कविताएँ ::
मिथिलेश कुमार राय

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मिथिलेश कुमार राय

मैं सिर्फ़

मैं सिर्फ़ घूमूँगा-देखूँगा-सुनूँगा
और मन मसोसकर रह जाऊँगा
मैं उस तरह का एक चित्र कभी नहीं रच पाऊँगा
जिसमें धूप पचाते लोग करतब किया करते हैं

मैं बारिश पचाते
और सर्दी पचाते लोगों को
सिर्फ़ दूर से निहारूँगा
उनकी कोई तस्वीर कभी नहीं ले पाऊँगा

मैं सिर्फ़ नाचूँगा-गाऊँगा और सीटी बजाऊँगा
मैं कभी भूख पचाते लोगों को
शब्दों में बाँध नहीं पाऊँगा
मैं सिर्फ़ खाऊँगा-सोऊँगा
हद से हद एक समाचार लिखूँगा
मैं कभी उसके पेट में जाकर
अन्न का दाना नहीं ढूँढ़ पाऊँगा

मैं सिर्फ़ पढ़ूँगा-लिखूँगा
और आगे बढ़ूँगा
मैं कभी उनकी आँखों से
दुनिया की सुंदरता को नहीं निहार पाऊँगा

खेत जो अब गेहूँ के लिए सँवरने लगा है

धान के चले जाने के बाद
वह ख़ाली बैठा था
उसने देखा कि ऐसे ही चुप बैठे रहने से
बेकार की घास-फूस का मन बढ़ जाता है
उसने यह भी देखा कि लोग-बाग मेड़ छोड़कर
अब उसके सीने पर चलने लगे हैं

बकरियों के गले में बँधी रस्सी के छोर पर लगी खूँटी
उसके सिर में ठोकी जा रही है

उसने हरियाली के दिनों को याद किया
कि वे दिन कितने प्यारे थे
कोई निहारता तो उसकी नज़रों में नेह उमड़ पड़ता
हवा थमती थी
कुछ देर खेलती थी
सूरज और चंदा सब ठहरे हुए लगते

यह सब हरेपन का कमाल था

वह फिर हरा होगा
उसने सोचा
और गेहूँ के लिए सँवरने लगा

स्त्रियों का दौड़ना

अदहन चढ़ाकर
चावल लेने पड़ोस के घर तक दौड़ी स्त्रियाँ
पैंचा के लिए नहीं दौड़तीं
न ही वे क़र्ज़ के लिए दौड़ती हैं

वे स्त्रियाँ चावल, नमक, चीनी या तेल के बहाने
एक से दूसरे से तीसरे से चौथे से पाँचवें
और अंततः घर से घर को पिरोने वाली नेह की रस्सी पर
नेह चढ़ाने दौड़ती हैं

चीनी चाय की मिठास के लिए अब उतनी ज़रूरी नहीं
स्त्री के हाथ में थमा कप एक भरोसा होता है
जो जीवन को मीठा करने को उगता है
ख़ाली कप लिए स्त्रियाँ खौलते पानी को छोड़कर
जीवन की मिठास के लिए बग़ल के घर तक दौड़ती हैं

सब्ज़ी देखकर किसी की पसंद याद आ जाना
कोई मामूली बात नहीं
इसकी याद दिलों को प्यार से भरती है
और सब्ज़ी को स्वाद से
और भरी कटोरी देखकर
किसी के होंठों पर जो मुस्कान तिरती हैं
उससे एक घना वृक्ष जन्मता है

स्त्रियाँ इस वृक्ष का बीज बोने ही बग़ल के घर तक दौड़ती हैं

हमने जो किया

हमने नंगे बच्चों को देखा था,
देखकर अपने चेहरे पर उदासी की लकीरों को उगने दिया था
हमने बेघर लोगों को देखा था,
देखकर आँखों में क्रोध को तैरने दिया था
हमारी नज़रों के सामने से बीमार और लाचार लोग गुज़रे थे,
हम उन्हें देखकर दुख में डूब गए थे

हमारे सामने बिना हरियाली के दृश्य आए थे,
और हमने बातें की थीं कि वहाँ फूल रोपेंगे
हमने यह तय किया था कि कश्तियों को राह पर लाएँगे
दलदल में फँसे आदमियों की तरफ़ हाथ बढ़ाएँगे
और उनके हाथों को थामकर उन्हें बाहर खींचेंगे

यह हमारा अरमान था, हमारी ताक़त, हमारी भाषा
लेकिन हमने भी वही किया
जो नहीं करना चाहिए था

मल्हार गाना हमारी आदत है

मेरा घर फूलों के एक बाग़ में है
बाँसों के घने झुरमुटों के बीच
जामुन के वृक्षों से घिरा हुआ
मैं चिड़िया का पड़ोसी हूँ

मैं पगडंडी पर दौड़ता हूँ
मेड़ पर कुलाँचे भरता हूँ
काँटे मेरे पाँव को अपना समझते हैं
जब सावन आता है
मेरा घर नदी में आ जाता है
पानी पर दौड़ना अब तक मैंने नहीं सीखा

पानी में घर तैरता है
और फिर डूब जाता है
घर के ऊपर खड़े होकर
हम यह तमाशा देखते हैं

जब पानी घर से निकल जाता है
तब हम अपने घरों को
खेतों के बीच रोप देते हैं
और ऐसे हँसते हैं
जैसे कोई बच्चा
रोना स्थगित कर हठात् खिलखिलाने लगा हो

मल्हार गाना हमारी आदत है

***

मिथिलेश कुमार राय (जन्म : 24 अक्टूबर 1982) बिहार के सुपौल ज़िले से हैं। उनकी कविताएँ, कहानियाँ और टिप्पणियाँ सभी प्रतिष्ठित प्रकाशन माध्यमों पर नियमित प्रकाशित होती रहती हैं। उनकी कविताओं की पहली किताब प्रकाशन की प्रक्रिया में है। कुछ एक वर्ष पत्रकारिता करने के बाद वह फ़िलवक्त ग्रामीण क्षेत्रों में अध्यापन कर रहे हैं। उनसे mithileshray82@gmail.com पर बात की जा सकती है।

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