पक्ष और पत्र ::

हिंदी संसार में कविता पढ़ने और समझने की जो नई प्रविधियाँ पनप रही हैं, यह कहते हुए दुःख होता है कि वे बेहद चिंताजनक हैं। जैसी स्थितियाँ मुल्क में हैं, वैसी ही अब साहित्य में नज़र आने लगी हैं। साहित्य-संगीत-कलाविहीन लफंगे ट्रोल बनकर हमारी भाषा को घेरने में लगे हैं। वे रचनागत-स्वतंत्रता की लिंचिंग पर उतारू हैं।

‘सदानीरा’ के प्रस्तुत स्पेस पर गए दिनों प्रकाशित अंबर पांडेय और मोनिका कुमार की कविता-शृंखला पर हुए घनघोर विवाद के किंचित थम जाने के बाद, इस प्रसंग पर अब ‘सदानीरा’ अपना पक्ष स्पष्ट कर रही है। यहाँ वे तीन शब्द (ताकि सनद रहे…) लिखने चाहिए, लेकिन लगता नहीं कि इनकी कोई ज़रूरत है, क्योंकि हिंदी साहित्य संसार के मसूड़ों में व्यर्थ के विमर्शों का रक्त लग चुका है। इस प्रकार के विमर्श एक साथ बहुत स्मृतिविहीन और समयविरोधी होते हैं और इनमें सबसे सीमित स्थान विचारों के लिए होता है। इनके नज़दीक सदा से ही इतनी पतनशीलताएँ और विनाशग्रस्तता रही आती है कि वह कहे जाने से भी कम नहीं होती। कहने से वह और बढ़ती है और कहने वाले को भी मलिन करती है। सारा कहा हुआ किसी असह्य दृश्य का दबाव, किसी गंभीर दुरभिसंधि से प्रेरित, किसी अदृश्य इंगित का निष्कर्ष जाना पड़ता है। बहुत सारी सच्चाइयों को प्रमाणित करने के लिए यथार्थ का तथ्याधृत अनुशीलन जरूरी है।

यहाँ इस प्रसंग का पटाक्षेप करते हुए ‘सदानीरा’ के प्रधान संपादक आग्नेय और विवादित कविता-शृंखला के कवियों का पक्ष प्रस्तुत है। आग्नेय का एक पत्र भी इन पक्षों के मध्य में है, जो इस विवाद में पेश-पेश रहे महानुभावों को संबोधित जान पड़ता है। इस प्रस्तुति में बोल्ड-इटैलिक में लिखी गई पंक्तियों को संपादकीय पक्ष के रूप में पढ़ा जाए।

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प्रधान संपादक की ओर से

सबसे पहले मैं ‘सदानीरा’ की व्यवस्था और कार्य-प्रणाली को स्पष्ट करना चाहूँगा। ‘सदानीरा’ पत्रिका और उसकी वेबसाइट दिल्ली-एनसीआर से संपादित/संचालित होती है और उसके संपादन/संचालन का दायित्व मैंने अविनाश मिश्र को दिया हुआ है। मैं भोपाल में रहता हूँ। अविनाश एक प्रतिभा-संपन्न युवा लेखक हैं और मैंने ‘सदानीरा’ के संबंध में उन्हें पूरी स्वाधीनता दी हुई है। वह बड़े मनोयोग से परिश्रमपूर्वक और पूरी प्रतिबद्धता से ‘सदानीरा’ सँभालते हैं। यह काम वह बिना किसी पारिश्रमिक के करते हैं। जब ज़रूरी होता है, तब मैं उन्हें सलाह और सुझाव देता हूँ।

‘सदानीरा’ उन रचनाओं को ही प्रकाशित करती है जिनमें मानवीय पीड़ा की अभिव्यक्ति, उसके संघर्ष की गौरव-गाथा, उसके स्वप्नों का आख्यान और सामाजिक यथार्थ का अभिकथन होता है। ‘सदानीरा’ संसार के श्रेष्ठतम साहित्यिक मूल्यों, परंपराओं, नवीनताओं और मर्यादाओं को स्वीकार करती है और उसका अनुसरण करती है।

‘सदानीरा’ पर/में प्रकाशित रचनाओं के संबंध में अविनाश कभी मेरी अनुमति नहीं लेते हैं। यह अनुमति लेना मैं ज़रूरी भी नहीं समझता हूँ। 12 अगस्त 2018 की शाम अविनाश ने जिन कविताओं को प्रकाशित किया, उनके संदर्भ में मैंने तुरंत उनसे कहा कि वह तत्काल इस प्रस्तुति को डिलीट कर दें, क्योंकि ये कविताएँ ‘सदानीरा’ की नीति-रीति के विरुद्ध हैं और उनके लिए ‘सदानीरा’ का उपयोग किया जाना अनुचित है। लेकिन अविनाश इस प्रस्तुति को डिलीट करने के लिए तैयार नहीं थे, क्योंकि उनका कहना था कि उन्होंने इन्हें प्रकाशित किया है, इसलिए उनके लिए इन्हें डिलीट करना एक अनैतिक कार्य है।

इस स्थिति में मैंने उन्हें स्पष्ट कर दिया कि उन्हें इस प्रस्तुति को डिलीट करना ही होगा, अगर वह ऐसा नहीं करेंगे तो मुझे ही यह करना होगा। इस पर उनकी प्रतिक्रिया थी कि इस स्थिति में वह ‘सदानीरा’ छोड़ देंगे। मैंने उनसे स्पष्ट कह दिया कि वह ऐसा कर सकते हैं। लेकिन इस बीच ही उन्होंने यह स्वीकार किया कि इस प्रस्तुति के लिए ‘सदानीरा’ सही जगह नहीं है। उनके इस स्वीकार के बाद मैंने यह सोचा कि अपने संपादकीय निर्णयानुसार मैं इस प्रस्तुति को डिलीट करने का निर्देश दे सकता हूँ, लेकिन यह निर्देश एक तरह की सेंसरशिप ही है और ‘सदानीरा’ की प्रतिज्ञाओं के वैसे ही विरुद्ध है, जैसे कि इस प्रस्तुति को प्रकाशित किया जाना। इसलिए मैंने सारे ख़तरों को उठाते हुए अपने पिछले आग्रह को वापिस ले लिया।

‘फेसबुक’ पर इस मुद्दे पर कोई सार्थक विचार-विमर्श अब तक नहीं हो सका है। अधिकांश टिप्पणीकार इन कविताओं पर सेंसरशिप लागू करना चाहते हैं और ‘सदानीरा’ की इसलिए आलोचना कर रहे हैं कि ‘सदानीरा’ ने यह सेंसरशिप क्यों लागू नहीं की। इसका उत्तर पाने के लिए धैर्य की ज़रूरत थी। ‘सदानीरा’ पर उनको इसका उत्तर ज़रूर मिलता। खैर! अब उत्तर प्रस्तुत है।

‘सदानीरा’ साहित्य के लोकतंत्र पर यक़ीन करती है और लेखक की अभिव्यक्ति का आदर करती है। वह अपने निर्णय करने की स्वायत्तता को किसी भी क़ीमत पर खो देने को तैयार नहीं है। वह अपनी प्रकाशित रचनाओं की आलोचना का सम्मान करती है, लेकिन वह न तो अपने परिसर में किसी भी प्रकार की सेंसरशिप लागू करेगी और न ही इस प्रकार की माँगों का समर्थन करेगी। ‘सदानीरा’ अपना स्वाधीन अस्तित्व बनाए रखने के लिए निरंतर संघर्ष करती रहेगी।

मुझे पूरा भरोसा है कि जो कवि-लेखक-अनुवादक-पाठक ‘सदानीरा’ के शुभचिंतक हैं, वे उसे कभी सूखने नहीं देंगे और उसे सदैव ‘सदानीरा’ बनाए रखेंगे।

शुभकामनाओं और सहयोग की कामना के साथ,

आग्नेय

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अपने एक अभिन्नतम मित्र को एक पत्र

प्रिय,

मैं बहुत दिनों से सोचता रहा हूँ, आपके व्यक्तित्व और अपनी मित्रता के बारे में। हमारी मित्रता को कई साल हो चुके हैं और उसमें कभी-कभी ठहराव, ठंडापन और असहमति आती रही है, लेकिन वह अब तक बनी रही, यह सुखद अनुभव है।

इधर ‘सदानीरा’ की एक पोस्ट को लेकर जो विवाद हुआ, उसने एक बार फिर से आपके व्यक्तित्व को लेकर मेरे मन में शंका, कौतूहल और जिज्ञासा जगा दी है। इस वजह से हमारी मित्रता की अग्नि-परीक्षा की घड़ी भी आ गई लगती है।

मुझे यह अनुभव होता रहा है कि आप एक अच्छे लेखक हैं और आपकी लेखनी ने हिंदी साहित्य को जो अवदान दिया है, वह अमूल्य और असाधारण है। आप मेरे सर्वाधिक प्रिय लेखक हैं। आपकी कविता और आपका गद्य मुझे आनंद देता रहा है और यहीं पर आपके व्यक्तित्व को लेकर मैं चिंतित हो जाता हूँ; क्योंकि एक मनुष्य के रूप में आप अहंकारी, षड़यंत्रकारी, विश्वासघाती, ख़ुदगर्ज़, क्रूर, दुष्ट और कुटिल हैं। आपके व्यक्तित्व का यह एक ऐसा हिस्सा है जिससे मैं डर जाता हूँ, क्योंकि मैं आपका मित्र जो हूँ। मुझे समझ में नहीं आता, ऐसा क्यों है? क्या यह लेखक के जीवन का पैराडॉक्स है या उसके संपूर्ण जीवन का यही यथार्थ है। यह पैराडॉक्स अनेक महान लेखकों के जीवन में भी रहा है। इस पहेली को समझने की ज़रूरत है, और मैं इसका रहस्य जानने में लगा हुआ हूँ।

नीत्से ने आप जैसे मनुष्य के लिए ही कहा है कि वह शिखर पर चढ़ता जाता है, लेकिन उसके पीछे-पीछे उसके अहंकार का कुत्ता भी चलता रहता है।

शुभकामनाओं सहित,

आग्नेय

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कवियों की ओर से

प्रिय पाठक,

…क्योंकि ये कविताएँ लिखने का हमें बिल्कुल खेद नहीं है, इसलिए इनके बचाव में कहने के लिए भी कुछ नहीं है। कवि के रूप में हमारा मूल्यांकन किया जा सकता है, लेकिन कविता के विषयों को लेकर कवि स्वतंत्र होता है और इसी अधिकार का प्रयोग हमने किया है।

शुभकामना के साथ,

मोनिका कुमार
अंबर पांडेय

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