कविताएँ ::
महेश वर्मा

hindi poet Mahesh Verma 92019
महेश वर्मा

सतह

कुछ ही चीज़ों को
सतह नहीं कह सकते
जैसे कि जलप्रपात

वह अनेक सतहों से बनी हुई
गतिमान संरचना है

जलप्रपात का रंगीन चित्र तो
सतह भी नहीं है
वह देखना है;
थिर आँखों से देखना

एक सतह हटने पर भी सतह दिखाई दे
जैसे अतीत के पीछे अतीत

धातु के पीछे (भी) ठंडा स्पर्श
एक गीली आत्मा के भीतर
अनेक गीली आत्माएँ, और उनके
उजले-नीले पारंपरिक बिम्ब

अब इसमें जानने की कोई जगह नहीं है

एक जादू-सा है : नहीं ख़त्म होने वाला

इन सबकी और अनेक सतहें हैं

और

उदास दिन कोई नहीं पुकारेगा। एक दिन अनंत बूँदों में अनंतकाल तक टपकता रहेगा। रात एक जगह बर्फ़-सी जम जाएगी, कोहरा सूर्य को ढँक लेगा। संगीत और रुदन सूख जाएँगे वाद्य पर और कंठ पर : प्यास रास्ता भूल जाएगी। भूलने की धूल भरी आँधियाँ उठती रहेंगी, उठती रहेंगी और यह धूल आँसुओं को सोख लेगी।

धूल पर भूल की परत, भूल पर धूल की परत,
आग पर राख की परत, आँख पर राख की परत

एक दुःस्वप्न अपने घर से बाहर धकेलेगा ठिठुरन में तो दूसरे बुरे सपने की झाड़ी अपने आग़ोश में खींच लेगी।

रात कभी ख़त्म नहीं होगी
न कोई दिन बीतेगा।

रेत करना

मरने से वापस लौटा तो ज़ प्रवचन की पात्रता लेकर लौटा था।

दो चीज़ें आपको रेत कर सकती हैं—एक है नींद और दूसरी भुला दिया जाना।

पहले सपने में एक नदी हुआ करती थी। जिस तक दौड़ कर पहुँचने और ठिठक जाने का नियत दृश्य हुआ करता था। पता नहीं कौन-सी बेईमानी से इस नदी को भी रेत कर दिया नींद ने। क्लोनाज़ीपाम की डूबती-सी नीली रोशनी में रात का अछोर समुद्र पार करते-करते ज़ सुबह तक मर जाया करता। वहाँ से लौटता तो ऐसी ही बातें करता।

दूसरी है भुला दिया जाना। जैसे आप अंबिकापुर में सोए हैं और नींद कोपेनहेगन के किसी व्यस्त इलाक़े में खुले। यह संसार को एक अचंभे में बदल सकता है। वहाँ कोई नहीं है दूर तक जो आपको पहचानता हो।

एक श्रोता ने उबासी लेते हुए कहा इससे तो अच्छा था यह सचमुच मर जाता और कभी नहीं लौटता।

पास

पास इतना है कि हाथ बढ़ाकर
छू सकते हो अँधेरे में

एक पास उससे भी नज़दीक है
जैसे कान की लौ

संगीत नहीं बजता है

निर्वात धीमे-धीमे रेत हो रहा आस-पास

सुनो बस

उसे गिरकर टूटने दो :

काँच की बेआवाज़ तश्तरी

यक़ीन करना है—छू सकते हो
छूकर देखना नहीं है

यक़ीन को भी छूकर नहीं देखना है
वह कान से भी पास है

फ़िर भी नहीं।

इसके बाद

इसके बाद मुस्कानों के चित्र समाप्त होते हैं
इसके बाद चुप्पियाँ शुरू होती हैं

हरेक चुप पर अलग-अलग एक-एक पत्थर
कि तेज़ हवा में पत्ते की तरह उड़ न जाए
हरेक चुप के रखने के लिए अलग-अलग कोना
कि कोई बोलने की जगह बच न जाए

इसके बाद चुप्पियाँ ख़त्म होती हैं
इसके बाद और गाढ़ा होता है एकांत
इसके बाद अकेला शुरू होता है

कहो तो भेज दूँ थोड़ी-सी,
उदासी, जो इसके बाद शुरू होती है

रहने दो, इधर पहले ही बहुत है

पता नहीं

पता नहीं कैसा मनुष्य है
उसको कोई प्यास ही नहीं है

कैसा मनुष्य है पता नहीं
कि पैर भूल गए हैं यात्रा
सिर उठाकर देखता नहीं आकाश
पूनम अमावस जानता ही नहीं
टूट-टूट गिरते रहें तारे
कोई इच्छा ही नहीं माँगने को

कहता है
कोई सपना ही नहीं देखा बीस बरस से

निर्वात से भी निर्वात है मन का आकाश

भूल गया भाषा
भूल गया है रुदन!

कैसा मनुष्य है
पता नहीं

एक परत जीवन

गीलापन भी एक सतह ही है
जैसे एक परत आर्द्रता

गीलेपन के पीछे गीलेपन की
अनेक सतहें नहीं हैं

न कोई वाद्यवृंद

सांत्वना की देवी
चील पर बैठ कर उड़ चुकी

बहुत से ख़ुश्क सिलसिले हैं पीछे की परतें
आप इन्हें बाद के परदे भी कह सकते हैं

एक बाद समाप्त होगा परदा गिरेगा
आप नेपथ्य से दूर होते जाएँगे

अंत में जहाँ कोई आर्द्र स्मृति भी क्षीण
आपको कोई नज़्म लिखनी चाहिए

कि पहले कैसा पानी हुआ करता था
उसे छू भी सकते थे, वग़ैरह

शर्त वही पुरानी है
कि न नज़्म में आँसू मिलाना है
न पानी में।

कान

इतनी साफ़ सुनाई देती है आवाज़
कि जैसे स्पर्श हो

कंधा छुए जाने पर
पलट कर देखना

वह बहुत दूरियाँ पार करके आई हो : आवाज़
या बहुत पास हो, जैसे पाँव तले
बजरी की चरमराहट या धड़कन (पाँव तले)

उसे प्रत्युत्तर नहीं चाहिए
एक भंगिमा दो
कि उसे सुन लिया गया है।

अक्स

नए दरपन का चेहरा
पुरानी संज्ञा के
हास्यास्पद संधि-विच्छेद से
मिलता-जुलता था

उसने अपने अधपके बालों को
थपथपाया और मेरी आँखों में
अपना चेहरा देखने लगा

हम दोनों खाली फ़्रेम की तरह
एक दूसरे के सामने खड़े रहे।

दबे पाँव

विस्मरण ऐसे ही आता है : दबे पाँव

गर्मियों में धूल आती है जैसे कमरे में,
सर्दियों में उदासी, ऐसे ही आती है भूल

विस्मरण दृश्य और हमारे बीच
कोहरे की तरह आता है
और पलकों पर अपनी ठंडक छोड़ जाता है

एक बार दबे पाँव मैं
अपनी चुप के नज़दीक पहुँच गया
वह लेकिन चुप थी, उसने
फिर भी सुन ली पदचाप
और मुझको सज़ा दी

दबे पाँव आती है उदासी
डर आता है।

ठंडा हाथ

ठंडा हाथ ठंडा स्पर्श छोड़ जाता है

अभी ठीक है तबीयत
इस आवाज़ की गूँज ख़त्म हो चुकी
और अब वह कहना कहीं दूर
इकहरे धागे की तरह हिलता है

ठंडी मुस्कान ठंडे हाथ से कम ठंडी
वह एक स्थायी चित्र है
उसे मोड़कर बटुए में नहीं रख सकते

ठंडा हाथ अँधेरा खोजता है
ठंडा हाथ अँधेरा खोलता है
वह अनिच्छा से आगे बढ़ता है
उसे तुम्हारी हार्दिकता नहीं चाहिए
उसकी उँगलियाँ सिगरेट भी अनिच्छा से पकड़ती होंगी

अपनी स्त्री का स्पर्श भूल चुका है।

महेश वर्मा हिंदी के सुपरिचित कवि-कलाकार हैं। वह अम्बिकापुर (छत्तीसगढ़) में रहते हैं। ‘धूल की जगह’ शीर्षक से उनकी कविताओं की एक किताब राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है। उनसे maheshverma1@gmail.com पर बात की जा सकती है

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