गद्य ::
कृष्ण कल्पित

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कृष्ण कल्पित

कभी-कभी वाचिक लिखित पर भारी पड़ता है. गोपालदास नीरज इसके जीते-जागते उदाहरण हैं.

गीत जब मर जाएगा तब क्या यहां रह जाएगा
एक सुलगते आंसुओं का कारवां रह जाएगा!

नीरज को ताउम्र हिंदी-साहित्य-भवन में घुसने नहीं दिया गया!

वह हिंदी-भवन के बाहर ही तमाम उम्र हिंदी गीतों की अलख जगाते रहे. हिंदी साहित्य के लिए जैसे शैलेंद्र अछूत रहे वैसे ही नीरज भी, जबकि आधुनिक हिंदी कविता का इतिहास इनके बिना अधूरा है.

लोकप्रियता आधुनिक हिंदी साहित्य में एक वर्जित फल है, जिसने इसको चखा उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. बच्चन को भी हिंदी वालों ने आधे-अधूरे मन से ही स्वीकार किया. नीरज को अपने जीवनकाल में जैसी दुर्लभ लोकप्रियता हासिल हुई उसकी तुलना केवल उर्दू कवि जिगर मुरादाबादी से ही की जा सकती है, जिनकी रेलगाड़ी को उनके चाहने वाले रोक लिया करते थे.

नीरज केवल प्रेम-विरह-वेदना-कसक-रोमान और शृंगार-पटार के ही कवि नहीं थे. नीरज को गरीब-गुरबों, शोषण-अन्याय और दीन-दुनिया की भी चिंता थी. नीरज अपने एक शुरुआती गीत में पूछते हैं कि अगर तीसरा युद्ध हुआ तो इस हरी-भरी धरती का क्या होगा? दरअसल, नीरज हिंदी की प्रगतिवादी धारा के प्रमुख कवि हैं.

हिंदी में उर्दू मुशायरों की तर्ज पर शुरू हुए कवि सम्मेलनों के वह आखिरी नायक थे. नीरज के साथ ही कवि सम्मेलन जैसी महान संस्था का भी पतन हो गया— अब कवि सम्मेलन मूर्खों और मसखरों के हाथ में हैं.

जब नीरज अपनी खरज वाली आवाज में आलाप लेते थे तो हजारों-लाखों की संख्या वाले पांडाल में खामोशी व्याप्त हो जाती थी. न जाने हिंदुस्तान के कितने शहरों, कस्बों की कितनी सुबहें नीरज की आवाज से जागती थीं.

‘कारवां गुजर गया’ से लेकर ‘आंसू जब सम्मानित होंगे’ तक नीरज ने बहुत यादगार गीत लिखे, लेकिन मुझे उनका सर्वश्रेष्ठ गीत ‘कानपुर के नाम पाती’ लगता है जो उनकी जवानी की रचना है. कानपुर नीरज की कर्मभूमि थी. वहां वह पहले टाइपिस्ट थे, फिर हिंदी पढ़ाने लगे. अपमानित होकर नीरज को वहां से निकलना और कानपुर छोड़ना पड़ा. उर्दू नज़्म की शैली में लिखी इस पाती में नीरज ने अपना सारा दर्द उड़ेल दिया है. इस गीत को पढ़ते हुए मज़ाज़ लखनवी की दिल्ली पर लिखी नज़्म याद आती है.

वह सही मायने में हिंदी कविता के बॉब डिलेन (Bob Dylan) थे— बस इतना फर्क था कि नीरज गिटार नहीं बजाते थे. यह वही बॉब डिलेन हैं जिन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिलने पर दुनिया भर के साहित्य-कुलीन-तंत्र में आग लग गई थी.

नीरज को तीन बार गीत-लेखन का फिल्म फेयर अवार्ड मिला. अनगिनत सम्मान-पुरस्कार मिले. पद्मश्री-पद्मभूषण मिला. नीरज के चाहने वालों में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्रियों के साथ अनेक सत्तावान लोग रहे. मंत्री-संत्री का दर्जा मिला. नीरज को सब कुछ मिला, लेकिन साहित्य अकादेमी अवार्ड नहीं मिला.

यह सही है कि नीरज का जो भी महत्वपूर्ण लेखन है, वह उनके संघर्ष के दिनों का हासिल था. पिछले बीस बरसों से वह एक पुराने ग्रामोफोन रिकॉर्ड की तरह सिर्फ बज रहे थे. उनकी आवाज में जो कशिश थी, उसे वह भारतीय मुद्रा में बदलते रहे. यह भी एक निराशाजनक बात ही कही जाएगी कि अपनी जवानी में क्रांति के गीत गाने वाले नीरज अपने जीवन के अंतिम समय में सांप्रदायिक और फासीवादी ताकतों का समर्थन करने लगे थे.

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गोपालदास नीरज (4 जनवरी 1925-19 जुलाई 2018) हिंदी के सर्वाधिक लोकप्रिय गीतकारों में से एक हैं. कृष्ण कल्पित हिंदी के समर्थ कवि-लेखक हैं. जयपुर में रहते हैं. उनसे krishnakalpit@gmail.com पर बात की जा सकती है.

1 Comment

  1. ऋचा पाठक July 21, 2018 at 8:02 am

    नीरज जी के बारे में लिखा विशिष्ट लेख है यह ! कानपुर पर लिखी कविता के प्रति उत्सुकता पैदा हुई। उ०प्र० के बेसिक शिक्षा परिषद ने सत्तर के दशक में उनके गीत ‘जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना, अँधेरे धरा पर कहीं रह न जाये ‘ को पाठ्यक्रम में स्थान दिया था। कालांतर में कालकवलित हो गया। किसी पाठ्यक्रम में तो ज़रूर उनके हस्ताक्षर रह गये होंगे ।

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