कविताएँ ::
शिवदीप

Shivdeep
शिवदीप

तुझे बार-बार चूमना चाहता हूँ

देह के पहले अध्याय में
तू मेरी गुरुदेव
फिर सहेली; पत्नी, प्रेमिका, औरत दूसरी, तीसरी, चौथी
घर बाज़ार हाहाकार!

बाक़ी सभी अध्याय व्याख्या।

मैं तेरी व्याख्या में उलझा
कामदेव का वह तीर हूँ
जो जन्म लेने से रह गया था किसी अछूत विचार करके।

तुझे बार-बार चूमना चाहता हूँ।

लेकिन पता नहीं क्यों
माँ की एक कथा में
भैरव की मूर्ति के साथ बँधा कुत्ता बहुत ज़ोर से भौंकता है
जिसके डर में मेरा सारा बचपन
उसके पास से जितनी बार गुज़रा डर कर गुज़रा।

चूमना तो चाहता हूँ
पर डरता हूँ
अपनी पवित्रता के भार से।

वह

वह
दीवार
की तरफ
देख
रही
है।

बिना हिले
बिना बोले
एकटक!

उसको लगता है कि ज़रा-सी आवाज़ तोड़ देगी दीवार को।

मैं और सख़्त हो जाता हूँ
जैसे देख रही हो वह दीवार के अंदर।

शायद

शायद सब भाषाओं में ही इस तरह होता होगा :
अक्सर लड़कियाँ कविताओं में खो जाती हैं!

उसने भी प्रेम के एक विचार के साथ प्रेम किया
जो उसकी भाषा के कवि कविता में रखते थे।

फिर वह एक कवि को मिली
और उसके साथ रहने लगी।

यक़ीन करना
इसके बाद उस ख़ूबसूरत विचार ने अपनी सारी योग्यता गँवा दी
उसने जाना कि
दरअसल, सूरज परछाईं ही होता है।

कवि इसको बुरी तरह ज़ख़्मी होकर कविता में सँभाल लेता।

और किसी दिन…
फिर कोई लड़की कविता में उलझ जाती है।

शायद सब भाषाओं में ही इस तरह होता होगा :
अक्सर लड़कियाँ कवियों से अपना दिल दुखवा लेती हैं।

पता नहीं क्यों,
मुझे दोनों पर प्यार आता है।

मैंने सारी उम्र

मैं अपने ब्रीफ़केस में बंद
शब्दों अ-शब्दों से बचा काग़ज़ का ख़ाली टुकड़ा रह गया हूँ
पढ़ लेना।

शायद ही कभी अँधेरे को खोलकर
रोशनी में आऊँ।

उसके पास बैठते
जो ख़याल
उसकी नीली नसों के जाल में फँस जाता है,
मेरा नहीं है।

दरअसल, सुख सिर्फ़ अनलिखे में होता है।

बहुत देर से समझा
कि रोशनी के जो हिस्से मुझे अँधेरों में मिलते हैं
वह अपनी ही पुतली द्वारा सिरजे
कल्पित सूरज के टुकड़े हैं।

मैंने सारी उम्र
कुछ न लिखने के दम में ही लिखा
हरेक ग्रह-उपग्रह को अपनी ऊँचाई से नीचे धकेल दिया
और इसी तरह प्रेम किया।

***

शिवदीप पंजाबी और हिंदी में कविताएँ लिखते हैं। उनसे 77shivdeep@gmail.com पर बात की जा सकती है।

Leave A Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *