कविताएँ ::
दिनेश श्रीनेत

poems by Dinesh Shrinet
दिनेश श्रीनेत

केलिडोस्कोप

पुराने टीन के डब्बों में जतन से सहेजी
वो लाल, हरी, नीली, बैगनी काँच की चूड़ियाँ
जो अक्सर छिटक जाया करती थीं कलाई से
केलिडोस्कोप के भीतर इंद्रधनुष बन जाती थीं
गत्ते के गोल खोखल के भीतर एक रंगीन संसार बसता था
थोड़ा-सा घुमाओ और बन जाता था एक नया पैटर्न
कितने ही रंग
कुछ माँ की चूड़ियों के
कुछ हमारी उम्मीदों के।

माँ कशीदाकारी करती थीं

माँ कशीदाकारी करती थीं
रंगीन रेशमी धागों से
और कढ़ाई दो सूती चादर पर
मेज़पोश पर क्रास स्टिच से फूल टाँकतीं
कभी सलाइयों से बनातीं गरम मुलायम टोपी
और उस पर एक काला ख़रगोश बिठा देतीं
कभी सीने पर सजे लाल गुलाब वाला स्वेटर
वो खिड़कियों पर क्रोशिए की झालर सजा देतीं
और मेरे लिए नींद की मुलायम चादर बनातीं
उनके पास क़िस्सों का एक छोटा-सा सुंदर तकिया था
जिससे सिर टिकाए जब मैं टकटकी लगाता
तो चाँद को मेरी खिड़की के ठीक बाहर सजा देतीं
और रात गए मेरे सपनों में चमकते मोती टाँकती रहती थीं।

छूटना

एक बार पिता की उँगली छूट गई थी मेले में
मैं अकबकाया-सा खड़ा रहा गुज़रती भीड़ और रोशनी में
जाने कहाँ से पलटकर आए पिता और लगा लिया गले
बहुत बाद में मैंने जाना कि भीड़ में सिर्फ़ हाथ नहीं छूटता
और छूटना बस वो नहीं था जो बचपन में हुआ
हम अक्सर छूट ही जाते हैं
जैसे मैं तुम्हारे साथ-साथ चलता रहता हूँ
और जाने कहाँ छूट जाता हूँ
मैं चलते-चलते तुम्हारी निगाहों को टटोलता हूँ
कि तुम पलटकर देखोगी कभी
कि कौन-सा पल, कौन-सी जगह थी वो
जहाँ मैं रह गया
मैं हँसी के ठहाकों में छूट जाता हूँ
दोस्तों के बीच छूट जाता हूँ
किसी से मिलने दरवाज़े पर दस्तक देता हूँ
और कभी का छूट चुका होता हूँ
पलटकर देखने की कोशिश करता हूँ
कहाँ छूटा था?
गाड़ी से गिरी पोटली की तरह
या किसी बेंच पर बैग की तरह बस वहीं रह गया मैं
वो क्या था जो पिता पलटकर आए थे…
छूटना दरअसल किसी के पलटने का इंतज़ार है।

कहानी

मैं एक कहानी हूँ
जिसे मैं ख़ुद सुना रहा हूँ
और ख़ुद ही सुन भी रहा हूँ।

इस कहानी में मैं सूरज उगाता हूँ
ज़ार-ज़ार रोता हूँ
गहरी नींद सोता हूँ
कहानी के भीतर एक और कहानी बनाता हूँ
फिर उन कहानियों के भीतर और कहानियाँ
मेरे सुनाने से पहले ही इस कहानी की शुरुआत हो चुकी थी
मेरे ख़त्म करने से पहले ही ख़त्म हो जाएगी ये
जिस दिन सुनाना बंद करूँगा
मैं ख़ुद ही भूल जाऊँगा अपनी कहानी
सिर्फ़ मेरी कहानी के किरदार ही याद रख पाएँगे मेरी कहानी।

इस बारिश में

बारिश अपने पीछे आवारा दिनों की याद लेकर आती है
जितने बादल घुमड़ते हैं उतनी यादें
जैसे आसमान से स्मृतियाँ बरस रही हों
बादल तो वहाँ भी छाए होंगे? तुम्हारे आसमान में
क्या वहाँ भी बरस रही होंगी स्मृतियाँ?
पानी में काँपते हम…
प्यालों से उठती भाप
और दूर क्षितिज से जाते बादलों की वह अलविदा वाली कौंध
क्या तुम्हारी आँखों में भी उतर आए होंगे बादल?

अपना हाल-चाल

बहुत दिन हुए
ख़ुद का हाल-चाल लिए
अपने अकेलेपन का हाथ थामे
टहलते-निरखते
ओस भीगी पत्तियों को…

सपनों से भी बातचीत बंद है इन दिनों
यादें भी पहचानती नहीं हैं मुझको
एकांत रातों में आवाज़ें दे-देकर
थककर क्लांत हो गया मन
कुछ ऐसे ही
व्यतीत होता है जीवन!

गुम आवाज़ें

कुछ आवाज़ें हैं जो आवाज़ों में दब जाती हैं
आँसुओं के बीच आँखों की नमी
जीवन के कुछ साल भी खो जाते हैं कभी-कभी
खिलंदड़े बच्चों में गुम हो जाती है घर की सबसे शांत बच्ची
एक बेहद ईमानदार दुख ट्रैफ़िक के शोर में गुम हो जाता है।

कई सुंदर सपने सुबह उठने पर कहाँ याद रह जाते हैं?

कई-कई बार कोई अपना-सा चेहरा भी याद नहीं आता
एक याद काग़ज़ की चिंदी-सी पीछे-पीछे भागती है कुछ देर तक
और फिर छूट जाती है दूर कहीं।

एक दिन

एक दिन,
मैं किसी काम का नहीं रह जाऊँगा
बोझ बन जाऊँगा
एक ही बात दुहराऊँगा अक्सर
पूछूँगा एक ही सवाल
निश्चिंत नहीं बैठूँगा
अपना ही कहा भूल जाएगा
काँपते हाथ उठाएँगे चाय की प्याली
बजने लगेंगे बार-बार कप-प्लेट
रात को खटके पर खुल जाएगी नींद
गाहे-बगाहे ज़िद पर उतर आऊँगा
काँपते हाथों से बाधूँगा बेल्ट
कसूँगा जूते के तस्मे
और उतरने लगूँगा सीढ़ियाँ
मेरे उन काँपते क़दमों में
कई-कई बरस शामिल होंगे
जब मेरे स्वाभिमान ने मुझे पलटना
और अनजान दिशा में तेज़ चाल चलना सिखाया
मेरे सीधे तनकर खड़े होने में
जून की दुपहरियों की अकड़ होगी
मेरी काँपती हथेलियों की छुअन में हर बार
हज़ार से अधिक प्रेम भरे स्पर्शों की स्मृतियाँ होंगी
मेरी झिझकती हुई मुस्कान में
जाने कितनी ऋतुओं के प्रति कृतज्ञता होगी
जिन्होंने मुझे सहना सिखाया
यक़ीन मानो मैं अपनी स्मृतियों की पोटली लिए
आने वाले कल के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना चाहता हूँ
पर मेरी धुँधली आँखों के पीछे का सूरज नहीं दिखेगा तुमको
तुम शायद ऊब ही जाओ मेरी परवाह करते-करते
चिढ़ जाओ मेरी परेशान करने वाली ज़िदों से
और छोड़ दो मेरे अकेलेपन में
मुझे बाल्कनी की धूप में ऊँघते हुए
सुनने के लिए अपने कानों में ईश्वर की फुसफुसाहट।

दिनेश श्रीनेत (जन्म : 1972) हिंदी कवि-कथाकार और पत्रकार हैं। उनकी पैदाइश गोरखपुर की है। सिनेमा पर उन्होंने कुछ उल्लेखनीय काम किया है। ‘पश्चिम और सिनेमा’ शीर्षक से उनकी एक पुस्तक वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हो चुकी है। वह दिल्ली में रहते हैं। उनसे dinesh.shrinet@gmail.com पर बात की जा सकती है।

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