा.

अप्रैल 29, 2016

55/89, 89/144, 144/233, 233/377, 377/610…

डायरी के आखिरी बयान के बाद विश्वमोहन ने जनमेजय से पूछा, “तुम्हें कुछ समझ में आ रहा है?”

“दीपू के घर की दीवार पर जो भिन्न थे, उसके अंश और हर अभाज्य संख्याओं (prime number) का क्रम था. इस डायरी में जो भिन्न है, वह कुछ और ही तरीके का है. ऐसा लग रहा है कि संख्याओं से इस पहेली का कोई न कोई संबंध है. शायद अभाज्य संख्या से इसका हल नहीं है, इसलिए दीपू को कुछ और रास्ता ढूंढ़ना पड़ रहा था. हमें कुछ गहरे तौर पर सोचना पड़ेगा. शायद किसी की मदद लेनी पड़े. कोई तो होगा जो इस समस्या को समझ सकता होगा. कोई न कोई सुराग मिलेगा. दुनिया में हर तरह के लोग हैं. हमें उस इंसान को ढूंढ़ना होगा जो हमारी सहायता कर सके.’’

“पहले हमें लाल दरवाजे के पास वह सुरंग ढूंढ़नी चाहिए.” विश्वमोहन ने गहरी सांस ली.

अचानक से उद्विग्न होकर जनमेजय ने पूछा, “क्या तुम्हें याद है कि चंदन किस तरह के भिन्न लिखा करता है?”

विश्वमोहन ने उसे अपने मोबाइल में खींची अपने अमेरिकी घर के दीवारों पर उकेरी भिन्न की तस्वीर दिखाई. जनमेजय ने उन भिन्नों को फिर से देखा : 1/1, 2/1, 3/2, 5/3, 8/5, 13/8…

“ये अभाज्य संख्याएं नहीं है.’’ जनमेजय ने कहा, “ये फिबॉनकी संख्याएं हैं.’’ फिर उसने कुछ जोड़-घटाव करके पुष्टि की, “दीपू की डायरी में भी कुछ और नहीं फिबॉनकी संख्याओं का क्रमबद्ध भिन्न है. लेकिन इनमें अंश और हर का क्रम चंदन के भिन्न से ठीक उल्टा है. चंदन के भिन्नों में अंश हर से बड़ा है, और दीपू की डायरी में लिखे भिन्नों का मान 1 से कम है.’’

“इसका मतलब क्या हुआ?” विश्वमोहन ने पूछा. जनमेजय ने कुछ न कहा और छत की तरफ शून्य में देखता रहा. भादों की काली रात में शुक्ल पक्ष का स्वच्छ चांद चमक रहा था.

तीन

समीकरण

छिलके के भीतर छिलके के
भीतर छिलका
क्रम अविच्छिन्न.
तो क्या?
यह कैसे है सिद्ध
कि भीतरतम है, होगा ही,
बाहर से भिन्न?

— सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

सुबह-सवेरे चंदन ने नदी में नौका-विहार करने की जिद की. नाश्ते के बाद जनमेजय और विश्वमोहन उसे नदी में घुमाने चले गए. बीच नदी में पहुंचकर विश्वमोहन ने नाविक से पूछा, “कितना गहरा पानी है यहां?”

“यही कोई चार बांस होगा हुजूर.”

‘‘बाप रे!” जनमेजय ने आश्चर्य जताया. चंदन ने हंसकर कहा, “आप डरते हैं?”

“हां.”

“क्यों डरते हैं?”

‘‘गिर गया तो डूब जाऊंगा. मुझे तैरना नहीं आता.”

चंदन ने फिर पूछा, “अच्छा चाचा जी, डरना क्या होता है?”

विश्वमोहन ने इस पर लाड़ से गोद में बैठे चंदन को थपथपाकर कहा, “जब हमें कुछ नुकसान होने का अंदेशा हो, तब हम डरते हैं.”

कुछ देर बाद जनमेजय ने विश्वमोहन से कहा, “मैं इस पर कुछ और ही सोचता हूं. मेरे हिसाब से कभी-कभी हमें किसी बाहरी शक्ति के विरुद्ध शक्ति का प्रयोग करने की आवश्यकता हो और उस समय हम शक्तिहीन हों, तब शक्तिहीन होने से अकेलापन आता है. अकेलेपन से ही अपूर्णता का बोध है. अपूर्णता से ही कायरता, लज्जा और भय का अनुभव होता है. अधूरापन समझ रहे हो? दो पूर्ण संख्याओं के बीच-सा कुछ. जैसे एक पूर्णांक ले लो. जो पूर्ण है वह स्पष्ट है, वहां कोई संशय नहीं है. जो पूर्ण है वही भयमुक्त है, वही सामर्थ्यवान है. जो पूर्ण है वही आकांक्षाशून्य एवं अन्यनिरपेक्ष है.”

“लगता है तुम अभी भी दर्शन में अटके हो.’’ विश्वमोहन ने हंसकर कहा, ‘‘भाई सरकारी नौकरी छोड़ दी, यह सब भूल जाओ.’’

‘‘साधारण शब्दों में शक्ति के विरुद्ध शक्ति का असंतुलित अनुपात भय का कारण बनता है. ठीक-ठीक कहा जाए तो दो भिन्न या विपरीत शक्तियों का भिन्न ही भय है.” जनमेजय ने आगे कहा. चंदन ने पूछा, “ये भिन्न क्या होता है?”

“तुम स्कूल में इसके बारे में पढ़ोगे.’’ जनमेजय ने चंदन के सिर पर हाथ फेरा.

विश्वमोहन बोला, “तुम तो हर जगह गणित ला देते हो.”

“मेरे हिसाब से गणित भी दर्शन ही है. जब तक किसी विषय को हम अच्छे से परिभाषित करेंगे, मेरे हिसाब से हर वह दुनिया गणित ही होगी, चाहे वह संगीत हो या कला. तुम्हें तो मालूम ही होगा कि प्राचीन ग्रीक सभ्यता में संगीत गणित का अंग हुआ करता था. स्पिनोजा का पूरा दर्शन तर्क पर आधारित ज्यामितीय प्रमेयों से बना है.”

‘‘जो भी हो. तुम्हारा विचार मुझे ठीक नहीं लगता. शक्ति का असंतुलन अनिष्ट की आशंका ही देगा. भय आशंका नहीं तो और क्या है?” विश्वमोहन ने प्रतिवाद किया.

चंदन ने विश्वमोहन की बांहें झिंझोड़कर उसे नदी के दूसरे किनारे की ओर इशारा किया. चलती नाव में यह समझ आ गया कि ये वही मैली-कुचैली काली साड़ी पहनने वाली अंधी भिखारिन बुढ़िया है.

यह देखकर विश्वमोहन चौंका. जनमेजय ने मन ही मन सोचा, “यह तो वही भिखारिन है. लेकिन वह अंधी नदी को पार करके यहां कैसे आई? इस पार तो दूर तक वीराना है. चार कोस तक कोई नहीं रहता.”

जनमेजय के कहने पर मल्लाह ने नाव नदी के उस पार कर दी. वहां पहुंचकर विश्वमोहन और जनमेजय पानी में कूदकर किनारे उसके पास पहुंचे. विश्वमोहन ने उससे डपटकर पूछा, ‘‘बुढ़िया, तू यहां कैसे आई?”

सफेद बिखरी बालों वाली पोपली बुढ़िया भिखारिन ने सिर उठाया और उन दोनों को देखा. उसकी आंखों की पुतलियां बीते दिन की तरह सफेद न थीं. उसने कुछ कहने की कोशिश की, पर उसके मुंह से केवल ‘गों-गों’ की आवाज आई.

जनमेजय ने चौंक कर कहा, “कल यह अंधी थी. आज गूंगी हो गई. क्या माजरा है?”

विश्वमोहन ने बुढ़िया को नदी के उस किनारे की तरफ इशारा करके कहा, “कल तो उस तरफ थी. आज बोलती क्यों नहीं?”

उसके ऐसा कहते ही वह बुढ़िया पोपले मुंह को खोलकर तीखी घुटी-घुटी आवाजें निकालने लगी. जैसे शिकारी बिल्ली अपने सामने दो चूहों को देखती है, वैसे वह उठकर दबे पांव उनकी तरफ बढ़ी. जनमेजय ने अज्ञात भय से विश्वमोहन को कहा, ‘‘चलो जल्दी चलो यहां से.”

अचानक वह बुढ़िया बिल्कुल सीधी खड़ी हुई और साथ में पड़ा सूखी लकड़ी का लंबा दंड उठाया जो ऊपर की तरफ पेड़ की शाखाओं की तरह तीन डालियों में त्रिशूल की तरह फैला था. नौका पर बैठकर विश्वमोहन और जनमेजय ने देखा कि बुढ़िया ने वह लकड़ी का सिरा पानी में डुबोया. जब नाव बीच मंझधार में पहुंची, तब नौका को एक जबरदस्त टक्कर लगी. पानी में देखते ही नाविक की आंखें फटी की फटी रह गईं. वह जोर से चिल्लाया, “मगरमच्छ!”

विश्वमोहन और चंदन की रूह कांप गई, जब उन्होंने नाव के किनारे मगरमच्छ का जबड़ा देखा.
जनमेजय चिल्लाया, “विश्वमोहन, किनारे से हटो. उधर भी एक मगरमच्छ…”

इससे पहले कि दूसरा मगरमच्छ चंदन के हाथ को निगलता विश्वमोहन झट से चंदन को गोद में लेकर नाव के बीच में चीखता-चिल्लाता आ गया. जनमेजय नाविक के सामान से बड़ा छुरा लेकर पहले मगरमच्छ की तरफ लपका जो नाव पर जोर से टक्कर मार रहा था. दहशत में जनमेजय ने जोर से ‘जय मां काली’ चिल्लाकर दोनों हाथों से छुरा लिए मगरमच्छ के माथे पर वार किया. मगरमच्छ चीत्कार कर वापस नदी में लौटा. पानी में खून फैल गया. दूसरा मगरमच्छ नदी में डुबकी मार गया. जनमेजय और नाविक ने जल्दी-जल्दी चप्पू चलाना जारी रखा. दूसरे मगरमच्छ का खतरा अभी भी बना हुआ था. नदी के दूसरे किनारे पर काली साड़ी वाली बुढ़िया नजर नहीं आ रही थी.

नदी के किनारे लगने तक दूसरा मगरमच्छ नहीं लौटा. किनारे आकर सारे लोग वापस महल लौट गए.

दोपहर का खाना खाने के बाद चंदन दवाई खाकर सो गया.

जब दोनों मित्र कमरे में बैठे हुए थे, तब विश्वमोहन ने बुझे-बुझे स्वर में कहा, “क्या कर रहा हूं मैं यहां? अपने बेटे के मरने की प्रतीक्षा?”

“ऐसे निराश न हो. अभी हमें राजा साहेब की सुरंग ढूंढ़ निकालनी है. कहो तो हम लाल दरवाजे की तरफ जाकर ढूंढ़ना शुरू करें?”

“लेकिन उससे क्या होगा? हमें रास्ता मिल भी गया तो?” विश्वमोहन ने आगे कहा, “मैं आशा करता हूं…”

“आशा हमेशा भय के साथ होती है.” जनमेजय ने कहा, “तुम डरते हो.”

‘‘डरा हुआ तो मैं हूं ही. पर यहां तो मैं आशावान हूं. है कि नहीं?”

जनमेजय ने कहा, “देखो, आशा अस्थायी प्रसन्नता है, जो किसी भूतकाल के या भविष्य से संबंधित विचार से उत्पन्न होती है जिसके बारे में हम किसी तरह से सशंकित होते हैं. भय अस्थायी वेदना है जो किसी भूतकाल के या भविष्य से संबंधित विचार से उत्पन्न होती है, जिसके बारे में हम किसी हद तक सशंकित होते हैं. अब इन दो परिभाषाओं से यह स्थापित होता है कि कोई भी आशा बिना भय के नहीं हो सकती और कोई भी भय बिना आशा के नहीं हो सकता है. जो व्यक्ति, आशा पर निर्भर होता है और भविष्य के बारे में सशंकित रहता है, वह निश्चित तौर पर भविष्य में उसके न होने के बारे में विचार कर चुका होता है, जिसके कारण किसी हद तक उसे वेदना होती है. फलस्वरूप आशा पर निर्भर होने के कारण, वह भय से जुड़ा रहता है.”

“हर जगह तुम अपना ज्ञान डाल देते हो! यहां कौन-सा भय है? केवल इतना ही कि वह सुरंग का रास्ता नहीं मिलेगा. वह अप्रसन्नता होगी, कोई वेदना नहीं.”

विश्वमोहन झल्लाया. फिर थोड़ा सोचकर उसने कहा, “इसमें एक गलती है.”

“वह क्या?”

“आशा का मतलब केवल दुआ-उम्मीद वाली खुशी नहीं है. आशा की अर्थच्छाया यहां इच्छा के रूप में लेनी चाहिए, जहां हम अपना अभीष्ट पूरा करना चाहते हैं.”

जनमेजय ने हां में सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘शायद! चलो, लाल दरवाजे की तरफ चलते हैं.”

लाल दरवाजे के आस-पास के मैदान में दोनों दोस्त बहुत भटकते रहे. जब शाम होने को आई, विश्वमोहन की नजर दूर जाती काली साड़ी पहने झुकी कमर वाली बुढ़िया भिखारिन पर जा पड़ी. विश्वमोहन दौड़ा-दौड़ा उसके पास पहुंचा. जनमेजय उसके पीछे भागा.

बुढ़िया के पास पहुंचकर विश्वमोहन ने पास पड़ी एक लकड़ी उठाई और चिल्लाया, “मनहूस बुढ़िया. तू कौन है? बता वरना आज मैं तुझे जान से मार डालूंगा.”

सफेद बिखरे बालों वाली बुढ़िया ने जैसे कुछ सुना ही न हो, अचानक से विश्वमोहन की ओर देखा और उसकी सफेद पुतलियों में लाल बिंदु चमकने-से लगे. उसके पोपले चेहरे पर विजयी दुर्दांत मुस्कान छा गई. विश्वमोहन अभी उसे मारने के लिए लकड़ी वाला हाथ पीछे ले गया कि अचानक बेहोश होकर कटे वृक्ष की तरह गिर पड़ा. जनमेजय जब तक उसके पास पहुंचा, वह बुढ़िया अट्टहास करते हुए वहां से चली गई. जनमेजय ने उसकी अजब-सी चाल को देखा, मानो वह चल नहीं रही बल्कि जमीन से कुछ ऊपर हवा में तैरते हुए कदम बढ़ा रही हो.

जमीन पर बैठ कर जनमेजय विश्वमोहन को झिंझोड़कर होश में लाने की कोशिश कर रहा था कि तभी उसे किसी की आहट सुनाई दी. उसने पलटकर देखा, सामने एक मंझोले कद का सांवला दढ़ियल आदमी खड़ा था. उसने काली लुंगी पहनी थी और बदन पर कुछ भी नहीं पहना था. सिर पर उसने काली पगड़ी डाल रखी थी और गले और बांहों में रुद्राक्ष की मालाएं. उसके समूचे बदन पर गोदने के विचित्र निशान बने थे. कंधे पर एक चमड़े की झोली लटकी थी और पांव में लकड़ी की घिसी खड़ाऊं.

“आप कौन हैं?” जनमेजय ने पूछा.

बिना कुछ जवाब दिए उस रहस्यमय इंसान ने अपनी झोली में रखी प्लास्टिक की बोतल निकाली और उससे विश्वमोहन के मुंह पर पानी के छींटे मारे. जब विश्वमोहन होश में आया, तब उसने विश्वमोहन की जीभ देखी. पलकें पलटकर देखीं और बोला, “तुम बच गए. अगर जान प्यारी है कभी उस बुढ़िया के पास न जाना.”

“आपने अपना परिचय नहीं दिया.” जनमेजय ने पूछा, “आप इस बुढ़िया के बारे में जानते हैं?”

“मेरा नाम लकुलेश्वर है. मैं एक सिद्ध तांत्रिक हूं.” उसने कहा.

विश्वमोहन उठकर बैठ गया. “जनमेजय, सिर बहुत दर्द कर रहा है. ऐसा लग रहा है किसी ने कपाल पर हथौड़ा मारा हो. बहुत तेज दर्द है.”

लकुलेश्वर ने कहा, “किस्मत अच्छी है कि जिंदा हो. पता है वह बुढ़िया कौन है?”

‘‘कौन है?” दोनों ने एक साथ पूछा.

“वह एक नहीं छह हैं. छह बहनें, जो एक जैसी दिखती हैं. इनके नाम हैं— सिल्लाई, जो अंधी है. एरुणा गूंगी है. कुमारी बहरी है, जिससे तुम अभी मिले. बोधाई, जो कोढ़ी है. महालच्छी अत्यंत कांतिमान चेहरे वाली है, पर वह हमेशा स्थिर रहती है कभी चलती नहीं. अपरामेखला, जो इन सबसे छोटी वृद्धा है, कहते हैं उसे किसी ने नहीं देखा है.”

‘‘कौन हैं ये छह बहनें?”

“ये विशिष्ट योगिनी शक्तियां हैं, जो यहां निवास करती हैं. यहां न जाने कब से निवास कर रही हैं. इस किले में जिन पुराने छह खंडहरों को लोग पुराने महल समझते हैं. दरअसल, वे इन योगिनियों के विशाल मंदिर थे. उनके मंदिर न जाने कब के नष्ट हो गए, पर उनका निवास नहीं. यह समझो कि उनका संसार इस संसार से भिन्न है. उन्हें मंदिरों की दरकार नहीं. मंदिर की जरूरत हम जैसे साधकों को है, उन्हें नहीं. जानने वाले तांत्रिक उन्हीं पुराने खंडहरों में उनकी पूजा करते हैं. कौन-सा खंडहर कौन-सी देवी का है, यह मुझे नहीं पता. योगिनियों से टकराने की कल्पना करते हो? मूर्ख… महामूर्ख हो तुम. उनके लिए तुम जैसे लोग चींटी से अधिक नहीं हो. यह समझो कि उनकी दया से अभी जीवित हो. वरना किसी पागल कुत्ते-सी बुरी मौत मिल चुकी होती.”

“ये अगर शक्तियां हैं तो इनमें दोष क्यों है?” विश्वमोहन ने पूछा.

इस पर लकुलेश्वर ने उनकी हंसी उड़ाकर बोला, “जहां तक मैंने गुरु से सीखा है, किसी शक्ति में कोई दोष नहीं होता. जो तुम्हें दोष लगता है, वह मेरे लिए भी एक सवाल है जिसका जवाब मैं इतने सालों से ढूंढ़ रहा हूं. तुम्हें कैसे उत्तर दूं? मैं एक छोटा-मोटा तांत्रिक हूं. इन शक्तियों के बारे में कम ही जानता हूं. इतना तो पक्का है कि इनसे टकराना मौत को दावत देना है.”

जनमेजय ने कहा, “हम बड़ी मुसीबत में हैं. क्या आप हमारी मदद कर सकते हैं?”

लकुलेश्वर को अपने महल पर ले जाकर विश्वमोहन और जनमेजय ने पूरा किस्सा बयान किया. लकुलेश्वर ने सारी कहानी सुनी और कहा, ‘‘लाल दरवाजे के पास सुरंग का रास्ता मुझे मालूम है. लेकिन बोधाई उसकी रक्षा करती है. अगर सुरंग के रास्ते में बोधाई ने हमें पकड़कर छू लिया तो हमारी मौत का दिन मुकर्रर हो जाएगा.”

“क्या किसी तरह चंदन की जान नहीं बच सकती है?” विश्वमोहन ने पूछा.

“पता करना होगा कि राजा साहेब की मौत कैसे हुई? क्या उसमें कुछ योगिनी शक्तियों का हाथ है? जैसा तुम बता रहे हो, उस हिसाब से यह मौत केवल किडनी फेल होने के कारण नहीं हुई लगती है. यह भी सवाल उठता है कि तुम्हें योगिनियों ने यहां क्यों बुलाया है?” लकुलेश्वर ने आगे कहा, ‘‘याद रखना, हम योगिनियों से प्रार्थना कर सकते हैं. इससे अधिक कुछ नहीं.”

“आप करेंगे हमारे लिए?” विश्वमोहन ने पूछा.

“हम सबको करना पड़ेगा.” लकुलेश्वर ने कहा, “इसमें मेरा व्यक्तिगत लाभ भी है. अगर योगिनियों से मेरा संपर्क हो गया तो मेरी शिक्षा पूरी हो जाएगी और मैं अपने गुरु मच्छंदनाथ को मुंह दिखा सकूंगा.”

“क्या अब सीधे अंधी बुढ़िया से मिलकर याचना नहीं कर सकते?” विश्वमोहन ने पूछा.

“अब वह तुम्हें शायद ही नजर आए! कम से कम जब तक तुम उनके भिन्न संसार में प्रवेश न करोगे, तब तक नहीं. उन्हें मालूम हो गया होगा कि तुम्हें मैंने उनके बारे में बता दिया है.”

जनमेजय ने पूछा, “आप कहते हैं कि आप एक मामूली तांत्रिक हैं, फिर इस जोखिम वाले काम से आप डरते नहीं हैं?”

लकुलेश्वर ने अंगारों जैसी जलती आंखों से जनमेजय को तरेरकर देखा जिससे क्षण भर में जनमेजय भी कांप गया.

तनिक क्षोभ से लकुलेश्वर ने कहा, ‘‘तांत्रिक के पास हर समस्या के हल के लिए कोई न कोई समीकरण होता है. यह उसकी सिद्धि की परीक्षा है कि वह समीकरण हल कर पाता है या नहीं. मैं एक सिद्ध तांत्रिक हूं. माना कि अंश मात्र हूं, इसका मतलब यह नहीं कि इस कार्य में मैं असमर्थ हूं.”

चार

अंश

मैं तुम लोगों से इतना दूर हूं
तुम्हारी प्रेरणाओं से मेरी प्रेरणा इतनी भिन्न है
कि जो तुम्हारे लिए विष है, मेरे लिए अन्न है

— गजानन माधव मुक्तिबोध

आश्विन में पितृपक्ष शुरू हो गया था.

चंदन की तबीयत बिगड़ती जा रही थी. बुखार कभी-कभी 104 फॉरेनहाइट पहुंच जाता. देखभाल के लिए किराए पर बुलाई गई नर्सें दिन-रात लगी रहती थीं. विश्वमोहन अपने बेटे का हाथ पकड़कर कभी-कभी रो लेता था. जूलिया ने एक बार भी फोन नहीं किया जिससे जनमेजय ने अंदाज लगाया कि विश्वमोहन शायद हमेशा के लिए रिश्ते तोड़कर आ गया है. भूल से भी वह उसका कोई जिक्र नहीं करता. जनमेजय ने अपने काम से पंद्रह दिन की लंबी छुट्टी ले ली.

सुबह नौ बजे लकुलेश्वर उनके महल आया, जब विश्वमोहन चंदन को दवा पिला रहा था.

लकुलेश्वर पालथी मारकर जमीन पर बैठा था. विश्वमोहन के आते ही वह एक पर्ची उसे थमाकर बोला, ‘‘पूजा का सामान.”

पर्ची पढ़कर विश्वमोहन ने कहा, “बकरा किसलिए?”

“बलि के लिए!” लकुलेश्वर ने हंसकर कहा.

विश्वमोहन रात भर सो न पाने के कारण थोड़ा उखड़ा था. उसने रूखाई से कहा, “मैं कोई बलि नहीं दूंगा.”

“आप बस इंतजाम कर दीजिए. बलि मैं दे दूंगा.”

‘‘कोई बलि नहीं देगा. मौत आ जाए तो आ जाए. समझे आप?” विश्वमोहन ने तैश में कहा. जनमेजय ने उसे शांत कराया.

लकुलेश्वर ने कहा, “आपको काम नहीं कराना है तो मैं चलता हूं.”

इससे पहले जनमेजय कुछ कहता, विश्वमोहन ने कहा, ‘‘ठीक है जाइए.”

लकुलेश्वर अपना सामान उठाकर जाने लगा, तब जनमेजय उसके पीछे जाकर बोला, ‘‘कोई दूसरा रास्ता भी होगा.”

लकुलेश्वर ने जनमेजय को अपनी थैली दिखाकर कहा, “यह देखो. यह इंसान के खाल की बनी है. जान जाने का खतरा हमेशा बना रहता है. खून तो लगेगा ही.”

जनमेजय सोच में पड़ गया.

कुछ विचार कर लकुलेश्वर ने कहा, “यजमान के हाथ में छह चीरा लगा दें? उनका खून गिरेगा तो शायद काम बन जाए.”

दोपहर में लकुलेश्वर, जनमेजय और विश्वमोहन लाल दरवाजे के पास सूखे घास के मैदान में चले जा रहे थे. एक सूखे कुएं के पास जाकर लकुलेश्वर रुक गया. वहीं बैठकर उसने उपले जलाए और कुछ मंत्र बोलने लगा.

विश्वमोहन ने जनमेजय से पूछा, “इन मंत्र से क्या होता है? कं कं ह्रीं श्रीं टं टं लं लं स्वाहा. इसका कोई मतलब है?”

‘‘तंत्र में हर वर्ण एक तरह की मातृका शक्ति का रूप है. मंत्र के पीछे साधक की इच्छाशक्ति बड़ी शक्तियों का आह्वान करती है.”

“तुम्हें कैसे पता? क्या तुम भी तांत्रिक हो?” विश्वमोहन ने आश्चर्य प्रकट किया.

“नहीं. मैंने ‘मालिनीविजयोत्तर तंत्र’ और ‘परात्रिंशिका विवरण’ जैसे तांत्रिक ग्रंथ पढ़े हैं.”

‘‘तो तुम तांत्रिक हुए?”

“सर्जरी की किताब पढ़ने वाला क्या सर्जन हो जाता है?” जनमेजय ने जवाब दिया.

लकुलेश्वर ने उपलों में कुछ द्रव्य डालने के बाद अग्नि प्रज्ज्वलित की. फिर अपने चमड़े वाली थैली में एक लंबा छुरा निकाला. उसकी थैली को देखकर विश्वमोहन कुछ चौंका. तब तक लकुलेश्वर ने तीखे छुरे से विश्वमोहन के बांह में चीरा लगा दिया. विश्वमोहन कराह उठा. बड़ी ही बेरहमी से लकुलेश्वर ने विश्वमोहन की हथेली में एक-एक करके छह चीरे लगाए.

राजा साहेब के राजमहल के राजसी ठाठ से बड़ा हुआ विश्वमोहन अपने बेटे की जिंदगी बचाने की आस में लहूलुहान हो चुका था. उसके हाथों से गर्म लहू टपक कर आग में गिरा. वही जख्मी हाथ लेकर लकुलेश्वर ने उसे आगे सूखे कुएं में ढकेलकर खून की कुछ बूंदें गिराईं. जनमेजय विश्वमोहन को संभालने उठा. तब तक लकुलेश्वर मंत्र के साथ अंक बोलने लगा :

1 7 10 13 19 23 28 31 32 44 49 68 70 79 82 86 91 94 97 100… कहते हुए वह सूखे कुएं में बने ईंटों के पायदानों के सहारे उतरने लगा. उसका इशारा देखकर जनमेजय और विश्वमोहन दोनों कठिनाई से कुएं में उतरने लगे. करीब पैंतीस मीटर उतरने के बाद कुएं में रोशनी मद्धम हो चुकी थी. उसी अंधेरे धुंधलके में जनमेजय ने देखा कि कुएं की दीवार में बनी एक खोह में लकुलेश्वर घुस गया. विश्वमोहन और जनमेजय दोनों उसके पीछे-पीछे उस खोह में घुसे. थोड़ी देर चलने के बाद आभास हुआ कि वह खोह एक बड़ी सुरंग में मिल चुकी है, जो कम से कम पांच मीटर ऊंची है और इतनी ही चौड़ी होगी. लकुलेश्वर ने अपनी थैली से टॉर्च निकाली और आगे-आगे कुछ अंक बुदबुदाता हुआ चलता रहा. रह-रहकर वह अपना हाथ झटकता, कभी पैर पटकता, कभी अपने हाथों से कोई मुद्रा बनाता. इस तरह वह आगे बढ़ता रहा. विश्वमोहन और जनमेजय उस सुरंग में आ रही दुर्गंध और मकड़ी के जालों से परेशान बढ़ते चले जा रहे थे.

इस तरह करीब आधे घंटे चलते रहने के बाद लकुलेश्वर एक पुराने मजबूत दरवाजे के सामने जा पहुंचा. जनमेजय और हाथ पर लगे चीरे से घायल विश्वमोहन लगभग पस्त से वहां पहुंचकर दरवाजे को देखने लगे.

“यह किसी भी भौतिक विधि नहीं खुलेगा.” लकुलेश्वर ने कहा, “न यह टूटेगा, न इसमें छेद हो सकता है, न ही जलेगा, न ही दीमक इसे चाट सकता है.”

“फिर क्या तरीका है?” विश्वमोहन ने पूछा.

“अंकमंत्र.’’ लकुलेश्वर ने कहा, ‘‘बीजमंत्र वाले बहुत से तांत्रिक मिल सकते हैं तुम्हें. अंकमंत्र जानने वाला शायद ही कोई मिलेगा तुम्हें.’’

“क्या यह दरवाजा बीजमंत्र से नहीं खुल सकता है?” जनमेजय ने पूछा.

‘‘खुलता होगा. मुझे केवल अंकमंत्र आते हैं.’’ लकुलेश्वर के जवाब पर विचारते हुए जनमेजय ने पूछा, “आपके अंकमंत्र में केवल प्राकृतिक संख्याएं क्यों होती हैं?”

“नहीं. ऐसा नहीं है. जिन्हें जरूरत पड़ती है, उन्हें सभी संख्याओं का प्रयोग करना पड़ता है. वास्तविक संख्या (real number) और अतिवास्तविक संख्या (hyperreal number) के मंत्र से काम करना बहुत मुश्किल है. जो विशेष शक्ति-केंद्र होते हैं, वह वास्तविक संख्या से परे होकर सम्मिश्र संख्या (complexe number) और अतिसम्मिश्र संख्या (hypercomplex number) में संचालित होते हैं. गुरु की शिक्षा है कि अतिसम्मिश्र संख्या में की गई याचना को केवल महादेव ही ठुकरा सकते हैं. अगर सम्मिश्र संख्या में योगिनियों से कुछ मांगा जाए तो वे विवश होकर उसे पूरा करेंगी ही. लेकिन मुझे उनका ज्ञान नहीं है.’’

लकुलेश्वर ने अपनी इंसानी चमड़े की थैली से पैना छुरा निकालकर विश्वमोहन के हाथ के घाव पर एक और बार वार किया और उससे खून निकालकर दरवाजे पर छिड़का. बड़े भीषण गर्जन से वह पूर्णांकों की लंबी शृंखला बोलने लगा. एक बहुत बड़ी संख्या बोलते ही जैसे कुछ चरचराहट की आवाज आने लगी. देखते ही देखते दरवाजे में हरकत हुई. चरचराते दरवाजे का पल्ला अंदर की तरफ खुला. सामने से कहीं मद्धिम रोशनी आ रही थी. तीनों एक-एक करके दरवाजे के अंदर घुसे. बाहर आकर जनमेजय ने पीछे पलटकर देखा तो न उसे वह रास्ता दिखा और न दरवाजा.

दूर चारों तरफ काले पहाड़ थे. तीनों घने जंगल के बीचों-बीच किसी मैदान में खड़े थे. आसमान क्षितिज तक काले उमड़ते-घुमड़ते बादलों से घिरा था. तेज ठंडी हवा चल रही थी. जनमेजय को वहां की वनस्पति भी विचित्र लगी. जो पक्षी-युग्म उड़ रहे थे, वैसे कभी किसी ने देखे न थे. दूर-दूर तक आदमियों के अस्तित्व का कोई निशान न था. लकुलेश्वर आगे बढ़ता गया और एक जगह रुका जहां सफेद पत्थरों का ढेर था. शायद किसी मौसम में यहां नदी बहकर जाया करती होगी. जनमेजय ने अपने शरीर में अजीब-सी पीड़ा का अनुभव किया.

लहूलुहान विश्वमोहन ने पूछा, “हम कौन-सी जगह आ गए हैं?”

“यह ऐसी जगह है जो आम जिंदगी के संसार से पूरी तरह भिन्न है. जहां के बारे में सुना जा सकता है, पर प्रत्यक्ष जाना नहीं जा सकता.”

“क्या हम इसे प्रत्यक्ष नहीं देख रहे?” जनमेजय ने पूछा.

“नहीं यह वैकल्पिक अनुमान है, जैसे स्वप्न!” लकुलेश्वर ने कहा. ‘‘चूंकि यह प्रत्यक्ष-सा लगता है, इसकी सत्ता है. लेकिन यह मूलरूप से विकल्पन है, इसलिए झूठ भी है. इसलिए न पूर्णतः सच है, न पूर्णतः झूठ है, अतः यह लोकोत्तर अनुभव है.”

“मतलब?”

“समझने के लिए ऐसा मान लो तुम पचास लाख साल पहले नदी के किनारे को स्वप्न में देख रहे हो. पचास लाख साल पहले का संसार तुम्हारे संसार से पूरी तरह भिन्न है, क्योंकि वह काल की भिन्नता है. इसी तरह सृष्टि में कई आयामों की भिन्नता हो सकती है.”

“यहां कोई हमें मार दे?” विश्वमोहन ने पूछा.

‘‘तो हम नहीं मरेंगे.” लकुलेश्वर ने दृढ़ता से कहा. “लगता नहीं कि तुम इसे समझ सकते हो!”

‘‘माना हम समझ नहीं सकते, पर क्या समझने की कोशिश भी नहीं कर सकते?” जनमेजय ने पूछा.

लकुलेश्वर ने उसका कोई जवाब न दिया. अपने पॉकेट से स्मार्टफोन निकालकर जनमेजय ने देखा कि वहां कोई सिग्नल नहीं आ रहा था. आकाश में गिद्धनुमा भयानक पक्षी चक्कर काट रहे थे. लकुलेश्वर ने आगाह किया, “इनसे बचकर रहना. यहां भले न मरो, पर बहुत चोट आ सकती है.’’

“मेरे बदन में अजीब-सी पीड़ा हो रही है. जैसे कोई मेरे शरीर की नसें मरोड़ रहा है.’’ जनमेजय ने कहा.

“यह इस संसार का प्रकोप है. जब तक यहां हो, इसे सहना होगा.’’ लकुलेश्वर ने कहा.

तभी विश्वमोहन की नजर दूर एक विशाल लकड़ी के चौबीस हिंडोले वाले झूले पर जा पड़ी. वह चौंका और उसकी तरफ यंत्रवत चलने लगा. जनमेजय उसे आवाज लगाता उस ओर जाने को हुआ पर उसे लगा कि उसके पांव जमीन में धंस गए हैं. जैसे नाग उसके पांव में लिपटकर उसे पाताल की ओर खींच रहे हों. इससे बेखबर लकुलेश्वर आंखें बंद किए कुछ मंत्र बुदबुदा रहा था.

‘‘मंत्र की महिमा देखो जनमेजय. जो अब तुम देखोगे, न जाने कभी देख पाओगे भी या नहीं. देखो कि सब कुछ एक है. जमीन-आसमान एक है. क्षितिज में मिलती हुई पृथ्वी-आकाश एक ही हैं. यह वनस्पति, यह शिला, यह शरीर, तुम्हारा रक्त, तुम्हारे विचार… सब एक हैं. 101 103 107 109 113 127 131 137 139 149 151…’’

अभाज्य संख्याओं के क्रम को सुनते हुए जनमेजय को लगा कि सच में वह पत्थर का ही तो हिस्सा है. या समूचा पत्थर उसके शरीर का विस्तार मात्र…

“सब एक हैं तो मुझे अलग-अलग क्यों नजर आते हैं?” घबराए हुए जनमेजय ने पूछा.

‘‘माया से!” लकुलेश्वर ने कहा, ‘‘माया से ही तो भिन्न नजर आता है. अब तुम इच्छा करो कि दूर वह पेड़ उखड़ जाए. इच्छा और क्रिया में कोई भिन्नता नहीं है. वही इच्छा है जो क्रिया है. अपने बाएं पांव का अंगूठा उस दिशा में हिलाने का प्रयत्न करो.” जनमेजय ने ऐसा करने की कोशिश की और दूर विशाल पेड़ जमीन से उखड़कर भूमि पर गिरा. जनमेजय उसकी बिखरी मिट्टी और विशाल जड़ को देख बर्फीली हवाएं उसे काटे जा रही हैं.

“हम, तुम और सब कुछ जो तुम्हें नजर आता है, इस विशाल सृष्टि के अंश हैं.” लकुलेश्वर ने कहा और आंखें बंद करके मंत्रोच्चार प्रारंभ किया.

इधर विश्वमोहन को लगा कि उसके शरीर में भयंकर तूफान मचा है. नसों में लावा बह रहा है, और हृदय धौंकनी की तरह लगातार चलता जा रहा है. तेज सांस लेने से कलेजा फुंका जा रहा है. आंख-कान तप चुके हैं. शरीर की सारी शक्ति जा रही है, मानो वह रक्तहीन हो रहा हो. सिर से पसीने की धारा पूरे बदन को भिगोती जा रही है. साथ ही आसमान का रंग बदलता जा रहा है. लाल-पीला होता हुआ अब धूसर होता जा रहा है. सुदूर रोशनियों पर काले बादल घिरते जा रहे हैं. दूर विशाल झूले पर निचले हिंडोले पर कोई साया उसे बुला रहा है. कौन है वह?

विश्वमोहन उधर खिंचा-खिंचा चला जा रहा है. एक-एक पांव एक-एक मन का हो चुका है. जमीन मानो दलदली हो गई हो. पांव धंसते जा रहे हैं. हथेली से खून की धारा बह रही है. मनहूसियत का शोर है. कुत्ते जैसी रोने की आवाजें आ रही हैं. कई-कई आवाजें उसके कानों में गूंज रही हैं. चंदन कहीं चीत्कार कर पुकारता है. जूलिया का रोता हुआ चेहरा बार-बार आंखों के सामने आता है. तुम कभी वापस न आ पाओगे. वह छोटे राजा साहेब के साथ शिकार पर निकला है. जंगल में एक विशाल लकड़बग्घे ने छोटे राजा साहेब पर हमला कर दिया है. लकड़बग्घे के पंजे राजा साहेब की छाती पर लगते हैं. राजा साहेब कमर पर बंधे छुरे को निकालकर ताकतवर लकड़बग्घे की गर्दन पर एक-एक करके छह चीरे लगा देते हैं. लकड़बग्घा चीत्कार कर उठता है. लकड़बग्घे की आंखें उसे मदद के लिए पुकार रही हैं. राजा साहेब की विजयी मुस्कान और लाल आंखें उसे देखती हैं. निचले हिंडोले पर उसे कोई बुला रहा है, जिसकी आवाज नहीं सुनाई पड़ रही. कोई है जो सालों से उससे मिलना चाह रहा है. कौन है?

छोटे राजा साहेब अपनी राजसी मोतियों वाली पगड़ी और सफेद अचकन पहने सही-सलामत डोले पर बैठे हैं. चेहरा छोड़कर शेष शरीर काले पत्थर का है. पत्थर हो गए हाथों में महंगी अगूंठियां लगी हुई हैं. उन्हीं हाथों से राजा साहेब उसे धीरे से इशारे से बुला रहे हैं. राजा साहेब के डोले पर ठीक सामने विश्वमोहन बैठ जाता है और अचानक तेज आंधी चलने लगती है. झूला हवा में झूलने लगता है. डोला उस तूफान में हिचकोले खा रहा है. विश्वमोहन का कलेजा उसके मुंह को आ गया है.

लकुलेश्वर और जनमेजय भयाक्रांत होकर उस अत्यंत गतिमान झूले को देख रहे हैं. सहसा गिद्धनुमा पक्षियों का झुंड उनकी तरफ आने लगता है. लकुलेश्वर उन्हें देखकर कुछ बुदबुदा रहा ही होता है कि तब तक भयंकर पंछी अपनी चोंच से उन पर झपट्टा मार देते हैं. घुटी-घुटी चीख के साथ लकुलेश्वर कराहने लगता है. उसके मुंह से झाग निकलने लगता है. न जाने कितने अंक कहे जा रहे हैं. कौन-सा स्वर निकल रहा है. शब्द है या नाद है या अंक है. अर्थ है या इच्छा है या प्रलाप है. आकाश में उड़ते बहुत से शिकारी पक्षियों के युग्म से भयभीत जनमेजय अपने धंसे पांव को पत्थरों से निकाल नहीं पा रहा है. हवा में चक्कर काटतीं विशाल चील और भयंकर गिद्ध उसकी तरफ बढ़ रहे हैं. उसने घबराकर आंखें बंद कर लीं. कपाल पर जैसे किसी ने तीखी आरी और हथौड़े से वार किया हो, जनमेजय तीक्ष्ण वेदना से चीत्कार करता हुआ कटे वृक्ष की तरह वहीं गिर पड़ा.

पांच

भेद

तू जो कहना चाह रहा,
वह भेद कौन जन जानेगा?
कौन तुझे तेरी आंखों से
बंधु! यहां पहचानेगा?
जैसा तू, वैसे ही तो
ये सभी दिखाई पड़ते हैं;
तू इन सबसे भिन्न ज्योति है,
कौन बात यह मानेगा?

— रामधारी सिंह ‘दिनकर’

जब विश्वमोहन की जब आंख खुली, उस समय उसका शरीर भीषण पीड़ा में था. इधर-उधर देखने के बाद उसे समझ आया कि वह अपने महल के बाहर मैदान में पड़ा था. घनघोर रात थी. पास ही में लकुलेश्वर और जनमेजय मृतप्राय पड़े थे. किसी तरह हिम्मत जुटाकर उसने महल में जाकर नौकरों को उठाया. नौकर-चाकरों ने लकुलेश्वर और जनमेजय को उठाकर बैठक में लिटा दिया. दोनों की सांसें चल रही थीं, मगर किसी तरह उन्हें होश नहीं आ रहा था.

चंदन अपने कमरे में अकेला सोया हुआ था. दीवार पर बनी छोटे राजा साहेब की तस्वीर को विश्वमोहन गौर से देखता रहा और उसे उतार कर बैठक में ले आया. वह रात उसने आंखों में काटी.

सुबह लकुलेश्वर और जनमेजय की तंद्रा टूटी. मौन विश्वमोहन उन्हें उठता देख कुछ न बोला. उसके बाल बिखरे हुए थे. आंखों के नीचे काले धब्बों की वजह से आंखें यूं लगती थीं कि जैसे मनहूस काले पत्थर के रंग से रंगी हों. शरीर की कांति जा चुकी थी. बुझे हुए चिराग की माफिक विश्वमोहन पर एक रात दस सालों की तरह गुजर गई थी. लकुलेश्वर थोड़ी देर बाद आकर उससे बोला, ‘‘योगिनियों के संसार से उनकी इच्छा से ही बाहर निकल पाए हैं. मुझे वहां से बाहर निकलने का तरीका नहीं मालूम था. इसे समझने के लिए मुझे साधना करनी पड़ेगी. थोड़ा वक्त चाहिए. मैं चार घंटों में वापस आऊंगा.”

“नहीं. आप नहीं जा सकते.” विश्वमोहन ने कहा, फिर नौकरों को चिल्लाकर बुलाया. नौकरों को उसने हिदायत दी कि लकुलेश्वर पर कड़ी नजर रखी जाए. अगर भागने की कोशिश करे तो उसे पकड़कर रस्सियों से बांधकर उसके सामने पेश किया जाए. लकुलेश्वर हैरत में उससे कुछ कहने को हुआ. विश्वमोहन ने तैश में उठकर दीवार पर लटकी दुनाली उतारकर उसके मुंह में घुसेड़ दी. फिर गुस्से से बोला, ‘‘बिना मेरे हुकुम के तुमने कुछ भी कहा, तो मुझे गोली चलाने में दो सेंकेड भी नहीं लगेंगे.”

जनमेजय उसकी भयभीत कर देने वाली जोरदार चेतावनी से जाग गया, लेकिन माजरा समझ न सका. विश्वमोहन ने जनमेजय को देखकर अपनी दुनाली वापस ले ली. लकुलेश्वर पराजित की तरह सिर झुकाकर वहीं जमीन पर बैठा रहा.

नौकर ने आकर चंदन के उठ जाने की सूचना दी. चंदन को रोशनी पसंद नहीं थी. खिड़कियां बंद थीं. यहां तक कि रोशनदानों को भी ढंक दिया गया था. मोमबत्ती जलाकर अंधेरे कमरे में दोनों चंदन के पास पहुंचे. मोमबत्ती की मद्धिम रोशनी में कमजोर विश्वमोहन और बीमार चंदन काल के वीक्ष (लेंस) में एक दूसरे की प्रतिछाया लग रहे थे, और दोनों ही काल में समा जाने वाले थे.

चंदन ने कराह कर कहा, “पापा, मुझे मम्मी याद आ रही हैं.”

“मैंने तुम्हारी मम्मी को आने को कहा है. वह आती ही होंगी.” विश्वमोहन ने अपने आंसुओं को रोकते हुए कहा. चंदन खांसने लगा. विश्वमोहन उसकी पीठ सहलाने लगा.

“पानी पीओगे?”

“नहीं पापा.” चंदन ने कहा, “मैंने दादा जी को सपने में देखा.”

“अच्छा? क्या कहा उन्होंने?” विश्वमोहन चौंका.

“मेरे साथ खेल रहे थे, कह रहे थे कि एक बार उन्होंने लकड़बग्घे का शिकार किया था.”

विश्वमोहन चंदन के बालों पर हाथ फेरने लगा. चंदन फिर खांसने लगा. खांसते-खांसते उसने खून की उल्टी की. विश्वमोहन ने घबराकर उसे गले से लगा लिया. बदहवास होकर वह रोने लगा.

जनमेजय चुपचाप वहां से बाहर चला आया. दो घंटे बाद विश्वमोहन वापस जनमेजय के पास आया. जनमेजय नहाकर तैयार हो चुका था. लकुलेश्वर वहीं फर्श पर कुछ लकीरें खींचकर ज्यामितिक आकृतियां बना रहा था. अष्टभुज, उसके अंदर पंचभुज, अंदर बनते त्रिभुज में वह अंक लिखता जा रहा था. जनमेजय ने उससे पूछा, “कल क्या हुआ था?”

लकुलेश्वर ने कोई जवाब न दिया.

“हम भिन्न से कैसे बाहर आए? क्या बाहर निकलने का रास्ता मालूम हुआ?”

लकुलेश्वर इस पर भी चुप रहा.

“खतरा अभी भी है?”

लकुलेश्वर जैसे बहरा हो गया हो. उसने तब भी कुछ न कहा जब विश्वमोहन ने नौकरों को विशाल बैठक से दूर भेजकर सारे दरवाजे और खिड़कियां एक-एक करके बंद कर दीं. जनमेजय उसके हाव-भाव से डर उठा. कमजोर विश्वमोहन की चाल में बदलाव-सा आ चुका था. मानो वह कोई चलता-फिरता पिशाच हो. उसकी आंखें सुर्ख लाल हो गई थीं.

भारी बूटों को पटकते हुए जनमेजय लकुलेश्वर के पास पहुंचकर रुक गया. लकुलेश्वर ने कोई ध्यान नहीं दिया. विश्वमोहन ने अचानक उसके माथे पर जोर से लात मारी. लकुलेश्वर हड़बड़ाकर पीछे गिरा. विश्वमोहन कूदकर उसकी छाती पर चढ़ गया और बेतहाशा उसे तमाचे मारने लगा. बदहवास को होकर उसने गुर्राकर पूछा, “बता, इस थैली के लिए चमड़ी किसने उतारी थी?”

लकुलेश्वर ने कोई जवाब न दिया और जोर-जोर से 1 2 4 9 21 51 127 323… ऐसे अंक चिल्लाने लगा.

गुस्से में आकर विश्वमोहन ने पास पड़ी उसकी थैली से छुरा निकाला और बड़ी बेदर्दी से उसके गर्दन पर छह चीरे लगाए, ठीक उसी तरह जिस तरह गए दिन लकुलेश्वर ने उसके हाथों पर किए थे. लकुलेश्वर की गर्दन से खून बहने लगा. यह देखते ही जनमेजय दौड़ते ही विश्वमोहन के पास दौड़ा-दौड़ा आया. “पागल हो गए हो? खून कर दोगे?” पूरी ताकत से उसने विश्वमोहन को हटाने की कोशिश की. न जाने विश्वमोहन में कौन-सी शक्ति आ गई, वह टस से मस न हुआ. जनमेजय उठकर पास से एक डंडा उठा लाया और विश्वमोहन की पीठ पर जोर से मारा. जैसे विश्वमोहन में चेतना आई और वह किसी तरह उठकर सोफे पर जाकर पसर गया. लकुलेश्वर अकुलाता हुआ कुछ-कुछ बुदबुदाने की कोशिश कर रहा था, पर उसकी आंखें उलटी होती जा रही थीं.

“हत्यारे!” जनमेजय ने विश्वमोहन पर लानत दी. “वह मर जाएगा. उसे हॉस्पिटल भेजना चाहिए हमें.”

“जिंदा रखने के लिए उसे नहीं मारा है.” विश्वमोहन ने कहा, “जनमेजय, मुझे तुम गलत न समझना. किसी की हत्या की सबसे बड़ी सजा क्या हो सकती है?”

“फांसी!”

“यकीन मानो मैं खुद मर जाऊंगा, और न मरा तो तुम पुलिस में मेरी शिकायत कर देना, क्योंकि मैं इसकी लाश जहां ठिकाने लगाऊंगा, तुम्हें जरूर बताऊंगा. मैं तुम्हें अपनी जुबान देता हूं. तुमने आज तक मेरा साथ दिया है, कुछ दिन की बात है कुछ साथ और दे दो. पहले ही तुम्हारे बहुत से एहसान हैं मुझ पर. यह आखिरी एहसान कर दो अपने बचपन के दोस्त पर.”

“क्या हो गया है तुम्हें? तुमने इसे मारा क्यों? कल क्या हुआ था? झूले पर कौन था? हम यहां कैसे आए?”

“हम यहां कैसे आए, यह तो मैं नहीं जानता. जब मेरी आंख खुली तो हम सब महल के बाहर बेसुध पड़े थे.”

“वहां झूले पर कौन था?”

‘‘छोटे राजा साहेब!” विश्वमोहन के कहते ही जनमेजय के रोंगटे खड़े हो गए.

विश्वमोहन ने सन्नाटे को तोड़ते हुए कहा, “यह झूठी दुनिया है. तुम्हें पता है इंसान के मर जाने के बाद अतृप्त आत्माएं प्रेत बन सकती हैं. मुझे यहां योगिनियों ने नहीं मेरे बाप ने बुलाया है.” जनमेजय खामोश सुनता रहा. “और इस कुत्ते को ताकत की बड़ी भूख है. लेकिन जानता कम है. इसे मालूम न था कि योगिनियों के नगर में वह लाया जा रहा है. पूछो किसलिए?”

“किसलिए?”
जनमेजय के सवाल पर विश्वमोहन ने तड़पकर मर रहे लकुलेश्वर की इंसानी चमड़े वाली थैली उठाई और जनमेजय की तरफ फेंकी, ‘‘गौर से देखो इसे.” जनमेजय ने देखा एक तरफ पीठ की चमड़ी और एक तरफ सीने की जहां दो स्तनाग्र दिख रहे थे. बाएं स्तनाग्र के पास तीन नाखूनों की गहरी खरोंच थी.

“यह मेरे बाप की छाती का चमड़ा है. वह निशान लकड़बग्घे के पंजों का है, जिसे राजा साहेब ने बड़ी बेदर्दी से मेरे सामने मारा था. जानते हो कैसे?” विश्वमोहन चिल्लाया. भयाक्रांत जनमेजय के मुख से कुछ न निकला. “उसकी गर्दन पर छह चीरे लगाकर.” कहकर विश्वमोहन झुका और छुरा उठाकर लकुलेश्वर की गर्दन पर बड़ी ताकत से छह चीरों पर गहरा घाव किया. लकुलेश्वर की मर्मांतक चीख से पूरा महल कांप उठा. ऐसा वीभत्स नजारा देखकर जनमेजय अपना सिर पकड़कर बैठ गया.

जनमेजय वहां से उठकर चंदन के कमरे में पूरे दिन बैठा रहा.

रात में विश्वमोहन ने उसे बाहर बुलाया. विश्वमोहन ने कहा, ‘‘राजा साहेब की गाड़ी निकाली है. लकुलेश्वर की लाश उसमें रख दी है. मैं उसे फेंकने जा रहा हूं चलोगे?’’

विश्वमोहन चुपचाप उसके साथ नीचे चला आया.

किले के बाहर चारों तरफ खाई है जिसमें अभी भी पानी भरा रहता है. पितृपक्ष का चंद्रमा पूर्व में उगा ही था, जब मनहूस सियारों के रोने की आवाजों के बीच विश्वमोहन ने कार की डिक्की से बोरे में बंद लकुलेश्वर की लाश को निकाला और उसे कंधे पर लादकर धीरे-धीरे खाई में उतर गया.

पंद्रह मिनट बाद वह वापस आया और कार में बैठकर फूट-फूटकर रोने लगा. उसने भरी आंखों से कहा, “अगर मैं हिंदुस्तान आ गया होता तो राजा साहेब की लाश की ऐसी दुर्गति ये घटिया लोग नहीं कर पाते. मेरी ही गलती है. इसकी सजा मौत से कुछ कम नहीं है.” यह कहकर विश्वमोहन जार-जार रोने लगा, “भगवान, किसी तरह चंदन की जान बख्श दो. मेरी जान ले लो. मेरी जान ले लो.”

ऐसे ही रोते हुए डबडबाई आंखों से भरा विश्वमोहन बोला, “मुझे समझ नहीं आता कि किस हैसियत से तुमसे कुछ मांगूं? आदमी मरने वाला होता है तब उसे समझ आता है कि वह भिखारी से कुछ अधिक नहीं है. सारी जिंदगी किसी न किसी से कुछ न कुछ लेता ही रहता है. लेकिन मैं अपने लिए नहीं मांग रहा हूं.”

“क्या कह रहे हो? तुम ऐसी बातें क्यों करते हो?”

“देखो, मैं सच कह रहा हूं. मैंने तुम्हें बताया नहीं. इधर दो दिनों से मैं सपने में अपनी लाश देख रहा हूं. मेरे महल की छत की मुंडेर के पाए से मेरी लाश लटकी है. मेरी दोनों आंखें बाहर निकल आई हैं. दोनों हाथ निष्प्राण झूल रहे हैं. चेहरा दक्षिण में लाल दरवाजे की तरफ कुछ देख रहा है. पेट में गहरा जख्म है जिससे खून बहते-बहते सूख गया है. मैं भी ऐसे ही मरूंगा, अपने दादा जी की तरह या दीपू की तरह. आत्महत्या कर लूंगा या कोई पैशाचिक शक्ति मार डालेगी मुझे.’’

“वहम है तुम्हारा.’’ जनमेजय ने कहा.

“उस दुनिया को देख लेने के बाद भी तुम्हें लगता है कि यह सब वहम है. तुम तो ऐसा न कहो. मरने वाले के साथ दिल्लगी नहीं किया करते. मैं जो कह रहा हूं उसे सुनो. सुबह-सुबह मैंने जूलिया को भी यही लिखकर भेजा है. वह ठीक सोचती थी. अब मेरा उससे कभी मिलना नहीं हो पाएगा. मेरी आस है कि मेरे मरने से पहले वह मुझे एक बार देख ले. मेरी मुहब्बत में असर है तो वह जरूर आएगी.’’

जनमेजय ने हां में सिर हिलाकर उसको हौसला बंधाया, ‘‘चंदन की उम्र बहुत कम है. अगर वह ईश्वर की कृपा से बच जाए तो मेरे मरने के बाद तुम चंदन की देख-भाल करना. वादा करो!” विश्वमोहन ने अजीब निगाहों से जनमेजय को देखा. जनमेजय ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “जब तक जिंदा रहूंगा, तुम्हारे बेटे की देखभाल करूंगा.’’

विश्वमोहन को जैसे आराम मिला, “एक मेहरबानी और कर देना. मेरे बाद जूलिया को सहारा देना, अगर वह चाहे तो…’’

जनमेजय ने अपने हाथ की पकड़ ढीली कर ली और अपना हाथ विश्वमोहन के हाथों से धीरे से पीछे खींचकर कहा, ‘‘शायद इसकी जरूरत न पड़े.’’

विश्वमोहन गाड़ी की स्टेयरिंग पर सिर झुकाकर सिसकता रहा. जनमेजय गाड़ी में बैठा बाहर खाई के वीराने को देखता रहा. कुछ देर बाद विश्वमोहन बोल पड़ा, “अब समझ नहीं आ रहा क्या करूं? वापस उस दुनिया में कैसे जाऊं? राजा साहेब के प्रेत से कैसे मिलूं?”

“किसलिए?”

‘‘कोई रास्ता तो होगा? कोई तरीका होगा जरूर. निर्दोष बच्चे की जान जाने की क्या जरूरत है? क्या करूं?”

‘‘कोई न कोई रास्ता होगा अंकमंत्र का. तुमने जल्दबाजी में लकुलेश्वर को मार दिया.”

“जल्दबाजी में नहीं मारा है…’’ विश्वमोहन कहते-कहते चुप हो गया.

“लकुलेश्वर को अंकमंत्र पता थे. अब शायद ही कोई जानकार मिले जिसे अंकमंत्र पता हों.’’

“उसने कहा था कि यह बीजमंत्र से भी खुल सकता है. हम किसी और से मिलें?”

जनमेजय ने पूछा, “किससे मिलें?”

निराश विश्वमोहन ने कहा, “मुझे क्या मालूम. तुम ही बताओ क्या किया जा सकता है अब?”

“इंतजार”, जनमेजय ने गहरी सांस लेते हुए कहा, “हर लकुलेश्वर के मुकाबले कोई न कोई उससे बढ़कर होता है. हमें उसे ढूंढ़ना होगा.”

छह

हर

रात में मन मन अलग थे
स्वप्न रचना में विलग थे
ताल लय में नव उदय था
भिन्न भाषा भिन्न जग थे
अब उषा की स्निग्ध स्मृति में
एक सृति में एक स्थिति में
एक भू पर भिन्न कृति में एक सरिता है बहानी

— त्रिलोचन

अगली सुबह मुंह अंधेरे ही नौकरों ने सूचना दी कि कोई सज्जन बड़ी दूर से विश्वमोहन से मिलने आए हैं. विश्वमोहन ने उनको बैठक में बिठाने के लिए कहा.

विश्वमोहन जब रात के कुर्ते-पजामे में ही बैठक में आया, तब उसने देखा कि अधेड़ आगंतुक बेहद दुबला-पतला, बेहद लंबा, खिचड़ी बालों वाला है और सफेद लंबी मूंछ रखे हुए है. उसने सिर से पांव तक जो कुछ भी पहना था, सफेद रंग का था. मामूली सफेद शर्ट, साधारण सफेद पैंट और पांव में सफेद जूते-मोजे. विश्वमोहन ने नमस्कार करके उसका परिचय पूछा. आगंतुक ने अपनी जगह से उठकर नमस्कार किया और फिर आहिस्ते से बैठ गया.

बड़ी ही गंभीर आवाज में उसने कहा, “अपने साथी को भी बुला लीजिए. फिर बात करते हैं.”

विश्वमोहन ठिठका पर पिछले दो दिनों में जो कुछ हुआ था, उससे अप्रत्याशित और अज्ञात का भय उसके हृदय से जा चुका था. जब जनमेजय बैठक में आया, तब अजनबी ने कहना शुरू किया, “आप लोगों ने लकुलेश्वर की हत्या कर दी. इसकी जरूरत नहीं थी. खैर, आपको नहीं पता था कि मैं आने वाला हूं.”

‘‘जी, आप कौन?” जनमेजय ने पूछा.

“मेरा नाम श्रीकंठ है. मैं कश्मीर से अपने गुरु मच्छंदनाथ के आदेश पर यहां आया हूं. रास्ते में कुछ बाधाएं आ गई थीं, इसलिए विलंब हो गया.” इतना कहकर श्रीकंठ खड़ा हो गया. उसके चेहरे पर जरा भी शिकन न थी. न किसी तरह का आक्रोश, न किसी प्रतिशोध की इच्छा, न किसी तरह का भय, न कोई विशिष्ट कामना. बड़े ही संयत तरीके से वह कमरे में चहलकदमी करने लगा, “यहां ही तुमने उसकी हत्या की थी?”

विश्वमोहन गुस्से और अविश्वास से श्रीकंठ को घूरने लगा. उसकी नजर अपनी दुनाली पर पड़ी. उसकी नजरों पर नजर रखते हुए श्रीकंठ ने शांत भाव से कहा, “मुझसे डरने की जरूरत नहीं है. मुझे मारने की तुम्हें आवश्यकता नहीं पड़ेगी.”

विश्वमोहन अचरज में पड़ा फिर फौरन गुस्से में बोला, “आप मेरे विषय में इतना अनर्गल प्रलाप कर रहे हैं. आपको सजा मिलनी चाहिए.”

बिना उद्विग्न हुए श्रीकंठ ने कहा, “एक तो तुम लोग सच जानना चाहते हो, दूसरी ओर खुद सच नहीं बोलते. डरो मत. मैं यहां तुम्हें दंड देने नहीं आया. दंड ही देना होता तो बिना सामने आए दे सकता था. निर्भीक बनो. कायर मत बनो.”

ऐसी बात सुनकर विश्वमोहन पर जैसे पानी फिर गया. उसकी चुप्पी पर जनमेजय ने पूछा, “आप कौन हैं? आपके परिचय से भी हम संतुष्ट नहीं हैं. क्या आपको पता है हम किस मुसीबत में हैं?”

‘‘बार-बार पूछो. जितनी बार पूछो, एक ही जवाब मिलेगा. भले ही अलग ढंग से, पर तुम सीख जाआगे. मैंने बताया कि मैं कश्मीर से आया हूं. पेशे से मैं एक आयुर्वेदाचार्य हूं. गुरु मच्छंदनाथ का शिष्य हूं. उन्हें गुजरे हुए डेढ़ हजार साल हो चुके हैं. लेकिन अभी उनके शिष्य बनते हैं और उनके रास्तों पर चलते हैं. लकुलेश्वर उनका शिष्य था, पर असंयमित. बहुत कुछ जल्दी कर लेने की फिराक में. जल्दी से खाना निगल लेने में, जल्दी से शर्बत पी लेने में. जल्दी से सब कुछ कर जाने की हड़बड़ी में. लेकिन तुम्हें उसे मारना नहीं चाहिए था.”

“उसने मेरे पिता की लाश की चमड़ी उधेड़ी और उसके बाद… उसके बाद…” विश्वमोहन का गला रुंध गया, “उनकी लाश को भूनकर खा गया.”

जनमेजय के रोंगटे खड़े हो गए. सोफे पर आराम से बैठे श्रीकंठ के चेहरे पर कोई भाव-परिवर्तन नहीं हुआ. उसने उल्टे पूछा, “तुम तो उनके अंतिम संस्कार को कंप्यूटर पर लाइव देख रहे थे. बचा क्यों न लिया तुमने?”

विश्वमोहन दोनों हाथों से मुंह ढक कर जार-जार रोने लगा.

जनमेजय ने पूछा, “क्या आपसे कुछ पूछ सकता हूं?”

‘‘नि:संकोच पूछो. बार-बार पूछो.” श्रीकंठ ने कहा.

“क्या आप तांत्रिक हैं?” जनमेजय ने ठहरकर पूछा.

“हां, मैं तांत्रिक हूं.”

“इसलिए हमारा हाल आपको पता है. क्या आपको नहीं लगता कि लकुलेश्वर ने राजा साहेब की लाश के साथ दुर्व्यवहार किया?”

‘‘हालांकि हम जीते जी दूसरों के प्रति दुर्व्यवहार की परवाह नहीं करते, उनके मर जाने पर व्यर्थ शरीर की चिंता करते हैं. तुम्हारी दृष्टि से यह माना जा सकता है कि पुरुषोत्तम सिंह राठौड़ के शव के साथ ठीक नहीं हुआ.”

जनमेजय ने पूछा, “क्या चंदन की जान बच सकती है?”

इस पर श्रीकंठ ने कहा, “मैं उसकी जान बचाने ही आया हूं.” यह सुनकर विश्वमोहन ने चौंक कर देखा. दौड़कर श्रीकंठ के पास जाकर अपने घुटनों पर बैठ गया, ‘‘कुछ भी करके उसकी जान बचा लीजिए.”

‘‘चिंता न करो. हर लकुलेश्वर के लिए देर-सवेर कोई न कोई श्रीकंठ मिल जाता है. यही संसार का नियम है.” विश्वमोहन की तड़प देखकर श्रीकंठ ने कहा, ‘‘पेशे से मैं आयुर्वेदाचार्य हूं. मुझे रोगी के पास ले चलो.”

चंदन के कमरे में जाकर श्रीकंठ का व्यवहार ही बदल गया. उसने चंदन को पलंग से उठाकर गोद में उठा लिया, “बच्चे, घबराना मत,” बहुत देर तक वह उसके बालों पर हाथ फेरता रहा. चंदन की सूनी-सूनी आंखें खुलतीं और बंद होती रहीं.

वापस बैठक में आकर श्रीकंठ ने अपने थैले से बहुत-सी जड़ी-बूटियों निकालीं और उन्हें आपस में मिलाकर पुडि़यों के कुछ ढेर बना लिए, ‘‘रोगी की हालात नाजुक है. गर्म पानी के साथ एक-एक पुड़िया हर घंटे दी जाए. रात में सोते समय यह दूसरी वाली पुड़िया दूध के साथ देना. कल तक तबीयत में कुछ सुधार होगा. फिर आगे देखेंगे.”

दुपहर में श्रीकंठ ने जनमेजय और विश्वमोहन को बुलाया. जमीन पर वह कुछ आकृति बना रहे थे. “लकुलेश्वर तुम्हें कहां ले गया था, तुम्हें इसका कुछ एहसास है?”

‘‘जी, इतना ही पता है वह दुनिया किसी साधारण सुरंग से बाहर किसी पहाड़ी की घाटी नहीं है. वह दुनिया हमारे एहसासों से भिन्न है.”

“भिन्न!” गहरी सांस लेकर श्रीकंठ ने कहा, “उसे भिन्न कहकर बुला लेते हैं. जिस तरह ईश्वर हर जगह मौजूद हैं, लेकिन मंदिरों में विशिष्ट दैवी शक्ति प्रतिष्ठित होती है, ठीक उसी तरह यह ‘भिन्न’ कुछ विशिष्ट योगिनी शक्तियों का निवास स्थल है. उसकी निवासी योगिनी शक्तियां. प्रेत, पिशाच, डाकिनी, शाकिनी, हाकिनी, लाकिनी आदि हैं.”

“क्या प्रेत, पिशाच अपना मनमाना करते रहेंगे? उन पर किसी का बस नहीं चलता?” जनमेजय ने पूछा.

‘‘बिल्कुल चलता है. कोई जादू नहीं है. जैसे तुम मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हो, पर उसे बनाने के लिए कुछ वैज्ञानिक चाहिए, निर्माण के लिए विशिष्ट फैक्ट्रियां चाहिए, उसी तरह उनके संसार के नियम हैं. उन तक पहुंचने के कायदे-कानून हैं.”

“क्या आप उन तक आसानी से पहुंच सकते हैं?”

“नहीं. मैं कुंडलिनी साधना में अनाहत चक्र तक पहुंचा हूं. मेरा अनाहत चक्र जागृत और संतुलित है. मैं मातृका शक्ति वाले बीजमंत्र से काम करता हूं. लकुलेश्वर अंकों का प्रयोग करता था. मुझे लगता है कि उसने सुरंग के दरवाजों को अंकों से बांध दिया होगा. उसे खोलना कठिन काम होगा.”

“आप को अंकमंत्र का ज्ञान नहीं?”

“बहुत अच्छे से नहीं. लेकिन कोशिश कर सकते हैं.”

“लकुलेश्वर को वहां से निकलने का रास्ता नहीं मालूम था. उसने कहा कि अंकमंत्र में वास्तविक संख्या (real number) और सम्मिश्र संख्या (complex number) के प्रयोग से कुछ भी किया जा सकता है. उसे आगे की जानकारी नहीं थी.’’

“मैंने भी यही शिक्षा पाई है कि सम्मिश्र (complex number) और अतिसम्मिश्र संख्या (hypercomplex number) से बहुत से कठिन काम किए जा सकते हैं. लेकिन अंकमंत्र मेरा क्षेत्र नहीं रहा है. मुझे बीजमंत्र आते हैं. फिर भी, यहां आया हूं तो गुरुकृपा से कुछ न कुछ करूंगा ही.’’

“मेरी एक ही मनोकामना है, वह है चंदन की जान बचाना. चंदन बच तो जाएगा न?” विश्वमोहन ने पूछा.

‘‘रोग तो मैं ठीक कर सकता हूं, पर उससे पहले तुम्हारे पिता के प्रेत को पकड़ना होगा. वह भिन्न में जा बसा है. जैसी कुसंगति मिली है, वह उसके इरादे को और मजबूत बना देगी. उस संसार से मैं उसे बाहर नहीं बुला सकता हूं. एक ही तरीका है. उससे वहां जाकर ही मिलना होगा. उसकी इच्छा क्या है, इसे समझना होगा. तभी हिसाब बराबर हो सकता है. यह तो मुश्किल है ही पर एक मुश्किल और है.”

“वह क्या?”

“लकुलेश्वर अब योगिनियों का दास बन गया है. वह भी भिन्न में पहुंच गया है. विश्वमोहन, अब तुम्हारे दो शत्रु हैं. लकुलेश्वर और…”

“और कौन?” विश्वमोहन ने पूछा.

“…तुम्हारे पिता, और कौन!” श्रीकंठ ने यह कहते हुए फर्श पर सफेद खड़िया से एक वृत्त बनाया. उसके किनारे पर सोलह दल बनाकर एक कमल-पुष्प बना दिया. देखते ही देखते उसमें एक दूसरे को काटते हुए दो समबाहु त्रिभुज बना दिए.

जनमेजय ने श्रीकंठ से पूछा, “आप हमारी मदद क्यों कर रहे हैं? क्या केवल चंदन की जान बचाने के लिए.”

इसी शहर में भिन्न हजारों को मार डालेगा. बहुत-सी हत्याएं होंगी. आत्महत्याएं बढ़ेंगी, रोगों
में वृद्धि होगी.”

“और भिन्न का विस्तार होता जाएगा.”

“हां, लेकिन हर शक्ति के अनुपात में कोई न कोई और शक्ति रहती है. विपरीत शक्तियों का भिन्न लौकिक सर्वत्र मौजूद है. इसलिए संसार में भय की सत्ता है. भय ही संसार को चलाता है.”

“आपका कहना है कि आप दैवी शक्ति की तरफ हैं और लकुलेश्वर योगिनी शक्ति की तरफ?”

“नहीं. ठीक से समझो. कोई शक्ति अच्छी-बुरी नहीं होती. अच्छा-बुरा प्रत्येक की उपयोगिता के अनुसार होता है. हालांकि हर शक्ति की विशिष्टता होती है. शक्ति का मतलब क्या होता है. कुछ करने की क्षमता, कुछ निर्माण करने की क्षमता. उपयोगिता की दृष्टि से कुछ शक्तियां सृजन करती हैं, कुछ पोषण करती हैं, कुछ यथास्थिति बनाए रखती हैं और कुछ संहार करती हैं. शक्ति का स्वभाव है विस्तार या संकुचन. सृजनात्मक शक्ति पसरना चाहती है, विस्तार चाहती है. वहीं संहार के समय शक्ति सिकुड़ती है.’’

“फिर आप भिन्न को क्यों रोकना चाहते हैं?” जनमेजय उत्सुक हो गया.

“अभी भिन्न मेरे लिए संहारक शक्ति है. इसलिए मुझे उसे अभी रोकना है. इस संतुलन के अलावा मुझे कुछ हिसाब बराबर करना है. इसलिए भी.” श्रीकंठ ने उन दोनों को बारी-बारी से देखते हुए कहा.

उधर अपने में ही खोया हुआ विश्वमोहन जैसे होश में आया. उसने लंबी सांस लेकर लगभग हारते हुए कहा, ‘‘ठीक है, हर हिसाब बराबर होना ही चाहिए.”

श्रीकंठ ने यह तय किया कि संध्या काल में भिन्न में प्रवेश किया जाएगा. जनमेजय के पूछने पर उसने बताया कि उसे किसी अनुष्ठान, बलि या खून की आवश्यकता नहीं है. जनमेजय ने पूछा कि क्या लकुलेश्वर बुरा तांत्रिक था?

श्रीकंठ ने बताया कि वह बुरा नहीं था, उसकी योग्यता में कमी थी. हर समीकरण के बहुत से समाधान हो सकते हैं. लकुलेश्वर को एक-दो ही तरीके आते थे, वहीं श्रीकंठ को उसकी तुलना में सौ गुने तरीके मालूम हैं. बहुत कुछ नहीं भी मालूम है, जैसे कि अंकमंत्र और योगिनियों का भिन्न-संसार.

कुछ कागज, कलम, स्याही, प्रकार, पेंसिल, खड़िया आदि का इंतजाम कर श्रीकंठ ने ज्यामिति आकृतियां बनानी शुरू कीं.

“मुझे समझ नहीं आया कि छोटे राजा साहेब और हमारा नौकर दीपू भिन्न के समीप कैसे पहुंचे? उस भिन्न और गणितीय भिन्न में क्या संबंध है?” पसीने से लथपथ विश्वमोहन ने पूछा.

“कभी-कभी ऐसा होता है कि योगिनियां किसी को अपने इच्छानुसार दर्शन देती हैं. माना जाता है कि योगिनियों ने हमारे गुरु मच्छंदनाथ को स्वप्न में दर्शन देकर तंत्र का ज्ञान दिया था. छोटे राजा साहेब ने अपनी बुरी आदत से मजबूर होकर सिल्लाई का तिरस्कार कर दिया. इसलिए सिल्लाई ने सपनों में आकर छोटे राजा साहेब को सुरंग का रास्ता बताया. कुछ पा लेने के लालच में राजा साहेब रहस्य की तरफ खिंचे चले गए.”

“लेकिन दीपू? हमने उसकी डायरी में भिन्न का चिह्न देखा.”

‘‘योगिनी नगरी में मंत्र से प्रवेश मिलता है. साधारण अंकमंत्र कुछ पूर्ण संख्याओं की आवृत्ति होते हैं, वहीं भिन्न क्लिष्ट तिलिस्मों, पिशाच नगरी, योगिनी नगरी के लिए कुंजी का काम करता है. इसे पुकारने के लिए पहले अंश की संख्या, फिर बटा के स्थान पर एक विशिष्ट मुद्रा और उसके बाद हर की पूर्ण संख्या कहनी होती है. इस तरह विशिष्ट स्थान पर गणितीय भिन्न का वाचिक उच्चारण-शारीरिक क्रिया करने से, भिन्न संसार में प्रवेश मिल जाता है.”

‘‘कोई भी भिन्न का दरवाजा खोल सकता है?” जनमेजय ने पूछा.

‘‘जिस किसी के पास ताले की चाभी होगी, वह ताला खोल सकता है.” श्रीकंठ ने निर्विकार होकर कहा, “पर ध्यान रहे, यह चाभी दुधारी है. अगर मूठ के सहारे न पकड़ गया, अपनी हथेली ही कटवा लोगे. मंत्र से खेलना आग से खेलना होता है.”

“क्या दीपू और राजा साहेब भिन्न में गए थे? क्या दीपू को भिन्न की चाभी पता थी?” यह कहकर जनमेजय ने दीपू की डायरी श्रीकंठ को दी. श्रीकंठ ने आखिरी पन्ने के बयान को पढ़ा. थोड़ा उलट-पुलटकर उसने आगे कहा, “भिन्न की चाभी केवल राजा साहेब को सिल्लाई ने सपनों में बताई थी. राजा साहेब कई बार भिन्न में गए और पिशाचों की दुनिया में रमते हुए नरपिशाच बनते चले गए. उन्होंने कई बार चाहा कि विश्वमोहन उनके पास आ जाए. ऐसा हो भी जाता पर उससे पहले वह अपनी ही बेवकूफी से मौत के समीप चले गए. भिन्न में जाना, आग के दरिया में जाने के समान है. लकुलेश्वर को जब यह अंदेशा हुआ कि राजा साहेब भिन्न में प्रवेश कर चुके हैं, तब उसने दीपू से दोस्ती गांठी. दीपू को राजा साहेब का पीछा करने के पैसे दिए. राजा साहेब का मुंहलगा होने के कारण दीपू ने राजा साहेब से भिन्न के बारे में पूछ लिया और इस तरह दीपू भी भिन्न में प्रवेश कर पाया. लेकिन उसे भिन्न की चाभी याद न रह सकी. उसमें कुछ गलतियां थीं. अंत में भिन्न की शक्ति से उसे अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी. वह भिन्न का भक्ष्य बन गया. लकुलेश्वर को भिन्न में जाने की जल्दी थी. वह जानता था कि अगर राजा साहेब के शव के साथ तांत्रिक क्रिया की जाए तो राजा साहेब इसका बदला लेने के लिए तुम्हें बुलाने पर मजबूर हो जाएंगे. एक बार अगर तुम आ गए, भिन्न विश्वमोहन के प्रवेश के लिए नई चाभी बनने का मौका देगा. बिना विश्वमोहन के लकुलेश्वर कभी भिन्न नहीं जा सकता था.”

“आपके कहे अनुसार अगर लकुलेश्वर भिन्न पहुंच गया है तो अब उसकी मनोकामना पूरी हो गई.” जनमेजय ने पूछा.

“नहीं. शक्ति के स्वरूप को जानकर, समझकर हम उसका उपयोग करना चाहते हैं. लकुलेश्वर भिन्न को जानकर उसकी शक्ति का उपयोग अपने स्वार्थ के लिए करना चाहता था. दुर्भाग्य से तो वह अब भिन्न से अभिन्न हो गया है. उसकी इच्छाएं भिन्न के अधीन हैं.”

‘‘राजा साहेब की इच्छा भी भिन्न के अधीन होगी. फिर भिन्न हमसे क्या चाहता है?”

‘‘राजा साहेब की संहारक इच्छा, भिन्न की इच्छा के विपरीत नहीं है. इसलिए भिन्न उन्हें हमेशा अपने पास रखेगा और वह भिन्न के लिए एक साधारण पिशाच हैं.”

“इस तरह लकुलेश्वर के साथ-साथ, राजा साहेब और दीपू भी भिन्न में पिशाच रूप में होंगे. अनंत काल तक?” विश्वमोहन पूछ बैठा.

“अनंत काल तक तो नहीं, जब तक भिन्न नष्ट नहीं होता है तब तक. जिस तरह सितारों की मंदाकिनियां होती हैं, जिनके मध्य में शक्तिशाली ब्लैकहोल होता है, ठीक उसी तरह अतृप्त आत्माएं भिन्न में शक्तिशाली योगिनियों के इर्द-गिर्द मंडराती हैं. हम उस पैशाचिक मंदाकिनी में प्रवेश करना चाहते हैं, इसलिए कि राजा साहेब से सुलह कर सकें.”

“और कोई तरकीब नहीं? कोई कवच या भिन्न से युद्ध?”

श्रीकंठ के होंठों पर हल्की हंसी आ गई, ‘‘चींटी और हाथी का युद्ध नहीं होता. युक्ति भिड़ाकर काम निकालना होता है. राजा साहेब के साथ भिन्न की शक्ति है. अगर वह साधारण प्रेत होते तो डर की कोई बात नहीं थी.”

‘‘हो सकता है कि भिन्न में जाने के बाद हम में से कोई वापस न आ पाए.”

दीपू की डायरी लिए हुए जनमेजय सोच में डूबा हुआ था.

‘‘हो सकता है.” श्रीकंठ ने कहा, “और नहीं भी हो सकता है.”

दो घड़ी तक जनमेजय को घूरने के बाद श्रीकंठ में फिर कहा, ‘‘संशय के लिए मेरे निकट कोई स्थान नहीं है.”

“मतलब? जब आप खुद ही कह रहे हैं कि हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है.’’ विश्वमोहन ने कहा.

“ये संभावनाएं हैं. संशय तब होता है जब किसी संभावना पर तुम्हारी इच्छा हावी हो. मैंने कहा नहीं हो तो अब कह देता हूं, भिन्न से लड़ने के लिए भय के भिन्न से मुक्त होना पड़ेगा. तभी कोई हिसाब बराबर हो सकता है.’’

सात

बराबर

मैं तुमसे हूं एक, एक हैं
जैसे रश्मि प्रकाश;
मैं तुमसे हूं भिन्न, भिन्न ज्यों
घन से तडि़त्-विलास;

— मैं और तू, महादेवी वर्मा

सूरज डूबते ही श्रीकंठ, जनमेजय और विश्वमोहन लाल दरवाजे की ओर निकल पड़े. तीनों के हाथ में लंबी टॉर्च थी. शाम बड़ी भयावह-सी थी. रह-रहकर तेज हवाएं चल रही थीं. तूफान-सा आने को था. अचानक हवाएं थम-सी गईं और कहीं कुछ चमगादड़ उड़ते हुए उनके समीप से निकले. तीनों खामोशी से कुएं की तरफ बढ़ते जा रहे थे कि अचानक एक बड़ा-सा उल्लू आया और विश्वमोहन के सिर पर झपट्टा मारकर उड़ गया. उल्लू के आक्रमण को भांपकर जनमेजय और श्रीकंठ पहले ही झुक गए थे. फिर उठकर श्रीकंठ लगातार कुछ बुदबुदाता हुआ कुएं की तरफ बढ़ता रहा. जनमेजय और श्रीकंठ उनके पीछे चलते रहे.

श्रीकंठ ने कुछ अंकमंत्र पढ़े, फिर विश्वमोहन को बताया, “ये अभिमंत्रित प्रसन्न संख्याएं (happy number) थीं. यहां का मंत्र सुरंग तक सकुशल प्रवेश करने को है. यह बोधाई से आज्ञा लेने के लिए है. वरना बोधाई भिन्न के रास्ते से पहले ही तुम्हें रोक लेगी.”

पहले श्रीकंठ, बाद में विश्वमोहन और अंत में जनमेजय ने कुएं में प्रवेश किया.

खोह में घुसकर सारे सुरंग की ओर रवाना हो गए. श्रीकंठ विविध अंकमंत्रों का अनवरत उच्चारण करते जा रहे थे. अंत में सुरंग के दरवाजे के पास पहुंचकर उनके इशारे से सारे बैठ गए.

“अंकमंत्र की पद्धति जरा कठिन है. छोटे-मोटे काम के लिए दहाई अंक पाठ करने आसान पड़ते हैं, लेकिन बड़े काम के लिए पच्चीस से अधिक अंकों का क्रमानुसार उच्चारण मुश्किल हो जाता है. अक्षर बहुत अधिक हैं, लेकिन अंकमंत्र के लिए हम दस अंकों वाली दशमलव पद्धति का प्रयोग करते हैं. मुझे अक्षर याद करना ज्यादा आसान लगता है, इसलिए मैं बीजमंत्र का प्रयोग करता हूं. अब इस दरवाजे को खोलना शुरू करते हैं.” यह कहकर श्रीकंठ ने अंकमंत्र का पाठ शुरू किया. अंश के लिए कुछ संख्या, फिर ध्यान की मुद्रा, फिर हर के लिए कुछ संख्या. ऐसा करते-करते वह बार-बार दरवाजे की तरफ देखते. करीब आधे घंटे के बाद वह चुप हुए और फिर से दीपू की डायरी के भिन्न को देखा.

“क्या हुआ? यह चाभी गलत है या अधूरी है.”

“यह तो अधूरी थी. लेकिन इसका ताला लकुलेश्वर ने तोड़कर नया ताला लगा दिया है, ताकि उसके अलावा भिन्न को कोई भेद न सके.”

“आप चाहें तो मेरा खून ले सकते हैं.” विश्वमोहन ने अपना दाहिना हाथ बढ़ाया.

“श्रीकंठ अभी हारा नहीं है. कम से कम श्रीकंठ लकुलेश्वर से नहीं हार सकता.

‘‘मुझे इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी.” श्रीकंठ की भृकुटि तन गई. वह फिर कुछ अंकों का उच्चारण करने लगे.

ऐसा करते-करते बहुत समय बीत गया. श्रीकंठ के ललाट पर पसीने की बूंदें आ गईं. जनमेजय और विश्वमोहन पसीने से पूरी तरह भीग चुके थे. श्रीकंठ अचानक झुंझलाए हुए खड़े होकर चिल्लाए, “लकुलेश्वर, तुझे मैं भिन्न से बाहर ले आकर सजा दूंगा.”

जनमेजय और विश्वमोहन श्रीकंठ को देखकर आपस में एक दूसरे को देखने लगे कि लगता है इनसे कुछ न हो पाएगा.

“लकुलेश्वर ने भिन्न का दरवाजा अपरिमेय संख्याओं से बंद कर दिया है. यह अंकमंत्र की विशिष्ट धारा है. मैं इस ताले को खोल नहीं सकता, पर तोड़ जरूर सकता हूं. मुश्किल यह है कि भिन्न इसके बाद अपना दरवाजा किसी नए ताले की फौलादी मजबूती से स्वयं बंद कर देगा. हम भिन्न में चले तो जाएंगे, पर वापस लौट पाना बहुत मुश्किल हो जाएगा. मैं नहीं कह सकता कि मैं वापस आ पाऊंगा या भिन्न का कैदी बन जाऊंगा.”

“भिन्न के कैदी बनने का क्या अर्थ है?” विश्वमोहन ने पूछा.

“उसका अर्थ इतना मात्र है कि हम अपने जान-पहचान वालों की नजर से गुमशुदा इस सुरंग में बेहोश पड़े रहेंगे, जब तक इस भौतिक शरीर को मौत न आ जाए, या संभव है हमारे अंग धीरे-धीरे काम करना बंद कर दें. हमारी हथेलियां रक्तहीन होकर काली पड़ती जाएं. यह भी संभव है कि भिन्न के कैदी अपाहिज होकर, गूंगे-बहरे होकर, किसी तरह इस लौकिक संसार में मुर्दे की तरह जीवन जीते रहेंगे. जब मृत्यु आएगी तो यमदूत से पहले भिन्न के पिशाच हमें अपने साथ ले जाएंगे.’’

“क्या हमें वापस लौटना होगा?” विश्वमोहन ने मायूसी से कहा.

“नहीं. पर जनमेजय, तुम विचार लो. तुम्हें अपनी जान प्यारी है तो वापस जा सकते हो.’’ श्रीकंठ ने कहा.

विश्वमोहन ने भी कहा, “जनमेजय, तुमने मेरी बहुत मदद की. मेरे लिए और मेरे बच्चे के लिए नाहक अपनी जान मुसीबत में डाल रहे हो. वापस चले जाओ.”

जनमेजय ने बड़ी शालीनता से कहा, “परिवार के लिए स्वयं का त्याग, समुदाय के लिए परिवार का त्याग, देश के लिए समुदाय का त्याग, पृथ्वी के लिए देश का त्याग, आत्मा के लिए सर्वस्व का त्याग… मेरी यही शिक्षा है. मैं आप लोगों के साथ चलूंगा.”

उसकी बात सुनकर श्रीकंठ ने आगे कहा, “लगता है यह दरवाजा मंत्र से नहीं यंत्र से खुल जाएगा. इस ताले की चाभी है 3 का वर्गमूल. इसके लिए हमें ज्यामिति से ऐसा यंत्र बनाना पड़ेगा, जिसकी एक भुजा 3 का वर्गमूल हो. इसे बनाने के लिए पहले 2 का वर्गमूल बनाना होगा. और इसके लिए पहले हमें भिन्न को यह बताना होगा कि हमने 1 किसे माना है. जब हम 1 तय करेंगे, उसके बाद 3 का वर्गमूल बताकर हम भिन्न में प्रवेश कर सकेंगे. लेकिन एक बात के लिए तैयार रहना, भिन्न का ताला तोड़ने की एवज में हमें भिन्न का भीषण रूप दिखेगा. इसके लिए जी मजबूत कर लो.” यह कहकर श्रीकंठ ने कागज पर लाल स्याही से एक ऐसा समकोण त्रिभुज बनाया, जिसकी एक भुजा 1, दूसरी का मान 2 का वर्गमूल और उसका कर्ण 3 का वर्गमूल था. इसके बाद उन्होंने कुछ अक्षरमंत्र बोलते हुए, उस यंत्र को भिन्न के दरवाजे पर रखा.

ऐसा करते ही बहुत जोर का धमाका हुआ. दरवाजे के परखच्चे उड़ गए. सुरंग में न जाने कहां से हरहराता पानी आ गया. उस तेज जलप्रवाह में तीनों बह चले. अचानक बहते हुए तीनों जैसे गहरे गड्ढे में गिरने लगे, मानो कोई जल-प्रपात हो. चारों ओर पानी का भयानक शोर है. श्रीकंठ, विश्वमोहन और जनमेजय तीनों गहरे पानी में गिरे और फिर डुबकी लगाते हुए ऊपर की ओर उछले.

पानी में तैरते श्रीकंठ ने सबसे पहले चारों तरफ देखा. बड़ी तीव्रता से सूरज उगता और डूबता जा रहा था. आकाश में अनगिन तारे चमकते और फिर अंबर की ही नीलिमा में डूब जाते थे. हवा में भयानक पक्षी विभिन्न युग्मों में उड़ रहे थे. कुछ नुकीले पत्थर हवा में चक्कर खाते तैर रहे थे. दूर कहीं ज्वालामुखी फूट रहा था. आकाश के एक कोने पर धुएं के बादल छाए हुए थे. श्रीकंठ के मुंह से निकला, “भिन्न!”

जनमेजय और विश्वमोहन तैरकर बाहर निकले और देखा कि जहां से वे गिरे थे, वह जल-प्रपात इतना ऊंचा था मानो उर्ध्व को छूने ही वाला हो. श्रीकंठ भी तैरते हुए किनारे आए और कहा, “यहां एक पल के लिए भी स्थिर न होना. विश्वमोहन, तुम छोटे राजा साहेब का ध्यान करो.”

विश्वमोहन और जनमेजय नदी किनारे दौड़ लगा ही रहे थे कि तभी जल-प्रपात से पानी की जगह तरल लावा गिरने लगा. जनमेजय यह दृश्य देखकर भयाक्रांत हो गया. श्रीकंठ उसकी बांह पकड़कर उसे किनारे के जंगलों में खींच ले आए.

तीनों बेतहाशा दौड़े जा रहे थे. कभी-कभी कोई उड़ता पत्थर उनके अगल-बगल से नाचता निकलता जाता. जनमेजय को अपने शरीर की नसों में वही पुरानी बेचैन कर देने वाली गर्मी महसूस होने लगी. जंगल में दौड़ते-दौड़ते सभी एक मैदान में आ गए.

विश्वमोहन सिर पर हाथ रखकर आंखें बंद करके कुछ बुदबुदाता रहा. जनमेजय ने देखा कि मैदान के दक्षिण की ओर वही चौबीस हिंडोले वाला विशाल झूला है. वह हांफते हुए कुछ कहने को हुआ कि विश्वमोहन खुद-ब-खुद उधर दौड़ता हुआ चला गया.

श्रीकंठ के पास जाकर जनमेजय कुछ कहने को हुआ, तभी उसने देखा कि लकुलेश्वर, दीपू और कुछ स्त्री-पुरुष, सभी सफेद कपड़ों में लिपटे हवा में तैरते उनके पास आ रहे हैं. सबका चेहरा सफेद स्याह-सा है. आंखें सुर्ख अंगारों की तरह दहक रही हैं. चारों तरफ पत्थर का कालापन है. डर के मारे थूक निगलकर जनमेजय श्रीकंठ की ओर मुड़ा. पिशाचों को आता देखकर श्रीकंठ ने बिना घबराए एक लकड़ी से जमीन पर अपने चारों तरफ एक वृत्त बना लिया. फिर वृत्त का एक व्यास खींचकर जनमेजय से कहा, ‘‘चाहे कुछ भी हो जाए तुम व्यास को मत लांघना. इनके हत्थे चढ़ोगे तो असहनीय पीड़ा होगी. याद रखना भिन्न में मरोगे नहीं, पर घायल हो सकते हो.’’

आतंकित जनमेजय ने देखा कि लकुलेश्वर, दीपू और उनके संगियों की श्वेत छाया उस वृत्त के बाहर रुक कर श्रीकंठ को घूरने लगी.

इधर विश्वमोहन जब झूले के पास पहुंचा, बड़ी जोर की बारिश होने लगी.

विश्वमोहन को लगा कि बारिश की बूंदें उसकी त्वचा को जख्मी करती जा रही हैं, हो न हो यह अम्लीय वर्षा है. निचले डोले में छोटे राजा साहेब मुस्कुराते हुए उसका इंतजार कर रहे हैं. उसके आते ही राजा साहेब डोले का दरवाजा बंद कर देते हैं और झूला तेजी से झूलने लगता है.

तेज बारिश की असहनीय पीड़ा झेलते हुए विश्वमोहन ने पूछा, ‘‘राजा साहेब, आपके कहे अनुसार मैंने लकुलेश्वर से बदला ले लिया. आप अब भी मुझसे नाराज हैं?”

बारिश के ओलों और झटास से अप्रभावित राजा साहेब ने जो कहा मानो कई दिशाओं से प्रतिध्वनित होकर सुनाई दिया, ‘‘जानते हो, संसार की सबसे बड़ी दौलत क्या होती है? आदमी का बेटा. तुम मुझे मेरा बेटा सौंप दो.”

तेज बारिश में विश्वमोहन की आंखें खुल नहीं पा रही थीं. उसने किसी तरह से कहा, ‘‘राजा साहेब. आप मेरे पिता हैं या मेरी जिंदगी के मालिक? जीते जी आपने मेरी जिंदगी नरक बना दी थी. मरकर भी आप मेरा पीछा नहीं छोड़ रहे?”

नीचे उतरते झूले में राजा साहेब के चेहरे पर कोई भाव न आया.

“मैं आपसे नफरत करता हूं. मैं जान-बूझकर आपकी अंत्येष्टि में नहीं आया, क्योंकि मैं आपकी शक्ल नहीं देखना चाहता था.”

‘‘बाप कितना भी बुरा हो, उसका अपने बेटे पर हक होता है. मेरे लायक बेटे, क्या तुम मेरा कर्ज उतार सकते हो?” राजा साहेब ने पूछा.

“अब क्या चाहते हैं? ठीक है मेरी जिंदगी ले लीजिए, पर अपने पोते की जान बख्श दीजिए. मैं उसे बहुत चाहता हूं, पर इतना नहीं कि उसे हमेशा अपने पास रखूं. मैं आपकी तरह स्वार्थी पिता नहीं हूं.”

राजा साहेब के प्रेत ने कहा, ‘‘चलो, मैं मान लेता हूं कि मैंने पिता का फर्ज नहीं निभाया. बिना मेरी देखभाल के तुम बड़े हो गए? बिना मेरा अन्न खाए तुम बड़े हुए? ये बताओ तुमने बेटे होने का क्या फर्ज निभाया?”

यह सुनते ही विश्वमोहन चुप हो गया. यह देखकर राजा साहेब का प्रेत भयंकर अट्टहास करने लगा. झूला और तेजी से झूलने लगा. राजा साहेब की निगाहें एकटक उसे घूरने लगीं. उन्होंने अपने दोनों पथरीले पंजे उसकी गर्दन की तरफ बढ़ा दिए.

विश्वमोहन ने कोई प्रतिरोध नहीं किया. राजा साहेब की उंगलियां विश्वमोहन की गर्दन पर कसने लगीं. विश्वमोहन की नसों में उबाल आ गया. शरीर के भीतर गहरा दबाव उत्पन्न हुआ और देखते ही देखते उसका पेट फट गया. आंखों के किनारे से खून निकल आया. खून के फव्वारे छिटक कर राजा साहेब के चेहरे पर जा पड़े. झूला थमने लगा.

वृत्त के अंदर सुरक्षित जनमेजय ने श्रीकंठ से पूछा, “ये पिशाच हमारे पास क्यों नहीं आ पा रहे.”

“इस संसार में ये पिशाच भिन्न से संचालित हैं. अभी हम एक बीजातीत संख्या (transcendental number) के निरूपण पर खड़े हैं. कोई भी समीकरण इस संख्या को व्यक्त नहीं कर सकता है. इसलिए भिन्न इसे छू भी नहीं सकता. वृत्त की परिधि और व्यास का तुलन. यह पाई (π) है. जब तक हम इस अपरिमेय बीजातीत संख्या के साथ हैं, भिन्न में कोई भी ताकत हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती है.” श्रीकंठ ने कहा.

“हमें यहां कब तक रहना होगा?”

“जब तक विश्वमोहन यहां न आ जाए. भिन्न में उसकी मौत नहीं हो सकती. वह यहां कैद हो सकता है, पर मर नहीं सकता. बिना मरे कोई भिन्न का निवासी नहीं बन सकता.”

जनमेजय ने देखा कि झूला रुक गया है और विश्वमोहन बाहर निकलकर गिर चुका है. उसने जोर से आवाज लगाई, “विश्वमोहन! जल्दी आओ.”

इधर परेशान श्रीकंठ बुदबुदाए, “मैं समझ गया. यहां से निकलने के लिए एक ही तरीका है, परिमेय की सहायता से अपरिमेय की तरफ पहुंचना.’’ ऐसा कहकर श्रीकंठ ने आंखें बंद करके कुछ मंत्रणा की.

“मतलब वे हमें बाहर नहीं जाने देना चाहते. अंश से हर का तुलन. परिमेय से अपरिमेय का गठबंधन. पूर्ण से अनंत की ओर…” कहकर श्रीकंठ ने जनमेजय से पूछा, ‘‘सोचो, क्या कोई ऐसी विधि है जिससे हम भिन्न के सहारे अपरिमेय संख्या बना सकें?”

“क्या कोई दूसरा रास्ता नहीं है?” जनमेजय ने लाचारी से पूछा.

“है, पर उसका निरूपण मुझे नहीं पता. क्या तुम 9 का घनमूल ज्यामिति से निकाल सकते हो?”

झुंझलाकर न कहते हुए जनमेजय ने अधीर होकर पूछा, “और कोई रास्ता?”

‘‘ज्यामिति की सहायता से एक न्यूनकोण को तीन भागों में बांटना.”

“आप किसी सम्मिश्र संख्या के प्रयोग से कुछ कीजिए न!” कहकर जनमेजय बदहवासी से विश्वमोहन की तरफ देखने लगा. लहूलुहान विश्वमोहन घिसटता हुआ उनके वृत्त की तरफ घुटनों के बल आ रहा था. श्रीकंठ ने जल्दी-जल्दी भूमि पर और बड़े वृत्त बनाने शुरू किए, कुछ इस तरह कि बड़े वृत्त की त्रिज्या पुराने वृत्त का व्यास हो, ताकि वे दोनों घायल विश्वमोहन की ओर तेजी से पहुंच सकें. सारे पिशाच वृत्त के बाहर खड़े होकर दांत किटकिटा रहे थे.

तनावग्रस्त सोच में डूबा जनमेजय अचानक हड़बड़ाते हुए चिल्लाया, “मुझे इसका हल मिल गया.”

“क्या?” बारिश के शोर में श्रीकंठ ने चिल्लाकर पूछा.

“वितत भिन्न! हम हर संख्या तक किसी वितत भिन्न से पहुंच सकते हैं.”

जनमेजय ने कहा, “वितत भिन्न (continued fraction) से हम अपरिमेय संख्या बना लेंगे.”

‘‘कैसे?” श्रीकंठ ने अविश्वास से जनमेजय की तरफ देखा.

जनमेजय ने श्रीकंठ के हाथों से लकड़ी लेकर वृत्त के अंदर एक सम-पंचभुज बनाया. फिर उसने पंचभुज के सभी विकर्णों को मिलाया. इस तरह वह एक सितारा जैसी आकृति बन गई. “इन विकर्णों से बने पंचभुज से हम ऐसा सितारा फिर बनाएंगे. फिर उसके बीच बने पंचभुज से फिर ऐसा सितारा…”

श्रीकंठ जनमेजय के दिए गए हल को विचारने लगे. जनमेजय ने समझाया, “अगर हम इस सितारे के बाहरी त्रिभुज की भुजा को 1 मान दें, इस वृत्त की जीवा φ +1 होगी. यह φ कुछ और नहीं बल्कि एक वितत भिन्न है, जो परिमेय से निरूपित हो सकता है. इसका मान अपरिमेय संख्या है.”

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जनमेजय की बात सुनकर श्रीकंठ सोच में पड़ गए.

जनमेजय ने कहा, “इसे समीकरण के हल से अपरिमेय संख्या मिलेगी, जो कि फिबॉनकी संख्याओं के क्रमबद्ध भिन्न के बराबर बनेगी. दीपू की डायरी के आखिरी पन्ने पर यही फिबॉनकी संख्याएं थीं. लेकिन वह इसके निरूपण तक नहीं पहुंच पाया था.’’

श्रीकंठ ने आंखें मूंदीं और कुछ बीजमंत्रों का पाठ किया. घबराए जनमेजय ने पूछा, ‘‘पिशाच विश्वमोहन पर हमला क्यों नहीं कर रहे?”

बंद आंखों से श्रीकंठ ने उत्तर दिया, “उन्हें इसकी जरूरत नहीं.”

लहूलुहान, किसी तरह घिसटता हुआ, विश्वमोहन वृत्त के अंदर आ पहुंचा. आंखें खोलकर श्रीकंठ ने जनमेजय के कहे अनुसार वृत्त के अंदर पांच नोक वाला सितारा बना दिया :

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विश्वमोहन के वृत्त में प्रवेश करते ही सितारे की एक भुजा पर श्रीकंठ, उसी रेखा पर दूसरी तरफ के निकले त्रिभुज की भुजा पर जनमेजय खड़े हो गए. बीच के रेखाखंड में तड़पते विश्वमोहन को लिटा दिया गया. ऐसा करते ही भिन्न के आकाश में बहुत तेज ध्वनि हुई. मानो इंद्र का वज्र चमका. एक साथ दसों बिजलियां कड़कीं. जनमेजय, विश्वमोहन और श्रीकंठ तीनों ने देखा कि सामने आकाश में पांच सफेद बालों वाली वृद्धाएं एक साथ खड़ी हैं. सभी एक दूसरे की प्रतिछाया. उनके चेहरे पर निर्मल कांति और मंद मुस्कान है. वे कहीं से भी भयावनी नहीं लग रहीं. श्रीकंठ ने सौम्य रूप में पाकर उन योगिनियों को शीश झुकाकर प्रणाम किया. जनमेजय और विश्वमोहन ने भी श्रीकंठ का अनुकरण किया. मुस्कुराती योगिनियों ने अपने दाहिने हाथों को अनुग्रह की मुद्रा में उठाया. अचानक बीच में खड़ी दो वृद्धाएं हटने लगीं, मानो उनके पीछे कोई छुपा हो. कोई दुर्लभ पुष्प, कोई विरल मणि, कोई अज्ञात जिसके दर्शन अभी होने ही वाले हों. तभी भयंकर ध्वनि हुई और सब कुछ शून्य हो गया.

आठ

दशमलव

ज्ञान दूर कुछ, क्रिया भिन्न है,
इच्छा क्यों पूरी हो मन की,
एक दूसरे से न मिल सके,
यह विडंबना है जीवन की.

— रहस्य, कामायनी, जयशंकर प्रसाद

होश आने पर सबसे पहले श्रीकंठ ने देखा कि तीनों किले के बाहर वाली खाई में पड़े हुए थे. उसने विश्वमोहन और जनमेजय को झिंझोड़कर उठाया.

श्रीकंठ ने कहा, ‘‘योगिनियों की तुम पर कृपा रही. अब कोई विशेष चिंता की बात नहीं.’’

कृतज्ञ विश्वमोहन ने दोनों हाथ जोड़कर कहा, “आपकी कृपा के बिना यह संभव नहीं था.’’

चैन की सांस लेते हुए श्रीकंठ ने कहा, “सम्मिलित प्रयास रहा. जनमेजय ने ही बाहर निकलने का रास्ता बताया. वैसे जनमेजय, तुमने देखा कि भिन्न के आकाश में जो पक्षी थे, वे युग्मों में थे?”

जनमेजय ने कहा, ‘‘जी, बहुत कुछ विविध युग्मों में थे. मैं समझ नहीं सका.’’

‘‘वे नाचते पत्थर, वे शिकारी गिद्ध, वे पिशाच के झुंड कुछ अतिसम्मिश्र संख्याओं (hypercomplex number) में गुणित-विभाजित हो रहे थे. भिन्न में जाने और बाहर निकलने के बहुत से रास्ते होंगे, जो इन संख्याओं से निर्धारित होंगे. मुझे और सीखना पड़ेगा. अभी यह बताओ लकुलेश्वर का शव कहां मिल सकता है?”

खाई में भयंकर दुर्गंध आ रही थी. मौत के मुंह से वापस लौटे विश्वमोहन ने वहशत में तर्जनी से गंदले पानी की ओर इशारा करके बताया, “वहीं कहीं होगी लकुलेश्वर की लाश वाली बोरी.’’

श्रीकंठ उसकी तरफ टकटकी लगाकर दुर्गंध की जरा भी परवाह न करते हुए उन दोनों को निर्देश देते हुए बोले, “जनमेजय, तुम विश्वमोहन को लेकर महल चले जाओ.”

“आप?” जनमेजय ने पूछा, लेकिन श्रीकंठ ने कोई उत्तर नहीं दिया.

जनमेजय चुपचाप पस्त विश्वमोहन को लगभग कंधे का सहारा देते हुए ऊपर चढ़ने लगा.

“क्या तुम्हारे पेट से खून बह रहा है?” जनमेजय ने पूछा.

विश्वमोहन ने कराहते हुए कहा, “न… बस पेट बुरी तरह दर्द कर रहा है. मानो कभी भी फट जाएगा.”

‘‘हौसला रखो.” यह कहते हुए जनमेजय उसे सहारा देते हुए किले के अंदर ले चला. उसने घाटी में झांक कर देखा. कहीं से धुआं-सा उठ रहा था.

अभी सवेरा होने में कुछ समय था. दर्द से परेशान विश्वमोहन को उसके कमरे में लिटाकर जनमेजय चंदन के कमरे में पहुंचा. चंदन गहरी नींद में था. नौकरों ने उसे रात की दवाई दे दी थी.

वापस आकर जनमेजय बैठक में बैठा रात के बारे में सोच ही रहा था. बैठे-बैठे न जाने उसे कब नींद आ गई.

सुबह नौकरों के शोर से उसकी नींद खुली. घड़ी में नौ बज रहे थे. अनिष्ट की आशंका से जनमेजय झट से उठकर विश्वमोहन के कमरे में गया. मनहूस निस्तब्धता में नौकर-चाकर हाथ बांधे खड़े थे. चंदन चुपचाप खामोशी से आंखें मूंदे विश्वमोहन को देख रहा था. जनमेजय ने विश्वमोहन की नब्ज देखी. इस पर नौकरों ने बताया कि कुछ देर पहले ही चंदन ने उन्हें बताया कि विश्वमोहन चल बसे. जनमेजय इस सत्य से जूझ ही रहा था कि अचानक बाहर से आती किसी स्त्री की आवाज आई, “विश्वमोहन, विश्वमोहन… आय एम हिअर… विश्वमोहन.” कमरे में अंदर आते ही उस स्त्री को माजरा समझ में आया. वह चीख मारकर वहीं गिर पड़ी. चंदन ने पलटकर देखा और अपनी मां के पास जाकर चुपचाप लिपट गया. बेहाल जूलिया सिसकने लगी.

जनमेजय ने पुलिस को सूचना दी. चूंकि कोई सुसाइड नोट नहीं मिला, इसलिए लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. जनमेजय ने पुलिस में बयान दिया कि विश्वमोहन अपने बेटे की बीमारी और पारिवारिक परेशानियों से जूझ रहा था. गई रात को वे दोनों किले के बाहर घूमने निकले थे और वापस आकर जनमेजय अपने कमरे में अकेला सो गया था.

चंदन की तबीयत सुधरी हुई लग रही थी, लेकिन आयुर्वेदाचार्य श्रीकंठ का कहीं कोई नाम-ओ-निशान न था. शाम को विश्वमोहन का विधिवत दाह-संस्कार किया गया. चिता की लपटों को देखते हुए जनमेजय को विश्वमोहन के बुरे सपने की बात याद आई. उसने मन ही मन सोचा कि राजा साहेब ने आखिर अपना बदला ले लिया. विश्वमोहन ने अपनी जान देकर अपने बेटे की जान बचा ली. शायद योगिनियों के अनुग्रह से विश्वमोहन को मुक्ति मिली और साथ ही उसकी भयानक मौत वाला सपना सच न हुआ.

जूलिया को भी चंदन के बचने की उम्मीद न थी, पर विश्वमोहन के श्राद्ध के बाद चंदन की तबीयत दुरुस्त होती गई.

जनमेजय छह महीने बाद वापस चंदन सिंह राठौड़ के महल आया. जूलिया चंदन की जान बचने से बहुत खुश थी. उसने भारत में ही रुकने का फैसला किया था.

जूलिया के सामने ही चंदन ने जनमेजय से एक बार फिर नदी पर नौका-विहार करने की जिद की. लेकिन जनमेजय ने मना कर दिया. बातों में बहलाकर जनमेजय अकेले ही चंदन को लेकर किले में ही घूमने निकला. चंदन ने जनमेजय की उंगली पकड़ी और दूर इशारा किया. मैली-कुचैली काली साड़ी में वही बुढ़िया भिखारिन बैठी हुई थी. उसे बिना कुछ कहे जनमेजय चुपचाप चंदन को लिए वहां से गुजर गया. पुराने खंडहरों, सागवान और पीपल के पेड़ों से चंदन का परिचय कराते हुए जनमेजय उसे साथ लिए आगे बढ़ता रहा.

शीशम के पेड़ों के पास से गुजरते हुए चंदन ने जनमेजय से कहा, ‘‘चाचा जी, मां ने यहां एक स्कूल में मेरा नाम लिखा दिया है.”

“बहुत अच्छा!”

“मां हिंदी भी सीख रही है.”

जनमेजय सुनकर मुस्कुराया. “अच्छा, ये बताओ क्या पढ़ाई हो रही है स्कूल में आजकल?”

“बहुत कुछ.’’

“गणित पसंद है तुम्हें? उसमें क्या पढ़ रहे हो?”

“भिन्न को दशमलव में बदलना.” चंदन ने मुस्कुराकर कहा.

यह सुनते ही जनमेजय ने उसे गोद में उठा लिया और महल की ओर वापस चल पड़ा. जूलिया उन दोनों को वापस आता देखकर मुस्कुरा रही थी.

***

प्रचण्ड प्रवीर कथा और दर्शन के इलाके में सक्रिय हैं. हिंदी और अंग्रेजी दोनों में लिखते हैं. हिंदी में एक उपन्यास, एक कहानी-संग्रह और सिनेमा से संबंधित एक किताब ‘अभिनव सिनेमा’ शीर्षक से प्रकाशित है. ‘सदानीरा’ के लिए गए दिनों उन्होंने विश्व कविता से कुछ अनुवाद भी किए हैं. उनसे prachand@gmail.com पर बात की जा सकती है. यह वृत्तांत ‘सदानीरा’ के 18वें अंक में पूर्व-प्रकाशित.

2 Comments

  1. Kaustubh June 14, 2018 at 3:30 pm

    Ultimate…
    I haven’t read much books, but this one is really worth reading (for me it’s once in a lifetime experience)….
    The story is really intriguing….
    It’s gonna bind you till the last paragraph….
    An out of the world story that combines your entire life knowledge (for me it is..I don’t know about anyone else)….

    “””THE AUTHOR HAS REALLY CREATIVE MIND TO COMBINE THE KNOWLEDGE THAT NO ONE BELIEVE’S AND THE KNOWLEDGE THAT EVERYONE HAS LEARNT….”””

    A drive of mathematics (((a solution to every existing and non-existing problem))) with the sparkle of 90s thriller of kings and their long lost myths with the reality of this world…..
    It’s like you have gone back into 80-90s horror movie….
    It’s truly amazing…some words in hindi made me think of my schooldays…
    Thank you so much Mr. Prachand Praveer for this awesome story..
    Keep writing and inspiring…

    Reply
  2. भैरवी July 8, 2018 at 8:11 pm

    शायद यही दुनिया थी जिसमें फर्मैट ने अंकों पर चिंतन मनन करते हुए अपना ध्यान खो दिया था। बॉर्जेस तुम पर गर्व करते।

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