डायरी ::
जे सुशील

जे सुशील | क्लिक : अनुराग वत्स

आजकल मैं ख़ुद को बहुत अकेला पाता हूँ। मुझे अकेलेपन से कभी प्रेम नहीं रहा। मैं लोगों के बीच रहने वाला आदमी हूँ। इन दिनों कई कई हफ़्ते बीत जाते हैं कि किसी आदमी से आमने-सामने बैठकर बात किए हुए। मी और बुतरू के अलावा बात करने के लिए कोई नहीं होता है।

ऐसा अमूमन होता है कि तीन चार दिनों तक घर से नहीं निकलता हूँ। घर में मी और बुतरू के अलावा मेरी सबसे अधिक बातचीत हफ़्ते में एक दिन होती है, जब मैं सब्ज़ियाँ लेने जाता हूँ और बेचने वाला गोरा मुझसे मेरा हाल-चाल पूछता है। इसके अलावा अंडा-ब्रेड ख़रीदने चार-पाँच दिन में जब गया तो काउंटर पर खड़ी काली गोरी या चीनी महिला मुस्कुराकर पूछती है, ‘हाउ आर यू डूइंग’ जिसका जवाब एक शब्द का होता है—गुड।

फ़ोन पर बात करके मुझे सुकून का एहसास नहीं होता है। कभी-कभी किसी से लंबी बात करने के बाद अच्छा लगता है, लेकिन ऐसा महीने में एकाध बार ही होता है। पिछले दिनों ख़याल आया कि मैं ही सबको फ़ोन करता रहता हूँ, जबकि व्हाट्सएप पर कोई भी मुझे फ़ोन कर सकता है जिनके पास मेरा नंबर है। ऐसा सोचने के बाद मैंने तय किया कि किसी को फ़ोन नहीं करूँगा। छत्तीस दिन बीत गए किसी ने फ़ोन नहीं किया।

मुझे यह ग़लतफ़हमी थी कि मेरा पास ढेर सारे दोस्त हैं। हज़ारों किलोमीटर दूर जब ये ग़लतफ़हमी साफ़ होती है तो अकेलापन और बढ़ जाता है। मैं घंटों काले रंग के अब पुराने पड़ चुके कठोर गद्दे वाले सोफ़े पर उकड़ूँ बैठा रहता हूँ और अपना सिर घुटनों में छुपाए रहता हूँ। मुझे रोना नहीं आता।

पहले मैं खिड़की से बाहर लोगों को देखा करता था। अब कुछ देखने की इच्छा भी ख़त्म हो गई है। अब कोई घर भी आता है मिलने तो मैं चाहता हूँ कि वे जल्दी चले जाएँ ताकि मैं फिर से सोफ़े पर उकड़ूँ बैठ सकूँ। मुझे उनके सवालों से चिढ़ होती है कि तुम कैसे हो? तुम क्या कर रहे हो? तुम कुछ लिखते क्यों नहीं?

मुझे लगता है उन्हें पूछना चाहिए कि तुम मर क्यों नहीं जाते।

*

मैं सुबह उठने के बाद ख़ुद को ऐसी जद्दोजहद में पाता हूँ जिसका कोई औचित्य नहीं होता है। मैं चिढ़ बैठता हूँ अपने से। चाय पीते हुए मुझे लगता है कि मैं आज कुछ न कुछ ऐसा करूँगा जिससे मुझे ख़ुशी मिलेगी। फिर मेरा मन कहीं से सिर उठा कर कहता है कि अरे तुम तो यही चाहते थे न—नौकरी से लंबा ब्रेक, किताबें-पढ़ाई। यह सब है, लेकिन तुम ख़ुश नहीं हो। मैं मन की बात सुन कर अपना सिर फिर से घुटनों में डाल लेता हूँ।

मेरा दिन ऐसे ही शुरू होता है, जिसके बाद मैं झल्लाते हुए उठता हूँ और बर्तन धोने लगता हूँ। भले ही बर्तन गंदे हो। बर्तन धोते हुए किसी रोबोट की तरह मैं चावल का पानी और दाल चढ़ा देता हूँ और बर्तन साफ़ करते करते ही चावल और दाल पका लेता हूँ। चावल को भात बनता देखते मेरे मन में अजीबोगरीब ख़याल आते हैं कि मैं पिछले दो सालों में चावल से भात बन गया हूँ, जिसे कोई भी खा सकता है।

इतना करने के बाद मैं मी पर झल्लाने लगता हूँ कि वह अपने स्टू़डियो क्यों नहीं गई है। वह चुप रहती है और मैं ख़ुद में बड़बड़ाता हुआ घर साफ़ करने लगता हूँ। मुझे लगता है कि घर साफ़ करना ही दुनिया का सबसे अच्छा काम है, क्योंकि ऐसा करते हुए मैं कुछ भी नहीं सोचता।

इतने काम में दुपहर हो जाती है और मैं अन्यमनस्क भाव से खाना खा लेता हूँ। बुतरू को सुलाने की प्रक्रिया में अक्सर मैं उससे पहले सो जाता हूँ और सोते-सोते मुझे लगता है कि मैं अब नींद से कभी न उठूँ। उठने के बाद भिनभिनाता हुआ कुछ सोचना नहीं चाहता।

मैं चाहता हूँ कि मैं सोऊँ और ये दिन बीत जाए किसी तरह। समय काटना कभी मेरे लिए इतना दुरूह नहीं रहा था।

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मुझे अब अपने अतीत से झल्लाहट होने लगी है। वर्तमान मुझे कचोटने लगा है और भविष्य अंधकारमय दिखने लगा है। मैं शायद पहचान के संकट से गुज़र रहा हूँ जिससे बाहर आने की कोई सूरत नहीं दिखाई देती है।

मैं लोगों को चिट्ठियाँ लिखकर इंतज़ार करता हूँ कि वह जवाब में मेरे प्रस्तावित आइडिया को रिजेक्ट कर देंगे। अगर कभी कोई सकारात्मक जवाब लिखता है तो मुझे ख़ुद पर शक होने लगता है कि यह तो उल्टा हो रहा है।

कभी-कभी मुझे लगता है कि मैं डिप्रेशन में जा रहा हूँ, लेकिन मुझे पता है कि यह डिप्रेशन नहीं है। यह एक ऐसा संकट है जिसे मैंने ख़ुद आमंत्रित किया है और अब इससे मुझे ही जूझना है।

मैं रात में देर तक जगता रहता हूँ और किताबों को घूरता रहता हूँ। पढ़ने से चिढ़ होने लगी है और लिखने से वितृष्णा। मैं लोगों का लिखा पढ़ने के लिए मोबाइल ऑन करता हूँ और एक साँस में सामने पड़ने वाला सारा कूड़ा-कचरा और अच्छा लिखा हुआ पढ़ जाता हूँ।

ये सब पढ़ते हुए मुझे पता नहीं चलता है कि मैं क्या पढ़ रहा हूँ। ये पढ़ा हुआ शरीर के किसी भी कोने में दर्ज नहीं होता है। जब भोर होने लगती है और कंधों में बेवजह मोबाइल की स्क्रोलिंग से दर्द होने लगता है तो मैं चोरों की तरह बिस्तर में जाकर दुबक जाता हूँ।

मैं चाहता हूँ कि जब सुबह हो तो सब ठीक हो गया हो, लेकिन ऐसा होता नहीं है। सपने में कभी-कभी सैनिक आते हैं जो मुझे डाँटते हैं और कहते हैं कि अनुशासन लाओ जीवन में। मैं उन्हें हाथ के इशारे से बताता हूँ कि मैं मर चुका हूँ, इसलिए मुझे डिस्टर्ब्ड न किया जाए। दो सैनिक मुझे उठाकर एक खाई में फेंक देते हैं। खाई में गिरने के बाद मैं कंबल खोजने लगता हूँ ताकि मैं चुपके से सो जाऊँ।

*

मेरे कान की लिबलिबी को बच्चे ने नोच रखा है। सोते हुए उसे कान की लिबलिबी पकड़नी होती है। रात में वह मुझसे ही सोता है। पहले मुझे उसे सुलाने में आनंद आता था। अब लगता है कि जल्दी सो जाए। बाप बनना आसान काम नहीं है। अब सोते हुए वह अचानक मेरे कान को अपने नाख़ून से नोच लेता है। मैं जवाब में उसे एक थप्पड़ लगाता हूँ और ग्लानि में चला जाता हूँ कि बच्चा छोटा-सा ही तो है। वह जवाब में रोता नहीं है। कान सहलाते हुए सो जाता है।

मैं उसे देखते हुए अँधेरे में ख़ुद को खोजने लगता हूँ। मुझे बच्चे के साथ नींद नहीं आती है। मैं उसे ढक देता हूँ और प्रार्थना करता हूँ कि मेरे अँधेरे मेरे पास रहें, मेरे साथ रहने वालों तक न पहुँचे।

मैं अक्सर रात के ग्यारह-बारह बजे नहाने जाता हूँ। ऐसा करने के पीछे कोई कारण नहीं होता है। मैं तब तक बाथ टब में बैठा रहता हूँ, जब तक मेरी चमड़ी सिकुड़ न जाती हो। मैं लेटे-लेटे बाथ टब में कुछ-कुछ बुनता रहता हूँ। मुझे लगता है कि पानी में समय रुक जाता है और सारे अँधेरे मिट जाते हैं। मुझे पानी में रहते हुए ख़ुशी मिलती है और मेरे जीवन का सारा अंधकार ख़त्म होता-सा प्रतीत होता है।

पानी से बाहर आते ही शरीर और मन अलग-अलग हो जाते हैं और मैं फिर से जॉम्बी होने लगता हूँ। मेरे एकाध बचे हुए दोस्त मुझे फ़ोन पर सलाह देते हैं कि मैं कुछ रूटीन काम कर लूँ, लेकिन मैं उनकी बात सुन कर अनसुना कर देता हूँ। मुझे पता है कि वे मेरा भला चाहते हैं, लेकिन मैं अब कुछ नहीं चाहता।

मैं थक गया हूँ। मैं लौट कर नौकरी करना चाहता हूँ। बिना किसी उम्मीद और बिना किसी परेशानी के अब मैं यह जीवन बिता देना चाहता हूँ। यह जानते हुए कि अगर ऐसा हुआ तो भी मैं ख़ुश नहीं रहूँगा, क्योंकि अभी जो हो रहा है, वह भी मैं ही चाह रहा था।

चाहने पर नियंत्रण कर लेना चाहिए। आदमी को ख़ुद नहीं पता होता कि उसे क्या चाहना चाहिए।

***

जे सुशील पत्रकार और लेखक हैं। वह इन दिनों अपनी बी.बी.सी. की नौकरी से ब्रेक पर हैं और सेंट लुइस, मिसौरी, अमेरिका में रह रहे हैं। उनसे jey.sushil@gmail.com पर बात की जा सकती है।

2 Comments

  1. Vibha March 31, 2019 at 8:16 am

    Kya bolun ye to man ka Khel hai.

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  2. Ashutosh Kumar Pandey April 1, 2019 at 8:13 pm

    सादर नमस्कार,

    अर्से बाद आपका कुछ लिख्हा मैंने पढ़ा. बहुत अच्छा लगा. क्यों अच्छा लगा? फिलहाल, इसका जवाब मेरे पास नहीं है.

    बीबीसी हिंदी रेडियो पर मैं आपको सुनता और पढ़ता था. जो अच्छा नहीं लगता था उसकी आलोचना करता था. लेकिन यह डायरी मुझे बहुत अच्छी लगी थी. याद कीजिये अफजल गुरु के फाँसी हो जाने पर संभवतः आपने बीबीसी हिंदी रेडियो के लिए एक डायरी लिखी थी. वह अबतक मेरे जेहन में हैं. वह अच्छा लगा था. उस डायरी को सुनने के बाद मेरी इच्छा थी कि आपके जैसे लिखू. लेकिन मुझे लिखना नहीं आता. ऐसे तो मैं कई लंबी टिपण्णी विभिन्न विषयों पर लिख के भेजता रहता हूँ. लेकिन जब कोई खास विषय पर लिखने को कहता है तो मुझे लगता है कि अपन को लिखने नहीं आता है और ये लोग मुझे तंग कर रहे हैं. इसके बावजूद लिख देता हूँ. जैसे आज आपको लिख रहा हूँ.

    अक्सर आपके लिखे लेख मुझे अच्छे नहीं लगते थे. आपकी आव्वाज़ भी मुझे रेडियो पर अच्छी नहीं लगती थी. सामने से सुनने का बेहतर अवसर हासिल नहीं हुआ. आपसे दिल्ली में आपके दफ्तर में एकबार सामना हुआ था. उस वक्त मुझे आप गुस्सा आया था. जब फ़ेसबुक पर आपसे बहस हुई जिसके बाद आपने मुझे ब्लॉक कर दिया था.

    आप स्वस्थ्य रहे. सानंद रहे. गीत खूब सुने. जय हिंद जय भारत. मन करे तो रिप्लाई करे.

    Ashutosh Kumar Pandey, Ara, Bihar

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