कविताएँ ::
राखी सिंह

hindi poems Rakhi Singh
राखी सिंह

मध्यवर्ग

जिनके हिस्से में कम होती हैं ख़ुशियाँ
वे मध्यम मार्ग अपनाते हैं
कम-कम ख़र्चते हैं
बचत की कोशिशों में जुटे रहते हैं
फिर भी चरमरा जाता है उनका बजट

उनके सारे जतनों का मुँह
बंद करके छोड़े ताले की भाँति टेढ़ा मिलता है
जिसे वे छोड़कर तो सीधा ही गए होते हैं
उनकी कोशिशों के पाँव
उन्हें मिली सफलता की चादर से लंबे होते हैं
मुड़-तुड़कर ढाँकते हैं वे स्वयं को

वे जिन्हें नहीं मिलतीं विरासत में मुस्कुराहटें
किसी मज़दूर की भाँति कड़ी मेहनत से कमाते हैं—
थोड़ी-सी हँसी
और उसे सहेजते हैं
यह सहेजना उनकी तसल्ली है

वे तलाश में रहते हैं ऐसी योजनाओं के
जिनके तहत दोगुनी-चौगुनी होती हों—
खिलखिलाने की वजहें
प्रायः ये योजनाएँ हो जाती हैं ध्वस्त

वे पूरी ताक़त से जुट जाते हैं फिर—
नई नीतियों के जुगाड़ में।

वर्षा-गीत

कुछ लड़के बारिश बनकर आते हैं
बादल का छोटा-सा टुकड़ा लिए
बरसने को तत्पर
नीली पोशाक वाले
उद्दंड बूँदों से लड़के!

हरी-भरी फूलों से लदी क्यारी-सी गीली-सीली लड़की
यूँ निहाल होती है
कि मानो जन्मी ही मरुस्थल में हो
कि जैसे उसकी पिछली कई पीढ़ियों ने
कभी मेघ का कोई दृश्य नहीं देखा
जबकि अभी-अभी होकर आई है वह पिछली बरसात से—
मिट्टी-सी वह नम लड़की

क्योंकि मन की देह धँसीली है
अ-भार छींटों के भी उभर आते हैं अक्षर

इन्हीं अक्षरों से सूखे के दिनों के लिए
लिखे गए हैं वर्षा-गीत
जलधर की कामना में जिन्हें गाती हैं
मेरे गाँव की
भींजने को आतुर लड़कियाँ।

गंगा से मिलकर

मैं उस समय और उस परिवेश में जन्मी
जब हवा में यात्रा करना स्वप्न सरीखा था
लोग जीवन में कम से कम एक बार अवश्य
इस स्वप्न को साध लेने का स्वप्न देखते थे
उन दिनों जब हवाई जहाज़ को निकट से देखना
कौतूहल का विषय हुआ करता था
मैं नदी किनारे जाने के बहाने तलाशा करती थी
जब लोगों की दृष्टि आकाश में उड़ते जहाज़ पर टिकी होती
मैं नदी के सीने पर हिलकोरे लेती नाव देखा करती

नदी में पाँव डालकर बैठना
नदी के जल को स्पर्श करना
मुझे किसी रहस्य को भेदने-सा प्रतीत होता

अब जब हवा में यात्रा करना सुलभ हो चला है
मैं अब भी पानी में हिलती नाव पर
एक लंबी यात्रा करने का स्वप्न देखती हूँ—
एक गीत जितनी लंबी यात्रा…

राखी सिंह की कविताएँ गए कुछ वर्षों में सामने आई हैं। वह पटना में रहती हैं। उनसे iamonlyrakhi@gmail.com पर बात की जा सकती है।

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