कविताएँ ::
अनुराधा अनन्या

Anuradha Annanya poet
अनुराधा अनन्या

विमर्श और यथार्थ में स्त्री

कभी-कभी मैं सोचती हूँ
बाहर निकलें औरतें
कथित स्त्री-विमर्श से

संभ्रांत दयालु लोग
ऊबे हुए दानिशमंदों की दिमाग़ी कसरत से निकला हुआ स्त्री-विमर्श
नहीं है किसी काम का—
बच्चे सम्हालती, भेड़ चराती औरतों के

किताबों-पोथियों में सहेजे विमर्श की चिंताएँ
और चिंतन नहीं पहुँच पा रहे
मछली पकड़ने वाली औरतों तक

विकास का पैमाना और आँकड़े मिथ्या हैं—
भूख से मरने वाली औरतों के लिए

मज़दूरों में मज़दूर औरतें
किसान औरतें जो किसान नहीं मानी गईं
स्थापित और सशक्त औरतें
सभी एक दल की तरह आएँ
और झटके से तोड़ें विमर्श के मकड़जाल को
अपनी आपबीती कहें—सच-सच
विमर्श में दिए गए उदाहरणों के अलावा

एक क़बीले की तरह निकलें औरतें
अपने दल को नेतृत्व देती हुईं
उसी तरह खोजें मिलकर
अपनी भाषा, अपने जीवन-कौशल,
हथियार, औज़ार, आग, पानी, धूप
ठीक उसी तरह जैसे खोजे गए थे
संसार के शुरू में—
लैंगिकपूर्वाग्रहों के बिना
उसी आधार में जाकर
सभ्यताओं के शिल्प को ठीक करें
अपने रचनाशील हाथों से
सत्ता की बेईमानियों को उधेड़ दें
और अपनी भाषा रचें
जो सिर्फ़ प्रेम और त्याग से न लीपी गई हो
ग़ुस्से और विरोध के स्वर में बोल सकें
भाषा जिसमें दुःख, दुःख की तरह आए
ख़ुशी, ख़ुशी की तरह,
और रंग बचे रहें बनावट से…

संभावित पुरुष

हर समय में संभावित पुरुष पैदा किए जाते हैं

शिक्षा और संस्कार ग्रहण करते हुए बच्चे
अक्सर व्यस्त दिखाई देते हैं—
पुरुष बनने के अभ्यासों में
अपनी उम्र भूल कर वे ताक़त का प्रयोग करते हैं

शासकों-सा अनुभव झलकता है उनके चेहरों पर
जबकि उन पर मासूमियत को होना था
उनका हठीला बालमन कुचलता रहता है
घर की औरतों के सम्मान को,
बच्चियों के उजले मन को

बच्चियाँ हर मौसम में उदास रहती हैं—
घरों में मुरझाई हुई बेलों की तरह
औरतें पालती ही रहती हैं संभावित पुरुषों को

शासक पुरुष सत्ता सुनिश्चित करते हैं—
पुरुष उत्तराधिकारियों के लिए

और बच्चे अभ्यासरत हैं—पूरी शिद्दत से,
अनजान और विस्मृति में डूबे हुए!

मनचाही दुनिया

एक दुनिया जिसमें मैं हूँ—
भीड़ के बीचोंबीच
एक दुनिया जो मन के भीतर है
जहाँ नहीं पहुँचती भीड़ कोई
एक दुनिया जो है सभ्यताओं की
जिसमें मैं रहती हूँ—
सभ्यताओं के बीच
सभ्यताओं से पनपे शहर में
शहर की सभ्य भीड़ के साथ
इस शहर में
कोने वाले घर में
रहती हूँ मैं
और मेरे भीतर बसता है एक बीहड़—
सभ्यताओं से दूर
अपनी दुनिया में
जहाँ अनगढ़-सी बोली में
मैं रचती हूँ कच्ची कविताएँ!

***

अनुराधा अनन्या हिंदी कवयित्री हैं। वह हरियाणा के जींद से हैं और इन दिनों दिल्ली में रह रही हैं। उनसे [email protected] पर बात की जा सकती है। इस प्रस्तुति में प्रयुक्त तस्वीरें : कवयित्री के फ़ेसबुक अलबम से।

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