कविताएँ ::
प्रेमा झा 

PREMA JHA hindi poet
प्रेमा झा

लिपि

अजीब शक्लों में
लोग घूम रहे हैं
एक-दूसरे को नहीं पहचानते हैं
एक-दूसरे की भाषा
नहीं पढ़ सकते हैं
और जी लेते हैं
पूरा वर्तमान, भविष्य और भूत
उन्हें समझे कोई इसलिए
वे चित्रकारी करते हैं
गीत गाते हैं,
नाचते हैं या
फिर पूरे शहर में घूम लेते हैं
उनको जानो, उनसे बातें करो
मगर भाषा कहती है
वे अजनबी हैं
एक-दूसरे को नहीं पहचानते हैं
उन्होंने शिलालेखों को
नज़र भर देखा
और
इतिहास की बातें करने लगे थे
अपनी-अपनी भाषाओं में
उनको कोई नहीं समझ रहा था
वे दीवारों से बातें करते
आकाश को देखकर
गीत गुनगुनाते
और
जब भी उन्हें प्यास लगती
धरती को ताकने लगते
भाषा अब भी पकड़ में नहीं आई थी इनकी
सिवाय इसके कि
उनका रोना, हँसना, गाना और प्यास लगना
लगभग एक-सा था!
वे अब भी विशेष लिपि की खोज में हैं
और
कविताएँ पढ़ना चाह रहे हैं!

चुप्पी

एक छिपे घूँघट से दुख का दिन शुरू होता है
कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि
आपके पास आज की योजना क्या है
आकाश की गहराई देख रहे हैं?
क्या आप आज इतिहास पढ़ रहे हैं!
अब लिख लीजिए इसे
ख़ुशी हमेशा दुख के दरवाज़े के पीछे छिपती है
जब आपके पास सबसे अकेला पल होता है
ईश्वर आपको अपने हाथों में उठाए हुए होता है
क्या आपने कभी दुख की सचाई को स्वीकार किया है?
वह हमेशा अपने हमसफ़र के लिए एक लंबा रास्ता तय रखता है
मैं अपना दरवाज़ा खटखटा रही हूँ
दूसरी भाषा में इसका एक जवाब है
क्या आप अज्ञात के रहस्य की लय को जानते हैं?
हाँ, मुझे पता है
यह एक लंबी और अनंत चुप्पी है
जो एक आकाश की तरह है।

गुमनाम शाम हूँ

तुम चाहो तो मेरा इस्तेमाल करो
बेकार, बेवजह, बेवक़्त
नींद के तख़य्युल में गुमनाम ख़याल-सी हूँ
पेशानियों पर पड़े बल और माथे की लकीरें
जो मुझे छूते ही रफ़ूचक्कर हो जाते हैं तुमसे
तुम्हारा हँसता चेहरा जिसके लिए मैं कुछ भी कर दूँ
जो छू दो तुम
मुहब्बत समझूँगी मैं
मेरे गालों की सुर्ख़ी
अब बस कुछ बरस के लिए है
इससे पहले की मुरझा जाऊँ तुम तोड़ लेना
मैं बेहद हस्सास लड़की जिसे पूरा ख़याल है
तुमको मुहब्बत से लबरेज़ रखने का
इसलिए जब कल मैं उम्रदराज़ हो जाऊँगी
तुम्हारे लिए नई लड़की तलाशूँगी
तुम तब तक मुझसे इश्क़ करो
और एक आसमानी वस्ल से
नीम चढ़ी ख़ामोशी के सब तारों को
मुहब्बत की धूप में सुखा दो
जब शाम होगी
मैं लौ जला दूँगी
और दरिया के पार मीलों दूर चली जाऊँगी
मगर चाहती हूँ कि तुम मुहब्बत में रहना हमेशा
एक लड़की
जो युवावस्था में कविताएँ लिखने लग गई हो
तुम उससे प्यार कर लेना
मैं उम्र की कहानी में अब उपन्यास हो गई हूँ
तुम मुझे पढ़कर रद्दी में बेच सकते हो
मगर मैं चाहती हूँ
तुम कविताएँ पढ़ते रहो
और
उस स्वप्न-सीलड़की की आँखों में फँसे रहो
मैं इश्क़ सहर की गुमनाम शाम हुई हूँ अब!

***

प्रेमा झा की कविताएँ हिंदी की लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। वह इन दिनों एक उपन्यास लिखने के सिलसिले में शोधरत हैं। दिल्ली में रहती हैं। उनसे prema23284@gmail.com पर बात की जा सकती है।

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