गद्य ::
आदित्य शुक्ल

Aditya Shukla
आदित्य शुक्ल

मैं एक ऐसा हत्यारा हूँ जिसने कभी किसी की हत्या नहीं की और न ही कभी करेगा, लेकिन मुझे सभी दंड स्वीकार्य हैं।

मेरे दिमाग़ के दरवाज़े खुलते हैं और उनसे निकलकर मेरे विचार एक उपन्यास में प्रविष्ट हो जाते हैं। एक आदमी समुद्र किनारे चल रहा है और उसके दिमाग़ में किसी दूसरे लेखक की पंक्तियाँ गूँज रही हैं—प्रेम भावुकता और कामुकता का मिश्रण है। आदमी एक असफल कवि है। वह एक असफल प्रेमी, मित्र, पुत्र, भाई और कर्मचारी भी हो सकता है। समुद्र के किनारे नारियल के पेड़ हैं। समुद्र के ऊपर बादल हैं और एक-एक करके हवाई जहाज उन बादलों की ओर जा रहे हैं। समुद्र के दूसरी ओर सभ्यता की निशानियों के रूप में बड़ी-बड़ी इमारतें हैं।

असफल आदमियों को कभी बंदूक़ नहीं पकड़ानी चाहिए। आदमी रुककर समुद्र की ओर देखता है और उसकी नज़र बार-बार समुद्र की सीमा तक पहुँचती है। ऐसा जान पड़ता है मानो पृथ्वी यहीं समाप्त हो जाती हो। समुद्र की लहरें बार-बार आकर तट को छूती हैं—इस स्पर्श में हिंसा, अहंकार या प्रेम कुछ भी हो सकता है जो सामने वाले के डिकोड करने की क्षमता पर निर्भर करता है। वह मन ही मन सोचता है कि उसे हवाई यात्रा, रेल यात्रा या समुद्री यात्रा से भय है। यात्राओं से भय क्यों? उसे एक मित्र का कथन याद आता है कि मुझे मरने से इसलिए डर लगता है कि लगभग आधा जीवन जी लेने के बाद भी मैं अपने जीवन में कुछ भी हासिल नहीं कर पाया। वह अपने जीवन में क्या हासिल करना चाहता है? क्या कुछ हासिल करना ज़रूरी है? नहीं, मैं हासिल नहीं कर पाने से नहीं भयातुर हूँ—मेरा भय पूरी तरह से भौतिक है—दुर्घटनाओं के मार्फ़त शारीरिक पीड़ा। अपनों को तड़पते-बिलखते आधी उम्र में छोड़ जाना आदि…

फिर भी अगर वह चाहे तो समुद्र की इन लहरों पर चलकर दिखा सकता है और समुद्र की उस सीमा को जीवित छूने का यत्न कर सकता है, जहाँ पर यह दुनिया ख़त्म होती जान पड़ती है। जहाँ पर दुनिया ख़त्म होती है, वहाँ पर तो जीवन भी ख़त्म हो जाएगा। जीवन के ख़त्म होने का क्या अभिप्राय है? जीवन के होने का क्या अभिप्राय है? क्या जीवन एक उपन्यास है—अधूरा अफ़साना? आज तमाम लोग एक अनुवादक-कवि की पहली पुण्यतिथि पर उसे याद कर रहे हैं। उसका अचानक से न होना क्या है? मेरे दिमाग़ के दरवाज़े खुलते हैं और उनसे निकलकर मेरे विचार कहाँ-कहाँ जा सकते हैं? मैं लिखता हूँ, मेरी कोई किताब नहीं छपती, न ही कोई मुझे लेखक मानता है। मैं पढ़ता हूँ और मुझे कोई पाठक भी नहीं मानता। मैं अनुवाद करता हूँ और मुझे कोई अनुवादक भी नहीं मानता। लेकिन क्या ज़रूरी है कि कोई मुझे कुछ माने। मेरे दिमाग़ के दरवाज़े में बहुत कुछ बंद है—बस उसे खोल दूँ, उसे निकलने दूँ और समुद्र के किनारे विश्व की सीमा को निहारूँ तो क्या फ़िलहाल इतना काफ़ी नहीं? मैं तुम्हें अगर प्रेम करता हूँ तो क्या इतना काफ़ी नहीं कि मैं तुम्हें प्रेम करूँ, भले ही यह एक प्रकार की अपरिपक्वता का नतीजा हो, मेरे अकेलेपन का बाई प्रोडक्ट हो, मेरे होने की अकुलाहट हो। मैं अक्सर आत्महत्या के बारे में इसलिए सोचता हूँ क्योंकि मेरे पास बंदूक़ या ज़हर नहीं है, अगर ये सब मेरे पास होता तो मैं किसी और की हत्या करके हत्या के सारे सबूत मिटा देने के बारे में सोचता…

लेकिन मैं हत्यारा नहीं हूँ, इसलिए कभी हत्या के उपकरणों की तलाश भी नहीं की और आत्महत्या की भी कोई कोशिश नहीं की। मुझे प्यार करने वाले सभी लोग मुझे भूल चुके हैं।

मेरे पास एक उपन्यास का प्लाट है जिसे मैं बरसों से अपने दिमाग़ में लिख रहा हूँ और काग़ज़ पर लिख नहीं पा रहा हूँ, कभी-कभी लगता है कि नहीं लिखना एक तरह की पवित्रता है, लेकिन नहीं लिखना एक तरह की फूहड़ता भी है और लिखकर छप जाना और उसका दिखावा करने से अधिक अश्लील तो और कुछ भी नहीं।

मैं कभी फ़र्नांदो पेसोआ नहीं हो सकता, पर आदमी तो उस आदमी जैसा होना चाहिए। मैं रॉबर्तो बोलान्यो जितना भटका हुआ हूँ… हालाँकि मैं सिगरेट, शराब और ड्रग्स नहीं लेता—फिर भी बीमार रहता हूँ।

मैं कभी किसी आंदोलन में हिस्सा नहीं ले सकता, क्योंकि मेरी देह में इतनी शक्ति नहीं कि वह पुलिस की लाठियाँ सहे।

मैं एक उपन्यास में खुला हूँ तो एक फ्लैट में फँस गया हूँ… न जाने कौन-सा तल, न जाने कौन-सी जगह, न जाने कौन-सी मर्डर-मिस्ट्री।

मेरे पास मेरे लिखे हुए का एक Manuscript है, जिसे मैंने कहीं नहीं भेजा छपने के लिए, लेकिन ऐसा नहीं कि मैं छपना नहीं चाहता। मेरा पुराना प्रेम प्रकरण समाप्ति की ओर है और मुझे दूसरी स्त्रियाँ पसंद हैं, लेकिन मैं उन तक नहीं पहुँच पाता, मेरी नौकरी ख़तरे में है और किसी भी दिन मैं यह जगह छोड़कर भाग जाऊँगा, लेकिन भागकर कहाँ जाऊँगा?

मैं छपने के लिए नहीं भेजता, क्योंकि वे मुझे छापेंगे नहीं। मैं प्रेम अनुनय नहीं करता, क्योंकि वे मुझे सुनेंगी नहीं। मैं इंटरव्यू नहीं देता, क्योंकि मुझे वे रखेंगे नहीं।

समुद्र के किनारे कितने लोग हैं, छोटी-छोटी दुकानें हैं और नए प्रेमी जोड़े हैं जिन्हें मैं बहुत ही प्रसन्न हृदय से देखता हूँ। मुझे लियोनार्डो कोहेन का एक गीत याद आता है जिसे मैं अपनी भद्दी आवाज़ में ख़ुद को गाकर सुनाता हूँ।

शाम होती है, सूरज ढलता है, अँधेरा होता है, समुद्र गरजता है—अँधेरे को आँखें बंद करके देखने पर बहुत कुछ दिखाई देता है—जैसे अँधेरे में छिपा हुआ अंतहीन उजाला। मुझे वे चींटियाँ दिखती हैं जिन्हें मैंने बहुत पहले अपने होने के संकेत के रूप में स्वीकार कर लिया था। अगर अँधेरे के इस उजाले में मुझे ये चींटियाँ न दिखें तो मान लो मैं अब और नहीं ‘हूँ’। जब अँधेरे में मैं अक्सर सो जाता हूँ तो ये चींटियाँ मुझे आकर छूती हैं और कुरेदती हैं, गुदगुदाती हैं, प्यार करती हैं और रोशनी देती हैं।

अचानक से एक उपन्यास के भीतर एक दुखद घटना होती है और पूरा जीवन बदल जाता है—उपन्यास के भीतर-बाहर—बारिश।

मेरा हर एक क़दम मेरा भविष्य निर्धारित कर रहा है, लेकिन मेरे ये क़दम मेरे स्वतंत्र निर्णय नहीं हैं। मैं हर पल अपने आप से बँधा हुआ हूँ—मेरा अपना आप दूसरों से इस कदर बँधा हुआ है जिसे मैं मरकर भी मुक्त नहीं हो सकता।

मैं एक दिन एक उपन्यास लिखूँगा जिसमें कालीकट का भूगोल होगा। जिस जगह मैं कभी नहीं गया, मैं वहां जाऊँगा और समुद्र के किनारे अकेला समय ढूँढ़ कर जी भर रोऊँगा।

अकेले होने का सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि आपको कोई रोने से नहीं रोक सकता। आप चाहे जो समझें, मैं अपने पुरुष होने या यहाँ तक कि मनुष्य होने पर भी शर्मिंदा हूँ। क्या मैं भी इस विश्व के ऐतिहासिक क्रम में कहीं कोई स्थान रखता हूँ? तब धर्मवीर भारती का यह कहा हुआ क्या है—एक दिन कूड़े-सा तजकर तट के पास, आगे बढ़ जाएगा इतिहास…

क्या विश्व-इतिहास पहले ही मुझे तजकर बहुत आगे बढ़ चुका है? मेरे दिमाग़ के दरवाज़े में एक उपन्यास भरा जीवन क़ैद है। जैसे दोस्तोवस्की या काफ्का का कोई उपन्यास। ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ या ‘दी कासल’। मैं ही जोसेफ के हूँ। काफ्का ही दोस्तोवस्की का प्रिंस मिश्किन है। इस क्रम में मैं अक्सर ख़ुद को इसलिए रखता हूँ ताकि ख़ुद को विश्व-इतिहास से फिर से जोड़ सकूँ।

लेकिन जो टूट गया, क्या वह अब कभी पुनः जुट-जुड़ सकेगा? इन सबसे घबराकर मैं प्रार्थना के घर यानी किस्लोवस्की की दुनिया में दाख़िल हो जाता हूँ। एक ठंडे संगीत और जीवन के सच्चे दृश्यों के बीच बहुत सुकून है।

अगर तुम मुझे थोड़ा-सा प्यार कर लेती तो मैं ये सब प्रपंच नहीं रचता। उपन्यास कभी ख़त्म नहीं होते—उनका कोई प्रस्थान या इति बिंदु नहीं होता। वे तो न जाने कब के शुरू हो चुके होते हैं और न जाने कब तक चलते रहते हैं। समय के फ्रेम में उनके आयाम निर्धारित नहीं होते। वे जीवन के एक दिन अचानक से साथ छोड़ कर चले जाते हैं, फिर दूसरे के जीवन का अभिन्न अंग बन जाते हैं।

मैं सिर्फ़ इसी भाषा में बात कर सकता हूँ जिसे आप स्वतः ही एक बनावटी भाषा कह सकते हैं और मैं इस पर क़तई एतराज़ नहीं करूँगा। एक छोटे-से उपन्यास में एक छोटी-सी कवयित्री ड्रग्स ले-लेकर आत्महत्या कर लेती है। मुझे लगता है कि आत्महत्या की बात करना एक अश्लील ड्रामा है—करना हो तो सीधे आत्महत्या करो—हिंदी के एक युवा कवि प्रकाश की तरह। अन्यथा चुपचाप जीते जाओ और जीवन के अत्याचारों के सम्मुख नत रहो। जीवन ही वह अज्ञात ट्रायल है और जीवन ही वह अज्ञात कासल है जिससे फ्रांत्स काफ्का इतना मुतासिर है। वह फिर भी उसके सामने एकदम नत है—विनय में नहीं जिज्ञासा में।

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आदित्य शुक्ल हिंदी की नई नस्ल से वाबस्ता कवि-अनुवादक-गद्यकार हैं। वह अपने जीवन-संघर्ष, तनाव और अवसाद से गुज़रते हुए कुछ वर्षों से एक उपन्यास के बीच हैं। वह जल्द इस उपन्यास के अंतिम सिरे को छू लें, इस शुभकामना के साथ ‘सदानीरा’ उनका यह गद्य प्रस्तुत कर रही है। उनसे shuklaaditya48@gmail.com पर बात की जा सकती है। इस प्रस्तुति की फ़ीचर्ड इमेज सुमेर के सौजन्य से।

1 Comment

  1. रचित दीक्षित September 7, 2018 at 5:47 pm

    कमाल कमाल, कितना ईमानदार, कितना अलग

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