सफ़र ::
मनीषा जोषी

Manisha Joshi new photo
मनीषा जोषी

मेक्सिको, अमेरिका में (कैलिफोर्निया में) रहते हम लोगों के लिए बहुत क़रीबी (दोनो अर्थ में) जगह है और हम इसे प्यार से ‘मेहिको’ ही बुलाते हैं। घने जंगल, सुंदर समुद्र किनारे, बेहतरीन खाना-पीना, संगीत-नृत्य सब कुछ है यहाँ… लेकिन मैं इस बार उस मायावी मेक्सिको को देखना चाहती थी जो माया संस्कृति और आधुनिकता के बीच कहीं पर रुक गया है, जो अमेरिका से इतने पास होते हुए भी अमेरिका नहीं है और जो भारत से इतने दूर होते हुए भी कई मायनों में भारत है। या फिर मैं मेक्सिको में उस जादुई यथार्थवाद को ढूँढ़ना चाहती थी जो जुआन रल्फो की किताब ‘पेड्रो पारामो’ में था, जो ‘लाइक वाटर फॉर चॉकलेट’ फ़िल्म के लव-सीन में था। यात्राएँ कभी अपने आप में निर्लिप्त नहीं होतीं। एक यात्रा, पिछली कई यात्राओं का सामान उठाए, साथ-साथ, समांतर चलती रहती है।

मेरा जन्म कच्छ में हुआ तो वहाँ धौलावीरा में हड़प्पा संस्कृति के अवशेष मैंने देखे। न्यूजीलैंड में छह महीने रही तब वहाँ माओरी सभ्यता से परिचय हुआ और उनकी भाषा, चित्र, शिल्प देखे… यूरोप प्रवास के दौरान ग्रीक-रोमन कला-सभ्यता से साक्षात्कार हुआ और अब यहाँ, मेसो-अमेरिकन संस्कृति में ईसा पूर्व 2000 के समय में विकसित माया सभ्यता के सबसे बड़े शहर रहे चीचेन इत्झा के खंडहरों को देख रही हूँ।

यहाँ एक मंदिर योद्धाओं का भी है जो दूर से ही अति प्रभावशाली लगता है। आस-पास कुछ छोटे स्टॉल लगे हुए थे, जिनमें माया सभ्यता के वंशज माया कला के मैग्नेट, वुडन मास्क आदि बेच रहे थे।

मैं पूर्वजन्म को नहीं मानती, लेकिन इन सभ्यताओं को देखने के बाद मुझे ख़याल आ रहा था कि मैं भी कभी ऐसे ही किसी समाज का हिस्सा रही होऊँगी। मुझे यह कल्पना करना अच्छा लग रहा था कि यहाँ का कोई योद्धा मेरा प्रेमी रहा होगा और मेरा प्यार पाने के लिए उसने किसी से युद्ध भी किया होगा। एक छोटी हटड़ी पर रखी कुछ योद्धाओं की मूर्तियों में से एक योद्धा पर मुझे प्यार भी आने लगा। मैं उसे निहार रही थी कि हटड़ी पर बैठे लड़के ने कहा, पाँच सौ पेसो या तीस अमेरिकन डॉलर। मैं चलने लगी तो वह पीछे से बुला रहा था, बीस डॉलर… फिर चिल्ला रहा था, दस डॉलर… वह मेरे प्यार की क़ीमत और कम कर दे इससे पहले मैं वहाँ से आगे निकल गई।

समय की गर्त में आख़िर क्या क़ीमत रह जाती है योद्धाओं की या फिर प्रेम की!

Temple of Warriors, Chichen Itza, Mexico
Temple of Warriors, Chichen Itza, Mexico

समुद्र के संदर्भ उतने ही जितने समुद्र इस दुनिया में

तेरह साल पहले ग्रीस की यात्रा के दौरान एथेंस से बस लेकर केप सुनीओन में समुद्र के देवता पोसायडन के मंदिर के दर्शन करने गई थी। मंदिर तो क्या, एक पहाड़ी पर एथेंस के गोल्डन एज के दौरान बने इस मंदिर के कुछ प्राचीन स्तंभ के अवशेष थे, और उस पहाड़ी के तीनों ओर सिर्फ़ समुद्र! न कोई शिल्प, न कोई चित्र, न प्रवासियों के लिए कोई दुकान… कुछ नहीं, सिर्फ़ ऊँचाई, खुला आकाश, गरजता हुआ समुद्र! और मुझे लगा था कि पोसायडन है, यहीं कहीं, इस नीले पानी में तैर रहा है दूर तक या फिर सो रहा है पानी के अंदर! ग्रीक पुराण-कथाओं में पोसायडन के जितने भी उल्लेख/चित्र हैं, वे सब उसे एक वृद्ध-पुरुष बताते हैं, लेकिन मुझे उस वक़्त पोसायडन और वह समुद्र सबसे ज़्यादा युवा और कामुक लग रहे थे। समुद्र से इतनी निकटता मैंने पहले कभी महसूस नहीं की थी।

इसीलिए तो आज भी मैं याद कर रही हूँ—ग्रीस का समुद्र, जबकि मैं अभी हूँ—मेक्सिको के दरिया किनारे पर!

यात्राएँ, स्मृतियाँ नहीं तो और क्या हैं और स्मृति का कोई क्रम नहीं होता। अतिक्रमण ही इनकी नियति है।

वैसे मैं एक और समुद्र को भी याद कर रही हूँ आज, और वह है—गुजरात के कच्छ में जखौ का समुद्र। छोटी थी तब माता-पिता के साथ वहाँ गई थी। रात वहीं रुके थे गेस्टहाउस में, पर अचानक वह रात बहुत भारी तूफ़ान की रात बन गई थी। रात भर खिड़कियाँ और कमरों के दरवाज़े ज़ोर-ज़ोर से टकरा रहे थे और लगता था कि दरिया का पानी अभी कमरों के अंदर तक आ पहुँचेगा!

ग्रीस के समुद्र का संदर्भ मेरे मन में रूप और यौवन से है, तो जखौ के समुद्र का संदर्भ आवाज़ से।

यूरोप में मैंने न्यूड बीच भी देखे हैं, लेकिन वहाँ कुछ सुंदर युवकों-युवतियों के सिवा ज़्यादातर नग्न शरीर बेहूदे लग रहे थे और उनकी जुगुप्सा में समुद्र की सुंदरता भी ख़त्म हो गई थी।

लेकिन अभी तो मैं हूँ यहाँ, रीविएरा माया के टुलुम बीच पर। यहाँ किनारे का एक विस्तार कछुओं के लिए आरक्षित अभयारण्य है। हर साल हज़ारों कछुए (जिसमें सफ़ेद कछुए भी होते हैं) यहाँ प्रजनन की ऋतु में आते हैं और इस किनारे को अपना घोंसला बनाते हैं। इस समुद्र के किनारे कुछ ऊँचाई पर पवन के माया देवता युराकान के मंदिर का खंडहर है जो इस पूरे किनारे की रक्षा करता है। टुलुम के इस समुद्र को मैं जब भी याद करूँगी, तब मैं प्रेम ओर संवनन का उत्सव रचते कछुओं को देखूँगी और मैं यह भी देखूँगी कि युराकान अपने मंदिर से पवन की गति मंद करके कछुओं के नए जन्मे बच्चों को धीरे-धीरे वापस पानी में भेज रहे होंगे।

Chichen Itza, Mexico
Chichen Itza, Mexico

उष्णदेशीय वृक्षों का यूँ मिल जाना मुंबई से…

कान्कुन शहर मुझे पहेली ही नज़र में पसंद आ गया—यहाँ के उष्णदेशीय वृक्षों की वजह से। लगा जैसे मैं भारत में मेरे प्रिय शहर मुंबई पहुँच गई होऊँ। गर्मियों में मुंबई के रास्तों पर जैसे गुलमोहर के लाल और अमलतास के पीले फूल बिखरे हुए दिख जाते है, वैसे ही यहाँ इन फूलों से सारे रास्ते रंगीन नज़र आ रहे थे। हरे बादाम के पेड़ भी इतने सारे कि चलते वक़्त माथे पर भी बादाम गिरे। नारियल, पाम ट्री, पपीता, केले, बेर, अवोकाडो वग़ैरह दूसरे कितने सुंदर छोटे-बड़े पेड़-पौधे।

कान्कुन मुंबई से ज़्यादा छोटा, स्वच्छ और गर्म है। प्यास बहुत लग रही थी और इस बहाने यहाँ के ठंडे शरबत जिसे एग्वा फ्रेस्का कहते हैं, पीने को मिल रहा था। यहाँ इमली, हीबीस्कस, चावल और मेक्सिकन मद्य, वग़ैरह कई तरह के फ्रेस्का मिलते हैं, पर मुझे आइस-टी जैसा एग्वा चाया सबसे ज़्यादा पसंद आया जो एक तरह की माया पालक के पत्तों से बनाते हैं।

यहाँ कॉर्न चिप्स के साथ अलग-अलग तरह के सालसा और साथ में मार्गारीटा और मोहितो पीने का एक अलग ही मज़ा है। कान्कुन नाम का अर्थ है—साँप का घोंसला, लेकिन शहर वैसा डरावना नहीं लगा। रास्तों पर चलते सुनाई देता स्पैनिश संगीत इतना आनंदप्रद था कि यहाँ उदास संगीत भी होता होगा, यह मानना ही मुश्किल लगता है! लेकिन है, ग़रीबी और क्रूरता यहाँ पर भी है।

कॉर्न, कैक्टस और कोको से शुरू हुई सभ्यता

ईसा पूर्व पाँच हज़ार वर्ष दौरान मेक्सिको में मक्का की खेती शुरू हुई और शिकार की संस्कृति से कृषि संस्कृति का विकास हुआ। मक्का यहाँ इतना पूजनीय है कि सुवेनियर स्टोर में हाथ में मक्का पकड़े हुए या अपने मुकुट में मक्का के छिलके सजाए हुए मक्का के देव-देवियों की मूर्तियाँ भी बिकती हैं। कॉर्न टोर्टीया मतलब मक्की की चपाटी यहाँ रोज़ का भोजन है। सुबह के नास्ते में टमाली प्रिय है। एक बूढ़ी मेक्सिकन औरत ने मुझे बताया कि वह रोज़ सुबह जल्दी उठकर मक्का के आटे में चीज या चिकन मिलाकर, उसे मक्का के छिलके में लपेटकर, फिर भाप में पकाकर टमाली बनाती है। एक डिब्बे में उसे भरकर, रास्ते पर बेचने के लिए बैठती है। थोड़ी देर में ही आस-पास के ग़रीब युवा नास्ता करने आ जाते हैं, और उसका गुज़ारा ऐसे ही चलता रहता है। जब, जहाँ, जो मिले, उसमें जी लेना ज़्यादा मुश्किल तो नहीं… लेकिन हमको बहुत कुछ और चाहिए होता है और यह अधिक दिलचस्प चीज़ है।

माया पूर्वज तो यहाँ उगते कैक्टस खाकर भी जी लेते थे, फिर इसी कैक्टस का रेशा लेकर उन्होंने वस्त्र बनाए और फिर इसी कैक्टस से टकीला नाम की तेज़ शराब भी तो बनी! और तो और, चॉकलेट का इतिहास भी माया समाज से ही शुरू हुआ। कोको बींस को पीसकर वे पीते थे और इस प्रवाह को माय भाषा में ‘क्षोकोलॉटी’ यानी ‘कड़वा पानी’ बोलते थे। कॉर्न की तरह कोको की भी एक माया देवी है, जिसका नाम है—इक्षकाको।

अब मेक्सिको के फ़ाइव स्टार रेस्त्राँ में कैक्टस के फैंसी फ्यूजन व्यंजन, महँगे टकीला रपसान्डो और आकर्षक प्रेजेंटेशन के साथ माया चॉकलेट परोसते हैं… लेकिन ये अमीर और आधुनिक मेक्सिको है।

हाबानेरो मिर्च और माचोइज्म

मक्का के खाने को ज़्यादा स्वादिष्ट बनाने के लिए फिर माया प्रजा ने मिर्च उगाई और अब तो मिर्च यहाँ इतनी प्रिय है कि बाज़ार में पासीला, अरबोल, मोरीटा, कास्काबेल, ग्वाजीलो, पोब्लानो जैसी कई तरह की ताज़ी मिर्च और व्यंजन मिलते हैं। मुलाक़ाती यहाँ से हॉट सॉस का गिफ़्ट पैक भी ख़रीदते हैं। मेक्सिकन कल्चर माचो कल्चर (पुरुष-प्रधान) है और यहाँ की सबसे तीखी हाबानेरो मिर्च तो माचोइज्म का प्रतीक बन गई है। हमारा मेक्सिकन गाइड रफ़ायेल सबको हाबानेरो खाने की चुनौती दे रहा था और दूसरे अमेरिकन प्रवासी डरकर दूर भाग रहे थे, लेकिन मैं काफ़ी तीखा खा सकती हूँ तो जब मैंने हाबानेरो खाकर दिखा दी तो वह बहुत प्रभावित हो गया। मुझे हँसी आ गई कि क्या मेक्सिको में पुरुष होना इतना सरल है?

Cenote, Yucatan, Mexico

भूमिगत जलाशयों में कौमार्य और वीररस की बलि

मेक्सिको में आजकल केव डाइविंग यानी गुफा में तैरना पर्यटकों के लिए बहुत बड़ा आकर्षण है। लाइमस्टोन टूटने से क़ुदरती तौर पर बनी ऐसी गुफाएँ जैसे सीनोटे या सिंकहोल सिर्फ़ युकाटान विस्तार में ही छह हज़ार के क़रीब हैं। इनमें से कुछ माया इतिहास के पवित्र सीनोटे भी हैं, जहाँ सिर्फ़ पूजा ही नहीं बल्कि वर्षा की देवी चाक को मानव बलि भी दी जाती थी। चीचेन इत्झा के सेक्रेड सीनोटे में कुमारिका और योद्धा को बलि देते थे।

कौमार्य और वीरता के लिए संसार भर की संस्कृतियों में कितना क्रूर आकर्षण है!

सीबा वृक्ष भी माया संस्कृति में सबसे पवित्र है। इस वृक्ष को पाताल, पृथ्वी और स्वर्ग—इन तीनों के बीच का संपर्क माना जाता है और कहते हैं कि मृत्यु के बाद आत्माएँ स्वर्ग जाने के लिए इस पेड़ पर चढ़ती हैं। यह वृक्ष कापोक या सिल्क फलोस के नाम से भी जाना जाता है और हर पवित्र जगह या पानी के उद्गम करके सीनोटे के पास देखने मिलता है। माया लोग मानते थे कि ये सीनोटे, पाताल या मृत्यु के बाद के जीवन के लिए प्रवेश-द्वार हैं।

इस पवित्र जलाशय से लौटने के बाद कार में बैठकर मैं रास्ते में आते छोटे-छोटे अनजान गाँवों के नाम पढ़ती रही और सोचती रही कि अब क्या मैं कभी भी उस सीबा वृक्ष से नीचे उतर पाऊँगी?

Mayan woman making tortillas, Yucatan, Mexico

फ्रीदा, अमृता, मैं और वह दुकान वाली औरत

प्लाया देल कारमेन, वैसे तो रीविएरा माया का एक छोटा फीशिंग टाउन, लेकिन अब लास वेगास जैसा पार्टी टाउन बन गया है और यहाँ तो बीच भी है, इसलिए मयामी से भी मुक़ाबला कर सकता है। एक हाथ में चुरो (लंबी मेक्सिकन पेस्ट्री) और दूसरे हाथ में कॉफ़ी पकड़े, प्लाया देल कारमेन की गलियों में घूमना सचमुच अच्छा लगा। यहाँ की एक दुकान से मैंने माया कैलेंडर की डिज़ायन का एक गले में पहनने का पेंडेंट ख़रीदा। मैं समझ रही थी कि दुकान वाली औरत ज़्यादा पैसे ले रही है, लेकिन पता नहीं क्यों, अजनबी शहर में, किसी अजनबी औरत से थोड़ा-सा लुट जाना मुझे अच्छा लगा!

यहाँ अब फ्रीदा काहलो म्यूजियम भी बना है, इसलिए पूरे शहर में इस विख्यात मेक्सिकन चित्रकार की मौजूदगी महसूस होने लगी है। टी-शर्ट, टी-कप, थैले, मैग्नेट, कुशन कवर इत्यादि कई चीज़ों पर फ्रीदा का चेहरा बिकता है। अर्जेंटीना के क्रांतिकारी चे ग्वेरा के बाद सबसे ज़्यादा वस्तुकरण अब शायद फ्रीदा का ही हुआ है। फ्रीदा के चित्र और उसका जीवन कुछ हद तक मुझे भारतीय चित्रकार अमृता शेरगिल की याद दिलाते रहे।

फ्रीदा, अमृता, मैं और वह दुकान वाली औरत… हम बालों में बड़े-बड़े फूल लगाकर, एक दूसरे का हाथ थामे, प्लाया देल कारमेन से गुजर रहे थे।

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मनीषा जोषी गुजराती कवयित्री हैं। ‘सदानीरा’ ने अपने 20वें अंक में एकाग्र स्तंभ के अंतर्गत उनसे एक बातचीत, उनकी कविताएँ और यहाँ प्रस्तुत यात्रा-आलेख प्रकाशित किया है। यह यात्रा-आलेख मनीषा ने ‘सदानीरा’ के आग्रह पर हिंदी में लिखा है। यह ध्यान देने योग्य है कि यह हिंदी में लिखने की उनकी पहली कोशिश है। वह कैलिफोर्निया में रहती हैं। उनसे manisha71@gmail.com पर बात की जा सकती है। इस प्रस्तुति में प्रयुक्त तस्वीरें लेखिका के ही सौजन्य से।

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