कविताएँ ::
अमिताभ चौधरी

Amitabh Chaudhary hindi poet
अमिताभ चौधरी

ऋषि की प्रार्थना नहीं

बहुत कोमल है
टूटे हुए पत्ते की ऐंठ। और
बहुत करुण—
ऐंठ के टूटने की कर्कश-ध्वनि।
जिस छाया में आने को तपा वह ग्रीष्म,
पीला पड़ा, कना, झड़ा : उस छाया में गिरा
क्या पेड़ के सूख जाने के कौतुक से भरा है?
कि मैं—
उसे हथेली पर रखकर
मुट्ठी भींचने से पहले सोचता हूँ [कि]
‘‘तुम्हारे लिए इतनी दूर आने के बाद
यदि मैं इस छाया में पहुँचा हूँ तो यह रास्ता ख़त्म हो जाना चाहिए!’’
[यद्यपि यह एक ऋषि की प्रार्थना नहीं है
कि एक टूटे हुए पत्ते की स्थिति से
वसंत नहीं आना चाहिए!]

एक दिन

एक दिन सूरज नहीं निकलेगा :
स्थिर हो जाएगी पृथ्वी
एक दिन।
—आकाशों भटकेंगे हम
एक दिन :
रिक्त स्थानों के लिए
अपूर्ण पंक्ति ढूँढ़ते।
ध्वनि के लिए पृष्ठ खोजते
मूक हो जाएँगे
झखते होंठों के नील।
तुम्हें पुकारते कंठ बैठ जाएँगे।

मैं हस्तक्षेप नहीं करना चाहता

पहाड़ की टूट में भरी मिट्टी पर
जो हरी घास है,
वह पहाड़ के पानी होने की प्यास है?
अरे, यह प्रश्न कि उत्तर तरलता चुके पानी जैसे
विरुद्धों में
जलसंधियों पर चुप है!
उदास है!
ओह, प्रिये!
इसलिए तुम जाओ : तुम्हारी छावियों पर पलकें डालकर
मैं हस्तक्षेप नहीं करना चाहता।
मैं पहाड़ की टूट में मिट्टी होकर इसलिए नहीं भरना चाहता
कि उसके पानी होने की प्यास
पृष्ठ पर
तुम्हारे न आने के रास्ते में उगी घास है
मेरे समक्ष।

तुम्हारे अ-साध्य सौंदर्य पक्ष की ओर

पलकें झपकती आँखों के समक्ष
भौंहों के बीच
शून्य सिकुड़ता है तो क्या!—
अंत को पाए हुए मर्त्य की घनीभूत चेष्टाएँ
उसके अपलक होने में आहत हैं?
तुम्हारे अ-साध्य सौंदर्य पक्ष की ओर
मैंने जो स्थैर्य साध लिया है,
क्या तुम उसे विचलन की सीमा कहकर चले जाओगे?
पानी के पुल बाँधकर
उफनती नदी से पार पाओगे तुम!—
[कि, अपनी तहों में डूबी नदी वह
तुम्हें बहा ले जाने को उफनती है।]

देह ही के मन

देह ही के मन
अंततः सब रचनाएँ।
कहानियाँ सब। सब कविताएँ।
बने हुए
कटे हुए
अमूर्त के राग सब। रंग सब चेष्टाएँ।
किंतु,
समय जैसे पारदर्शी शीशे क्यों हो जाएँ?—
जिन्हें पृष्ठ पर पोतकर
हमने चीन्हा एक-दूसरे को।
जिन्हें सामने रखकर हमने दुःख के कारण सजाए।
जिन्हें तोड़कर समय काटा।
चेहरे चुकाए।

कुछ न होने के तले

ओ मेरे अंतिम वैभव!
तुमने देखा मेरा शव? इसलिए
नीले हो—मौन के रव!—
अपनी इयत्ता में देखता था जैसे
मैं तुम्हें।
मुँह देकर जीभ पर रखता था तुम्हारी ध्वनि।
अनुराग के रस
सारी रात कुछ न होने के तले
तारे गिनता था।

मैं प्रमाणित करता हूँ

कल्पना के संसार में
रजत-पत्रों पर स्वर्ण-रेखाएँ खिंची हैं।
यद्यपि,
मेरे हाथ में मुट्ठी भींचना है।—
ऐसे, मैं प्रमाणित करता हूँ :
पदार्थ की सत्ता के भीतर
एक आत्मा है—सदैव—
जिसे ग्रहों की ओर नहीं धकेला जा सकता :
[जैसे किसी ने पहाड़ पर से पत्थर धकेला है, कि
घाव पर भी
पृथ्वी अपने गुरुत्व से घूमेगी।]
दु:खी होकर, मनुष्य कविता लिखता-पढ़ता रहा है,
वह लिखता-पढ़ता रहेगा।

जब तक मुझे प्यास है

मृग जैसे : चौंकी हुई
हवा—एक साँस :
कितना मरुस्थल है अहरह
इन नंगे पैरों के तले
पानी जैसा साफ़ और
अपने उठाव में समतल?
मेरी भूख ही भटकती है रोटी भीतर
यदि वह दूसरे पहर बासी हो जाती है :
आख़िर, अनाज के जंगलों में खोया हुआ
अपने पेट में मुँह देकर
मैं अपनी भूख शांत करता हूँ।
दौड़ते हुए मृग के भीतर मेरे प्राण सूखते हैं तो सूखते हैं।
इस मरुस्थल की इयत्ता में
जब तक मुझे प्यास है, मैं तुम्हें पानी की कमी नहीं रहने दूँगा।

आखेट का एक चित्र

आखेट का एक चित्र है
समय जैसे।
विश्वास करो : वह पृष्ठ कोरा नहीं है,
जिस पर तुम कुछ लिखने को हो रहे हो।
हर दृश्य को
घास-फूस की तरह छीलकर
हाथ में लिया गया है।
बंदूक़ की नोक पर
चिड़िया की उड़ान को चूमने में
मैंने तुम्हारा प्यार पाया है।

बाढ़ के एक दृश्य में

बाढ़ के एक दृश्य में
पानी की ओर पीठ करके
वह : जो अपने में ढँके बैठा है;
उसे देखो—
यदि पहचान सको : ‘‘वह पुरुष है!’’ [या]
‘‘वह स्त्री है!’’
बाढ़ के एक दृश्य में
इंगित करो, कि—
सारे संशय जलमग्न हो गए हैं।

प्रस्थान

प्रभात का समय है।
कोहरे जैसी धूप पर पौधे उतरे हैं।
ओस पर झरते क्षण कितने साफ़ हैं :
सुथरे हैं।
रास्ता ऐसे कटता है कि रक्त धमनियों का
पैरों में और लाल-आशय होता है।
[धमनियों में रक्त की गति से पैर साँस ले रहे हैं।]
हवा का हल्का स्पर्श तुम्हारे चुंबन का स्मृति-बिंब है।
[मेरे होंठों पर
मुँदी हुई आँखों का आलोक : देखो—
और स्पष्ट करो कि कहना क्या है!]
देह में आत्मा का एक कंपन
शांत नदी में ‘छपाक्’ जैसा—
कि इस अनुराग-ऋतु का नैरंतर्य एक ताप-ध्वनि की ओर मुझे ले जा रहा है,
जहाँ मैं एक ऋषि की मुद्रा में तुम्हारा ध्यान करूँगा
तो क्या आसन लगाकर बैठूँगा?—कि;
मेरी गति बाधित हो गई है?
या, मैं तुमसे कटकर रक्त की ओर प्रस्थान करूँगा?

प्रेम के विषय में

प्रेम के विषय में
मैंने बहुत सोचा है। अर्थात्
तुम्हारे बारे में विचार करते हुए
मैं इतनी दूर चला आया हूँ कि अब कह सकता हूँ :
कोई रास्ता नहीं, प्रिये!—किंतु कैसे कहूँ?
यथार्थ और कल्पना की एकता में
मैं एक ऐसा चित्र देखता हूँ, जिसे किसी ने बनाया नहीं।
[इसका अर्थ यह नहीं कि वह बना नहीं।—]
मैं देखता हूँ कि तुम्हें पा जाने में
पीठ हटाते ही कक्ष का कोना उतर गया है :
[जैसे मुँह उतरता है।]
जबकि,
मैंने तुम्हें खो देने के बाद खोजना शुरू किया है।

चाह लेने का एक दृश्य

हिम हो गई देह को
मैं खुले आकाश के नीचे
खुरचना चाह रहा हूँ—
कि यहाँ पानी होने का अर्थ मरुस्थल के विस्तार में
मेरे पैरों तले मिट्टी की खोज है।
—और,
चाह लेने का एक दृश्य [इस समय]
वह ठिठुरता हुआ रिक्त स्थान मेरे समक्ष है,
जिसे मैं बूझ भी लूँ तो ख़ुद को कवि कहूँ।
[यह—समझो—मित्र : कोहरा इतना है कि सर्दी यदि मुझे दिखाई दे मैं तुमसे धूप की बात करूँ।]

कवि ने तुम्हें पारधी होने से बचाया है

चिड़िया की उड़ान वहीं तक नहीं है;
साँझ होते
जहाँ से वह लौट आई है।
यद्यपि, चिड़िया आकाश की ओर से
तारे चुगकर नहीं लाई।
भले तुम्हें आश्चर्य न हो—
कि, चिड़िया का चुग्गा तुम्हारी मुट्ठी में है—
किंतु, एक कवि ने उसे आकाश में उगाकर
तारों को इतना चमकीला बनाया है।
तुम कल्पना कर सकते हो—कि,
प्रेम में असफल होने के समय
एक कवि ने तुम्हें पारधी होने से बचाया है।

उजाले की ओट

अपनी सरलता में
क्लिष्ट है, सब कुछ। किंवा,
उजाले की ओट में
इतने भेद छुपे हैं, कि उन्हें
आँखें मूँदकर देखा जा सकता है।

पृष्ठ के पक्ष में

पृष्ठ के पक्ष में
यदि घास-फूस बचाया जाए
तो तुम बता सकते हो : पृथ्वी के इतिहास में
कितना जंगल अलिखित है? जिसमें
हमारी कीड़े-मकौड़ों की अगणित प्रजातियाँ
कहीं की नहीं रहीं।—
शायद तुम्हें पता हो : जंगलों को काटकर
आदमी की तरह प्यार करने के लिए
जो नगर बसाए गए हैं; उनमें छेड़छाड़ होती है,
इसलिए
सैंकड़ों किताबें होने के उपरांत
पुस्तकालय से कितने युगल हाथ पकड़कर
भाग गए हैं!

अंत में

आकाश में पानी इतना आपसी हो गया है
कि पृथ्वी पर उसकी घनी छाया
जैसे अंधकार है।
हवा ने ठहरकर
पत्तियों का कंपन सोख लिया है।
न सूखने को होने से पीली पड़ी
रास्ते की घास ने जड़ें छोड़ दी हैं—
कि, अब प्रतीक्षा किस बात की?
अधिक कहने की आवश्यकता में सधा हुआ मौन
एक खटके भर के लिए मुझे झकझोर रहा है
जैसे
मैं मर गया हूँ :
अंत में, कितने साक्ष्य हैं
कि जिनके प्रस्तुत/अप्रस्तुत होने में कोई भेद न होने से
मेरी आँखें पथरा गई हैं—
अपलक रह जाने के बाद भी—कि,—
मैं चाहे हूँ : तुम चाहे हो।

इतनी सुंदर आग

इतनी सुंदर आग है :
लाल गुलाब जैसी : लाल। कि,
मैं उसे हथेली पर रखकर कैसे हाथ खींच लेता हूँ—कि आह,
जल गया!
जबकि,
कविता लिखते समय
पतंगों के पीछे मेरे प्राण जाते हैं।

एक आर्द्र ऋतु में

मिट्टी में दबे अबोध
पतंगों को क्या ध्यान?—कि यह आकाशों बरसता पानी
उन्हें आत्मा की ओर करके
आग में झोंक देगा!
एक आर्द्र ऋतु में
समय इतनी रोशनी देगा
कि एक क्षण के लिए वह अपनी आँखें मूँद लेंगे।

निकटता के आशय से

फूल जैसी
एक पत्ती टूटकर भी
फूल जैसी।
पतझड़ की अ-ऋतु में या कि
ऋतुचक्र की संवेदना में
लाल जल : जल-हीन जल :
यह वह समय है,
जब निकटता के आशय से
अलगाता कोई केवल कविता लिखकर रह जाता है।
अर्थात्, एक पेड़
टूटकर पैरों तले आए हुए पत्ते में पानी मुरमुराता है
तब कोई प्रेमी कवि हो पाता है।

***

अमिताभ चौधरी हिंदी की नई नस्ल से वाबस्ता कवि हैं। उनकी यहाँ प्रस्तुत कविताएँ ‘सदानीरा’ को हिंदी कवि-लेखक प्रशांत विप्लवी के सौजन्य से प्राप्त हुई हैं, इस परिचय के साथ—‘‘अमिताभ चौधरी अपने शिल्प और भाषा को लेकर बेहद सजग हैं। उनकी कविताएँ सरसरी दृष्टि से नहीं पढ़ी जा सकती हैं। उनके भाव और बिंबों को समझने के लिए बहुत ठहरना पड़ता है। समकालीन युवा कवियों में विषय-बोध को लेकर अधिक बेचैनी है, जबकि अमिताभ अपने शब्द-मात्र से आकुल-व्याकुल हो उठते हैं। दृश्यों के प्रति उनकी दृष्टि इतनी गहरी होती है कि उनके भाव कई परतों में जाकर खुलते हैं। उनकी कविता सौंदर्य के उत्कर्ष और सौंदर्य की विद्रूपता दोनों की बातें करती हैं।’’ अमिताभ सीकर (राजस्थान) में रहते हैं। उनसे amitabhchaudhary375@gmail.com पर बात की जा सकती है।

इस प्रस्तुति की फ़ीचर्ड इमेज़ : Spring, Summer, Fall, Winter… and Spring (2003)

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