कविताएँ ::
वीरू सोनकर

Veeru Sonker poems
वीरू सोनकर

काम पर लौटने का समय

क्या होगा,
मैं नहीं जानता

पेड़ों की हज़ारों-हज़ार हरी हथेलियाँ यूँ ही यात्राओं की थकी नसें सहला रही होंगी
नदी अपनी सीवन को फाड़ते हुए बाहर नहीं निकलेगी

बिस्तर पहले की तरह ही बदलते रहेंगे
आरामदायक गुफाओं में

हमारे स्वप्नों में उड़ रही मछलियों से हार चुके
देह के भीतर उल्टे लटके चमगादड़ हर सुबह निकल भागेंगे चीख़ते हुए

रेत-घड़ी की तरह लगातार रिस रहे रक्त में हमारा यह समय सर से पैर तक भीग चुका है

भाषा मे सबसे ख़राब गाली
अपने तत्सम रूप में आकर शालीन हो रही है

सबसे अच्छे कवि सबसे ख़राब कविताएँ लिख रहे हैं
सबसे ज़िम्मेदार संपादक सबसे बड़ी ग़लतियाँ कर रहे हैं

सबसे निर्मम सरकार ने कह ही दिया है
कि वह बचाएगी
हवा के भीतर गंध!
प्यास के भीतर तृप्तता!
रक्त के भीतर नमक!
वह सड़क के ऊपर से हटा लेगी कील की तरह खाल को भेदती कड़क धूप
पानी की आवाजाही सुनिश्चित करेगी वह
मिट्टी का स्वाद बचाने के लिए
वह नदी के भीतर घुल चुके संदेह को दे देगी देश-निकाला

उसका दावा है कि वह एक नया और गर्व-संपन्न इतिहास देगी
उसका वादा है कि वह हर दावे में अभिनय-कुशलता के साथ खड़ी होगी

वह भर देगी मंचीय भाषा के सभी वाक्यों में
अतिशयोक्ति और शब्दों में अनुस्वार!

कठोर चेतावनियों और तनी हुई क्रोध भृकुटियों से जब तक नहीं पहचानने लगते हैं बच्चे
कि यही है हमारा देश-प्रधान!
तब तक वह सुधार-कार्यक्रम ज़ारी रखेगी

यहाँ सुधार-कार्यक्रम से आशय यह नहीं है कि देश में कुछ नया होगा
इसका स्पष्ट आशय है
कि वह नागरिकों को सुधार देगी

वह चाहती है
कि मैं भी उसके साथ हो जाऊँ

यहाँ मैं सिर्फ़ मैं नहीं हूँ समकालीनो!

यहाँ ‘मैं’ से आशय है—
समय के भीतर मेरे साथ सो रहे सभी हस्तक्षेप!

इसके भीतर सो रहे सभी लोग आते हैं
इसके भीतर सोने के अभिनय में शामिल सभी लोग आते हैं
इसके भीतर मृत हो चुके लोग नहीं आते हैं
इसके भीतर सुंदर शब्दावलियाँ तलाशते कवि नहीं आते हैं

मैं नहीं जानता
सबसे ज़रूरी कविताएँ कब प्रभात-फेरियों में गाई जाएँगी
सबसे ज़्यादा चिढ़े हुए लोग अभी भी जीवित हैं या नहीं
सबसे ज़्यादा सजग ख़बरनवीस कब तक ग़ैरज़रूरी ख़बरों से धोते रहेंगे अपना चेहरा

मैं नहीं जानता कि
कब तक प्रेमपत्र लज्जा का विषय रहेंगे
कब तक खींची जाएगी खेतों की खाल
कब तक आकाश सह पाएगा पीली पड़ चुकी प्रार्थनाओं का रोज़ बढ़ता वजन

देश के बूढ़ों की आँख अब मछली की आँख क्यों नहीं लगती?
वे सन्नाटे को किस भाषा में घूरते हैं?
वे किस भाषा मे गढ़ते हैं अपनी चुप्पी?
वे संसार के सबसे अबूझ रहस्य में कब और कैसे बदल गए?
वे कहाँ चले जाते हैं अपने हिस्से की हार पहाड़ की गोद मे रख कर?

मैं नहीं जानता
एक अकेला खड़ा पहाड़ कितने बूढ़ों की हार से दबा है
उसकी पीठ से रगड़ खा-खा कर हवा में कहाँ से आ गई है इतनी सारी नमी

मैं एक अकेले खड़े उदास युवा को जानता हूँ
जो शायद ख़ुद को नहीं जानता!

जो चुपचाप देखता है कि
ऐसे कठिन समय से लड़ने का बीड़ा उठाए कुछ कवि
अपनी गुदा में उँगली डाल कर
उसे सूँघते हैं
और चाटते हुए कहते हैं
वर्ष 2018 में नई कविता का स्वाद यही है

वे युवा 2018 से घबराए हैं
मैं कहना चाहता हूँ
कि उन्हें 2019 से घबराना चाहिए!

यह युवाओं के बूढ़े होने का समय क़तई नहीं है
यह बचे हुए बूढों के रहस्य का ताला खोलने का समय है

यह जूतों के तस्मे कसने और जेब में नदी भर कर निकल पड़ने का समय है
कि सत्ताएँ हारी हैं पहले भी बुरी तरह
यह गए दिनों को पलट कर देखने का समय है

यह स्वीकृतियों की भिक्षा माँगते हुए
कविता की बेमक़सद अंध-गलियों में भटकने का समय नहीं है

यह कवियों के काम पर लौटने का समय है।

शोर

सन्नाटे के पैर में
कील धँसी है

लँगड़ाता हुआ यह
सड़क से चढ़ आता है मेरे घर की छत तक

कभी-कभी मेरे भीतर से निकल कर कूद जाता है
नदी के भीतर

मूक तितलियाँ देर रात तक लौटती हैं फिर मेरी छत पर
यह बताते हुए कि सन्नाटे ने सिखा दी है
मछलियों को एक नई भाषा

फिर तितलियाँ ही बताती हैं
उन्होंने उड़ना सीखा है
उस सन्नाटे से

मैं कैसे बताता
कि वह छोड़ भागा है मेरे भीतर
अपने पैरों से निकला एक नुकीला सच!

शब्दकोश

मेरी डायरी में छुप कर रहती हैं—
छिपकलियाँ

तकिए को उठाते ही निकल भागती है
कई बार एक मछली की चीख़

मैं पानी पीता हूँ
तो लगता है कई बार
कि धरती के सारे चमगादड़ बुझा रहे हैं अपनी प्यास
मेरे गले मे लटक कर

कल जंगल मे उल्टी लटकी एक अनजान लाश मिली थी

यह अजीब था
कि उस लाश ने अपनी शिनाख़्त मुझसे पूछी

ठीक उसी पल
मेरे हिस्से में आई एक सबसे आसान भाषा
मेरी आँखों से निकल भागी

मेरी डायरी, तकिया और प्यास के भीतर
अब कोई नहीं आता

मेरी आँखों से झाँकता है अब
एक मर चुका साँप

मेरी भाषा को सारे शब्द अब यही देता है।

यात्राएँ

सभी खिड़कियाँ यह सोचती हैं
कि हो जाना है एक दिन उन्हें दरवाज़ा

वह प्रतीक्षाओं के ताखे में
एक उम्र की तरह लटकी रहती हैं

खिड़कियाँ नहीं बनतीं कभी भी दरवाज़ा
वे बनती हैं एक दूर बैठी दुनिया

मछलियों की सबसे बेहतरीन सहेली खिड़कियाँ
सबसे पहले बाँधती हैं उनके पैरों में
भागने का भूत!

मछलियाँ ही देखती हैं
कि खिड़कियों की आँख में पड़ गया है एक रिस रहा घाव

मछलियाँ जितना देखती हैं
सूखता है उतना ही खिड़कियों का ताप

यूँ ही नहीं भागती हैं अकेले मछलियाँ
वे पहले देखती हैं खिड़की की आँख में उतराया समुद्र
वे बनती हैं नदियाँ
खिड़कियों का हाथ पकड़ कर निकल जाती हैं
दरवाज़े से,
फिर वे होती हैं तितलियाँ!
फिर उनके पंखों की आँख से झाँकती हैं खिड़कियाँ!

***

वीरू सोनकर हिंदी की नई नस्ल से वाबस्ता कवि-लेखक हैं। उनका पहला कविता-संग्रह प्रकाशन की और पहला उपन्यास रचना की प्रक्रिया में है। वह उन समकालीन कवियों में एक नहीं लगभग इकलौते हैं, जिनके यहाँ प्रतिबद्धता बहुत आवेग के साथ व्यक्त होती है। उनके अब तक उपलब्ध कविता-संसार में ‘धूमिलियन’ आवाज़ें बहुत ज़िम्मेदारी के साथ नई होकर सुनाई देती हैं। वह उन कवियों से अलग हैं, जो तत्क्षण स्वीकृति की चाह में अस्मितावाद की चालू कविताएँ लिखते हैं। वीरू की कविता इस अर्थ में हिंदी की समकालीन कविता है, क्योंकि वह अपने समकालीनों से सीधे टकराती है और यह करते हुए वह अपने लिए कोई आरक्षण या कहें छूट नहीं चाहती। वीरू कानपुर में रहते हैं। उनसे veeru_sonker@yahoo.com पर बात की जा सकती है.

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