वृत्तांत ::
ऋषभ श्रीवास्तव

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ऋषभ श्रीवास्तव

जब भी वो झुकती, फौजी को उसके स्तन दिखाई देते. ये कई बार होता. ट्रेन हिचकोले खाती. उसका बच्चा कोई न कोई सामान नीचे गिरा देता. जब वह चेहरे पर थोड़ी शर्म लिए सामने की सीट पर देखती तो फौजी से उसकी आंखें मिलतीं. फौजी मुस्कुरा देता. फिर फौजी रह-रहकर अपने बैग से एक मैगजीन निकाल लेता. थोड़ा पढ़कर वापस रख देता. मैगजीन देश की राजनीति पर थी. फौजी उसे अपनी आंखों के सामने इस कदर रखता जैसे देखने वाले को लगता कि फौजी को ट्रेन में ही इत्मीनान मिला है पढ़ने के लिए. लेकिन मैगजीन के ठीक ऊपर से फौजी उसके ब्लाउज के अधखुले बटन में झांकता रहता.

उसे यह भी डर था कि कोई देख लेगा तो यूनिफॉर्म की इज्जत चली जाएगी. नौकरी तो जाएगी ही. इसलिए हर दो मिनट पर एक गंभीर सांस लेकर खिड़की के बाहर शून्य में ताकने लगता. लगता जैसे कुछ सोच रहा है. फिर वापस मैगजीन की तरफ आंखें लाता— पूरे कोच का सिंहावलोकन करते हुए. किसी से नजरें मिलती तो फौजी एकदम निर्लिप्त रहता. फिर अपने हाथ के पन्ने पर एक सरसरी निगाह डालता जैसे रिवीजन कर रहा हो. उसके बाद पन्ना पलट देता.

बनारस आने में अभी तीन घंटे थे. कोच के यात्री कहने लगे टाइम से पहुंच जाए तो मानेंगे. पर अपने को क्या. बनारस थोड़े ही न जाना है. सारे अपना-अपना सामान बटोरने लगे थे. बलरामपुर हाल्ट पर ट्रेन रुक गई. एक-एक कर कई लोग उतरे. फौजी भी झटपट उतरा चाय लेने. हल्की-हल्की बारिश हो रही थी. सूरज अपने अड्डे लौट रहा था. लौट के आया तो कोच में उसके और उस औरत के अलावा सिर्फ एक लड़का और एक बूढ़ा आदमी ही बचे थे. लड़का साइड अपर पर, बूढ़ा साइड लोअर पर.

फौजी फिर मैगजीन लेकर बैठ गया. अब उसे बार-बार बाहर नहीं देखना पड़ रहा था. सिर्फ एक बार लड़के की तरफ देख लेता. लड़का फोन पर उलझा हुआ था. उसकी तरफ से फौजी निश्चिंत हो गया. बूढ़ा ऊंघ रहा था. उसका हाथ अपने बैग पर इस कदर जकड़ा था मानो बूढ़ा किसी लहर में बह रहा हो और यह बैग किसी चट्टान की तरह उसके हाथ आ गया हो. फौजी ने धीरे से आवाज की, जैसे कुछ पूछ रहा हो. किसी ने ध्यान नहीं दिया. अब फौजी ने आराम से पैर फैला दिए.

खुराफाती बच्चा सो गया था— औरत के दाएं, उसकी कमर के पास. वह औरत अपनी आंखें बंद किए खिड़की की तरफ टेक ले सो रही थी. नींद में थी या नहीं कहना मुश्किल था. उसकी साड़ी उसके दोनों स्तनों के बीच सिमटी पड़ी थी. अब पहले की तरह उसके ब्लाउज के बीच का हिस्सा दिखाई तो नहीं पड़ रहा था. पर अब कसे हुए ब्लाउज में से उसके स्तनों का आकार पूरी तरह मालूम पड़ रहा था. हरे रंग के ब्लाउज के पीछे सफेद रंग की ब्रा थी. ब्रा का कटाव साफ मालूम पड़ रहा था. फौजी ने अपनी कल्पना दौडाई. उसके स्तनों के बारे में सोचने लगा. अचानक उसे लगा कि औरत के निप्पल तो साफ पता चल रहे हैं. फौजी ने अपनी आंखों को और समेटा. और ध्यान से देखने लगा. कहीं ये ब्लाउज की सिकुड़न तो नहीं? नहीं, यह निप्पल ही है.

अचानक फौजी की नजर साइड अपर पर सोए लड़के से मिली. लड़का फौजी को ही देख रहा था. फौजी एकदम सकपका गया. तुरंत मैगजीन के चार-पांच पन्ने पलटे. टाइम देखा. बोतल खोलकर एक घूंट पानी पिया. फिर बोतल हाथ में लिए बाहर की तरफ देखने लगा. खिड़की पर एक कीड़ा चल रहा था. फौजी आगे की तरफ झुका और कीड़े को उंगलियों से बाहर फेंक दिया. फिर एकदम से कुछ दृढ़-निश्चय का भाव आया फौजी के चेहरे पर. मैगजीन और बोतल सीट पर अपने दोनों साइड रख दिया. उठा, अपनी पैंट ठीक की और धीरे-धीरे चलता बाथरूम की तरफ निकल गया.

बाथरूम में वह उसके स्तनों के बारे में ही सोचता रहा. बीच-बीच में उसे लड़के का ख्याल आ जाता. इस ख्याल ने फौजी की पेशाब की धार को धीमा कर दिया था. पेशाब कर लेने के बाद फौजी उसी स्थिति में खड़ा रहा. कुछ सोचा और फिर निश्चय कर लिया कि अब वह लड़के की तरफ देखेगा ही नहीं… मैगजीन में देखेगा. एक नजर औरत की तरफ मार लेगा. वैसे भी कौन-सा उसे कुछ मिलने वाला है. आंखों से जितना सौंदर्य पी सकते हो पी लो. लेकिन दिक्कत यह है कि आंखों से कितना भी देख लो दिल नहीं भरता. खून में एक अजीब तरह का उबाल आ जाता है. यह उबाल चैन से बैठने नहीं देता. न देखे बिना रह ही नहीं सकते. कितना भी मन मना लो, घूम-फिरकर देख ही लोगे. देखो तो कुछ समझ नहीं आता कि क्या करें.

फौजी वापस आया और अपनी सीट पर बैठ गया. कुछ देर खिड़की की तरफ देखा, फिर सिर झुकाकर अपने पैरों की ओर देखने लगा. बारिश तेज हो गई थी. पेड़-पौधे सारे मजे कर रहे थे. कहीं-कहीं तालाब जैसा दिख जाता. तालाब तो ऐसे उछल रहे थे मानो बारिश की बूंदें लपक रहे हों. सिर झुकाए ही फौजी ने अपना बैग समेटा, दो-फोल्ड किया. खिड़की की तरफ अपने पैर किए और बैग को सिर के नीचे रखकर सो गया. अब उसे लड़के से निवृत्ति मिल गई थी. अपने हाथों को उसने अपने माथे पर रख लिया. अब कोई नहीं बता सकता था कि फौजी सो रहा है या नहीं. उधर औरत अब सो गई थी, यह कन्फर्म था. क्योंकि उसके हाथ बिल्कुल खुले एक तरफ लटके थे. साड़ी घुटनों पर चढ़ चुकी थी. एक मक्खी बार-बार उसके घुटने पर बैठ रही थी. वह कुछ देर के लिए उड़ जाती, बच्चे के मुंह पर बैठती, फिर घुटने पर आ जाती.

बीच-बीच में औरत एक लंबी सांस लेती. उसकी छातियां एकदम से चढ़ जातीं. फौजी कसमसा जाता. ब्लाउज के नीचे से झांकने का यत्न करता. ऐसा लगता ब्लाउज के नीचे कुछ दिख रहा है. स्तन का एक छोटा हिस्सा. फौजी ने अपनी आंखें मलीं. फिर भी साफ पता नहीं चल रहा था. थक कर फौजी ने उसके पेट को देखना शुरू कर दिया. चपटे सपाट पेट पर एक गहरी नाभि. पेट एकदम मासूम लग रहा था. फौजी को लगता जैसे पेट उसकी ही तरफ देख रहा है. फौजी ने अपनी नजरें हटा लीं. फिर नाभि में देखने लगा. ऐसा लगता नाभि को अपने अस्तित्व से कोई मतलब नहीं. धीरे-धीरे फौजी फिर स्तनों को देखने लगा. औरत अपने ब्लाउज के ठीक ऊपर एक उंगली से सहला रही थी. फिर निश्चेष्ट पड़ गई. अचानक फौजी को लगा कि औरत का पेट घूर रहा है. फौजी ने तुरंत पेट की तरफ देखा. अबकी बार पेट थोड़ा लाल लगा. जैसे गुस्से में हो. अब फौजी स्तनों की तरफ देख ही नहीं पा रहा था. उसे खीझ होने लगी.

औरत ने सोते-सोते ही अपनी साड़ी नीचे कर ली. मक्खी का एक ठिकाना बंद हुआ तो उसने बच्चे को परेशान कर दिया. लगा उसकी नाक में घुस जाएगी. बच्चा कुनमुनाने लगा. औरत अचानक से उठी और बच्चे को गोद में लेकर दूध पिलाने लगी. फौजी घबरा गया. कहीं औरत उसी की तरह आंख मूंदे देख तो नहीं रही थी? उसने अपने पैर मोड़ लिए, और करवट लेकर सो गया. औरत से नजर मिलाने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी.

तब तक बूढ़ा आदमी भी उठ चुका था और उस लड़के से बात कर रहा था. अब दोनों ही साइड लोअर सीट पर बैठे थे. ट्रेन धीमी हो गई थी. फौजी सकुचाने लगा. कहीं लड़का बूढ़े को मेरे बारे में तो नहीं बता रहा? फौजी पूरा ध्यान लगाकर उनकी बातें सुनने की कोशिश करने लगा. लड़का धीरे से उठा और फौजी के कंधे पर हाथ रख धीरे से झिंझोड़ दिया. फौजी घुन्ना गया. दिखावा ऐसे किया मानो बहुत गहरी नींद में था. बोला क्या हुआ? कोई दिक्कत है? लड़के ने फौजी की बात को अनसुना करते हुए कहा, ‘‘अंकल को उतरना है रघुनाथपुर. दो मिनट में आ जाएगा. एक बोरा है उनका गेहूं का. थोड़ी हेल्प कर देना मेरी. मुझसे उठ नहीं रहा था. दोनों मिलकर उतार देंगे. फिर जवाब की प्रतीक्षा किए बिना बोरे को सीट के नीचे से खींचने लगा.

रघुनाथपुर आ गया. तीनों खड़े हो गए. बूढ़े ने जोर से अंगड़ाई ली. औरत की तरफ ध्यान से देखा. फिर फौजी की तरफ. लगा कुछ पूछ रहा हो. फौजी ने ओंठ बिचका दिए. मानो हां बोला है. ट्रेन रुक गई. बूढ़ा उतर गया. दोनों ने बोरे को नीचे प्लेटफार्म पर फेंक दिया. बूढ़ा बहुत खुश था. खुशी में उसने अपने दोनों हाथ हवा में उठाए मानो आशीर्वाद दे रहा हो. फिर आंखों को गोल करते हुए सिर को टेढ़ा कर तीन-चार बार हिलाया.

फौजी ने लड़के की तरफ देखा. दोनों मुस्कुरा पड़े. फिर आकर अपनी-अपनी सीट पर बैठ गए. फौजी ने मैगजीन रख दी थी. अकड़कर बैठ गया और सामने की सीट पर पैर रख दिए— औरत की तरफ याचना भरी निगाहों से देखते हुए. औरत ने अपने पैर को एक तरफ कर लिया. उसके चेहरे से बिल्कुल नहीं लगा कि उसे कोई दिक्कत है. लड़के ने अपना फोन रख दिया था. साइड अपर पर बैठने लायक जगह तो होती नहीं. सो वह गर्दन झुका बैठा था. चुपचाप देख रहा था. बच्चा फिर सो गया था.

बनारस आने में दो घंटा और था. लेकिन रघुनाथपुर के बाद ट्रेन दीन-दुनिया, समय-काल से परे हो जाती है. कब पहुंचेगी कोई नहीं जानता. डेढ़ घंटे में भी पहुंच सकती है. पांच घंटे भी लग सकते हैं. आठ बजे रात का समय है. पर कभी नहीं पहुंची है. फौजी को यह बात मालूम थी. शायद तीनों को मालूम थी, क्योंकि तीनों ही आराम से बैठे हुए थे. बच्चे को क्या खाक मालूम होगा. न पढ़ा, न लिखा. वह दूध पी रहा है. उसकी कोई औकात नहीं. सोना ही ठीक है उसके लिए.

फौजी को एहसास हुआ कि उसका अंगूठा औरत के पैर में छू रहा है. औरत की साड़ी का एक हिस्सा फौजी के अंगूठे पर गिरा हुआ था. फौजी ने लड़के की तरफ देखा. लड़के ने उसे अनदेखा कर दिया. फौजी ने अपना अंगूठा धीरे से हिलाया. लगा जैसे औरत का नरम-नरम पैर दब रहा है. औरत की कोई प्रतिक्रिया नहीं थी. वह चुपचाप बैठी सामने वाली खिड़की में देख रही थी.

तभी लड़के ने फौजी को घूरना शुरू कर दिया. फौजी ने उसकी तरफ देखा… कुछ सेकेंड… जैसे उस लड़के की आंखों को पढ़ रहा हो. फिर वह अपने सामने देखने लगा. लड़का धीरे से उतरकर साइड लोअर पर बैठ गया.

ट्रेन धीमे-धीमे चल रही थी. चल रही थी, रुकी नहीं थी. अंधेरा बढ़ रहा था. बारिश बहुत तेज हो गई थी. अब बाहर पेड़-पौधे भी नहीं दिखाई दे रहे थे. लड़के ने कोच का बल्ब जला दिया. हल्की रोशनी थी इसकी. पर एक-दूसरे को देखने भर को काफी थी. फौजी और चौड़ा होकर बैठ गया. उसने दूसरा पैर भी सामने वाली सीट पर रख दिया. अब उसकी चार उंगलियां औरत के पैरों को छू रही थीं. लड़का भी खिड़की के पास गर्दन टिकाकर फैल गया. उसके पैर मिडिल और अपर बर्थ पर जाने वाली सीढ़ी पर टिक गए. बच्चा फिर कुनमुनाने लगा. औरत ने अपने बगल से उठाकर उसे फिर छाती से लगा लिया. साड़ी को थोड़ा-सा सीने पर लाकर वह ब्लाउज ऊपर करने लगी. तभी ट्रेन ने हिचकोला लिया और साड़ी नीचे खिसक गई. बच्चा औरत के निप्पल को मुंह में नहीं ले पाया था. वह किचकिचा गया. औरत का स्तन और निप्पल हवा में हिल रहे थे— अलग-अलग. औरत ने अपने पैर पीछे खींचे और खिड़की की तरफ मुड़कर बच्चे को दूध पिलाने लगी. अब फौजी ने लड़के की तरफ देखा. दोनों मुस्कुरा पड़े.

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[ ऋषभ श्रीवास्तव बक्सर से हैं. दिल्ली में रहते हैं. कुछ वर्ष पत्रकारिता करने के बाद उन्होंने कुछ दिन कहानियां लिखी हैं. उनसे sriwastavarishabh@gmail.com पर बात की जा सकती है. इस प्रस्तुति की फीचर इमेज नार्वेजियन चित्रकार एडवर्ड मुंच (1863–1944) की पेंटिंग है. लेखक की तस्वीर ज्योति यादव के सौजन्य से. यह प्रस्तुति ‘सदानीरा’ के 19वें अंक में पूर्व-प्रकाशित.]

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