डायरी ::
रुस्तम

Rustam Singh in Sweden 2--2012
रुस्तम

मनुष्य लंबे समय से यह दावा करता आया है कि वह अन्य सभी प्राणियों से ज़्यादा बुद्धिमान और समझदार है। धार्मिक विचारक, दार्शनिक व वैज्ञानिक इस बात पर सहमत रहे हैं और अब भी हैं। लेकिन मनुष्य ने इस बात का कोई प्रमाण नहीं दिया। मनुष्य का इतिहास तरह-तरह के कारणों से की जाने वाली हिंसा व मारकाट से अटा पड़ा है। जाति-पाति और कई तरह की ऊँच-नीच के भेदभाव भी मनुष्य ने ही पैदा किए हैं। अब वैज्ञानिक ख़ुद कह रहे हैं कि पृथ्वी पर जीवन नष्ट होने की कगार पर है और कि ऐसा मनुष्य के क्रिया-कलापों की वजह से ही हो रहा है, दूसरे प्राणियों की वजह से नहीं। तो फिर मनुष्य अन्य प्राणियों से ज़्यादा बुद्धिमान और समझदार कैसे हुआ? लगता तो यह है कि वह उनसे ज़्यादा मूरख है।

31 मई 2017

साहित्य और कलाओं में हमारी रुचि किस स्तर की है, इससे भी यह तय होता है कि हम कैसा लिखेंगे। उदाहरण के लिए, यदि हमारी प्रिय फ़िल्में हॉलीवुड या बॉलीवुड की फ़िल्में हैं, या हम रोज़ टी.वी. पर आने वाले निम्नस्तरीय सीरियल देखते हैं, तो निश्चित ही हम बहुत उच्च-स्तरीय कविता, कहानी या उपन्यास वग़ैरह नहीं लिख पाएँगे, ऐसा मुझे लगता है।

27 जून 2017

मनुष्य कितना हास्यास्पद प्राणी है कि उसने धर्म, ईश्वर, स्वर्ग, नर्क जैसी अवधारणाओं को जन्म दिया है। किसी और प्राणी ने भी ऐसी अवधारणाओं को जन्म दिया है, मैंने कभी सुना-पढ़ा नहीं। मैं कभी-कभी सोचता हूँ कि जब दूसरे प्राणी मरते हैं तो वे किस स्वर्ग या नर्क में जाते हैं!

28 जून 2017

संसद, विधानसभाओं और चुनावों का यह अर्थ नहीं हो जाता कि यहाँ लोकतंत्र है। ये चीज़ें सिर्फ आवरण भर हैं। इनके पीछे कुलीनतंत्र है और 1947 से यहाँ कुलीनतंत्र ही रहा है। असली बात यह है कि दुनिया में कहीं भी अब तक वास्तविक लोकतंत्र नहीं आया। हर उस देश में जहाँ लोकतंत्र का दिखावा है, सत्ता और शासनतंत्र कुलीन वर्ग के हाथों में ही रहा है और अब भी है। लोकतंत्र आने में अभी बहुत समय लगेगा, यदि उसे आने दिया गया तो।

19 सितंबर 2017

भोजन सिर्फ़ मनुष्यों को ही चाहिए, अन्य प्राणियों को नहीं! सुख-सुविधाएँ सिर्फ़ मनुष्यों को ही चाहिए, अन्य प्राणियों को नहीं! पूरी पृथ्वी मनुष्य के लिए ही बनी थी, अन्य प्राणियों के लिए नहीं! अन्य प्राणियों की क्या ज़रूरत है, हम जो हैं!

21 सितंबर 2017

ईश्वरों की कल्पना यदि की जानी चाहिए तो केवल इस तरह कि उनके बारे में सोचकर मनुष्य अपने जीव रूप से ऊपर उठ सकें। अब केवल उनसे कुछ माँगने के लिए ही उन्हें याद किया जाता है, मानो वे कोई ख़ज़ाना बाँटने को तैयार बैठे हों। फ़िलहाल ईश्वरों के साथ यहाँ सिर्फ़ लेन-देन का रिश्ता है। आप हमें ये दें, हम आपको ये चढ़ाएँगे। लेन-देन तो सिर्फ़ मनुष्यों के बीच होता है। मनुष्य ने ईश्वरों जैसा बनने की बजाय, ईश्वरों को भी अपने जैसा बना लिया है!

22 सितंबर 2017

जीवन से मुक्ति ही निर्वाण है और वह मृत्यु से ही प्राप्त होता है। निर्वाण का अर्थ है—बुझ जाना, यानी अंत हो जाना।

इसलिए जीवन का अंत ही निर्वाण है। इसके अलावा और कोई निर्वाण नहीं। जीवन ही दुख, कष्ट और इच्छा का स्रोत है। इसलिए उसका बुझ जाना ही निर्वाण है।

24 सितंबर 2017

धर्म का एक काम हमें दूसरों के प्रति संवेदनशील बनाना है, लेकिन भारत में गाड़ियों के शोर के बाद सबसे ज़्यादा शोर प्रदूषण धर्म द्वारा ही पैदा किया जाता है।

24 सितंबर 2017

इस जगत् और इस जीवन का अपने आपमें कोई अर्थ नहीं है। न ही किसी ने इन्हें बनाया है। ये अपने आप ही पैदा हुए और बने। यदि कोई कहता है कि इन्हें बनाया गया या इनका कोई अर्थ है तो वह झूठ बोल रहा है या हमें मूर्ख बनाने की कोशिश कर रहा है। हाँ, यदि मनुष्य चाहे तो अपने कामों द्वारा अपने जीवन को कोई अर्थ दे सकता है, जैसा बहुत लोग करते भी हैं। पर यह ज़रूरी नहीं। करोड़ों लोग आए और जैसा-तैसा जीवन बिताकर चले गए।

27 सितंबर 2017

धार्मिक किताबों को यह जानने के लिए नहीं पढ़ा जाना चाहिए कि उनमें क्या लिखा है, बल्कि यह जानने के लिए पढ़ा जाना चाहिए कि उनमें क्या नहीं लिखा जाना चाहिए था।

28 सितंबर 2017

सभी सभ्यताएँ लोगों, पशुओं और पृथ्वी के शोषण तथा दमन पर आधारित थीं। यह सभी तथाकथित महान सभ्यताओं का वह छुपा हुआ पक्ष है जिसकी शायद ही कोई चर्चा करता है।

28 सितंबर 2017

सभ्यताएँ हमें यह दिखाती हैं कि कैसे पृथ्वी पर मनुष्य का वर्चस्व बढ़ा और मनुष्यों पर शासक वर्गों का।

29 सितंबर 2017

पृथ्वी सिर्फ़ युद्धों और हाथियारों की वजह से ही नष्ट नहीं हो रही। उसके नष्ट होने का एक मुख्य कारण है—जीवनयापन का वह स्तर जो कुछ सदियों से बहुत से मनुष्य बनाए हुए हैं। ज़ाहिर है कि मैं यहाँ ग़रीब लोगों की बात नहीं कर रहा। दूसरा मुख्य कारण है कि मनुष्यों की जनसंख्या जो इतनी ज़्यादा हो गई है कि पृथ्वी के पास उसको सह सकने के लिए काफ़ी संसाधन नहीं हैं।

सन् 1600 में मनुष्यों की कुल संख्या 60 करोड़ थी। अब वह 700 करोड़ से भी ज़्यादा है। पृथ्वी इतने संसाधन कहाँ से लाएगी?

इस दौरान 1970 से लेकर अब तक जंगली जानवरों की संख्या आधी से भी कम रह गई है। उनमें से कितनी प्रजातियाँ तो लुप्त हो चुकी हैं।

29 सितंबर 2017

हम कह सकते हैं कि अन्य जीवों को केवल दो तरह की भूख लगती है—एक खाने की और एक दूसरी… और यह दूसरी भी नियमित होती है। लेकिन मनुष्य की भूखों का कोई अंत नहीं।

30 सितंबर 2017

महात्मा गाँधी के विचारों और राजनीति की उचित छानबीन होनी चाहिए। इसके बिना उनका गुणगान करते रहने का कोई अर्थ नहीं। उदाहरण के लिए, वह न केवल धर्म बल्कि वर्ण तथा जाति में विश्वास करते थे। कुछ ऐसे अवसर भी आए जब उन्होंने हिंसा का पक्ष लिया। कुछ एक बार राजनीति में उन्होंने दलितों के अहित में फ़ैसला लिया। गाँधी के साथ-साथ अंबेडकर को भी पढ़ना चाहिए।

3 अक्टूबर 2017

कविताएँ विभिन्न प्रक्रियाओं के माध्यम से लिखी जाती हैं। कई बार एक ही कवि अलग-अलग कविताओं को लिखते वक़्त अलग-अलग प्रक्रियाओं में से गुज़रता है। कुछ कविताओं को शुरू करने से पहले कवि को कुछ पता नहीं होता कि पहला वाक्य क्या होने वाला है, और उस पहले वाक्य को लिखने के बाद फिर पता नहीं होता कि अब उसके बाद क्या आएगा। लेकिन कई बार उसको लगभग पूरी तरह पता होता है कि वह क्या लिखने जा रहा है और कैसे। कुछ कविताएँ अपने आप नहीं आतीं, या केवल अनुभव पर आधारित नहीं होतीं, बल्कि बहुत शोध करने के बाद सोच-समझ कर लिखी जाती हैं। यह एक मिथक है, जिसमें बहुत से लोग विश्वास करना चाहते हैं कि सभी कविताएँ स्वतःस्फूर्त ढंग से आती हैं।

6 अक्टूबर 2017

आमतौर पर चीज़ें इतनी जटिल या रहस्यमय नहीं होतीं जितना जटिल या रहस्यमय कहकर उन्हें पेश किया जाता है—साहित्य और दर्शन भी नहीं। साहित्यक रचनाओं में साधारणतः उतनी परतें नहीं होतीं जितनी प्राय: बताई जाती हैं। यदि दर्शन की कोई पुस्तक समझने में कठिन लगती है, तो इसलिए क्योंकि या तो दार्शनिक ख़ुद उलझन में है या भाषा पर उसकी पकड़ कमज़ोर है या फिर वह जानता ही नहीं कि अपने विचारों को कैसे प्रस्तुत करना है।

9 अक्टूबर 2017

जिस व्यक्ति के पास अगला भोजन करने के लिए पैसा नहीं है, यदि वह गली में या सड़क पर आपसे कुछ पैसे माँगता है, तो पैसे दे देने चाहिए। जो लोग क्रांति में विश्वास रखते हैं, पर इस तरह की छोटी-मोटी मदद करने के ख़िलाफ़ हैं, उनका तर्क मुझे समझ नहीं आता। समानता और न्याय मैं भी चाहता हूँ, लेकिन क्रांतियाँ होने में समय लगता है। फ़िलहाल जो भूखा है, वह अभी भूखा है।

15 अक्टूबर 2017

पाठकों की टिप्पणियाँ कवि को बर्बाद कर सकती हैं। इसलिए उन्हें पढ़ लो और तुरंत भूल जाओ। कविता के बाहर पाठक और कवि में संवाद जितना कम हो, कवि के लिए उतना ही अच्छा है।

16 अक्टूबर 2017

किसी रचना विशेष का पाठक या दर्शक तभी पैदा होता है, जब वह किसी रचना को पढ़ता या देखता है। इससे पहले उसका कोई अस्तित्व नहीं होता। इसीलिए कोई भी गंभीर रचना पाठक या दर्शक के लिए नहीं रची जा सकती। यह उसी तरह है जैसे लेखक या रचनाकार उसी वक़्त लेखक या रचनाकार होता है, जब वह लिख या रच रहा होता है, उससे पहले या बाद में नहीं।

17 अक्टूबर 2017

कविता-कहानी के अधिकतर पाठकों की एक समस्या यह है कि उन्हें वही अच्छा लगता है जो उनकी धारणाओं की पुष्टि करे। जबकि (गंभीर) साहित्य आमतौर पर ऐसी धारणाओं को चुनौती देता है। इसलिए भी पाठक के प्रति उदासीन रहना चाहिए।

18 अक्टूबर 2017

जो कवि-लेखक कथ्य में या शैली में या रूप में या फिर इन तीनों में कुछ नए प्रयोग करते हैं और इन प्रयोगों के बावजूद जिनकी रचनाएँ उच्च स्तरीय बनी रहती हैं, उन्हें ही सबसे महत्वपूर्ण साहित्यकार कहा जाता है। पर कुछ साहित्यकार ऐसे भी होते हैं जो शैली या रूप में कुछ भी नया किए बग़ैर अपने कथ्य को इतना गहन या/और सूक्ष्म बना पाने की क्षमता रखते हैं कि वे अति महत्वपूर्ण रचनाकार बन उठते हैं। उदाहरण के लिए, बीसवीं सदी की अँग्रेज़ी कविता में एलियट पहली तरह के कवि थे और येट्स दूसरी तरह के।

18 अक्टूबर 2017

लोग सोचते हैं कि एक बढ़िया कवि-लेखक बनने के लिए तो साधना और स्व-प्रशिक्षण की ज़रूरत होती है, पर एक बढ़िया पाठक होने के लिए नहीं। यह केवल भ्रम ही है। असल में एक ‘शिक्षित’ पाठक ही अच्छी रचनाओं को पहचान पाता है और ऐसा बनने के लिए उसे भी साहित्यिक साधना और स्व-प्रशिक्षण की ज़रूरत होती है। ज़ाहिर है कि ‘शिक्षित’ से यहाँ मेरा मतलब उससे नहीं जो क, ख, ग पढ़ सकता है या जो सामान्य तौर पर बहुत पढ़ा-लिखा है। एक ‘अशिक्षित’ या मूढ़ पाठक उत्तम रचनाओं को पहचान नहीं पाएगा यह तय है। न ही वह उनका स्वाद जान पाएगा। दूसरी तरफ़, एक ‘शिक्षित’ पाठक निम्न स्तरीय रचनाओं को एकदम पहचान जाता है और उनसे दूर भागता है।

19 अक्टूबर 2017

वे क्या गुण हैं जो साहित्यिक रचनाओं को ‘उच्च स्तरीय’ बनाते हैं? शुरुआत के तौर पर कुछ गुणों की ओर इशारा किया जा सकता है। इनमें से सभी या कुछ गुण ऐसी रचनाओं में होते हैं :

  • ऐसी रचनाएँ ‘सेंटीमेंटल’ या लिजलिजी नहीं होतीं। यानी वे आपको उदास कर सकती हैं, भाव-विह्वल कर सकती हैं, पर वे आपको रुलाती नहीं।
  • ऐसी रचनाएँ घिसे-पिटे विचारों, धारणाओं इत्यादि पर प्रश्न उठाती हैं। वे आपको सोचने की ओर ले जाती हैं।
  • ऐसी रचनाएँ घिसी-पिटी भावनाओं से बचती हैं।
  • ऐसी रचनाओं में भाव और विचार आमतौर पर मिलकर आते हैं। वे सामान्यत: इस धारणा पर चोट करती हैं कि भाव और विचार दो अलग-अलग चीजें हैं।
  • ऐसी रचनाएँ कई बार उन दृश्यों के दर्शन भी आपको कराती हैं जिन्हें सामान्य आँखों से आप देख नहीं पाते।
  • ऐसी रचनाएँ, यदि वे कविताएँ हैं, तो लय को लेकर ज़रा भी समझौता नहीं करतीं।
  • ऐसी रचनाएँ अपने किसी भी पक्ष में ढुलमुल नहीं होतीं, हर तरह से कसी हुई होती हैं… इत्यादि।

19 अक्टूबर 2017

मैंने देखा है कि अधिकतर लोग भ्रमों में ही रहना चाहते हैं। जैसे ही आप उनका भ्रम तोड़ने की कोशिश करते हैं, वे विरोध करते हैं, शायद इसलिए कि भ्रम टूटने पर उन्हें डर लगता है। इसमें कोई शक नहीं कि वास्तविक स्थिति का ज्ञान आपको डरा सकता है। लोगों का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि ईश्वर नाम की कोई चीज़ है जो प्रार्थना करने पर संकट से उन्हें बचा लेगी। वे भूल जाते हैं कि सारी प्रार्थनाओं के बावजूद दुनिया में करोड़ों लोग हर वक़्त संकट ही में रहते हैं।

23 अक्टूबर 2017

प्राकृतिक विपदाओं को छोड़ दें तो ज़्यादातर संकट मनुष्य ही एक-दूसरे के लिए पैदा करते हैं। इसलिए मनुष्य ही अपना और दूसरों का भी संकट दूर कर सकते हैं। ऐसा चाहे वे एक-दूसरे की मदद करके करें या सरकारी नीतियों के माध्यम से। मनुष्य के अलावा कोई बाहरी सत्ता किसी का संकट दूर कर सकती है, इस धारणा को शक की निगाह से ही देखा जा सकता है।

23 अक्टूबर 2017

साहित्य का पुरस्कारों से छुटकारा हो जाए तो अच्छा रहे। इनके चलते कई साहित्यकार सोचते रहते हैं कि शायद उन्हें यह पुरस्कार मिल जाए या वह मिल जाए। पाठकगण भी सोचते रहते हैं कि इनको यह पुरस्कार क्यों नहीं मिला, वह क्यों नहीं मिला। कुछ साहित्यकार तो बेचारे कोशिश भी करते हैं कि उन्हें कोई ख़ास पुरस्कार मिल जाए। पुरस्कारों की वजह से लेखकगण कुंठाग्रस्त हो जाते हैं, एक-दूसरे से नफ़रत करने लगते हैं। वैसे भी पुरस्कार सदा किसी के लेखन की श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं होते। पुरस्कार देने वाली समितियाँ कई बार ग़लती करतीं हैं। उन्हें हमेशा पता नहीं चलता कि श्रेष्ठ क्या है और क्या नहीं। बहुत बार स्तरीय लेखन को पुरस्कार नहीं मिलता, दूसरे को मिल जाता है। पुरस्कार देने, न देने के पीछे राजनीतिक, विचारधारात्मक कारण भी होते हैं। पुरस्कार न रहें तो सबसे अच्छा।

8 नवंबर 2017

बड़े कवियों और दार्शनिकों में इतना विवेक और अनुशासन होता है कि वे चाहें तो भाषा को—उसे नुक़सान पहुँचाए बिना—तोड़-मरोड़ सकते हैं। लेकिन जब सब लोग ऐसा करने लगें तो भाषा को ‘भगवान’ ही बचा सकते हैं।

11 नवंबर 2017

कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो हिंदी में संपादन की स्थिति अत्यंत शोचनीय है। सबसे बड़ी समस्या रचनाओं के चुनाव में नज़र आती है। बहुत-सी रचनाएँ जो चुनी जाती हैं, छपने लायक़ नहीं होतीं। ऐसा संपादकों की कम समझ के कारण तो होता ही है। पर कई बार इसलिए भी होता है कि रचनाएँ ग़ैरसाहित्यिक कारणों से चुनी जाती हैं। कोई दोस्त है, किसी को ख़ुश करना है, कोई किसी समिति में बैठा है या कहीं न्यासी इत्यादि है। दूसरी बड़ी समस्या कॉपी-एडिटिंग की है। आमतौर पर रचनाएँ जैसी आती हैं, वैसी ही छाप दी जाती हैं। उन्हें सुधारने की कोशिश नहीं की जाती जो कि संपादकों का काम होता है। तीसरी समस्या है प्रूफ़रीडिंग की। प्रूफ़ की ख़ूब सारी ग़लतियाँ हिंदी की हर पत्रिका में होती हैं। हिंदी में यह लगभग मान ही लिया गया है कि ये ग़लतियाँ तो रहेंगी ही, इनसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

19 नवंबर 2017

मनुष्यों को शायद ही कभी यह समझ में आया है कि बनाने का अर्थ तोड़ना भी है; खड़ा करने का अर्थ गिराना, ध्वंस करना भी है, और सभ्यताएँ व संस्कृतियाँ पृथ्वी की क़ीमत पर बनाई गईं, वे मनुष्येतर प्राणियों की क़ीमत पर बनाई गईं; वे पर्वतों, जंगलों व नदियों की क़ीमत पर बनाई गईं, और अब समुद्रों की क़ीमत पर भी बनाई जा रही हैं।

3 दिसंबर 2017

जब से मनुष्य मनुष्य बने हैं, वे भक्षण और ध्वंस के रास्ते पर चलते आए हैं।

3 दिसंबर 2017

विद्वान व्यक्ति और ज्ञानी व्यक्ति में फ़र्क़ होता है। यह ज़रूरी नहीं कि जो विद्वान है, वह ज्ञानी भी हो… और जो ज्ञानी है उसका विद्वान होना भी ज़रूरी नहीं है। यदि आपको कोई ज्ञानी व्यक्ति टकरा जाए तो यह आपका सौभाग्य है, जबकि विद्वान व्यक्ति बहुत मिल जाएँगे। आजकल दुनिया में ज्ञान की कमी है, जबकि विद्वत्ता की भरमार है।

12 दिसंबर 2017

साहित्य में आमतौर पर ‘प्रेम’ को केंद्रीय स्थान दिया गया है। जीवन में भी लोग ‘प्रेम’ को अति महत्वपूर्ण मानते हैं। पर ‘प्रेम’ को परिभाषित करना कठिन है। वास्तव में आपको एक अच्छा साथी और दोस्त चाहिए होता है जो आपके प्रति चिंतित हो, आपकी मदद करे, और आप उसकी। दोनों के बीच यदि इस तरह का संबंध हो तो लगता है कि शायद ‘प्रेम’ भी वहाँ होगा ही।

18 दिसंबर 2017

हिंदी के ‘ज्ञानी’ शब्द में ज्ञान का जो भाव है, उसे अँग्रेज़ी में wisdom कहते हैं। Wisdom के लिए हिंदी में कोई सही शब्द नहीं है। साधारण ज्ञान के लिए अँग्रेज़ी का knowledge शब्द उचित है। इसलिए ज्ञानी शब्द में ज्ञान का जो भाव है, वह उच्च किस्म का ज्ञान है। पर उच्च किस्म का ज्ञान क्या होता है? वह ज्ञान जो भले-बुरे को ध्यान में रखता है, किसी का बुरा न हो, जिसे इस बात की चिंता रहती है—यानी नैतिक ज्ञान। इसे अंग्रेजी में ethics कहते हैं। उच्च किस्म का ज्ञान नैतिकता की भावना से ओत-प्रोत होता है। अध्यात्म में जब हम ज्ञान की बात करते हैं, तो हमारा मतलब इसी उच्च किस्म के ज्ञान से होता है, साधारण ज्ञान से नहीं। दर्शन में कुछ ही लोग इसे उच्चतम स्थान देते हैं, पर शेष नहीं, जबकि देना चाहिए।

20 दिसंबर 2017

मैंने जो गुण या अवगुण पुरुषों के स्वभाव में देखे हैं, वही स्त्रियों के स्वभाव में भी। इस मामले में दोनों में कोई फ़र्क़ नज़र नहीं आता।

24 दिसंबर 2017

आप लोगों को थोड़ा-बहुत प्रभावित तो कर सकते हैं पर उनके रूढ़ विचारों को बदलना एक अत्यंत कठिन काम है। इसीलिए ईसा, बुद्ध, कबीर, नानक जैसे व्यक्ति असफल रहे और इसीलिए आमूलचूल परिवर्तनों के लिए क्रांतियाँ करनी पड़ती हैं जो आमतौर पर थोड़े से लोगों द्वारा ही शुरू की जाती हैं। लोकतंत्रों में भी लोग अक्सर उन्हीं नेताओं को चुनते हैं जो अंतत: उनके अहित में ही काम करते हैं। आमूलचूल परिवर्तन चाहने वाला कोई भी आंदोलन पूरी तरह आम लोगों पर निर्भर नहीं कर सकता।

25 फ़रवरी 2018

हमें बचपन से ही बताया जाता है कि हमें सक्रिय होना और रहना चाहिए इस शिक्षा पर सवाल उठाया जाना चाहिए क्योंकि ‘मनुष्य की सक्रियता’ पृथ्वी को मार रही है!

1 मार्च 2018

मुझे यह सोचकर हैरानी होती है कि लोग इस तरह के उदात्त विचार के ख़िलाफ़ हो सकते हैं कि समाज में लोगों में समानता हो। अब इससे अगला विचार यह है कि मनुष्यों और दूसरे जीवों में भी समानता होनी चाहिए। यह सुनकर ज़्यादातर लोग तो बौखला ही जाएँगे!

10 मार्च 2018

सही अर्थों में बुद्धिमान वह व्यक्ति है जो दूसरों—और यहाँ ‘दूसरों’ में दूसरे लोग और मनुष्य के अलावा दूसरे प्राणी भी शामिल हैं—के प्रति संवेदनशील हो, जो आत्मकेंद्रित न हो, और जो उनके प्रति जो ग़रीब, कमज़ोर या बीमार हैं सहानुभूति या दया-भाव रखता हो। इन गुणों से रहित बुद्धि क्रूर और नष्टकारी साबित हो सकती है, अक्सर होती ही है।

11 मार्च 2018

अधिकतर धर्मों और दार्शनिकों ने मनुष्य को प्राणियों में सबसे ऊपर रखा है। मुझे यह कहने में ज़रा भी संकोच नहीं है कि वे ग़लत थे ऐसा कोई मापदंड नहीं है जिसके आधार पर प्रकृति में किसी प्रजाति के प्राणियों को दूसरों से ऊपर रखा जा सके या कोई सोपान-क्रम बनाया जा सके। यह मनुष्य का अहंकार ही है कि वह मानता है—वह शेष प्राणियों से ऊपर है।

11 मार्च 2018

मनुष्यों में सयाने वे नहीं हैं जो ख़ूब कमाते हैं, ख़ूब खाते-पीते हैं, ख़ूब बड़ी-बड़ी चीज़ें ख़रीदते हैं… क्योंकि यही लोग हैं जो पृथ्वी, पर्यावरण व दूसरे प्राणियों को तबाह कर रहे हैं।

मनुष्यों में सयाने वे हैं जो कम कमाते हैं, कम ख़रीदते हैं और कुल-मिलाकर कम में गुज़ारा करते हैं… क्योंकि पृथ्वी, पर्यावरण और अन्य प्राणियों पर वे ही सबसे कम बोझ डालते हैं।

6 अप्रैल 2018

प्रकृति को बचाने और बचाए रखने का एक ही तरीक़ा है,और वह यह है कि उसे अकेला छोड़ दिया जाए यहाँ तक कि तथाकथित ‘ईको-टूरिज्म’ को भी बंद कर दिया जाए, क्योंकि जहाँ-जहाँ मनुष्य के पैर पड़े हैं, उसने प्रकृति को नष्ट ही किया है। प्रकृति को अकेला छोड़ दिया जाए तो वह तेज़ी से वापिस फलने-फूलने लगती है।

8 अप्रैल 2018

कम से कम दर्शन की पुस्तकों में लंबे-लंबे अध्याय होना ज़रूरी नहीं है। जो विचार हमें सूझे, यदि उसमें कुछ मौलिकता है तो हम उसे लिख लें। इस प्रकार लिखे हुए बहुत से विचारों को इकट्ठा कर दें तो एक पुस्तक बन जाती है।

यह धारणा कि दर्शन लंबे लेखों या अध्यायों के रूप में ही होना चाहिए, दर्शन के प्रोफ़ेसरों द्वारा बनाई गई है। इन प्रोफ़ेसरों में से ज़्यादातर ख़ुद दार्शनिक नहीं होते। ये सिर्फ़ दर्शन पढ़ाते हैं।

17 मई 2018

मैंने देखा है कि अलग-अलग विचारधाराओं में विश्वास करने वाले और बहुत पढ़े-लिखे, विद्वान लोग भी मनुष्य की आत्म-केंद्रीयता यानी मनुष्य- केंद्रीयता (anthropocentrism)को नहीं छोड़ पाते,जबकि वास्तव में यह एक बहुत बड़ी बौद्धिक (और भावनात्मक भी) सीमा है।

26 जून 2018

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रुस्तम (जन्म : 30 अक्टूबर 1955) कवि, दार्शनिक और अनुवादक हैं। अब तक उनके पाँच कविता-संग्रह प्रकाशित हुए हैं, जिनमें एक संग्रह किशोरों के लिए कविताओं का है। अँग्रेज़ी में भी उनकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हैं। वह भोपाल में रहते हैं। उनसे rustamsingh1@gmail.com पर बात की जा सकती है।

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