कविताएं ::
प्रज्ञा सिंह

प्रज्ञा सिंह

मैं हमेशा सोचती थी कि कम से कम एक कविता आपके लिए लिखूंगी. ऐसी कविता जो आपके काम आए. तकिये जैसी कि जब आप थक जाएं, तब उसके कंधे पर सिर रख लें. ऐसी कविता जो पुराने दोस्त-सी मिले और उछल-उछल कर बतियाए. तालाब के ठहरे हुए पानी जैसी. निरभ्र आसमान जैसी. अंखुआए हुए गेहूं जैसी. हरे शाल वाली धरती की कविता. पिंटुआ की कविता. उसकी माई की कविता. जलकर मर गई भुअरी की कविता. जो लाल-लाल आंखों से मुझे आज भी घूरती है. बहुत बतिया रही हो चाची. कम से कम एक गुलाबी कविता खटरी के लिए जिसके हाथ से हरदम गोबर की बास आती है. नीतू के लिए जो सोचती है कि भोर के चार बजे से पहले उठेगी तो और काम निपटा लेगी. मस्तवानी वाली अम्मा के लिए एक कविता जो सबसे अधिक दयू को गरियाती थीं कि वही तो सब के उल्टे-सीधे भाग बनाता है. अपनी सास के लिए जो एनीमिया से बयालीस में मर गईं. मैंने सोचा था अपने उस दोस्त के लिए एक कविता लिखूंगी जो कहता था तुम कितना भी तेज दौड़ो, नहीं गिरोगी और गिर भी गईं तो क्या. एक कविता उस भाई के लिए जो मेरे हिस्से की मार खा लेता था. अभिलाषा के लिए जो मेरे रोने पर रोती थी. मैं हमेशा सोचती थी कि कम से कम एक कविता आपके लिए लिखूंगी.

गंगा में

हहराती हुईं कुछ औरतें आईं
और गंगा में समा गयीं

कुछ भजन रह गए
बालू में चिपके

टहटह लाल सिंदूर था
तुलसी के सिरहाने
थकान थी उम्र भर की

चिंतातुर थीं
वे औरतें थीं
कि सोचती थीं
गंगा मइया के पास सरकारी नौकरी है
बेटियों के लिये उपयुक्त वर है

पति के बवासीर की कोई दवाई?
पूछतीं गंगा में डुबकी लगाती औरतें
अंचरा पसार गंगा के आगे
माथा नवाती

गंगा भी औरत थी
दुख जानती थी
मिट्टी के ढेले-सी गलती थी
बहती थी कि आग-सी जलती थी
उन दोनों को नहीं पता था
आसमान में भगवान की जगह
एक काला कौआ रहता है
आश्चर्य कि हहराती हुई
वे औरतें जिस गंगा में समा गईं
वह गंगा भी अब नहीं रही

सेल्फी

आपने सेल्फी ली
मै’म अच्छा किया
अच्छी आई है
अच्छा है
इसमें तो बिल्कुल ही नहीं आया
एड़ियों का चटकना
घुटनों की सूजन
गठिया का उभरना नहीं आया

आपने सेल्फी ली
मै’म अच्छा किया
अच्छी आई है
अच्छा है कि इसमें नहीं आई है
टूटे हुए मन की फांके
भीतर तक भर रहा अवसाद
नहीं आईं हताशाएं
जीवन भर का विषाद नहीं आया

आपने सेल्फी ली
मै’म अच्छा किया
अच्छा है कि इसमें उपेक्षा की खरोंचे नहीं आईं
दंश मारता अकेलापन
बढ़ रहा चिड़चिड़ापन
घरों का उजड़ापन नहीं आया

आपने सेल्फी ली
मै’म अच्छा किया
बदल दिया बैकग्राउंड
अच्छा किया मै’म

उसी कारण से

हिंदू को मर जाना चाहिए
क्योंकि वह हिंदू है
इसी एक कारण से मुसलमान को भी मर जाना चाहिए
न जाने किस कारण से
मर जाना चाहिए आदमी को
पेड़ों को मर जाना चाहिए
कि तमाम विस्तार के बाद भी
वे केवल पेड़ ही बन पाए
लड़कियों को मर जाना चाहिए
कि वे नासपीटी लड़कियां ही रहीं
उम्र भर
हवा को हवा होने के कारण
मर जाना चाहिए
मर जाएं तालाब की सब मछलियां
कि रंगीन छटपटाहट से भरे उनके जिस्म पर
सूर्य सरक कर रोज सुबह को शाम कर देता है
मरें तो मर जाए रोशनी
कि आखिर एक शांत यानी
लगभग मरणासन्न-सी दुनिया में खलबली भर देने का
किसी को क्या अधिकार है
चीजें जो हैं
जिन कारणों से हैं
उनको उन्हीं कारणों से मर जाना चाहिए
मर जाएं स्कूल
कि वहां एक बेहद मासूम बच्चे के लिए
तो कोई जगह ही नहीं है
घर के जितने हिस्से में घर है गिर जाए
कि इस तेज रफ्तार घूमती दुनिया में
वह कब तक टिका रहेगा
मर जाओ,
अर्द्धविकसित फूलो
अल्पविकसित फलो
नाजुक हृदय लोगो
निष्फल कामनाओ
जिस कारण हो
उसी कारण से मर जाओ

पहाड़

पहाड़ कैसे होते हैं? पानी की लड़की ने पूछा. कुछ पता नहीं. किसी को मालूम नहीं. पहाड़ को भी नहीं मालूम. पानी की लड़की कभी पहाड़ से नहीं मिली. शायद जो बहुत ऊंचे होते हैं पहाड़ होते हैं. जो झुक नहीं पाते. हंस नहीं पाते. बढ़कर किसी का हाथ नहीं थाम पाते वे पहाड़ होते हैं. अपने ही बोझ से दबे. छटपटाते. जो बहुत कातर होते हैं पहाड़ होते हैं. कमजोर से लोग जो बहुत तनकर चलते हैं पहाड़ होते हैं. पता नहीं. कुछ पता नहीं. पता नहीं पहाड़ कैसे होते हैं. पानी की लड़की अक्सर सोचती. उसे लगता सोने के लड़के जैसे ही होते होंगे पहाड़ भी.

मैं पूछती हूं

मुझे एक सिक्के की तरह उछालो
मैं चित और पट
दोनों स्थितियों में एक साथ गिर सकती हूं
मैं गिर सकती हूं बेआवाज
मैं बिना किसी सुनवाई के
लौट जाने वाली फरियाद को
दे आऊंगी अपना कंधा
उन भटके हुए लोगों में से नहीं हूं
जो लौट आएंगे शाम तक घर
मुझसे कहीं जाना ही नहीं हो सका
और मैंने खुद को खो दिया

एक जुगनू से पूछो मेरा पता
वह सारी रात अंधेरे में मुझे ढूंढ़ने निकलता है
और रोशनी की चिट्ठियां बांटकर लौट आता है

एक खाली टिन के पिचके हुए डिब्बे की तरह
मुझे फुटपाथ पर रख दो
मैं लोगों के पदचाप गिनती रहूंगी देर तक
सवा नौ से पहले निकल गई कस्बे की आखिरी बस
शहर से हड्डियों का पिंजर लिए तड़के पहुंचती है

मैं पूछती हूं
इसका मतलब क्या है
मैं पूछती हूं
उसका मतलब क्या है
मैं पूछती हूं
इस सारे ड्रामे का मतलब क्या है
मेरी अतड़ियों को पाजेब की तरह पैर में पहनो
खाल को सुखा दो धूप में
मुझे मेंढक की तरह बनी-बनाई दुनिया में
बेमतलब कूदने का शौक नहीं है

निजी दुख

यह मेरा निजी दुख है
कि पाकड़ पर इस बार पत्तियां इतनी कम आई हैं
कि चिड़िया चाह कर भी छुप नहीं पा रही
बेर के झुरमुटों के नीचे
एक लाल नाजुक दुपहरिया का फूल—
संकुचित-सा
बस मेरे हृदय में टंकित होता है
जब कि मैं उसके रक्तिम ठहाकों को
दूर-दूर तक छींट देना चाहती हूं
यह मेरा नितांत निजी दुख है
कि मेरे गांव के बच्चे जिस धुन पर नाच रहे हैं
वह नदी की एक तेज भंवर की तरह
उन्हें खींचकर ले जा रही है
मुझसे दूर
मैं उन्हें असहाय हाथ-पैर मारे बिना
डूबते देख रही हूं
खुद अगर डूब नहीं रही
तो उबर भी नहीं पा रही
सचमुच यह मेरा निजी दुख है
कि एक जर्जर बुढिया अक्सर मेरी कलम पकड़ लेती है
एक लड़की विलाप करती मेरे सपने में चली आती है
मेरी कल्पना में दूर गांव में
मेरी मां भूखी सो जाती है
मेरे बाप की पेंशन बंद हो जाती है
पड़ोस मे एक जवान लड़का फांसी लगा लेता है
दिप्पू काका का लड़का बंबई जाता है
पर आ नहीं पाता
यह मेरा निहायत निजी दुख है
कि एक एक दुख के सौ सौ पंख लगे हैं
रक्तबीज से वे बढ़ते और फैलते जाते हैं
मेरी आंखों से उतर कर आपके सपनों में चले आते हैं
यह मेरा निजी दुख है
कि मेरे दुख से आप दुखी हो जाते हैं

***

इधर कुछ समय से हिंदी के काव्य-दृश्य में सक्रिय और प्रकाशित प्रज्ञा सिंह की कविताओं के कई रंग हैं. इन सारे रंगों को यहां समेटना मुश्किल है. यहां उनकी एक झलक भर है. प्रज्ञा ने अपने अब तक के काव्य-कर्म से जिस विषय-वैविध्य, परिकल्पना, दृष्टि, संवेदना और सरोकार को अभिव्यक्त किया है, उसकी सामर्थ्य और सार्थकता इसके लिए बाध्य करती है कि उनकी कविता को महज स्त्री-कविता के क्षेत्रफल में सीमित न किया जाए. अपनी मूलगामिता और स्थानीयता को बचाए रखते हुए अपने संसार को सतत वृहत्तर करने की आकुलता प्रज्ञा की कविताओं को व्यापक बनाती है. आत्मलीन अभिव्यक्तियों के संकीर्ण दायरे इन कविताओं ने अब तक निर्मित नहीं किए हैं. ‘प्राप्तियों’ से बेपरवाह उनके व्यवहार में एक उल्लेखनीय काव्य-संघर्ष नजर आ रहा है. उनकी कविता कविता पढ़कर कविता लिखने और उसे प्रकाशित कराने के उन प्रयत्नों से दूर है, जो कवि को काव्येतर व्यस्तताओं में नष्ट कर देते हैं. कवियों की लिस्ट और लाइन दोनों से ही प्रज्ञा सिंह अब तक दूर हैं. एक सिनेमाई संवाद के सहारे कहें तो वह शायद जल्द वहां नजर आएं, जहां से लिस्ट और लाइनें शुरू होती हैं. उनसे pragyasingh2109@gmail.com पर बात की जा सकती है.

1 Comment

  1. प्रशांत विप्लवी June 18, 2019 at 3:49 pm

    कमाल की कविताएं हैं। एकदम दो टूक बात करने वाली प्रज्ञा सिंह की कविता उनके स्वर लहरियों में ही लग रही है।

    Reply

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