कविताएँ ::
सोमेश शुक्ल

hindi poet Somesh Shukla 2792019
सोमेश शुक्ल

एक

मैं उन आवाजों से ग्रस्त हूँ जो सुनाई नहीं देतीं।

दो

मुझे फूल, मिट्टी, स्त्री से अधिक हवा की गंध पसंद है।

तीन

छोटी से छोटी जगह के पार देखने पर भी जीवन दिखता है—‘जीना’ किसी छेद में छेद होने जैसा है।

चार

कुछ ऐसे रहस्य हैं, जिन पर कोई परदा नहीं।

पाँच

जब मैं कहीं कुछ नहीं देखता हूँ तो मुझे ईश्वर दिखाई देता है।

छह

रास्ते के बग़ल में पेड़ से एक पत्ता टूटकर गिरता है और एक नया रस्ता बन जाता है।

सात

किन्हीं दो रंगों के बीच अंतर का भी एक रंग होता है, मुझे अंदर से वही भरता है।

आठ

ईश्वर किताबों से हमें देखता है, पन्ने पलटना उसकी आँखों का झपकना है।

नौ

कमी हमारी सामूहिक सफलता है।

दस

आदमी को इतना सरल होना चाहिए कि जब किसी चीज़ को देखे, तो वह चीज अपने आपको कुछ और न समझे।

ग्यारह

संसार का बचा हुआ रंग भी टपक जाना है—फूल-फूल होकर।

बारह

जो मेरा नहीं है के अलावा मेरे पास कुछ नहीं है।

तेरह

मेरा लौटना मुझसे भी अधिक था जो कम से कम की गई मेरी प्रतीक्षा में आ गया।

चौदह

ख़ाली पन्ने वैचारिक अभाव के लिखित दस्तावेज़ हैं।

पंद्रह

जैसे ही हम चोर के पीछे भागे लुटेरे हो गए।

सोलह

मैं उस बात को अपने में दुहराता रहता हूँ जिसे कहने का कोई तरीक़ा नहीं है।

सत्रह

अपनी पीठ न देख पाने के अतीत में पलटते रहने की स्मृति है।

अठारह

किसी भी तरह की सोच मौन और संगीत के बीच ही बनती है।

उन्नीस

देखने में सबसे बेहूदा चेहरा उस आदमी का होता है जो अपने लिए सोच रहा होता है।

बीस

मेरा नाम किसी की उतरन जैसा है… पता नहीं मुझसे पहले यह कितनों का रहा होगा, इसलिए जब भी मैं अकेला होता हूँ; इसे उतारकर अपने से दूर फेंक देता हूँ।

सोमेश शुक्ल हिंदी कवि-कलाकार हैं। उनसे और परिचय तथा ‘सदानीरा’ पर इससे पूर्व प्रकाशित उनकी कविताओं के लिए यहाँ देखें : थोड़े समय से बच गए अनंत समय में

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