कविताएँ ::
विहाग वैभव

poet Vihag Vaibhav
विहाग वैभव

यह कविताओं को खेतों में जोतने का समय है

प्रिय आयोजक!
उपकृतता के दंभ से लबालब आपका कविता-पाठ का निमंत्रण मिला
शुक्रिया, पर क्षमा करें नहीं आ सकूँगा, अक्षम हूँ

नहीं, ऐसी कोई ख़ास व्यस्तता नहीं है, बस एक अधिक ज़रूरी काम आन पड़ा है,
मैं मेरे कवि को लेकर एक विरोध प्रदर्शन में शामिल होने जा रहा हूँ

असीम पुरातन घृणा की जायी देश की सरकार ने
मेरे पाठकों और विरोधियों और नागरिकों से अपने ही देश की नागरिकता के सुबूत माँगे हैं

मेरा एक पाठक बेघर है
जिसके पुरखों को पिछली सरकार ने गोकशी के संदेह में क़त्ल कर डाला था
मुझे उसके लिए जाना होगा

मेरा एक विरोधी है
जिसके एकलौते तीन डिसमिल खेत के काग़ज़ात को ठाकुर ने जाति की आग में जला डाला था
मुझे उसके लिए जाना होगा

एक और शख़्स है जिससे मनुष्य के अलावा कोई अतिरिक्त रिश्ता नहीं है
वह मुंबई, कोलकाता, सूरत, नोएडा, कानपुर, बनारस, हैदराबाद कहीं भी
वह कहीं भी आपको दिख सकता है
अपनी नाज़ुक गुलमोहर-सी बच्ची की लाल चोटी के लिए
तीन रुपए के रिबन का मोलभाव करता हुआ
वह किसी भी नुक्कड़, किसी भी ठेले पर आपको दिख सकता है

अन्न की भूख मृत्यु को बहुत हरामी बना देती है
यह कविताओं को खेतों में जोतने का समय है

चिमनी से उठता काला धुआँ मजूर के परिवार के फेफड़े में काली खाँसी की तरह जमता जाता है
यह कविताओं को कारख़ानों में नाधने का समय है

भूख के युद्ध से बची हुई शक्ल शहर की भीड़ में बंजारा हो जाती है
और सात समंदर घृणा के विष से जन्मी सरकारें बंजारा होने को देश के लिए ख़तरा बताती हैं

यही सही समय है कि मनुष्यता के हक़ में मेरी कविताएँ रक्तदान करें
यही सही समय है कि कविताएँ इस ग्रह पर मनुष्य की आदिम बाशिंदगी के हक़ में गवाही दें
और अपने होने का मूल्य अदा करें

हर कविता भाषा के कोश से मनुष्य का लिया हुआ उधार है

जब कविताओं की सबसे ज़्यादा ज़रूरत सड़कों पर उतर आए
मेरे साथियों की थरथराती आवाज़ और तनी हुई मुठ्ठी को है
तब आपके सभागार में कालजयिता के लोभ का पाठ करती हुई मेरी कविताएँ
बेहद अश्लील दिखाई पड़ेंगी महोदय
आपके निमंत्रण में दस हज़ार का वादा है
दस हज़ार से याद मुझे आता है—
पुश्तैनी पीड़ाओं के संग्रहालय, वहाँ मेरे गाँव में
ख़ून के रिश्ते से इतर मेरे एक चाचा थे
कहने को तो कमाने गए थे सूरत
पर सरकार की नालायक़ी छिपाने के लिए
ख़ून बेचकर घर इतना ही पैसा भेजा करते थे साल-दर-साल
वे तो नहीं लौटे, उनकी लाश लौटी
उनकी आठ साल की बेटी को चीख़-चीख़कर धरती की छाती फाड़ते हुए मैंने देखा था श्रीमान
मनुष्य के ख़ून के साथ इससे भद्दा मज़ाक़ क्या हो सकता है महोदय

धार्मिक परिभाषाओं के इतर आत्मा नाम की एक चीज़ होती है
इसके पहले की मेरा ईमान मेरी आत्मा को सत्तर चाक़ू गोदकर मार डाले
मुझे इस शांति-मार्च में जाना होगा
मुझे हर उस विरोध-मार्च में जाना होगा
जहाँ कविताओं के बाहर इंसान का निचाट बदन लाठीचार्ज झेल रहा है
जैसा कि पिछली सदी के एक कवि ने कहा था
मनुष्य कविताओं-फविताओं से बहुत बड़ा है श्रीमान

मनुष्य कविताओं से बहुत पहले का है
वह कविताओं के बहुत-बहुत बाद तक रहेगा
यही सही समय है कि मैं अपने कवि को लेकर
खेतों में नध जाऊँ
सड़को पर उतरूँ और सरकार से लड़ जाऊँ
फिर फ़र्क़ नहीं पड़ता जीतूँ या मर जाऊँ।

कुछ लड़ाइयाँ अटल और अनिवार्य होती हैं

कुछ लड़ाइयाँ अटल और अनिवार्य होती हैं
जिन्हें हमारे पुरखे
या तो हारे होते हैं
या लड़े नहीं होते
वे मृत्यु की तरह अटल और अनिवार्य होती हैं

घृणा और बदले के सिंहासन पर बैठी सरकारें
अपनी कारुणिक विनम्रता में भी
क़त्लेआम की शांति-व्याख्याओं की हद तक निर्मम होती हैं

फिर यहाँ तो सामूहिक हत्याओं को भी
सदी के विकास-क्रम का अनिवार्य चरण बताया जाता है
मुसोलिनी और हिटलर, इदी अमीन और पॉल पॉट
बहुत कम हत्यारों को राज करने का दुयोग होता है
पर जब होता है तो देश को मक़तल में बदलते देर नहीं लगती

तब सड़कों, आँगनों और दिमाग़ों में
खेतों, जंगलों और विश्वविद्यालयों में
संसदीय नीति-पत्रों और पुस्तकालयों में
चारो तरफ ख़ून ही ख़ून पसर जाता है
सभ्यता के कोढ़ की तरह जन्मे हत्यारों को देशभक्त के तमग़े से नवाज़ा जाता है
शांति-दूतों की तस्वीरों से पुर्नहत्या का किया जाता है अभ्यास
तब मानवद्रोहिता और अमानुषिकता की एक प्रतियोगिता शुरू होती है
जिसमें बहुत बड़ी आबादी निकृष्टतम होने के लिए गिरती चली जाती है

पर इसी बीच कुछ ज़िंदा ज़ेहन लोग निकलते हैं अपनी अपनी देह से बाहर
और सरकार की गोली खाकर मरी संतान की ताज़ी चिता से उठा लाते हैं मुठ्ठी भर आग
सीने में छिपा लेते हैं प्रमथ्युस की विरासत
और आग को जिलाए रखने के मुहावरे से बाहर लाते हैं

दोस्तो! बहुत काम की चीज़ होती है आग
जाति का ज़हर ज़ेहन में चढ़ जाए तो
लगा दी जाती हैं चमारों की बस्तियों में
बलात्कारियों के हत्थे चढ़ जाए तो
फूँक दी जाती है चीख़ती हुई औरत
यह धर्म-शास्त्रों में शस्त्र की तरह फैलती है
और राख हो जाता है मुहल्ला, पुरवा, प्रदेश
आग का प्रयोगधर्मी हत्यारा यदि हो जाए प्रधानमंत्री
तो धू-धू कर जलने लगता है पूरा देश
तब आग जंगल की तरफ़ से नहीं संसद की तरफ़ से फैलती है

पर नहीं दोस्तो!
आग रोटी भी पकाती है
अच्छे दिनों की तमन्ना
दुर्दिन में आग बनकर उभरती है और इंसान को बेख़ौफ़ कर देती है
तब आग को जिलाए रखने के मुहावरे से बाहर लाकर
मनुष्य ललकार कर लड़ जाता है हत्यारों से, सरकारों से
फिर वह हक़ और हुक़ूक़ के लिए जिरह नहीं करता
सामने से आती हुई सरकार की गोली को चूम लेता है
क़ैदख़ानों में यारों के साथ मुक्ति-गीत गाता है
तानाशाह की बौखलाहट पर हँसता है
और हँसते हुए फाँसी तक चढ़ जाता है

वह बहुत अच्छे से जानता है कि
यह लड़ाई वह नहीं लड़ेगा तो उसकी आने वाली पीढ़ियों को लड़नी होगी
और तब तक बहुत देर हो चुकी होगी

वह बहुत अच्छे से जानता है कि
कुछ लड़ाइयाँ मृत्यु की तरह अटल और अनिर्वाय होती हैं।

इसी देश में रहेंगे

इसी धरती के गर्भ का जल बदन में लहू बनकर दौड़ता है
इसी खेत का उपजा अन्न मांस-मज्जा बनकर बढ़ता है
कभी काम के कोल्हू से बँधी माँ ने उतारा तो
इसी धरती की गोद में बेफ़िक्र पसर गए
अपने घावों पर इसकी मिट्टी का थाप दिया
और सब ठीक हो जाने के भरोसे से ज़िंदा रहे

पर धर्म की घृणाएँ क़त्लेआम से भी नहीं जातीं
वे अजन्मी पीढ़ियों तक का पीछा करती हैं

अब जब संगठित घृणा-वंशज हमसे बाशिंदगी का सुबूत माँगते हैं
तब मैं एक ऐसे लैब को ढूँढ़ता फिर रहा हूँ जो मेरी रूह का एक्सरे कर सके

पर नहीं
नागरिकता रूह नहीं जिस्म का मसअला है
और जिस्म को गोली मारी जा सकती है

सरकार की गोली, घृणा का बारूद बेशक हमें ख़त्म कर सकता है
पर हम लड़ेंगे, थकेंगे, टूटेंगे, रो पड़ेंगे
अपनी क़ब्र खोदेंगे और पुरखों के बग़ल में जा सो पड़ेंगे
पर हम कहीं नहीं जाएँगे

इसी देश में जन्मे थे, इसी देश में मरेंगे
यहीं अपनी देह, अपने देश में रहेंगे।

मानवद्रोहियों की जैविक संरचना के संदर्भ में

वे वीर्य से नहीं,
घृणा से उपजे थे

वे मनुष्य योनि में हुए
और मनुष्यता के मवाद की तरह जीते रहे

मनुष्य को मनुष्य से अलगाते रहे
मनुष्य को मनुष्य का मांस परोसते रहे
और मनुष्यता की आत्मा चबाते रहे
ऐसा करते हुए वे पुराने करैत की तरह मुस्काते रहे

वे धार्मिक-ग्रंथों से निकले और ख़तरनाक जीवाणुओं की तरह
सभ्यता के भूगोल पर इस छोर से उस छोर तक फैल गए
इतिहास में पसर गए द्वेष के अजगर की तरह
हवा में ज़हर की तरह समा गए
पानी पर बैठ गए कुंडली मारकर
उन्होनें क़लम बनाई और उससे विधर्मियों का क़त्ल करने का काम लिया
गर आग हाथ लगी तो सबसे पहले उन्होंने दूसरों के घर जलाए
कपास हाथ लगा तो दुनिया का गला घोंट सकने लायक फंदा बनाया

वे मनुष्य की सबसे सुंदर चीज़ों का सबसे अश्लील इस्तेमाल करते रहे

वे पहाड़ पर गए तो पहाड़ों के गर्भ में बम छोड़ आए
उन्होंने नदी को छुआ तो नदियाँ सूखती चली गईं
वे जंगलों में गए तो जंगल में आग लग गई
उनका लालच इतना विशाल था कि
उसमें पूरा का पूरा ग्रह शक्कर के एक दाने-सा समा सकता था

वे अभियंता हुए तो काली चमड़ियों वालों के मनुष्य की हड्डियों से पुल बनाते रहे
वे डॉक्टर हुए तो मनुष्य की सबसे तेज़ मृत्यु कर सकने वाली दवा तलाशते रहे
वे प्रोफ़ेसर हुए तो भाषणों से निर्लज्ज इतिहास का बदन ढँकते रहे
वे कवि हुए तो भाषा से सत्ता की नाक पोंछते रहे
वे ऋषि या साधु हुए तो देखते ही देखते बलात्कारी में बदल गए
वे मंत्री हुए तो पूरी बेहयाई से हत्यारे हो गए
वे सदी के दुर्दांत हत्यारे हुए तो प्रधानमंत्री हो गए

वे वह सब कुछ हो गए जो मानव-देह के लिए वीभत्स
और सभ्यता के लिए विनाश का कारण हो सकता था

वे आततायी स्वप्नयात्री थे
मेरे सपने में वे तैतीस करोड़ मुँह वाले अजगर की शक्ल में आते रहते हैं

वे आख़िरी जन्म जितने नए हैं
वे पहली मृत्यु जितने पुराने हैं

वे मनुष्य योनि में हुए और मनुष्यता के मवाद की तरह जीते रहे
इसके अलावा मनुष्यों और उनमें एक ही जैविक अंतर था
मनुष्य, स्त्री और पुरुष के प्रेम-संसर्ग से उपजा था
और वे सात समंदर जितने बिच्छुओं के डंक को निचोकर इकठ्ठा हुए
घृणा और विष-द्वेष से पैदा हुए थे।

हमारे चेहरों पर चीख़ों के धब्बे हैं

पिछली चौबीस रातों से मेरे स्वप्न में आने वाला
नालंदा के राजगीर की पहाड़ी पर बलत्कृत स्त्री के यौनांग से रिसता ख़ून
और छह पुरुषों के लिंग से बहता सभ्यता का वीर्य
मेरे मष्तिष्क में मवाद की तरह जम रहा है

इतिहास हत्यारों के दलाल की तरह सच छुपाने का आदी है
वह कभी नहीं कहेगा कि आशीर्वाद से और खीर खाकर गर्भवती हुई स्त्रियाँ
वस्तुतः उन ग़लीज़ आत्माओं वाले महात्माओं और ऋषियों द्वारा बलत्कृत औरतें हैं

त्रिशूलधारी त्रिपुंडमंडित रक्तख़ोर इतिहास से मुझे उम्मीद भी नहीं
वह तो सदियों से
नालंदा के राजगीर पर्वत पर बह रहे छह पुरुषों का वीर्य पोंछने में लगा हुआ है

तो क्या राजगीर के पत्थरों पर एक बलत्कृत स्त्री
और उसके असहाय प्रेमी को छोड़कर हम चाँद पर चढ़ जाएँ?
फिर इतिहास हमें हत्यारों का दलाल कहेगा!
अरे भाड़ में जाए इतिहास
भाड़ में जाएँ हत्यारे
और भाड़ में जाएँ उसके दलाल

सवाल एक बलत्कृत स्त्री और क्षत-विक्षत हुई सभ्यता का है
सवाल यह है कि
इसे लेकर हम किस अस्पताल में जा सकते हैं
किस रसायन से धुल सकता है
हमारे सूख चुके रक्त की शक्ल का पत्थरों पर पड़ा यह सदियों पुराना दाग़
किस भाषा में, दुनिया की किस अदालत में दायर किया जा सकता है यह मुक़दमा?

अब समय आ गया है कि
सृष्टि के सभी प्राणियों, जंगलों, पर्वतों और नदियों की सामूहिक पंचायत से
यह तय कर लिया जाए कि
इस दुनिया में पुरुष रहेगा कि मनुष्य

मैं चौबीस दिनों से सुन रहा हूँ कि वह लड़की
लगातार मुझे कातर आवाज़ लगाए जा रही है
इतिहास के चंगुलों में फँसा उसका प्रेमी
मुझे मेरे मनुष्य होने का वास्ता दे रहा है

स्वप्न और स्वप्न से बाहर
ये आवाज़ें दिन-रात मेरा पीछा करती हैं

इन दिनों मेरा बदन
क्रोध, हताशा, चिंता और शर्म से अक्सर थरथराने लगता है
और बारहा मैं महसूस करता हूँ कि ये आवाज़ें
चौबीस दिन से नहीं
बल्कि सदियों से मेरा पीछा कर रही हैं।

विहाग वैभव (जन्म : 1994) हिंदी के सुपरिचित कवि हैं। उनकी कविताओं में विचलित कर देने वाली सपाटबयानी के वेदनामय ब्योरे हैं। यह तेवर हिंदी कविता में नया तो नहीं है, लेकिन एक नए रूप में लगभग तीन दशकों के बाद लौटा है। विहाग ‘कवि-आक्रोश’ को सजगता के साथ सँभालने वाले इस दौर के एक और एकमात्र कवि हैं। वह काशी हिंदू विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहे हैं। हिंदी विभाग की अंधी समझदारियाँ और जड़ताएँ अगर उन्हें अपनी ज़द में न ले सकीं, तब वह निश्चय ही बहुत दूर तक जाएँगे। उनसे vihagjee1993@gmail.com पर बात की जा सकती है।

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