कविता ::
अरुणाभ सौरभ

Arunabh Saurabh hindi poet
अरुणाभ सौरभ

चंद्रगंधर्व की अप्सरा

मंगलाचरण

भूलोक
भुवर्लोक
स्वर्गलोक
और आकाश से पाताल तक
अंतरिक्ष और ब्रह्मांड की
समस्त शक्तियों से प्राप्त सुंदरता
प्रकृति बनकर या प्रकृति से प्राप्त
ऊर्जा के रूप में विद्यमान है
एक ही नाम—
सुंदरतम
दिव्य
अलौकिक स्त्री—
अप्सरा…
एक ही नाम—
मंगलमयी अप्सरा

सुमिरन करो कि
प्रकट हो जाए अप्सरा
अप्सरा आए तो
गुलाब का फूल देना
गुलाब का इत्र देना
पान देना
उसे साधकर और
उसे प्राप्त कर
थोड़ा और
बेहतर हो सकेगा संसार

यहागच्छ

गंधर्वों की संगिनी अप्सरा
गंधर्व और अप्सरा
यानी पुरुष और प्रकृति
कला और कलाकार
नितांत रूपवती स्त्री
यूनानी ग्रंथों की निफ़
केवल इंद्र की सुकुमार मोहक प्रहरण
या आह्लादिनी नहीं
जल-थल में विराजने वाली
हाथ में जल से भरे हुए पात्र लेकर
तालाबों में पक्षियों के रूप में तैरने वाली
जंगली जलाशयों में
नदियों में
समुद्र में
समुद्र के भीतर
वरुण लोक में
कला सौंदर्य की देवी अप्सरे
प्रथमतः प्रकट होकर
कलाहीन धरती को
सौंदर्यमय कर दो

तुम्हें साधना
कविता में संभव नहीं
रसायन किया तंत्र से
हमारे लोकतंत्र को सुरक्षित रखने
इस अंधकारपूर्ण धरा को
अनिंद्य सुंदरता से जगमग कर दो

यहतिष्ठ

शांत जल में
कंकड़ मारने भर
विक्षोभ उत्पन्न कर रही थी मेरी कविता
जिससे कोई और काम नहीं लिया जा सकता

जलाशय, नदी, समुद्र और अन्य जल तटों पर
जाने को व्याकुल हो मन
या जल देव के महल में
कि किसी जल तट पर
अश्वत्थ और न्यग्रोध वृक्षों पर झूले झूलती
कर्करी वाद्य की मीठी धुनों संग
आभासी जादुई स्पर्श
और उस शक्ति में खो जाता
मम से ममेतर
अहम से इदम
न माया न ब्रह्म
न छल न छद्म
दिव्य अनुपम स्त्री
जिसकी शक्ति के आगे नतसिर
फ़ारसी की हूरी
अरबी की हवरा
संस्कृत की अप्सरा
दुनिया की हर भाषा के कवियों की प्रेयसी

हरेक पुरुष के अंतस और
चेतना के काग़ज़ पर
आदि-अनादि काल से
लिखा है एक स्थायी नाम
अप्सरा
संसार में सौंदर्य और कला की देवी
जैसे वीणा पर पखावज की संगत
जैसे बाँसुरी पर तबले की थाप
राग-थाट में बंदिश

कि लिखना चाहता था
क्षुधातुर व्याकुल तप्त धरा
सम्मुख प्रकट थी
चंद्रगंधर्व की अप्सरा
चिर साधना रत
पीत कक्ष में
पीत वस्त्र में
शुक्र रात्रि में
गुप्त

चरवैति

साधना के ग्यारहवें दिन
चहुँओर ग्यारह गुलाब पुष्प
पूजा की थाल में
गुलाबी इत्र से उन्मत्त
नशे में डूबा कक्ष
स्फटिक माला पर मंत्रोच्चार
अप्सरा साधना मंत्र अनवरत
स्फटिक माला की चमक
टुकड़े में मेरे चेहरे पर
और चहुँओर
क्षीण प्रकाश संग
रिलमिल-रिलमिल
दीये की बाती की लौ
और मेरी आँखें
साथ-साथ जल रहीं
और मैं रत…
मैं रत… रत… साधनारत…
मंत्र की गूँज होंठों से

बाहरी डरावनी आवाज़ से अलग
शुक्र रात्रि किसी न्यायाधीश की तरह
न्याय करती रही
वैशेषिक नैयायिक दार्शनिक की तरह

केवलम्

मैं और मेरी दुनिया के तमाम लोग
भूख से व्याकुल
प्यास से व्याकुल
शरीर को अनथक यात्रा से
वापस लाते हैं धीरे-धीरे
कामना इतनी कि सुरक्षित रहें
ख़ुशहाल रहें
देश-दुनिया के लोग
एकमात्र इच्छा
कि सबको अन्न-वस्त्र-गृह
कम-से-कम
मैं और मेरे साथी
तंत्रसाधनालीन
तंत्र-मंत्र, जादू-टोना
केवल वाह्याचार
केवल पापाचार
केवल व्यभिचार
केवल चमत्कार
संसार के लिए
पर
सुंदरतम कविता के लिए
अन्न पानी तेल के लिए
चाहिए
सीमाहीन प्रेम
उन्मुक्त वसुंधरा

आरोहन

पंछियो के कलरव ने
झरने के पानी में
उड़ेल दिया गीत
उस पानी को पीकर
किसी पेड़ के नीचे
आराम कर सके बाट-बटोही

श्वेत हिमालय की काली कंदरा
संयम और धैर्य सीमाहीन
परीक्षा जल-पात्र की
अग्नि-पात्र की
आकृष्ट करती रही
चरम आकर्षण से
कि होंठों ने दुहराया—
‘मुक्त करो अप्सरे
मुक्ति दो
चरम अंधकार से

कट विकट मारकाट से
अपराध से
षड्यंत्र से
अतिरेक से
एकल सम्राट से
भयभीत प्रजा को मुक्ति
मानुस भेद हरो
हमारे जलते वर्तमान पर
वर्षाजल-सी बूँद- बूँद टपक जाओ’

अकाल मृत्यु हमारे
समय की कविता का
सबसे भयानक शब्द
और आत्महत्या
सबसे त्रासद यथार्थ
महत्त्वहीन श्रम
ज्ञान ऋणात्मक
अप्रभावी गणनायक
निरर्थक गणतंत्र
व्यर्थ सारे मुद्दे
प्रलापमात्र राजनीति
असत्य दूरदृष्टि
हर ग्राम व्याकुल
हर नगर में घमासान
हर जनपद अशांत
महाराजाधिराज सात समुद्र पार
अर्थ-समाज-न्याय-तंत्र
अस्त-व्यस्त-पस्त

आवाहनं

आओ अप्सरे
हमारे वर्तमान में
केवल उन्माद है
केवल हिंसा
केवल अपराध
केवल षड्यंत्र
केवल अतिरेक
केवल अंधकार
जाति से
धर्म से
लिंग से
नस्ल से
निरंकुश सत्ता के अनुचरों से
पद दलित जन के प्राण को
अंतस के आलोक से
जगमग कर दो
ओ चंद्रगंधर्व की अप्सरा

कौलिक क्रिया या कौलाचार
कोई विकल्प नहीं
पर क्या करूँ कौलाचार या कविता
और हमने कविता को हथियार बनाया

साधना का अंतिम क्षण
सारी सामग्री अर्पित कर
असंख्य प्राप्ति के निमित्त
बुदबुदाते मंत्र
उस गंधर्व की संगिनी को साधने
जिस गंधर्व ने
पृथ्वी को दिया संगीत
जिस गंधर्व के
नृत्य और गायन कौशल से
आलोकित धरा
अग्नि गंधर्व की नहीं
जलवायु गंधर्व की नहीं
चंद्रगंधर्व की अप्सरा
अप्सरा केवल मेनका रंभा उर्वशी नहीं
जिसके लिए अपव्यय हो
समस्त कवियों की ऊर्जा
क्रीतस्थली, पुंजीकस्थला
प्रम्लोचा नहीं
धृताची, वर्चा नहीं
पूर्वचिति और तिलोत्तमा नहीं
अनुचना-अंबिका-अलम्बुषा नहीं

चंद्र ज्योत्सना
शुभवसना मुक्तकुंतला
चंद्रगंधर्व की अप्सरा

स्वस्थानम्

मारण, मोहन, स्तंभन, विद्वेषण,
उच्चाटन, वशीकरण, आकर्षण
अप्सरा साधना का
रसायन क्रिया तंत्र
अप्सरे
अप्सु सरति गच्छीति
कि हमारे आस-पास
या तो जल-बूँद पाने को
तड़प रहे हैं जल और वन प्राणी
या जल-प्रलय से आप्लावित

कविता में सूर्य
व्यवहार में चंद्रमा
षोडशी शृंगारमयी
चट्टानी इच्छाशक्ति
आकाश-सी विस्तृत
ओजस्विनी
श्वेतस्विनी
उर्जस्विनी
वीरागुने
वीरांगना
सुवासिनी
जिसके सुवास से
वाष्पित था हिम
जिसके प्रभाव से
प्रकृति अपने राग में गाती थी
जिसके अनुराग से
जलवायु परिवर्तन
जिसकी अनिंद्य सुंदरता पर
मुग्ध था वायुमंडल
लिखना चाहता था सीताघड़ा
लिखना चाहता था वाग्धरा
सामने प्रकट हो गई चंद्रगंधर्व की अप्सरा

आओ अप्सरे मुझे सँवारो
और बेहतर
और वृहत्तर मानुस-सा

कैवल्य

कौलाचार में
उस गंधर्व-लोक में
जिसके गायन
और नृत्य-कौशल के सम्मुख
देवगण समर्पित
मंत्रमुग्ध संसार
जिससे कला माँगता हो
जिसने संसार को कला दी
और दिया मुक्ति का संकल्प

चंद्रगंधर्व की संगिनी
चंद्रगंधर्व की अप्सरा
आओ कि,
प्रेम, करुणा और सुंदरता से
जगमग कर दो
जन-जन जीवन

आओ कि,
कलाओं की लीलाभूमि मेरा देश
इतिहास में
कई बुरे पन्ने जोड़ रहा है
जिसमें मेरे संसार के हर पौधे को
जड़ से उखाड़कर
मेरे लोक में
हाहाकार और त्राहिमाम
मात्र चलने दिया जाएगा
रक्त रक्त रक्त
रक्त से पटी धरा
रक्तलोलुप शक्तियों का
खेल खेल खेल
रक्त पिपासुओं ने
कर रक्तरंजित धरा
जाओगी कहाँ
इसी संसार में रहो
शापित जीवन जियो
चंद्रगंधर्व की अप्सरा!

अरुणाभ सौरभ (जन्म : 9 फ़रवरी 1985) हिंदी-मैथिली के सुपरिचित कवि-लेखक और अनुवादक हैं। उनकी सात से अधिक किताबें प्रकाशित हैं। वह इन दिनों भोपाल में रह रहे हैं। उनसे arunabhsaurabh@gmail.com पर बात की जा सकती है।

2 Comments

  1. Neelesh Kumar October 6, 2019 at 1:47 pm

    मित्र को बहुत बहुत बधाई।
    खासकर कविता के शीर्षक सम्बन्धी जो प्रयोग हैं वो बिल्कुल नया है। अरुणाभ ने पिछले दिनों में लम्बी कविताओं को काफी बेहतर तरीके से संभाला है।नए कवि लम्बी कविता को लिखने की कोशिश तो करते हैं पर कविता उनसे फिसल कर कहीं और चली जाती है।अरुणाभ की कविता फिसलती नहीं है बल्कि एक ठोस वैचारिक आग्रह लेते हुए है और इस आग्रह में विचार कहीं से लादे नहीं दिखाई पड़ता बल्कि धमनियों में बहनेवाले रक्त की तरह शामिल है।

    Reply
  2. Mukhtar Alam October 6, 2019 at 2:03 pm

    अत्यंत भावपूर्ण शानदार कविता।

    Reply

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