कविताएँ ::
शशिभूषण

Shashibhooshan
शशिभूषण

प्रार्थना

जब चिड़ियों का जगना होता है
दिशाएँ ओस नहाती गहन गगन की
मेरी आत्मा के नीले अंतरिक्ष में
प्रेम का सूरज उगता है
मैं करता हूँ प्रार्थना
हर उस भूखंड के लिए
जहाँ समय के सिपाही व्रत लेते हैं
बचाने के लिए कत्थई धरा के रंग
हरा और लाल!

किताबें

मैं जब-जब रोया
किताबों ने मेरे आँसू पोंछ दिए
मुझे किताबों ने बहुत रुलाया
और कभी कठोर नहीं होने दिया

मैं जब-जब जीता किताबों ने मुझे दुलार दिया
मुझे किताबों ने कई बार हराया
लेकिन पराजित होकर टूट नहीं जाने दिया

मैं जब-जब लड़ा किताबों ने मुझे हथियार दिए
मुझे किताबों ने बुरी तरह घायल किया
लेकिन कभी करुणा वंचित नहीं होने दिया

मैं जब-जब लोगों से जुड़ा
किताबों ने मेरे कंधे मज़बूत किए
मुझे किताबों ने एकांत प्रेमी बनाया
लेकिन कभी रुदन-कलरव से दूर नहीं होने दिया

किताबों ने मुझे दुनिया भर के विध्वंस ही नहीं दिखाए
अपने भीतर ढलने वाली कुल्हाड़ी भी दिखाई
निडर होना, भार लिए जीना
झुकना-उठना, बच्चों के लायक़ होना
बड़ों की बीमारों की सेवा करना सिखाया

किताबों ने मुझे प्रेम करने लायक बनाया
किताबों ने मुझे बाग़ी हो जाने दिया
लेकिन दीवानगी में कभी ग़ाफ़िल नहीं होने दिया

जब लोग या तो मेरी राह रोकते रहे
या उपकार करके पालतू बना लेना चाहते रहे
तब किताबों ने मेरा हाथ पकड़ा
खुद्दारी से पार हुए कठिनाइयों के काँपते पुल

मैं मन ही मन करता हूँ प्रार्थना
पूँजी, हिंसा, धर्म और धोखादेह राष्ट्रवाद के हाथों में पड़कर
किताबें कभी इंसानों को दग़ा न दे पाएँ
सच्ची किताबें हम सबको अपनी शरण में लें।

पालतू हो जाने के बाद

कल शाम सड़क पर हाथी देखा

रास्ता चलते हाथी दिख जाए तो शुभ होता है
ऐसा मानते हैं लोग

मैंने ग़ौर से देखा हाथी को कल
महावत की शाही बैठक
हाथी की अधीन चाल

जड़ रहा था लात महावत हाथी की गर्दन पर
प्रणाम कर रहे थे आते जाते लोग
धीमे-धीमे हिलता हुआ जा रहा था हाथी

बड़े से बड़ा क़द भी उधर ही जाने लगता है
जिधर ठेली जाती है गर्दन

मैने देखा
पालतू बना धरती का सबसे बड़ा जीव
तो सिर से लतियाया जा रहा है
पूज रही है दुनिया

आदमी का जवाब नहीं
बन सकता है महावत
बना लेता है किसी को भी पालतू

केवल पेट-पीठ रह जाते हैं
एक बार पालतू हो जाने के बाद।

नाम

एक लड़की गाँव में
उपले पाथती हुई
लिखती है उस चरवाहे का नाम
जो उसे सबसे सुंदर समझता है
चोरी से दिए गोबर के बदले
उससे कुछ नहीं चाहता

वह रात-दिन उसके सपने देखती है
घर लीपते हुए, रोटी सेंकते हुए

उसकी आँखों में वही मुस्कुराता है
उसके होंठों में वही गुनगुनाता है

धीरे-धीरे कड़ी धूप में सूख जाते हैं उपले
सूख जाता है उनमें उकेरा हुआ नाम
एक दिन गोबर से पीले हुए लड़की के हाथ
हल्दी की चटख में खो जाते हैं

फिर तो चूल्हे में लगते हैं उपले
लड़की के सीने में सुलगता है नाम
धुँआती हैं आँखें जीवन भर!

मारना

मुझे किसी समय मारा जा सकता है
मेरा सब छीना जा सकता है एक इशारे पर
बार-बार बोले गए झूठ मिटाएँगे मेरा सच
आरोप छा जाएँगे मेरी करनी पर
मुझ पर थोपी जाएगी दूसरी पहचान
जिसके लिए क़ानून में सज़ा हो

अन्याय होगा न्याय की ज़रूरत-सा

जान के भूखे मारते हैं
सबसे भागते हैं
छुपते हैं कि कोई पहचान न पाए
लेकिन मुझे मारने वाले
हाथों में किताब लेकर आएँगे
पहने होंगे सूट-बूट
झूठ विनम्रता से बोलेंगे
मेरे बयान पर मुस्कुराएँगे
जैसे दूध में पानी मिलाया जाता है

आदेशों, अनुशासन और उचित माध्यमों के
शानदार अनुपालन से
मैं रोज़ अकेला होता जाऊँगा

जैसे दलित को दान मिलता है
मुझे न्याय मिलेगा

संसदीय भाषा में बड़ी संक्षिप्ति के साथ
अंत में कहा जाएगा—
मेरा सज़ा पाना ज़रूरी है

कुछ लोग जिन्हें ख़तरे का अनुमान होता है
थोड़े और लायक़, थोड़े और आज्ञाकारी हो जाएँगे
महत्वाकांक्षी फ़ैसले की भाषा के कायल होंगे

मेरे सम्मानित हत्यारे की तरक्की होगी
जैसे निर्दोष क़ैदियों को जेल अपराधी बनाता है
और जेलर ईनाम पाता है

मुझे किसी क्षण मारा जा सकता है
यह मेरा डर नहीं है

जीवनरक्षक परिस्थितियों में
अपनी वैधानिक हत्या के लिए गढ़े गए सबूतों,
जुटाए गए हथियारों को देख लेना है
इस तरह मारे जाना है
कि बचने की कोशिश में और मारे जाएँ

इतना निरापद मैं
मेरे पक्ष में कोई नहीं बोलने वाला
मारने वाले जानते हैं
अपनी बारी आ जाने से हर कोई डरता है

लेकिन जिसने हाकिम को हत्यारा देख लिया
जो बोलता है,
वह चुपचाप नहीं मिटेगा।

***

[ शशिभूषण कथा, कविता और आलोचना के इलाक़े में सक्रिय हैं। यह सक्रियता समयांतरालों पर कभी-कभी कुछ धुँधली दृश्य होती है… लेकिन वह अपनी स्थानिकता जानते हैं और इसलिए वहाँ लौट आते हैं, जहाँ के वह हैं। उनका व्यवहार इन दिनों साहित्य से संबंध रखने वाले किसी सांस्कृतिक-सामाजिक कार्यकर्ता सरीखा है, ये व्यवहार अब बेहतर लेखन में कम ही मदद करता है। शशिभूषण की कविताओं में अपने समय को एक खुली नज़र से देखते हुए विस्थापन, मध्यवर्गीय दुख और अपराधबोध के कई क्षण आते हैं। इनमें बहुत पुरानी, लेकिन कभी जंग न खाने वाली चीज़ों की वकालत है और एक सही मनुष्य की तलाश भी। शशिभूषण हिंदी-शिक्षक हैं, आज शिक्षक दिवस है और उनका जन्मदिन भी। वह उज्जैन में रहते हैं। उनसे gshashibhooshan@gmail.com पर बात की जा सकती है।]

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