कविताएँ ::
अनुराधा अनन्या

Anuradha Annanya 20 poems
अनुराधा अनन्या

नानी की कहानी

मेरी नानी,
मेरी माँ की भी माँ ही थी

मुझे ताउम्र बनाती रही
सँवारती रही
किसी बनती-बिगड़ती तस्वीर की तरह

मुझे समझाती रही
बताती रही
औरतों के ज़िंदा रहने के जोखिम
ख़ुद को बचाने के तरीक़े
ख़ुद को मनवाने के सलीक़े
मेरी माँ की बेवक़ूफ़ियाँ
ख़ुद पर हुई ज़्यादतियाँ
और अपने सब्र की कहानी भी

घर के मर्दों पर रोब था उनका
बिगड़ैल मर्दों को इंसान कैसे बनाया जाता है
यह भी ख़ूब जानती थीं
न्याय की भाषा बोली सब समझती यहीं
वह ख़ालिस लड़ाकी थीं

मगर जब कोई कहता—
ये औरत, औरत-सी नहीं लगती

नानी फिर ख़ुद को भीड़ के लायक़
बनाने के जतन करती
पति की बात मानती
बेटे को बेटा बनाती
बेटी को बेटी
और फिर औरतों-सी
औरत भी बन जाती

उन्हें मेरे साँवले रंग की चिंता रहती
उन्होंने मेरे लिए लड़ाइयाँ भी लड़ीं
हालाँकि वे जीती कभी नहीं

उन्होंने मुझे वे तमाम नुस्ख़े दिए
जिनसे मैं सीधी, सुंदर, सरल बन सकूँ
मगर मैं मनमानी करती रही

फिर वे इस नतीजे पर पहुँचीं
कि मैं भी उनके ही जैसी हूँ
एकदम ख़ालिस लड़ाकी

ख़ैर, एक लंबे अरसे से हम दोनों दूर हैं

मगर आज भी देखती हूँ
ऐसे ही नानियाँ, दादियाँ
बच्चियों में ख़ुद को देखती हैं
और बच्चियाँ हैरानी से उन्हें

सोचना

क्या होगा
क्या हो सकता था
क्या बचेगा
क्या नहीं बचा
कितना सिर खपाऊँ
और उबाऊ है यह सोचना

एक बूढ़ी हो चुकी ढीठ माशूक़ा बंद कमरे में सोचेगी अपने माशूक़ के बारे में
जो किसी दूसरी जगह पर ज़िंदा रहने के नियमों का निबाह करता हुआ पाया जाएगा
ठहरकर देखेगा एक अलग नक्षत्र एक अलग जगह से और ठंडी साँस लेगा

ये ख़याल बहुत उम्दा है
कि लोग सारे हिसाब-किताब से ख़ुद को बचाकर भी सोच लेते हैं—
अपनी प्यारी चीज़ों के बारे में
और धड़कते हुए दिल अभी भी यक़ीन करते हैं
कि ये दुनिया सुंदर है।

एकांत

मैं अपने साथ हूँ—अकेली—
ख़ुद के खोल से उधड़ती हुई
मन की गाँठें खोलती
अपने आपसे सुलझती हुई

अपने अकेले जंगल में
अपनी अकेली धरती पर
चलती
रुकती
दम भरती
अपनी धुन पर थिरकती हुई

इस जहाँ से दूर
किसी और जहाँ में
जो सिर्फ़ मेरा है
मैं जिसमें मैं हूँ
और मैं अपने साथ हूँ—अकेली—
अपने ही मन के आँगन में
बेपरवाह
बेलिबास
बेलिहाज़
अपने पूरे बदन के साथ—अकेली—
ख़ुद अपनी रूह में उतरती हुई
मैं अपने साथ हूँ—अकेली।

अनुराधा अनन्या की कविताएँ इधर कुछ वर्षों में सामने आई हैं। उनसे और परिचय तथा ‘सदानीरा’ पर इस प्रस्तुति से पूर्व प्रकाशित उनकी कविताओं के लिए यहाँ देखें : विमर्श और यथार्थ में स्त्री

2 Comments

  1. Priyanka September 21, 2019 at 9:57 am

    Wahh.. Kitna Sundar ❤️❤️❤️❤️❤️
    Love🍁

    Reply
  2. अभिषेक आर्जव October 6, 2019 at 6:00 am

    मैं अपनी नानी को माँ कहता हूं। एक मज़बूत नानी का जीवन में होना आपको पूरी तरह बदल देता है। अच्छी कविता !

    Reply

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