फ्रेडरिक शिलर की पहली चिट्ठी ::
अनुवाद और प्रस्तुति : प्रत्यूष पुष्कर

बीथोवन ने नवीं सिंफनी के चरम पर जो काव्य पिरोया हुआ है, वह शिलर की कविता ‘ओड टू जॉय’ है। जर्मन कवि और दार्शनिक जोहान क्रिस्तोफ फ्रेडरिक शिलर, जिनका जन्म 1759 में हुआ, जर्मन साहित्य पर अपने अभूतपूर्व प्रभाव, अपने लिखे तीन नाटकों—‘द रॉबर्स’, ‘मारिया स्टुअर्ट’, और ‘वालेनस्टाइन’ (ट्राइलॉजी)—के लिए जाने जाते हैं। एक अप्रतिम कवि गोएथे से अपनी ऐतिहासिक मित्रता के लिए चर्चा में रहने वाले शिलर एक समर्थ दार्शनिक और चिंतक हैं। 1791 से 1796 तक उनके किए कार्य हालाँकि सौंदर्यबोध और कला पर अधिकतर केंद्रित रहे, लेकिन उनका विस्तार एथिक्स, मीमांसा, अध्यात्म और राजनीति तक हुआ। शिलर की उपस्थिति ने दर्शन के विश्व को बदलकर रख दिया और जिन पत्र-पत्रिकाओं का संपादन शिलर ने किया, वे आगे चलकर जर्मन और विश्व साहित्य और नाट्य के नए युग के प्रारंभ की द्योतक सिद्ध हुईं।

मानव के सौंदर्यबोध पर लिखी गई चिट्ठियाँ, फ़्रांसीसी क्रांति के हिंसक पतन से संबंधित शिलर के वे दस्तावेज़ हैं जिनमें व्यक्ति की राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए शिलर उसके सौंदर्यबोध को प्रेरित करते हैं, सौंदर्यबोध के अभाव में मानस की भंगुरता को इंगित करते हैं, और कला और सौंदर्यबोध के सान्निध्य से मानव के एक संपूर्ण मनुष्य और एक संपूर्ण नागरिक एक संग होने की संकल्पना करते हैं।

1794 में ये चिट्ठियाँ सबसे पहले शिलर ने डेनिश राजकुमार फ्रेडरिक क्रिस्चियन को लिखी थीं जो राजकुमार के आवास पर लगी आग में जलकर राख हो गईं। फिर दो साल बाद शिलर ने इन चिट्ठियों को दुबारा दुहरे विस्तार से लिखा और स्व-संपादित ‘ग्रेसेस’ पत्रिका में छापा। आगे चलकर ये चिट्ठियाँ शिलर द्वारा किया गया सबसे महत्वपूर्ण कार्य और कला के मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक प्रभावों, फ़्रांसीसी क्रांति की सबसे महत्वपूर्ण पड़ताल, आने वाले समय में राजनीति की नई दिशा और सौंदर्यबोध की एक नई अतींद्रिय यात्रा का प्रारंभ बन गईं।

जैसा कि हम जानते हैं कि कला की यात्रा में प्राकृतिक और कृत्रिम अनुभूतियों के पृथक्करण के मोड़ सहसा आते रहते हैं। ऐसे मोड़ पर जब कलाकार स्वयं को विमूढ़ पाता है तो शिलर उसके लिए अनुभूतियों के विस्तार का कार्य करते हैं, और वह जो संपूर्णतया प्राकृतिक लगे हों ऐसे विरोधाभासों के अधैर्य पर आश्चर्य दर्ज कर, क्लिष्ट अभिव्यक्तियों से मानव के प्राकृतिक (किंतु संरचनाओं द्वारा विचलित) आकर्षण की पैरवी कर, सौंदर्यबोध को किसी ध्यान-सा प्रकट करते हैं। वह ध्यान जिसके नेपथ्य में सत्यता की घड़ी टिक-टिक कर रही हो, जिसका मित्र यौवन हो, और जो रहस्य और उनकी क्षणभंगुरता पर सौंदर्यबोध की अपनी यात्रा का क़िश्तों में अवसान न देकर, कला के उस तल पर आकृष्ट हो जहाँ तकनीक कलाकार की चिढ़ मात्र न होकर, उसकी अनुभूतियों की समग्रता का एक अंश बने।

शिलर का सौंदर्यबोध, और शिलर की कला, किसी ‘वॉर ऑफ़ इंटेलेक्ट’ में एक कलाकार का अभ्यर्पण या उसके दमन से उपजी मलिन नैतिकता द्वारा निष्पादित अत्यंत दैहिक सुलह-समाधान की यात्रा नहीं है। यह यात्रा विविधता, समग्रता और स्पिनोज़ा की उस अंत:प्रज्ञा की है जिसमें सौंदर्यबोध इतना प्रत्यक्ष और तीव्र है कि विसंबंधन की अपनी यात्रा पर कोई कलाकार, अनुभूति की मौलिकता, गहनता, सुंदरता और उनके अद्भुत प्राकृतिक प्रवाह पर नम्र और सृजनरत रहता है। शिलर का संबोधन ‘सत्य और सौंदर्य के युवा मित्रो!’ को है।

कांट के जो सिद्धांत मानव को कारण के समक्ष पंगु और प्रेम के समक्ष आदिम प्रस्तुत कर उसे उसकी राजनीतिक स्वतंत्रता के संग एक अनंत संघर्ष में बाँध छोड़ते हैं, उनके ठीक विपरीत शिलर उसी राजनीतिक घर्षण से स्वतंत्रता के लिए मानव के सौंदर्यबोध की शिक्षा को अनिवार्य प्रस्तुत कर हमें यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि सौंदर्यबोध केवल व्यक्तिपरक न होकर, किसी भी सत्ता या अस्तित्व की राजनीतिक यात्राओं के मील के पत्थरों के समानांतर चलता है, और उसके दर्शन में सौंदर्य की प्रगाढ़ समझ के साथ उसे समय में आगे भेजता है।

कांट की नैतिकता जो प्रतिवाद का प्रतिवाद मालूम पड़ती है, उसके बारे में शिलर यह मानते हैं कि वह किसी दास मानसिकता की नैतिकता तक ही सीमित है। अपनी पहली चिट्ठी में शिलर कला और सौंदर्य को अंत:करण से जोड़ते हुए, समय-समय पर बौद्धिकता के अतिप्रयोग के लिए क्षमाशील प्रतीत होते हैं।

Johann Christoph Friedrich von Schiller
फ्रेडरिक शिलर [ 10 नवंबर 1759–9 मई 1805 ]

पहली चिट्ठी

आपकी सहमति से मैं आपके सामने सौंदर्य और कला पर किए गए अपने शोध को चिट्ठियों की एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ। मैं इस कार्य के महत्व, आकर्षण और गरिमा को संवेदनशील होकर समझता हूँ। मैं इस विषय का उपचार करूँगा जो हमारे आनंद के एक बहुत बड़े हिस्से से अत्यंत समीपता से जुड़ा है, और जो हमारी नैतिक भद्रता से अलग भी नहीं किया जा सकता।

मैं सौंदर्य के उस ‘कारण’ की पैरवी करूँगा—उस हृदय के समक्ष जिसके द्वारा ही सौंदर्य की संपूर्ण शक्ति महसूस और व्यक्त की जाती है, जिसमें मेरे इस उपक्रम का सबसे दुरूह मानक भी शामिल है, वह मानक जिसमें कोई भी मजबूर है अपनी अनुभूतियों से उतनी ही भेंट करने को जितना अपने सिद्धांतों से…

जिसके लिए, मैं आपसे प्रार्थना करूँगा कि आप मुझे अनुग्रहित करें, मुझे उदारतापूर्वक यह कार्य एक कर्तव्य रूप में सौंपे और जब-जब मैं केवल अपने झुकाव और पक्षों का परामर्श लूँ तो आप मुझे अपना समय और अपनी सेवा दें।

आप जो ‘कार्य की स्वतंत्रता (के मानक)’ निर्धारित करते हैं, वह मेरे लिए बाधा से ज़्यादा एक आवयश्कता ही है।

औपचारिकताओं में कम ही अभ्यास में लाया गया या किसी अनुचित उपयोग के द्वारा, अच्छे टेस्ट के ख़िलाफ़ कोई पाप करने का जोखिम भी मैं शायद ही उठाऊँगा; मेरे विचार, अपनी उत्पत्ति अंत:करण से ही पाते हैं—केवल बाहरी दुनिया के अनुभव को निर्मित करने या पढ़ने से नहीं। मैं उन्हें उनके मूल से वर्जित नहीं करूँगा। वे तिरस्कार सह लेंगे—किसी पंथ या मत-विशेष के पूर्वाग्रह से पहले।

सत्यता से कहूँ तो मैं आपको उन दावों से दूर करने की कोई कोशिश नहीं करूँगा जो बाक़ी कई की तरह कांटियन सिद्धांतों पर आधारित हैं, लेकिन शोध की इस यात्रा में, अगर आप दर्शन के किसी विशेष मत या संप्रदाय के स्मरण में चले जाते हैं, उन्हें याद करते हैं तो इसे मेरी अक्षमताओं पर ही मढ़ें, न कि उन सिद्धांतों पर।

आपकी मति-स्वतंत्रता मेरे लिए पवित्र होगी, और वे सभी तथ्य जो मैं सामने रखने का यत्न करूँगा, वे आपकी अपनी भावनाओं से ही सुसज्जित होंगे। आपके अपने निरंकुश विचार ही उन नियमों को निर्धारित करेंगे जिनके समानांतर हमें यह यात्रा करनी है।

वे विचार जो कांटियन-तंत्र के व्यावहारिक हिस्सों में भी प्रबलता से हैं, उनसे दार्शनिक असहमत ही होते हैं, जबकि मानव ने कभी उनसे असहमति ज़ाहिर नहीं की है, और ऐसा मैं प्रमाणित भी कर सकता हूँ।

अगर उन्हें उनकी तकनीकी रूपरेखा से वंचित कर दिया जाए, तो वे ‘कारण’ के उन मतों के रूप में उच्चरित होंगे जो पुरातन काल से एक पारस्परिक सहमति से ही विद्यमान हैं—प्रकृति की नैतिक सहजवृति के तथ्य-रूप में; प्रकृति जिसने अपनी प्रज्ञा से, मानव को एक गाइड या एक शिक्षक के रूप में सेवाएँ देने को नियुक्त किया हो—तब तक जब तक कि उसकी प्रबुद्ध प्रज्ञता उसे परिपक्वता नहीं दे देती… लेकिन यही तकनीकी रूपरेखा जो सत्य को समझ के सम्मुख दृश्य करती है, इसे अनुभूतियों से वंचित रख लेती है। एक कार्य के तौर पर ‘समझना’ तभी सार्थकता से प्रारंभ होता है, जब अंतर के प्रयोजनों को नष्ट कर लिया जाए… इससे पहले कि वे विषय को विनियोजित कर लें।

किसी केमिस्ट की तरह दार्शनिक अपना संश्लेषण विश्लेषण के माध्यम से पाता है, या प्रकृति के सहज/त्वरित कार्य—‘कला की यंत्रणा’ से।

क्षणभंगुर इस प्रतिच्छाया को साध सकने के लिए, उसे इन निरंकुश नियमों से बाँधना ही होता है, अमूर्त विचारों में इसके समानुपात को विच्छेदित करना होता है, और इसके सजीव आत्मन् को निरामिष शब्द कंकालों में संरक्षित करना होता है।

क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि प्राकृतिक अनुभूति स्वयं को ऐसी प्रतिलिपि में चिह्नित ही नहीं कर पाती, और जो विश्लेषक है, उसके विवरण में, सत्य हमेशा किसी विरोधाभास की तरह प्रतीत होता है?

इसीलिए आपकी आज्ञा से मैं आपका ध्यान इन शोधों की तरफ़ आकर्षित करना चाहूँगा, जो अपनी विषयवस्तु को एक समग्र समझ की ओर ले जाने के लिए उन्हें इंद्रिय क्षेत्र से दूर भी ले जाते हैं।

वह जो मैंने पहले नैतिक अनुभव के बारे में कहा है उसे ‘सौंदर्य/सुंदर’ के एक वृहत्तर सत्य की अभिव्यंजना के संग भी लागू किया जा सकता है। वह रहस्य ही है जो अभिभूत करता है, और उसके तत्वों के अनिवार्य संयोजन के अवसान के संग उसे समाप्त।

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प्रत्यूष पुष्कर हिंदी कवि-कलाकार और अनुवादक हैं। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पढ़ाई की है और बतौर फ्रीलांस फ़ोटो जर्नलिस्ट पूरा देश घूमा है। इन दिनों वह संगीत के साथ-साथ कला, दर्शन और अध्यात्म के संसार में रम रहे हैं। गए दिनों डच दार्शनिक स्पिनोज़ा पर किया गया उनका कार्य-अनुवाद भी पढ़ा-सराहा गया है। शिलर की कुछ और चिट्ठियों, जिनमें उनकी विश्वप्रसिद्ध चौदहवीं चिट्ठी भी शामिल है, का अनुवाद भी प्रत्यूष ‘सदानीरा’ के आगामी अंक के लिए कर रहे हैं। वह दिल्ली में रहते हैं। उनसे reachingpushkar@gmail.com पर बात की जा सकती है।

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