चार कविताएं ::
अनुराधा सिंह

ईश्वर नहीं नींद चाहिए

औरतों को ईश्वर नहीं
आशिक नहीं
रूखे-फीके लोग चाहिए आस-पास
जो लेटते ही बत्ती बुझा दें अनायास
चादर ओढ़ लें सिर तक
नाक बजाने लगें तुरंत

नजदीक मत जाना
बसों, ट्रामों और कुर्सियों में बैठी औरतों के
उन्हें तुम्हारी नहीं
नींद की जरूरत है

उनकी नींद टूट गई है सृष्टि के आरंभ से
कंदराओं और अट्टालिकाओं में जाग रही हैं वे
कि उनकी आंख लगते ही
पुरुष शिकार न हो जाएं
बनैले पशुओं
इंसानी घातों के

वे जूझती रही यौवन में नींद
बुढ़ापे में अनिद्रा से

नींद ही वह कीमत है
जो उन्होंने प्रेम, परिणय, संतति
कुछ भी पाने के एवज में चुकाई

सोने दो उन्हें पीठ फेर आज की रात
आज साथ भर दुलार से पहले
आंख भर नींद चाहिए उन्हें.
*

प्रेम का समाजवाद

दलित लड़कियां उदारीकरण के तहत छोड़ दी गईं
उनसे ब्याह सिर्फ किताबों में किया जा सकता था
या भविष्य में

सवर्ण लड़कियां प्रेम करके छोड़ दी गईं
भीतर से इस तरह दलित थीं
कि प्रेम भी कर रही थीं
गृहस्थी बसाने के लिए
वे सब लड़कियां थीं
छोड़ दी गईं

दलित लड़के छूट गए कहीं प्रेम होते समय
थे भोथरे हथियार मनुष्यता के हाथों में
किताबों में बचा सूखे फूल का धब्बा
करवट बदलते जमाने की चादर पर शिकन
गृहस्थी चलाने के गुर में पारंगत
बस प्रेम के लिए माकूल नहीं थे
सो छूट गए
वे निबाहना चाहते थे प्रेम
लड़कियां उनसे पूछना ही भूल गईं

लड़कियां उन्हीं लड़कों से प्रेम करके घर बसाना चाहती थीं
जो उन्हें प्रेम करके छोड़ देना चाहते थे.
*

क्या सोचती होगी धरती

मैंने कबूतरों से सब कुछ छीन लिया
उनका जंगल
उनके पेड़
उनके घोंसले
उनके वंशज
यह आसमान जहां खड़ी होकर
आंजती हूं आंख
टांकती हूं आकाश-कुसुम बालों में
तोलती हूं अपने पंख
यह पंद्रहवां माला मेरा नहीं उनका था
फिर भी बालकनी में रखने नहीं देती उन्हें अंडे

मैंने बाघों से शौर्य छीना
छीना पुरुषार्थ
लूट ली वह नदी
जहां घात लगाते वे तृष्णा पर
तब पीते थे कलेजे तक पानी
उन्हें नरभक्षी कहा
और भूसा भर दिया उनकी खाल में
वे क्या कहते होंगे मुझे अपनी बाघ-भाषा में

धरती से सब छीन मैंने तुम्हें दे दिया
कबूतर के वात्सल्य से अधिक दुलराया
बाघ के अस्तित्व से अधिक संरक्षित किया
प्रेम के इस बेतरतीब जंगल को सींचने के लिए
एक नदी चुराई, बांध रखी आंखों में
फिर भी नहीं बचा पाई कुछ कभी हमारे बीच
क्या सोचती होगी पृथ्वी
औरत के व्यर्थ गए अपराधों के बारे में.
*

सन् 1800 की बागान औरतें

काली औरतें
जंगल, पहाड़, समुद्र और कोयले में भी पाई जाती थीं
उगाई जातीं लुइविल और केंटुकी में
तोड़ कर बेच दी जातीं क्यूबा और त्रिनिदाद में
वहां भी जन्म लेतीं जहां मिट्टी सिर्फ सफेद रंग पैदा कर सकती है
जबकि वे धमनियों में बहता लाल रक्त कण थीं
क्योंकि सफेद रक्त कणों की तरह लड़ना नहीं जानतीं थीं

सांवली मछलियों-सी
ओहायो में फिसलकर गिरती थीं मनुष्यता के साथ
रक्तहीन पांवों से चलती आतीं
दुनिया की काली रेत पर
बिना छोड़े निशान काले इतिहास में
एक दिन जमीन पर रहना सीख गईं
पकातीं, खातीं, बच्चे जनतीं
झगड़तीं, हंसतीं
गृहस्थिन हो जातीं
दुनिया नहीं भूली उनका मछली होना
तलकर, भूनकर, सुखाकर खाया
बिल्लियां छीन ले गईं अधबीच
उकाब लहरों की पीठ से झपट ले गए
मछुआरों ने छोड़ दिया दलदल में मरने
फिर भी हम चाहते रहे बनी रहें हमारे बीच
बनी रहें गोरी औरतों के नजरबट्टू-सी
गलाजत के प्रति सहनशील
दुनिया के पिछवाड़े बने घूरे-सी विनम्र

वे नाचना जानती थीं
क्या खूब नाचती थीं
यह हम जानते थे
बहुत खूब जानते थे
क्योंकि उनके नृत्य में नहीं देखते थे कला या नफासत
हमारी काली करतूतें देखती थीं
एक अश्वेत कमनीय देह
आंदोलित अकथ पीड़ा से जिसे नृत्य कहते हैं.

***

[ अनुराधा सिंह हिंदी कविता के इलाके में देर से सामने आई हैं. लेकिन यह सुखद है कि अपनी मजबूत तैयारी, रचनात्मक-कुशलता और धैर्य के दम पर उनकी पहचान इधर हिंदी की एक उल्लेखनीय कवयित्री के तौर पर बन गई है. अनुराधा की कविताओं की पहली किताब अभी बिल्कुल अभी ‘ईश्वर नहीं नींद चाहिए’ शीर्षक से भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हुई है. अनुवाद में भी दिलचस्पी रखने वालीं अनुराधा की यहां प्रस्तुत कविताएं ‘सदानीरा’ के 14वें अंक में पूर्व-प्रकाशित हैं. उनसे anuradhadei@yahoo.co.in पर बात की जा सकती है.]

2 Comments

  1. Poonam Bhargava zakir January 9, 2018 at 8:41 am

    Anu love you and your poems

    Reply
  2. Poonam Bhargava zakir January 9, 2018 at 8:42 am

    Anu dear love you and your poems

    Reply

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