कविताएँ ::
अमित तिवारी

hindi poet Amit Tiwary 1952019
अमित तिवारी

आनुवादिक त्रुटि

उसके चेहरे का रंग तीखा था
और आँखें आक्रांताओं की तरह गहरी
उसका स्पर्श इतना नम और सर्द था
कि भय होता था
पर ये आनुवादिक त्रुटि थी
बहुत बाद में मैंने जाना
कि स्तब्धता मेरा समर्पण थी
और भय उसकी अनुपस्थिति की कल्पना।

भेंट का समय

प्रतीक्षा के सभी क्षण
मैंने बाज़ार में घूमते हुए
कपड़े फींचते हुए
राशिफल बाँचते हुए
या छननी खुरचने जैसे
औसत काम करते हुए बिता दिए
मैं चाहता था कि
तुमसे भेंट का समय
अचानक आए
ताकि वह सर्वश्रेष्ठ हो
प्रतीक्षा के उन्माद से अछूता
कुँवारे सुख से लदा-फदा
स्याह-सफ़ेद कल्पनाओं से मुक्त।

मतदान

हर बार
मतदान पेटिका में
मतपत्र उतारते हुए लगता है
कि इसी तरह
अहम होने के भुलावे के बीच
धर्म और सत्ता ने
उतार दी रही होगी
एनी बोलिन1इंग्लैंड के राजा हेनरी अष्टम की दूसरी बीवी जो 1533-36 के दौरान रानी रहीं। उनकी शादी किसी और से तय थी पर हेनरी उन पर आसक्त हो गया और अपनी पहली बीवी कैथरीन को छोड़ कर उनसे शादी कर ली। रोम के चर्च ने एनी-हेनरी की शादी को अमान्य घोषित कर दिया। कामातुर हेनरी ने रोम के चर्च से अपने राज्य और सत्ता के संबंध तोड़ लिए और इंग्लैंड के चर्च को धर्म का प्रतिनिधि मान कर उसको अधीन कर लिया। ऐसा करने में इंग्लैंड के चर्च के कई लोगों ने स्वायत्तता और अधिक ताक़त हासिल करने के लिए हेनरी का साथ दिया। इस विवाह से एनी को एक बेटी, एलिजाबेथ-I हुई, जो बाद में इंग्लैंड की महारानी बनीं, पर कई गर्भपातों के बावजूद एनी को बेटा नहीं हुआ। इससे हताश हेनरी ने चर्च की मदद से एनी पर बाह्य और कौटुम्बिक व्यभिचार का आरोप लगाकर उनकी गर्दन उतारने की सज़ा दी। एनी बोलिन अपने पूरे जीवन धर्म और सत्ता की कठपुतली बनी रहीं। की गर्दन।

कबूतर की परछाईं के आकार का एक कबूतर
विनोद कुमार शुक्ल के प्रति

कबूतर की परछाईं के आकार का एक कबूतर
मेरी निजता के आकार की खिड़की पर बैठा था
वह खटखटाना नहीं जानता था
अंदर आने को जानता था
उस चिड़िया के साथ फ्रेम पर टहलता रहा
चिड़िया के नाप भर का विस्मय
मैंने खिड़की नहीं खोली
वह प्रेम या सहायता के अचानक को नहीं
हमले के अचानक को जानता था।

मिलना

मैं उसे ऐसे मिला
जैसे लोकतंत्र के तमाशे से
नुच-पिट कर
जनता में लौट जाता है
कोई असफल विद्रोह।

जाना

असंख्य चुंबनों
और अगणित आलिंगन में डूबे
अथाह प्रेम के बाद
तुम्हारा सब समेटकर जाना
ऐसे हुआ
जैसे पानी के साथ ही
उड़ गया हो जीवन
और ठगी-सी खड़ी चट्टान पर
रह गया हो
देह चीरता, चाटता नमक।

क्रांति

वह चला था
क्रांति की मशाल लेकर
बुझते-बुझते
सिर्फ़ गर्म राख बची है
जिसमें वह आलू भून रहा है
मशाल और आग से ज़्यादा
अब उसे आलू की चिंता है
राख से छिटक कर उड़ते
क्रांति के आख़िरी वारिस
देख पा रहे हैं कि
भूख चेतना का सबसे वीभत्स रूप होती है।

***

अमित तिवारी हिंदी कवि-अनुवादक हैं। उनसे और परिचय तथा ‘सदानीरा’ पर इससे पूर्व प्रकाशित उनकी कविताओं के लिए यहाँ देखें :

प्यार, परिधि और चुंबन

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