कविताएँ ::
सौरभ राय

सौरभ राय | क्लिक : पीवी

असंख्य ब्रह्मांड और मेरी ट्रेन

विज्ञान कहता है—
असंख्य ब्रह्मांड हैं
घटते हैं जिनमें असंख्य यथार्थ
एक साथ

यानी जिस ट्रेन पर मैं सवार हूँ
वह भी कई दिशाओं में बढ़ रही है—
अलग-अलग रंगों की ट्रेन
किसी के मैं भीतर बैठा हूँ
और किसी के नीचे कुचल गया हूँ—
घर से निकलते ही।

ऐसा ब्रह्मांड ज़रूर है
जहाँ ट्रेन हमेशा समय पर पहुँचती है
लेकिन ऐसा ब्रह्मांड भी है
जिसमें अपने आप मुड़ जाती हैं पटरियाँ
और मैं जहाँ से चला था
वहीं पहुँच जाता हूँ।

वह ब्रह्मांड मैं देखना चाहूँगा
जहाँ अचार का डिब्बा खुलते ही
धूप खिलती है
बशर्ते हम दूर रहें उस ब्रह्मांड से
जहाँ मूँगफली फोड़ते ही
रुक जाती है ट्रेन।

जिस ब्रह्मांड में ट्रेन
उड़ती चिड़ियों का झुंड है
वहाँ मैं डूबते सूरज का सिग्नल जलाकर
करता हूँ क्षितिज पर इंतज़ार।

जिस ब्रह्मांड में ट्रेन है विस्तृत एक नदी
वहाँ मैं गिरता हूँ झरने के साथ,
टनल से गुज़रने की तरह।

और अगर सचमुच ब्रह्मांड असंख्य हैं
तो सोचकर अजीब लगता है
कि किसी में ट्रेन तारों की शृंखला है
किसी में मेरी नोटबुक पर आड़ी-तिरछी रेखाएँ
और किसी ब्रह्मांड में ट्रेन रस्सी है
अघोरी की खोपड़ी में
साँप बनने को तैयार।

मेरे ब्रह्मांड में फ़िलहाल ट्रेन रुकी हुई है
जो गर्म चाय का कप भरवाकर
हाथ में लेते ही
झटककर चल देती है।

अनिद्रा

आँखें बंद रहती हैं

उचकती है गरदन की नस
छुटपन की एक सहेली
मेरी हथेली पर फ़ाउंटेन पेन गड़ाकर
गोदती है अपना नाम
और अचानक संतरे के छिलके का रस
आँखों में झोर
भाग जाती है चौखट्टा लाँघ,
खिलखिलाती हुई।

पानी की सतह पर
उछलता है कंकड़ कई-कई बार
डूबने से पहले।
दो हिस्सों में विभाजित
काई-ढका तालाब
गड्डमड्ड डोलता है
सिरहाने मेरे।
पानी में डूबे पैर
महीन कीचड़ से लिपटे धँस जाते हैं
और भी गहरे पानी में।

टूटी हुई बाँबी से लगातार निकलती हैं चीटियाँ
मँडराते हैं मेरे कान की कंदराओं में विचार जलती मशाल लिए।

मुझे याद आता है उन्नीस का पहाड़ा
कोका कोला पीती नायिका का मुँह
पहले एक्सीडेंट का स्वाद,
ख़ुशबू अस्पताल की।

पंखा घूमता रहता है
फ़ोन में घड़ी के काँटे
टिकटिक आवाज़ नहीं करते
अभी थोड़ी देर में चनक जाएगी रात शीशे-सी
चीख़ पड़ेगा अलार्म
जैसे पीठ पर बैठा मुर्ग़ा
और मैं सो जाऊँगा पलटकर,
माथे पर तकिया ढाँप।

सोई बिटिया

मेरी गोद में
समुद्र भर आया है।

गहरे समुद्रतल से सतह तक तैरती आईं
उछलने को तैयार मछलियाँ
तुम्हारी आँखों का कौतूहल है
अपने अनमनेपन में जानती हैं जो—
चाँद एक झुनझुने से बढ़कर कुछ नहीं है।

तुम्हारे आने में कोई कविता नहीं थी
काँप रहा था मैं
घास की अकेली पत्ती जैसे काँपती है
बारिश टूटने से पहले।
अपने शहर में आगंतुक
मैं लगातार दौड़ रहा था
गिर रहा था धड़ाम-धड़ाम
सड़क के गड्ढों में
अस्पताल के बिस्तर पर
बादलों के पीछे कहीं

अट्ठारह घंटे प्रसव के बाद
बाहर आया था तुम्हारा सिर
बहुत साफ़ और नाज़ुक चीज़
चेहरे पर ज़िद लिए
और थकान
और सुकून…
तुम कमरे में सबसे छोटी थीं
जिससे सब डरे हुए थे

मुलायम गमछे में लिपटी
अब तुम महफ़ूज़ हो
दूध से भरी हुई
डकारती, हिचकियाँ लेती
बड़ी हो रही हो लगातार
कनखियों से देखती हो मुझे
पूछती हो उँगली पकड़कर
मुझसे मेरा परिचय।

मेरे हृदय में
पेड़ उग आया है
तितलियों की तरह मेरी बाँह में मँडरा रहे हैं
तुम्हारे पैरों के निशान
अपनी भाषा में समझा रही हो तुम मुझे
कि तिलिस्मी कहानियों में
जिन्न को क्या चाहिए होता है
कि बिना आँसू बहाए रोना
सबसे अच्छा रोना है
कि इस ऊबड़-खाबड़ पृथ्वी में
गोद से समतल जगह नहीं

डोलते सिर पर
टिकी रहती हैं एकटक आँखें
घुमाती हुई दोनों हाथों की उँगलियाँ
तुम हवा में बनाती हो टाइम-मशीन का ढाँचा
जिसे आधा समझाकर
सो जाती हो

गीली मिट्टी की तरह
मेरे हाथों में धँस गई है
तुम्हारी नींद।

राजचिह्न

निर्बाध दाढ़ी वाले चार शेर
पीठ टिकाकर बैठे
घोड़े
बैल
और पहिये पर
मेरे देश का राजचिह्न है।

एक शेर पर्याप्त है
श्रीलंका के लिए
तीन पैर पर खड़ा
चौथे से तलवार पकड़े।

मलेशिया बाघ है
सिंगापुर के ठप्पों पर
खड़ा है शेर के साथ
शेर का बैनर लिए।

बुल्गारिया के राजचिह्न में तीन शेर हैं
बैनर के दो तरफ़ जो एक जैसे लगते हैं मुस्कुराते हुए
बैनर पर तीसरा
हवा में पंजा लहराकर
अपने आपसे लड़ता हुआ।

हालाँकि पूरे यूरोप में शेर विलुप्त हो चुके हैं,
ब्रिटेन के राजकीय मुहर पर
नौ शेर हैं
बैनर पकड़ा हुआ एक
सात बैनर में
और बैनर के ऊपर रखे मुकुट पर बैठा नवाँ
जिसने मुकुट पहन रखा है।

राजा शेर हैं
बाक़ी सब शिकार।

***

सौरभ राय हिंदी की नई नस्ल से वाबस्ता कवि-अनुवादक हैं। वह बेंगलुरु में रहते हैं। उनसे sourav894@gmail.com पर बात की जा सकती है।  इस प्रस्तुति से पूर्व उन्होंने ‘सदानीरा’ के 20वें अंक के लिए जापान के प्रसिद्ध कवि मात्सुओ बाशो (1644-1694) की कविताओं का अनुवाद किया था :

डुबुक !

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