गद्य ::
अनिल यादव

अनिल यादव

मैंने नखलऊ में चाय की दुकान पर बैठकर कभी किसी का इतना इंतजार नहीं किया, जितना अरविंद चतुर्वेद का किया है. आने से पहले कई बार दिखता है कि वह आ रहे हैं, लेकिन वह नहीं आ रहे होते हैं. तब सोचता हूं, यह आदमी कैसा दिखता है जो मैं ठीक से नहीं देख पा रहा हूं… और जो अभी-अभी दिखा था वह कौन है.

सबसे ऊपर तो यह कि अपनी इतनी पुरानी रिहाइश वाले शहर में इन दिनों इसी एक आधे आभासी, आधे वास्तविक आदमी से मिलने क्यों चला आता हूं. मुझे मिलता क्या है? कवि अरविंद कैसे दिखते हैं?

दिखाता हूं आपको.

दुपहरिया ढलान, एनक लगाए एक गंजा आदमी दाल-भात, डायबिटीज की दवा और आठ-दस अखबार खाने के बाद योजना भवन की परली तरफ खलीफा ईदू मार्ग पर पैदल अपने दफ्तर की ओर चला आ रहा है. उसके चलने में इत्मीनान है जो इस सच से पैदा हुआ है कि उस जैसे लोगों के रोजी कमाने का सफर अंतहीन है जो उनके मरने के साथ खत्म होगा. काहे की हड़बड़ी!
उसके झुकते कंधे पर रैक्सीन का एक बैग है जो कहीं भी रात बिताने की तैयारी के साथ भटकने वाले गुजरे जमाने के फक्कड़ लेखकों के रूमान की लाश की तरह फूला और नुचा हुआ है. उसमें हो सकता है एक कंघा हो जो देर रात लौटकर पी जाने वाली शराब की शीशी के साथ ‘लिव इन’ में रहता है. उंगलियों में एक सिगरेट है जिसे आग के कटखने फूल की तरह सावधानी से सहेजा गया है. टेरीकाट की पैंट-कमीज, पुराकालीन स्लीपर और बीच में ठिठक कर मल्टीस्टोरी इमारतों को ताकने की हरकत सब चुगली कर रहे हैं कि इस आदमी को खुद को सजाने वाले सामानों के विपुल वैविध्य, आसान उपलब्धता और समकालीन फैशन की खबर नहीं है. उसके तबके के बहुतेरे लोग छैला बने दिखते हैं, क्योंकि सूख चुकी हसरतों के पूरे होने के अवसर इधर बहुत बढ़े हैं.

वैसे यह किसी एक आदमी की तस्वीर नहीं है. राजनीति, साहित्य, कला, संस्कृति के दायरों में ऐसे पुराने, भौंचक और अटपटे इक्का-दुक्का लोग अब भी दिख जाते हैं जिन्हें किसी स्वप्न से उठाकर सड़क पर चला दिया गया है. उन्होंने जो स्वप्न ही नहीं बेचैनी, प्रयोग, मोहभंग का भी ऊबड़-खाबड़ अपारंपरिक जीवन जिया है… उसकी अब कल्पना संभव नहीं रह गई है. इकहरे, सनकी, अवसरवादी और महाआत्मकेंद्रित होते जाते जमाने की नई पीढ़ी को तो यकीन भी दिलाना मुश्किल है कि एक ऐसा भी समय था कि घुटन और शोषण से भरे पुराने ढांचे को तोड़-ताड़ कर सबके लिए कुछ नया बनाने की दिशा में सोचते हुए उस ऊंचाई तक जाने की आजादी थी, जहां से गिरकर आदमी ऐसा हो जाता है. इस आदमी की जवानी की भी एक तस्वीर होगी, लेकिन दिखाने से क्या फायदा. कोई मानेगा ही नहीं.

उसकी डुबान देखिए. वह किसी और युग में चलते हुए दफ्तर की ओर आ रहा है और मैं घोड़ा अस्पताल के सामने बरगद के नीचे चाय की दुकान पर उसका इंतजार वर्तमान में कर रहा हूं. लग सकता है कि यह आदमी ज्यादातर किसी बीते समय में रहता है. उसकी रुचियां, आदतें, सड़क पर चलने और जीने का सलीका सब वहीं बने होंगे… लेकिन वह बड़े आराम से वर्तमान, भविष्य और दूसरे अज्ञात समयों में भी ऑटोमैटिक आता-जाता रहता है. उसके ऊपर से पुराने और बेतरतीब लगते व्यक्तित्व में एक करीनापन है. वह खुद से अच्छी तरह संतुष्ट होकर ही घर से निकला है. उसकी अपने साथ व्यस्तता से जाहिर है कि बिना अप्वाइंटमेंट मुलाकात संभव नहीं है.

लीजिए वह खरामा-खरामा आ पहुंचे. देख लिया है, लेकिन जो भाव आंखों में आना चाहिए वह हाथ की तरफ भेज दिया गया है जिसके कारण वह हल्का-सा हिला है, ‘‘क्या हाल है यार… केतनी देर से बइठे हैं?’’

निराशा होती है. मान लीजिए आप जान लें कि मैने ठीक कितनी देर आपका इंतजार किया तो… क्या करेंगे. इस जानकारी का इस्तेमाल अपने उपेक्षित खस्ता अस्तित्व को संतोष और खुशी का जरा-सा चारा खिलाने के सिवाय और क्या किया जाएगा!

मुझसे पहले अपनी बेकरारी का इजहार करने के लिए अचानक एक पिल्ला बेंचों के नीचे से होता हुआ आगे आ जाता है और उनके चारों ओर मंडराने लगता है. अच्छा तुम भी यहीं जमे हो! वह चाय की दुकान में रखे मर्तबान से एक बिस्कुट निकालकर उसे देते हैं. वह नहीं खाता, सूंघकर एक ओर चल देता है. वह कहते हैं, ‘‘जाओ बच्चू! जब तुमको बड़े कुत्ते झोरेंगे तब इस बिस्कुट की याद आएगी.’’

वह हैरानी के साथ पूछते हैं, ‘‘का हो, यह बताइए, क्या आजकल के बच्चे भी अपने बाथरूम के लिए लड़ते हैं?’’

‘‘क्या मतलब है इस बात का!’’

इतनी देर में वह स्मृति की बस पकड़कर सोनभद्र जिले के मुख्यालय रापटगंज पहुंचते हैं और वहां से पैदल अपने गांव की ओर चल पड़ते हैं. निहायत औपचारिक ढंग से अपने मतलब की तफसीलों पर जोर देते हुए एक बहुत पुराना किस्सा शुरू होता है…

Arvind Chaturved
अरविंद चतुर्वेद

‘‘हम लोग छोटे थे. बच्चे ही कहिए. प्राइमरी में पढ़ते थे तो क्या कहिएगा. हां, बच्चा तो हुए ही. तब की बात कर रहा हूं. हमारे गांव चरकोनवां के बगल से एक नदी बहती थी. उसे मैं बच्चा नदी कहता हूं. ऐसी कोई बड़ी या गहरी नहीं थी कि कोई नहाने जाए तो डूब जाए. पठार की छिछली नदी समझिए. उसके कारण स्कूल में बड़ी लड़ाई होती थी. हम लोग कहते थे कि वह हमारी नदी है. दूसरे गांव के बच्चे कहते थे कि हमारी है. क्योंकि वही नदी तो उनके गांव के पास से भी जाती है और वे उसके किनारे खेलते हैं तो वह हम लोगों की नदी कैसे हुई. हम लोग कहते थे कि भाई, वह सब ठीक है कि वह तुम लोगों के गांव के पास से भी जाती है. नदी है तो जाएगी ही. लेकिन है वह हमारी ही नदी. पहले हमारे गांव आती है, तब न तुम लोगों की तरफ और उससे भी आगे जाती है!’’

ऐसे तो पहिले की दुलहिनें भी अपने गांव के लिए लड़ती थीं. जब ससुराल में कोई ताना मारे कि उसकी तरफ के लोग भतहा (ज्यादा चावल खाने वाले), पनहग्गा (बाढ़ के दिनों में पानी में शौच करने वाले) या छेरिहा (बकरी पालने वाले) हैं… लेकिन बच्चे… बच्चों का क्या कहा जाए. अपार्टमेंट में रहने वाले बच्चों का अपना बाथरूम है. उस पर उनके मां-बाप का कानूनी मालिकाना हक है, लेकिन नदी जैसा अधिकार महसूस नहीं होता. नदी की तरह आदमी भी प्रकृति का जिंदा हिस्सा है इसलिए नदी, पेड़ और तारों पर नानी-दादी जैसा अधिकार महसूस हुआ करता था… लेकिन यह खूब पढ़ा-लिखा आदमी इतना तो जानता ही होगा कि बस्तियां, नदियों के किनारे सिंचाई-प्यास-पूजा और परिवहन के लिए बसीं, लेकिन असली सभ्यता तो नदियों और पेड़ों से दूर जाने का नाम है. यह प्रकृति से छिटक कर उसे मनमाफिक पालने, नष्ट करने और मुट्ठी भर लोगों के खजाने को और भारी करने की प्रक्रिया है. मालूम है कि ऐसा नहीं हो सकता फिर भी यह आदमी बच्चों को फिर से असभ्य बनाकर किसी बीते समय में ले जाना चाहता है ताकि उन्हें प्लास्टिक और कल्पना की परछाई से बने वीडियो प्लेयर के बजाय नदी और जंगली घास के फूलों से अपना संबंध महसूस होने लगे.

ओहो! तभी सभ्य लोगों ने अपने बच्चों को बचाने के लिए इसका यह हाल किया है.

अब यह आदमी आज की तुलना में अपने काफी जंगली बचपन की याद करने और तब से अब तक के विकास के गलत हो जाने की शिकायत करने के अलावा कुछ और नहीं कर सकता. हो न हो. कहीं यह एक कवि तो नहीं है!

कोई सत्रह साल पहले, पहली मुलाकात बनारस में हुई थी. तब भी कवि कलकत्ते से रापटगंज के रास्ते में था.

सुशील पंडित1सुशील त्रिपाठी एक बनारसी जनपक्षधर पत्रकार और चित्रकार थे जिनका निधन चकिया के पास एक पहाड़ी से गिरकर साल 2008 में हो गया था. साथ लेकर आए थे. वह एक बंद हो चुके काफी पुराने अखबार ‘कैमूर समाचार’ का फिर से रजिस्ट्रेशन कराना चाहते थे. कुछ इस तरह परिचय कराया था, ये कलकत्ता ‘जनसत्ता’ में फीचर एडिटर हैं. जल्दी ही वीआरएस लेकर यहीं रहेंगे. तब मजा आई राजा! ये आ जाएं तो हम लोग बनारस के राजनीतिक सांस्कृतिक जीवन में कचाका हस्तक्षेप किया जाएगा.

सुशील पंडित हमारी आत्मा पर लगे पैबंदों को छिपाने के लिए या मिस्कीन हालत को कुर्बानी की गरिमा देने के लिए कभी अचानक लोहिया युग के अदरकी सोशलिस्टों की तरह बोलने लगते थे, जबकि जन्नत की हकीकत सबको मालूम थी.

मैं बनारस में हिंदुस्तान अखबार का घुमंतू संवाददाता था जो कई दिनों से एक पुराने कवि विनय श्रीकर की जासूसी करने में लगा हुआ था. लहुराबीर के पिछवाड़े महामंडल नगर की एक गली में मद्रास हाउस की छत पर बने अकेले बड़े से कमरे में रहता था, जिसमें ताला लगाने की नौबत दो-चार महीने में एक बार आती थी. नीचे लोहे के दरवाजे, ग्रिल, कंडाल, कड़ाही बनाने का कारखाना था. बीच की मंजिल पर खराद मशीन की शक्ल वाले कुछ सेल्समैन, छात्र और पत्रकार किराए पर आ बसे थे. कमरे में मेज पर एक हीटर, कुकर, कुछ आलू, चावल का कनस्तर और आलमारी में आधा-पौना रम की बोतल हमेशा उपलब्ध रहते थे. किसी रिपोर्टिंग असाइनमेंट से लौटने के बाद बाहर से आया कोई दोस्त या परिचित अक्सर आबाद मिलता था. अरविंद चतुर्वेद भी कलकत्ते से आए और अपना बैग रखकर तहरी के लिए मटर छीलने लगे. कमरे की हालत का मुआयना करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘एकाधिक बार मैने भी च्यवनप्राश के साथ रोटी खाई है. हां, कोई खास बात नहीं है. कवियों के साथ कभी-कभार ऐसा हो जाता है. उन्हें पता नहीं चलता कि कब सारी दुकानें बंद हो गईं, शहर सो गया. तब जो मिले उसी से काम चलाना पड़ता है.’’

शाम उतर आई. आठ-साढ़े आठ का समय होगा. कुछ ऐसा हुआ कि मटर की छीमियों में सड़कें बन गईं जिनके किनारे विक्टोरिया युग के लैंपपोस्ट थे, ढलवां लोहे की लंगड़ी बेंचें थीं. छिलकों में कलकत्ते के कीचड़-कादो से लथपथ ऊबड़-खाबड़, हरे बदरंग मुहल्ले दिखाई देने लगे जिनके बीच में कहीं-कहीं खपरैल वाले मकान थे. थाली में लुढ़कते दानों में एक पीली छत वाली एंबेसडर टैक्सी चल रही थी जिसमें नवारुण भट्टाचार्य और अरविंद चतुर्वेद बैठे थे. किसी गोष्ठी से लौट रहे होंगे. अरविंद ने कहा कि नवारुण दा, ऐसा करते हैं कि किसी बार में दो-दो पेग रम पीकर तब घर जाते हैं.

नवारुण ने जतीन दास पार्क के मेट्रो स्टेशन के सामने टैक्सी रुकवाई. गाजा पार्क के बगल में सड़क के मुहाने पर एक पुरानी धूसर इमारत के दूसरे तल्ले पर एक बिना साइनबोर्ड का बार था. बालकनी से होकर गुजरते एक संकरे गलियारे में ऊंघते दरवाजे के पीछे एक बूढ़ा जर्जर हॉल था. बल्ब की पीली मटमैली रोशनी. बहुत पुरानी नाटे कद की चौड़ी मेजें और उधड़े गद्दों वाली सोफानुमा कुर्सियां. कम से कम दो पीढ़ी पुराना बार होगा. खालीपन के एक नुकीले कोने में दो बुजुर्ग व्हिस्की पी रहे थे. नवारुण ने दो नहीं तीन पेग पीने के बाद पनीली आंखों से देखते हुए गाजा पार्क की ओर हाथ उठाया, ‘‘इसी बगल के पार्क में मेरा बचपन गुजरा है. हम यहीं मां-बाबा के साथ पास में रहते थे. एक सुबह पार्क में आया तो देखता हूं बेंच पर काकू (फिल्मकार ऋत्विक घटक, जो महाश्वेता देवी से उम्र में थोड़े ही बड़े थे मगर उनके काका थे) बैठे हैं. वह रात भर उसी बेंच पर सोए रह गए थे. उन्होंने पास बुलाया, मुझसे एक चाय और बन मंगाकर खाया. उन्हें भूख लगी थी. कहा, मां-बाबा को बताना मत.’’

टैक्सी दोनों को लेकर कहीं चली गई. अब महाश्वेता देवी कंधे पर बड़ा-सा थैला टांगे चिट्ठियां बांट रही थीं. वह पोस्टमैन थीं. एक दिन घर आए अरविंद को धमका रही थीं, ‘‘आजकल नवारुण के साथ ज्यादा दोस्ती हो रही है. देखना, तुमको भी डायबिटीज हो जाएगी.’’ फिर देखा, एक तौलिया भिगोकर अरविंद के सिर पर रगड़ रही थीं और कह रही थीं, ‘‘जब मैं बहुत थक जाती हूं तो ऐसा ही करती हूं.’’ वह आदिवासियों का एक वाकया सुनाने के बाद कह रही थीं, ‘‘इसे तुम लोग लिख मत देना. यह मेरा अपना प्लाट है. भूल न जाऊं इसलिए सुना दिया.’’

अचानक अरविंद चतुर्वेद ने कहा, ‘‘आपके पास कुछ कविताएं होनी चाहिए!’’

मुझे थाली में पहली बार मटर के दानों के गिरने की टंकार सुनाई दी. मैने काफी दिन पहले कविता जैसा कुछ बनाया तो था, लेकिन लगता है कि यह आदमी नारियल घुमाकर कविता खोजने निकला है क्या. बचपन में एक ऐसे आदमी को देखा था जिसे कुआं खोदने का संकल्प कर लेने के बाद धरती के नीचे भरपूर पानी वाली जगह खोजने के लिए बुलाया जाता था. वह मंत्र से पवित्र किए गए सूत में बंधा नारियल झुलाते हुए खेतों में घूमता था. जिस जगह नारियल नाचने लगता था, निशान लगा दिया जाता था. उसका कहना था कि नारियल के भीतर का पानी जमीन के पानी को पहचान लेता है.

मैने थोड़ी ही देर पहले एक स्वयंभू संपादक का जिक्र किया था जिसने अपनी पत्रिका का पहला अंक भेजा था और अब समीक्षा लिखने के लिए एसएमएस भेजकर चरस किए हुए था. कविताएं घटिया थीं, कहानियां अपठनीयता की हद तक लद्धड़, लेख पुराने और संपादक के आत्मप्रचार के नमूने पन्नों पर बेशर्मी से बिखरे हुए थे. मैने बिना पढ़े ही एक कोने में फेंक दिया था. अरविंद चतुर्वेद ने गंभीरता में इतने गहरे धंसी कि न दिखने वाली शरारत से कहा था, ‘‘जवाब दे दीजिए. प्रयास अच्छा है. आप जैसे विद्वान से और सुधार अपेक्षित है. शुभकामनाएं. सेट लैंग्वेज है. ऐसे ही कहा जाता है.’’

अगली शाम कवि ज्ञानेंद्रपति आए. मुझे कविता से कहीं बहुत अधिक उनकी जिंदगी आकर्षित करती रही है. उन्होंने बहुत पहले नौकरी-दुनियादारी छोड़कर बनारस में सिर्फ एक कवि बने रहना चुन ही नहीं लिया था, इसे संभव भी कर दिखाया. मैं उनसे पूछा करता था कि मैं ऐसी जिंदगी कब जी पाऊंगा. वह हैरान करने वाली उदासीनता में छिपे चुप्पे आत्मविश्वास से कहते थे कि हो जाएगा, सब पहले भीतर होता है.

हम लोग मलदहिया के एक देसी ठेके पर जा बैठे, जहां जाली के भीतर बोतलों के आगे एक लंगोट सूख रहा था. शोर, सौजन्य, बांग्ला कवियों, कलकत्ता के अड्डों और रेशमा पारेख पर बातचीत के बीच अचानक मैने विनय श्रीकर को देखा जो कुछ दूरी पर अकेले बैठे नमक के साथ पी रहे थे. नशा लगभग हिरन ही हो गया, क्योंकि मेरी एक आंख उनकी हरकतों से चिपक गई थी. मामला ही कुछ ऐसा था कि वह निकलने लगे तो मैं भी चुपचाप उठकर पीछे लग लिया. बाद में अरविंद चतुर्वेद ने बताया कि ज्ञानेंद्रपति को लगा था कि मैं किसी बात से दुखी होकर चला गया हूं. दोनों ने काफी देर मेरा इंतजार किया, आस-पास खोजा और लौट गए.

उधर मैं लड़खड़ाते हुए झूमते विनय श्रीकर के पीछे इंग्लिशिया लाइन की ओर जाने वाली एक गंदी गली में चला जा रहा था. मुझे उस तीर्थ की तलाश थी जहां वह जा रहे थे.

कोई एक हफ्ता पहले दफ्तर में चपरासी ने आकर बताया था कि बाहर एक आदमी बारिश में भीगते हुए आपको गालियां दे रहा है. बुलाने पर भीतर नहीं आ रहा. मैने खिड़की से देखा, वाकई कोई था जो पहचान में नहीं आ रहा था. पीकर धुत्त, गा रहा था. धुआंधार पानी में भीगी गालियां बक रहा था. बारिश में नाच रहा था. नीचे गया तो पाया यह विनय श्रीकर थे जो मूंछे मुड़ाए होने के कारण पहचान में नहीं आ रहे थे. वह उन दिनों हैदराबाद के एक हिंदी अखबार ‘वार्ता’ में थे, उनके जगतगंज में नाचने का अनुमान लगाना कठिन था. उन्होंने गले लगाते हुए मुझे भी पानी में घसीट लिया. अब दफ्तर से निकल लेने के अलावा कोई चारा नहीं था. पिछली बार कई साल पहले नखलऊ में मिले थे, बेहद दुखी थे कि उनकी कविताएं चोरी कर किसी ने अपने नाम से छपवा ली हैं. हम दोनों आधी रात के बाद जियामऊ मोहल्ले में उस आदमी के दरवाजे तक गए, लेकिन उन्होंने मुझे खटखटाने से रोक दिया. कहा कि जाने दो. साला, ऐसा करके कवि थोड़े हो जाएगा.

दरअसल, उन्होंने कविता क्या जिंदगी को भी गंभीरता से लेना कब का छोड़ दिया था… अब आगे शराब से तर होकर फिसलनदार हो गई मृत्यु तक लंबी ढलान थी.

कमरे पर जाकर फौरन बोतल खोली गई. उन्माद सम पर आया. वह हिचकियां लेते हुए बताने लगे, ‘‘सालों ने फिर निकाल दिया. कई महीने से घर का किराया बाकी है. हैदराबाद में मकान मालिक ने पत्नी बच्चों को बंधक बना लिया है. घर से बाहर निकलने तक नहीं देता. बड़ा बेटा इंजीनियरिंग कर रहा है. उसकी फीस बहुत दिनों से नहीं गई है. मैं किसी तरह निकला हूं. एक अखबार में नौकरी के लिए इंटरव्यू देने दिल्ली जा रहा हूं. ट्रेन में किसी सज्जन ने बैग मार दिया. यहां मेरा साला जीआरपी में है सो बनारस उतर गया. तुम्हारी याद आई तो मिलने चला आया. साले ने एक सेट कपड़ा बनवा दिया है. हर चीज उसी से तो नहीं कह सकते न. तुम किराए-भाड़े का देख लो तो इंटरव्यू दे आऊं… वहां का अजब रिवाज है. बंधक बना लेते हैं.’’

‘‘आपने मूंछें क्यों साफ करा दी?’’

‘‘कॉरपोरेट कल्चर डियर! कम उमर के लगें इसलिए. अब अखबार में चालीस के ऊपर वालों को नौकरी नहीं मिलती न इसलिए.’’ उन्होंने शर्माते हुए बताया.

अगले दिन उन्हें दिल्ली भेजने का इंतजाम किया गया. वह गले लगकर चले गए, लेकिन तीसरे दिन उनकी झलक लहरतारा पुल के पास दिखी. दो दिन बाद मैने खुद उन्हें परेड कोठी के पास देखा. आंखें मिलतीं, कुछ पूछ पाता कि एक गली में निकल गए. आज फिर दिख गए थे. मैं इस बार मुलाकात का मौका नहीं चूकना चाहता था.

अगले साल अरविंद चतुर्वेद फिर बनारस आए. इस बार साजो-सामान के साथ. जगतगंज में अपने बालसखा भोला के घर के सामने एक कमरा किराए पर लेकर रहने लगे. कलकत्ते में रहने के औचित्य बहुत थे. एक दशक से भी अधिक पुराने संपर्कों-संबंधों का जाल था जो उन्हें ‘जनसत्ता’ से वीआरएस लेने के बाद बड़े आराम से थाम सकता था और वह उस समय नवारुण भट्टाचार्य की पत्रिका ‘भाषाबंधन’ के संपादक थे जो बांग्ला और हिंदी की साझा पत्रिका थी. लेकिन कलकत्ते का ही औचित्य शायद नहीं रह गया था, क्योंकि उनकी गर्लफ्रेंड मुनमुन सरकार की कैंसर से मृत्यु हो गई थी. मुनमुन ने तसलीमा नसरीन की छह किताबों का बांग्ला से हिंदी में अच्छा अनुवाद किया है और नवारुण के प्रसिद्ध उपन्यास ‘हरबर्ट’ का भी.

अब उनकी खबर भोला से मिलती थी.

कबीरचौरा अस्पताल के सामने से गुजरो तो अपने मेडिकल स्टोर के काउंटर पर आधे से अधिक बाहर लटके भोला पान की पीक मारते हुए चिल्लाते थे, ‘‘काहो अरविंदवा से भेंट भयल?’’

‘‘काहे!’’

‘‘अरे, हमसे बाल फिर से जमाने वाली दवाई मांग रहा था. और कोई बात नहीं है.’’

अरविंद चतुर्वेद में अपने वक्त यानी सत्तर के दशक का बनारस भूसे की तरह भरा हुआ था.

बीएचयू कैम्पस की व्यवस्थित हरियाली पार कर लेने के बाद लंका का मद्रास कैफे था जिसके आगे लवंगलता-लस्सी की दुकान थी फिर कभी-कभार साइकिल का पैडिल मारने पर भी काम चला देने वाली अस्सी तक की ढलान थी.

साइकिल पर बैठने के पहले के समय में एक जगह थी जहां नया भारत बनाने के लिए कसमसाता प्रगतिशील किस्म का राष्ट्रवाद था, नेहरू के घर में अखंड आशावाद की कलारी थी जिसका माल किसी भी किस्म के समाजवाद के साथ मिलाकर पीने पर नशा कर्रा होता था, लेकिन हैंगओवर बहुत बुरा था. किसी गरीब को कुछ मनहर गानों के अलावा कुछ नहीं मिला था और नेहरू मर गए. मरते समय उन्होंने अपनी राख हवाई जहाज से देश पर बिखराने को कहा था. वह जहां-जहां गिरी वहां जो जरा रूमानी और आधुनिक था और अधिक हरा हो रहा था. सफर में नीम की दातुन का गड्डा और पान का चौघड़ा लेकर चलने वाले देहाती काशीनाथ सिंह तब जींस पहनने लगे थे. जींस का ही झोला लटकाए लाल रंग की साइकिल से बी.एच.यू. के हिंदी विभाग आते थे जो गुलमोहर के नीचे खड़ी होती थी. पालि की क्लास के बाद अपने चैंबर में अरविंद को बुलाकर कहते थे कि आर्य, अब आप सिगरेट पीएं और मुझे भी एक पान खिलाएं. उन्होंने तब ‘अपना मोर्चा’ उपन्यास लिखा था जिसका अब कोई नाम भी नहीं लेता.

पच्चीस साल बाद मैने देखा, धवल धोतीधारी काशीनाथ सिंह ‘हंस’ में देख तमाशा लकड़ी का और ‘काशी का अस्सी’ छपने के बाद गदगद आत्मीयता से स्वीकार कर रहे थे, ‘‘अहिरा (राजेंद्र यादव) ने हमको अमर कर दिया.’’

नक्सलबाड़ी कुचला जाकर फ्लॉप हो चुका था, लेकिन वसंत के वज्रनाद की गूंज हवा में थी. जवान रीढ़ों में झुरझुरी थी— हो सकता है… हो सकता है. रूस, चीन से आई किताबें खासतौर से उपन्यास बेहद सस्ते थे. अभी क्रांतिकारियों की जात देखकर भी नहीं देखी जा रही थी, लेकिन कहां चूक हुई इसके लिए एक जटिल तकनीकी भाषा में मूल्यांकन चल रहा था. लोफर लौंडे भी जानते थे कि एक कदम आगे दो कदम पीछे का क्या मतलब है. समाज बदलने के अधिक वैज्ञानिक तरीकों की खोज की जा रही थी, इसलिए दुर्गाकुंड पर सर्वहारा क्रांति के लिए वाजिब साहित्य व अन्य संस्कृतिकर्म की रचना को लेकर डॉ. रामनारायण शुक्ल, जलेश्वर उर्फ टुन्ना, ओमप्रकाश द्विवेदी, श्रीकांत पांडेय, राजशेखर के साथ की जाने वाली लंबी बहसें थीं. बगल में रवींद्रपुरी से लगी जो मेहतर बस्ती थी उसके वर्गीय चरित्र की व्याख्या सर्वहारा मानकर की जा रही थी. यह अंदाज लगाना असंभव था कि वे सब भविष्य की मायावती यानी दौलत की बेटी के वोट थे. टेंपर इतना था कि तभी अरविंद ने बनारस शहर में बने रहने के लिए ‘आज’ अखबार की नौकरी कर ली और उन्हें पूंजीवाद का पट्ठा घोषित कर दिया गया.

इंदिरा ने इमरजेंसी लगा दी थी तो क्या हुआ पीठियाठोंक जेपी आंदोलन भी था. गोदौलिया पर द रेस्टोरेंट और तांगा स्टैंड था, जहां विरोध सभाएं हुआ करती थीं. कुछ नौजवानों को बर्दाश्त नहीं था कि आदमी आदमी को खींचे इसलिए वे रिक्शे पर नहीं बैठने का ‘काम’ किया करते थे. अभी मुसलमान होना पाप नहीं बना था. चौराहों पर ऐसी बिरहा सुनी जा सकती थी जिसमें हनुमान जी अमेरिका जाते हैं और किसी डिपार्टमेंटल स्टोर में बहुत छोटे, अजनबी कपड़ों में सजी मैनिकिन को सीता माता समझकर चकित होते हैं.

भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद था, लेकिन विद्रोही चिंतन और घर के भीतर प्रतिपक्ष भी था. कोई जरूरी नहीं था कि बाप अगर बेईमानी करके बेटे को रेस जिता दे, वह उसे पूजनीय भी मानने लगे. हिंदी विभाग में सिर्फ दो कारें थीं एक महाप्रतापी प्रोफेसर विजयपाल सिंह की दूसरी सेकेंड हैंड टाइप कमलिनी मेहता के पास. विजयपाल सिंह के लड़के ने एम.ए. में गोल्डमेडल लाने वाले नामवर सिंह और शिवप्रसाद सिंह दोनों का रिकार्ड एक साथ तोड़ा था और जे.एन.यू. से लौटकर एम.ए. को पत्रकारिता का वह विशेष प्रश्नपत्र पढ़ाने लगा था जो छात्र-व्याखाता के तौर पर अरविंद पढ़ाया करते थे.

‘‘आता-जाता कुछ था नहीं, क्लास में भयभीत वन्यपशु की तरह बचता फिरता था. जिस रोज कोई लड़का सवाल पूछ दें तो घर लौटकर विजयपाल सिंह को केहुनाठ-केहुनाठ मारता था, वहां रोज मेरा मजाक उड़ता है. बेइज्जती कराने के लिए लेक्चरर बनवा दिए हो!’’

स्वाधीन ढंग से सोचने वाले, वर्जनाएं तोड़ने वाले, अपनी जिंदगियों के साथ निर्मम प्रयोग करने वाली स्वाधीन युवा आत्माओं की कमी नहीं थी. रीवा कोठी छात्रावास की खिड़की थी, जहां से खाली दुपहरी में पंडों की लंगड़ी छतरियां और नदी में हिलती छूंछी नावें दिखाई देती थीं.

एक दिन मैने देखा कि वह नखलऊ में एक अखबार में संपादक लगे थे और अब जीवन के केंद्र में नौकरी आ गई थी. बीच के बीते दिनों का निचोड़ कहने लगे, भौगोलिक नहीं समय की दूरी मायने रखती है. साला, बनारस में अब सिर्फ पुराना साइनबोर्ड बचा है. मैने पाया कि गोदौलिया पर मक्खियां बहुत बढ़ गई हैं, ठंडाई पर हरी काई जमी है, भीड़ भयावह है, परमसुपरिचित जगहों पर भी जा पाना दुरूह, टेलर मास्टरों के गले में हमेशा लटकने वाला फीता उतर चुका है, अब सब कुछ रेडीमेड है, हर जगह विज्ञापन के बोर्ड हैं, जो भी आत्मीय और पहचाना था वह जादू के जोर से गायब हो चुका है. सब ओर पलस्तर झर रहा है. इंतजार किया जाए तो जो दिखता है वही बदरंग और कुरूप निकलता है. शंख घोष की कविता याद आती है :

एकला हए दांड़िए आछी
तोमार जन्य गलिर कोने
भाबी आमार मुख देखाबो
मुख ढेके जाए विज्ञापने.
एकटा दूटा सहज कथा
बोलबो भाबी चोखेर आड़े
जौलूशे ता झलसे उठे
विज्ञापने रंगबाहारे.

(तुम्हारे इंतजार में अकेला खड़ा हूं गली के मोड़ पर. सोचता हूं दिखाऊंगा अपना मुखड़ा. चेहरा ढंक जाता है विज्ञापन से. सोचता हूं सहज ही एक दो बातें करूंगा नजरों की ओट से. लेकिन भीड़ में विज्ञापन की रंगीनियों में वह चौंधिया रहा है.)

भूल गया था, इसी बीच में उदारीकरण हुआ और दुनिया एक गांव भी तो बन गई थी. घोड़ा अस्पताल पर बरगद के नीचे चाय की दुकान पर मिलने जाओ तो लगता था जैसे कोई किलनी चिपकी हुई है. एक चाय, एक सिगरेट और आधा गाल बतकही के बाद धागा खट्ट से टूट जाता था, चलें यार, दफ्तर में बहुत काम है.

मैं नकली हैरानी और खांटी उपेक्षा से देखता था, ‘‘ऐसा क्या काम है.’’

‘‘है यार, आप समझ नहीं रहे हैं. आदमी कम हैं. अभी जो स्थिति है उसी में दफ्तर से निकलते-निकलते बारह बज जाता है.’’

मैं यह सोचकर उनकी उपस्थिति से ही कपट अंजान हो जाता था कि उपेक्षा का असर पड़ेगा और वह थोड़ी देर और बैठेंगे, लेकिन वह तो सचमुच पछताते हुए कदमों से दफ्तर की ओर चल देते थे. मैं सोचता था कि आदमी सदा से किरानी रहा होगा या इन दिनों बदलकर ऐसा ‘कामी’ हो गया है.

अंततः एक दिन मैं यह देखने दफ्तर के भीतर गया कि यह आदमी काम कैसे करता है. मैने पाया कि किसी कॉपी को एडिट करने या लेख पर हेडिंग लगाने के बाद कम्यूटर के की-बोर्ड पर इतनी जोर से हाथ मारता है कि लगता है वह टूट जाएगा. क्या उसे पता नहीं है कि हल्का-सा कमांड पाने के बाद फाइल अपने आप जहां भेजी जा रही है, साइबर स्पेस में तैरती हुई पहुंच जाएगी. पता था, लेकिन यकीन नहीं… कम्प्यूटर छकड़ा था, यह आदमी पल्लेदार की तरह पुट्ठों की पूरी ताकत लगाकर खबरों और लेखों में भरे अक्षरों के वजन का अनुमान लगाते हुए वाजिब डेस्कों और प्रिंटर तक पहुंचा रहा था जिससे अक्सर सांस उखड़ जाती थी. प्रिंटर से निकलते कागजों पर असुरक्षा भी छपी होती थी, लेकिन कोई उसे देख नहीं पाता था क्योंकि सभी उसके नजरबंद में काम कर रहे थे.

मैं एक रात उन्हें दफ्तर से उठाकर त्रिपुर सुंदरी का लॉन दिखाने ले गया. यह बरसात के दिनों में ला मार्टिनियर कालेज और अंबेडकर पार्क के बीच की बढ़ियाई गोमती नदी थी जिसके दोनों किनारों पर ऊपर सड़क तक बोल्डर जड़ दिए गए थे. रात में जब गोमती नगर को जाने वाले पुल, अंबेडकर पार्क के आगे नदी के पुश्ते पर लगे लैंपपोस्टों की रोशनियां पानी पर पड़ती थीं और दूसरे छोर पर दिलकुशा के पास अंधेरे में कोई रेलगाड़ी नदी पार कर रही हो तो खुशी और उदासी का अजीब-सा मेल होता महसूस होता था. पुरवाई से पानी में लहरें उठती थीं, तब नदी का पाट रोशनियों के वन में बदल जाता था. प्रकाश का यह जादू अंधेरे और हल्के नशे में ही चलता था, वरना दिन में तो किसी रेगिस्तानी किले जैसा अंबेडकर स्मारक था, किलोमीटरों तक चिलचिलाते बोल्डर थे जिन पर सूखते गू से बचकर चलना पड़ता था, नदी में प्लास्टिक की पन्नियां, रसायनों का झाग और शहर का कचरा भरा था. दुर्गंध के भभके बेचैन किए रहते थे. हम दोनों काफी देर तक बोल्डरों पर बैठे साथ में लाए तरल की चुस्कियां लेते सौंदर्य पर मुग्ध होते रहे. मोटरसाइकिल से वापस लौटते हुए ख्याल आया, क्या कविता और साहित्य की दुनिया इस त्रिपुर सुंदरी के लॉन जैसी ही नहीं है, जिसमें हम लोग रहते हैं?

‘‘हां, यार बात तो कुछ ऐसी ही है, लेकिन किया क्या जाए!’’

सोशलिस्टों ने कुछ किया हो या नहीं भाषा को कुछ शब्द बहुत सटीक दिए हैं. ऐसे ही एक पद ‘निराशा के कर्तव्य’ की याद बेसाख्ता आई, जब देखा कि अरविंद चतुर्वेद फेसबुक पर इस फ्यूजन के जमाने में खालिस दोहे लिख रहे हैं और हर दोहे में जो कहा जा रहा है, उसका पहला श्रोता बांकेलाल है.

मैने उसे पहचान लिया. उसका असली नाम कुछ और है, लेकिन उस पर हिकारत की इतनी धूल पड़ी है कि कोई उसके नाम से पुकारे तो वह चौंक कर किसी और को देखने लगेगा. मूर्ख समझे जाने की हद तक लटक कर भी हमेशा मुस्काने वाला बांकेलाल चरकोनवां का रहने वाला है. उसके दो ही शौक हैं— महुए की शराब और मछली. मछली तो वह गांव के तालाब से बंसी डालकर पा लेता है, लेकिन महुए के लिए काम करना पड़ता है. कभी उसका पुलिस से सीधा पाला नहीं पड़ा, लेकिन उसे खाकी वर्दी से बहुत डर लगता है. यह डर गाजर-मूली लोगों को ही नहीं पुलिस वालों को भी पुलिस वालों से लगता है. वह अपने बेटे के विवाह के मंडप से एक वर्दी में आए होमगार्ड को देखकर पेशाब करने के बहाने भाग खड़ा हुआ था जो दरअसल दुलहिन का मामा था. प्रधानी और विधायकी के चुनाव में मतदान के दिन वह छिपकर बैठ जाता है, क्योंकि उस दिन पोलिंग बूथ पर पुलिस वाले तैनात होते हैं. उससे वोट डलवाने के लिए उम्मीदवारों को बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है, पुलिस वालों को जरा देर के लिए इधर-उधर हटाना पड़ता है. ये दोहे निराशा के कर्तव्य के पालन में उसी बांकेलाल से कहे गए हैं.

***

[ अनिल यादव हिंदी के प्रसिद्ध कथाकार, पत्रकार और यायावर हैं. उनकी अब तक तीन किताबें ‘नगरवधुएं अखबार नहीं पढ़तीं’ (कहानी-संग्रह), ‘वह भी कोई देस है महाराज’ (यात्रा-कृति) और ‘सोनम गुप्ता बेवफा नहीं है’ (लेख-संग्रह) प्रकाशित हैं. उनसे oopsanil@gmail.com पर बात की जा सकती है. यह प्रस्तुति ‘सदानीरा’ के 19वें अंक में पूर्व-प्रकाशित.]

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