गद्य ::
सिद्धांत मोहन

सिद्धांत मोहन

यहां पर अक्सर इमरान भाई मिला करते हैं. इमरान भाई अच्छे आदमी हैं और उनसे मिलने पर अक्सर किसी किस्म की योजना पर ही बात होती है. हम लोग दिल्ली के खानों पर जरूर बात करते हैं. यहां पहले उज़ैफ़ भी मिला करते थे. उज़ैफ़ मुझे मेरे जाहिर करने से पहले से जानते थे. जिस दिन मैं उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की गिरती-खोती सल्तनत के बारे में यहां बैठा लिख रहा था, उस वक्त मेरे पास दो चीजें थीं. एक, एक प्लेट चिकन फ्राइड राइस और दो, एक मोहम्मद उज़ैफ़.

उज़ैफ़ अब आगरा चले गए हैं, जिसके पहले वह कुछ दिनों तक लखनऊ में थे. उज़ैफ़ तो इतने प्यारे इंसान थे कि जब भी मिला करते थे तो मुझे अच्छे मोबाइल फोन या लैपटॉप सस्ते में पाने के तरीके बताते थे, यदि उन्हें मोबाइल पर कोई टी.वी. सीरीज देखने या कैफे की बालकनी में जाकर सिगरेट पीने से फुरसत मिल गई तो.

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यहां बहुत दिनों बाद आ पाया हूं. आने के साथ-साथ मैं यहां से जाना भी चाहता हूं. इस कैफे से एक चीज का समीकरण तो साफ समझ में आता है कि यहां मेरे जीवन का सबसे जरूरी हिस्सा गुजरा है. जिस तरीके से इस कैफे से मैं ऊबता हूं, ठीक वही तरीका मेरा किसी नए संबंध से भी ऊबने का है. किसी भी नए संबंध से जुड़ते ही मैं बनारसी तरीके से उचटने लगता हूं. ऐसा होना मेरा खुद में डेविल होना है.

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आज यहां सामने से ही मैं अपनी गाड़ी घुमाकर निकल आया. कहीं दूर बैठकर लिख रहा हूं तो ऐसा लग रहा है कि यहां होता तो क्या लिखता? आज क्या खाता? कितना मीठा या कितना तीखा या कितना कुछ कसैला खाता? क्या पीता? क्या यहां पर बैठकर होने वाला टेंशन आज होता? आज यहां न आकर मैं सो गया, तो क्या किसी अलग दिशा-धार को चल देना होगा? यहां न आने से मेरे हाथ के दर्द, मेरी दुर्भावनाओं और मेरे आपराधिक दिमाग पर क्या असर पड़ा है? क्या मैं आज यहां न आकर कुछ ज्यादा ईमानदार हो पाया? थोड़ा ज्यादा सजग हुआ?

अब इन सबका जवाब तो रात के परवान चढ़ने के साथ ही मिलेगा.

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सितंबर में इतने बड़े मोड़ हमने मुश्किल से लिए हैं. सरकार एक अजीब-सी चीज है, स्साली जो इन छात्रों की बात सुनने को राजी ही नहीं है. एक तो कुलपति है, जो अभी भी असंवैधानिक तरीके से नियुक्तियां किए जा रहा है. लड़कियां और लड़के गेट पर बैठकर चंदे की मदद से पानी पी रहे और कुछ न कुछ खा रहे हैं, लेकिन कुलपति एक आराम गाड़ी में बैठकर कुलपति आवास से निकलता है और सामने के होलकर हाउस में शामिल हो जाता है. जहां वह दिन भर मेहनत के साथ लड़कों को खुद को बतौर अध्यापक चुन लेने देगा. ऐसे में इस कैफे में कुछ ज्यादा ही लोकतंत्र दिख रहा है, जो मुझे पच नहीं रहा है. अगर इसे एक एक से तीन घंटों के ऑफिस स्पेस की तरह चुनने की मेरी जिद और इस कैफे के पास अच्छी कॉफी नहीं होती तो इसका रख-रखाव करने वालों को पांच गाली देते हुए आग्रह करता कि अपना आज का सारा बचा हुआ सामान किसी खाद्य सामग्री में तब्दील करके बी.एच.यू. की लड़कियों को सौंप आओ. वरना यहां बैठी विश्वविद्यालय की ही बेफिक्र लड़कियों को देखकर मेरा यह सोचना जरूरी है कि इनसे पूछ न लिया जाए कि समय कठिन हो तो भी क्या शर्म इतनी मोहलत दे देती है कि मैं नॉन-वेज रेप और नॉन-वेज सैंडविच के लिए लड़ सकूं और खीझ सकूं कि यहां तो जब आओ तब टूना मछली मिलती ही नहीं है.

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यहां से मेरे घर के रास्ते में एक बार पड़ता है. वह दिन में भी अंधा बार है. जब-जब मुझे बीयर की कुछ घूंटों के साथ गोविंदा, अक्षय कुमार, सोनाक्षी सिन्हा की चलताऊ या चकाचौंध से भर देने वाली दक्षिण भारतीय फिल्म या फिल्मी गाने या नब्बे के दशक की फिल्में देखनी होती हैं तो उस बार में चला जाता हूं. पूरे कथानक के किसी मुकम्मिल अंत पर पहुंच जाने तक मैं वहां बैठा रहता हूं, द्रवित होता रहूं ऐसा जरूरी नहीं है. लेकिन लोगों को देखने की अभिलाषा मुझे हमेशा इस कैफे तक जरूर खींच लाती है. और जिस दिन मैंने यहां कुछ रच दिया और कुछ अच्छे लोगों से मिल लिया, मैं उस बार को थोड़ी तिरछी नजर से देखता हूं. वह बार भी मुझे ऐसे देखता रहता है, जब मैं उसके सामने से सिर ऊंचा किए हुए निकल जाता हूं.

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बहुत दिनों बाद उदित के साथ बार में बीयर पी.

टी.वी. पर ‘मि. नटवरलाल’ शुरू हो रही थी. कुछ देर में अचानक से चैनल बदल गया और दक्षिण भारतीय फिल्म ‘राजा नटवरलाल’ चलने लगी. मैंने बदलने को कहा तो वेटर ने बदल भी दिया. ऐसा होते ही मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ. मुझे तो लगी दो बातें, कि एक, क्या मैं शुरुआत से ही ‘राजा नटवरलाल’ तो नहीं देख रहा था, और ‘मि. नटवरलाल’ मेरी स्मृतियों में चल रही थी? और दो, कि कह देने पर ‘राजा नटवरलाल’ से ‘मि. नटवरलाल’ में बदल कैसे गया? यह कैसे हुआ? क्योंकि एक बार यहां वेटर ने चैनल बदलने से इंकार कर दिया था तो मुझे भोजपुरी गाने सुनते हुए पूरा समय बिताना पड़ा.

बहरहाल, मैं आ गया यहां कैफे में. और एक ब्लैक कॉफी पी और एक ग्लास गरम पानी पिया. मैं थोड़ा तबीयत से ठीक महसूस करने लगा.

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आज मैं कुछ अजीब महसूस कर रहा हूं. यहां जूते उतारना जरूरी है. मैंने ऊनी मोजे पहने हुए हैं, लेकिन पैर ठंडे होते ही जा रहे हैं. एक फ्रेंच महिला बहुत दिनों से यहां कुछ लिखती-काटती-रंगती रहती है. सुंदर है. इमरान भाई ने बताया कि वह लेखिका है. मैंने इससे आगे उससे कुछ नहीं पूछा कि वह क्या लिखने की तैयारी कर रही है. कुछ दिनों से वह अपने बॉयफ्रेंड के साथ आती है तो लिखना-पढ़ना कुछ नहीं करती है. मैं एक चौड़ी टेबल चुनता हूं. उसके सामने के सोफे पर वह अक्सर ही बैठ जाती है. जबसे प्रेमी के साथ उसने बैठना शुरू किया है तो वह लिखती नहीं है, पढ़ती भी नहीं है, कान में ईयरफोन भी नहीं खोंसे रहती है.

यानी मैं अगर यह समझूं-लिखूं कि प्रेम का जो सबसे भौतिक क्षण होता है, वह आपको रचना से दूर ले जाता है तो शायद मैं दूर जाकर कहूंगा कि प्रेम का समय सबसे कम रचनाशील बनाता है.

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तीन ब्लैक कॉफी और बढ़ती हुई यह धुकधुकी— मैं दूर ही कहीं देखने लगा हूं. मैंने रिपोर्टों को कुछ देर के लिए रोक दिया है. मैंने देखा है कि यहां बज रहे गाने कुछ ज्यादा तेज हो गए हैं. पानी कुछ ज्यादा ही कम आरामदायक हो गया है. लोगों को देखकर मैं कुछ ज्यादा ही तेज नजरें फेर ले रहा हूं. हंसकर जवाब देने की मेरी झूठी आदत इतनी जल्दी उतर जा रही है.
‘‘ओह! तो ज्यादा कॉफी पी लेने से ऐसा होता है?’’

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अगर यह जगह मेरे जीवन में साल 2015 के जाड़ों में नहीं आई होती तो मैं कैसा होता. मैंने कितने घंटे और कितने रुपए बचाए होते. मैं इतना ही छोटा और सरल-सा हिसाब करना चाहता हूं. इसमें यदि मैं यह आकलन करने बैठूं कि क्या अच्छा लिख सका इस जगह पर बीते तीन सालों में तो मेरे लिए वह एक कठिन हिसाब होगा. मसलन, यहां आए कई ख्वाबों को मैंने यहीं का रह जाने दिया. जैसे डायरी का एक बेमिसाल टुकड़ा शायद यहां दो साल पहले जन्मा था. वह टुकड़ा अपनी बेमिसाली में हर बार यहीं एक ही टेबल पर मिलता है, जिस पर अक्सर चिपचिपा शीरा जैसा कुछ गिरा रहता है. यहां पर लिखी एक कविता को मैंने ऐसे ही फाड़ दिया, मिटा दिया. मुझे लगा वह बेवजह स्थान के अतिक्रमण का बीज रोप देती.

यहां लगभग रोज औसतन सौ रुपए खर्च होते हैं. महीने के पंद्रह से बीस दिनों में यह संख्या जोड़ लीजिए, और आगे बढ़िए.

फिर जब आप पूरे साल का हिसाब जोड़ेंगे तो पाएंगे कि मैं गर्मी के दिनों में यहां कम आता हूं. एक बार मूड झटक गया तो मैं दो महीनों तक लगातार नहीं आया था. ऐसे हिसाब थोड़े मजेदार होते हैं.

अब इन नोट्स को ही ले लीजिए. ये एक ऐसे ही मजेदार और लापरवाह किस्म के हिसाब का परिणाम हैं, शायद. यदि मैं इस जगह पर इतना सुनियोजित या इतना व्यवस्थित होता तो क्या इतना सोच रहा होता? क्या मेरे पैसे इतने कम खर्च हुए होते? क्या मैंने खबरों के अलावा इस जगह से कुछ और नहीं लिखा होता?

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अच्छे लोग अच्छा काम करते हैं. ये लड़की गंगा पर रीसर्च कर रही है, और (अब तक) हम एक ही टेबल पर आमने-सामने बैठते हैं. बातचीत तो शुरू ही ऐसे हुई कि उसे पता चला कि मैं भी गंगा पर कुछ समय काम कर चुका हूं, और फिलहाल गंगा पर एक बड़ी रिपोर्ट पर काम कर रहा हूं. वह फुलब्राइट फेलो है, और बी.एच.यू. से जुड़ी हुई है. उसके चेहरे पर जितनी सजलता है, उसके काम में भी उतनी ही होगी, ऐसा मेरा मानना है. ऐसा मानना इसलिए है क्योंकि उसकी मुझसे हुई बातों में भी मुझे उतना ही निर्दोष और सजल होने का उजाला दिखता है. जैसे उसने मेरी स्टोरी की बढ़त पर बात करते हुए एक बार कहा था, ‘‘मैं तुमसे जलती हूं.’’ इस पर मैंने कहा था, ‘‘अभी तुम्हें और जलाऊंगा.’’ फिर मैंने उसे कुछेक और तथ्य बताए जो शायद उसे लैब में न मिलते. लेकिन मेरे ‘सजलता’ वाले क्लेम को इस बात से समझा जा सकता है कि नई बातों को जानने के बाद उसने कहा कि इस पर उसे कुछ और चीजें ढूंढ़नी और खोजनी होंगीं.

इसके बाद मैं एक व्यक्तित्व के आलोक में बिना चीनी की मसाला चाय पीने लगा.

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यह एक नई जगह है. यह जगह नई तो है ही, महंगी भी ही. मेरे पुराने कैफे से आधे किलोमीटर दूर है. यहां कॉफी कुछ कम अच्छी है, लेकिन यहां का पास्ता बेहद अच्छा है. महीना भर लगातार यहां का पास्ता खा लेने पर दिल की बीमारी होना तय है— इतना चीज डालते हैं ये अपने पास्ता में. इस जगह में कुछ ज्यादा अभिजात्य ठसक है. यहां दो अंजान लोग एक ही टेबल साझा करने से बचते हैं. बचते हैं? …नहीं ही करते हैं. मेरी पुरानी जगह तो इस चीज के लिए ही इतनी मानवीय है. वह दो ही नहीं, कम से कम छह अंजान लोगों को एक ही टेबल पर बैठने दे सकती है.

यही छूट थी कि उस दिन मैंने (एक भारतीय), एक अमेरिकी कपल और एक फ्रांसीसी लड़की ने मिलकर इजरायल से आए एक अधेड़ टूरिस्ट का लगभग तीन घंटों तक मजाक उड़ाया था. उस दिन हम पांचों उस टेबल और उस जीवन में पहली बार मिले थे. मुलाकात के आधे घंटे के भीतर इजरायल के नागरिक ने राष्ट्रवाद को पूरी बहस के ऊपर रख दिया और उन दिनों भारत के अनेकानेक हिस्सों में चल रहे दलित आंदोलनों को उसी दृष्टि से समझाने लगा. मैं तो शांत रहा, लेकिन उस फ्रांसीसी लड़की से यह सहा नहीं गया. उसने कुछ तर्क रखे और फिर रास्ता खुल गया. अमेरिकी कपल ने भी यही किया, और उन्होंने तो यह भी स्वीकार किया कि उन्होंने नौकरी के लिए डोनाल्ड ट्रम्प को वोट दिया था, लेकिन अब वे उस ‘कमअक्ल’, ‘प्रभुत्ववादी’ और ‘घोर जातिवादी’ को सिर पर बिठाकर पछता रहे थे.

मैंने भी यही किया. मैंने वही किया जो मैं हमेशा करता हूं. मैंने कहा कि भारतीय लोगों ने 2014 में नरेंद्र मोदी को चुनकर कोई अच्छी सरकार नहीं चुनी है. हम अभी भी कमाने-खाने के लिए लड़ रहे हैं, क्योंकि 2014 में इतने सारे भारतीय लोगों का नरेंद्र मोदी चूतिया काट गया था कि ‘सब कुछ ठीक हो जाएगा.’ मैंने कहा कि ‘सबकुछ ठीक हो जाएगा’ सुनते ही बहुत सारे लोगों को पता चला कि कुछ खराब भी चल रहा था.

मैं इस नई जगह पर ऐसा कुछ नहीं कर सकता हूं. कोई मुस्कुराहट भरे ‘नमस्ते’ या ‘हाय’ का जवाब भी नहीं देता है.

दीवारों पर तमाम किस्म की फैंसी कल्ट फिल्मों और टी.वी. सीरीज के पोस्टर लगे हैं. एक धीमा संगीत — अक्सर तो जैज — बजता रहता है. दूर-दूर से पोर्सलेन की प्लेट में चमचमाते कांटों, चम्मचों और छुरियों की आवाज सुंदर-सजी कुर्सी-मेजों से लड़कर कान में आती रहती है. कई-कई लोग एक तरह के कपड़े पहनकर आते हैं. क्या यह कोई कम मजेदार संयोग है कि यहां दिल खराब कर देने वाला स्वादिष्ट पास्ता मिलता है?

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मेरी हर दुपहर का लंबा हिस्सा इस कैफे के इतने पास से गुजरा है कि जिन दुपहरों को मैं यहां नहीं होता हूं तो मैं यह सोचना चाहता हूं कि मेरे जाने पर वहां क्या होगा? एक लंबे समयांतराल के बाद जाने पर कैशियर और वेटर सभी हालचाल पूछने लगते हैं. यह भी पूछ ही देते हैं कि मैं इतने दिनों कहां था? मुझे यह अच्छा लगता है कि यदि उन अनुपस्थित दिनों में मुझे कुछ हुआ होता तो शायद इन्हें न मालूम हुआ होता, लेकिन फिर भी दो से चार घंटों की इस बैठकी में भी वे मेरे बारे में इतना सोच ही लेते हैं. अक्सर तो मेरे बोलने के पहले ही जान रहे होते हैं कि मुझे क्या चाहिए, लेकिन तस्दीक तो जरूर ही कर लेते हैं.

जीवन को समानांतर रूप से देखता हूं तो जीवन एक बहुत बड़ा कैफे भी लगता है, जिसमें निर्बाध आत्महीनता, आत्मश्लाघा, अभिमान और यहां से निकलते-निकलते पैसे चुकाते जाने की बाध्यता बनी हुई है. ऐसा लिखकर मैं जीवन को अपने छोटे-से कैफे से थोड़ा अलग कर रहा हूं.

प्रेम तो बहुत मिला है इस जीवन में, लेकिन मुझसे बमुश्किल सौ रुपए ही कमा सकने वाले लोगों की तरह मेरी फिक्र करने वाले लोग शायद कम मिले हैं. मुझे लगता है कि एक कैफे होने के साथ-साथ जीवन को एक टॉफी-बिस्कुट की दुकान भी होना चाहिए.

विस्तार में देखें तो मैंने जीवन में उकताहट की हद तक प्रिविलेज पा लिया है, इतना कि अब मिलते ही उल्टी कर देता हूं, जिसकी गंध फटे दूध की उल्टी से भी बदतर होती है. लेकिन मैंने इसका फैलाव अपने आस-पास बहुत देखा है, उसे रोकने के मेरे प्रयास विफल हुए हैं. जीवन का सारा प्रिविलेज एक खराब कॉफी की तरह ही है. जब तक आप अच्छी न पी लें, तब तक सर्वसुलभ खराब कॉफी ही गर्व करने की चीज बन जाती है.

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इस सड़ेली-सी अलसायी दुपहर का क्या करें?
अरुंधति रॉय की किताब पढ़ें : ‘द मिनिस्ट्री ऑफ अट्मोस्ट हैपीनेस’.
अगली सड़ेली-सी दुपहर को क्या करें?

अच्छी कॉफी पिएं, और साथ बैठे दोस्तों से पूरी ईमानदारी के साथ कहें कि अरुंधति रॉय ने फिक्शन के नाम पर प्रॉपगैंडा लिख मारा है.

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खाने के लिए कैसे क्या फैसला ले सकते हैं, यह एक संकट है. मुझे पीना क्या है, यह एक तयशुदा ड्रिल है. जिन दिनों कॉफी पीता हूं, उन दिनों कॉफी ही पीता हूं. लेकिन अपनी परिचित बकझक में कॉफी छोड़ देता हूं तो चाय पर मामला टिक जाता है. लेकिन इससे आगे बात बढ़ती नहीं है. खाने का फैसला होता नहीं है.

जब सैंडविच खाना होता है तो उसके साथ सलाद एक अच्छा फैसला है, लेकिन जब मैं थोड़ा आगे बढ़ता हूं तो पीछे ही लौट आता हूं. यहां एक कमाल की बात जान लीजिए, इस कैफे की ब्राउनी कमाल की है. एक सफेद पोर्सलेन की प्लेट के बीचोंबीच रखी गर्म ब्राउनी पर उतना ही गर्म चॉकलेट सिरप, और इस पूरे भूरे निकाय में आपके हाथों में मौजूद कांटा यूं अंदर जाता है जैसे बालू के ढेर में कोई तेज तलवार— उतनी ही संतुष्टि और उतना ही आसान.

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जगह खाली हो तो बैठ मत जाओ. पूछो कि बैठ सकते हो या नहीं. या ऐसे पूछो कि तुम्हारे बैठने से पहले से उस जगह के आस-पास बैठे हुए लोगों को कोई असहजता तो नहीं होगी. ऐसा मैंने यहां से थोड़ा पहले सीखा है, लेकिन अब इसे आगे लेकर चलता आया हूं. इसी पूछने की असहजता का सामना करने के बाद संवाद करने में सहजता होती है, ऐसा मैंने पाया है. मसलन, एक भारतीय मूल के अमेरिकी लड़के से मेरी दोस्ती इसी जगह पर यूं ही हुई थी. मैंने पूछा बैठने के लिए तो उसने हां कर दिया. अब बैठने के बाद उसने लरजती हुई हिंदी में कहा कि उसने भारत में पहली दफा किसी को पास बैठने के पहले पूछते हुए देखा है. फिर उसने कहा कि ऐसा करने की सबसे कम आदत उसने एशियाई लोगों में देखी है, वे कभी भी पूछते नहीं, न हंसते हैं, न ही बात करना चाहते हैं, अक्सर चेहरों पर मास्क चढ़ाकर वे अपने आइफोन में लगे रहते हैं. फिर उसने कहा कि वह एशियाई मूल के लोगों में अंतर कर पाने में असफल है, जबकि उसकी प्रेमिका खुद एशियाई मूल की थी.

वह भारत में बहुत दिनों बाद आया था. शायद जन्म के एक या दो सालों बाद ही वह कैलिफोर्निया रहने चला गया था और तब से दूसरी बार ही आया था. मैंने उससे पूछा कि भारत को दूर से और भीतर से देखने में क्या कोई अंतर दिखता है? उसने कहा, ‘‘राष्ट्रवाद.’’

मैंने पूछा कि क्या बाहर से उसे राष्ट्रवाद नहीं दिखाई देता? उसने कहा, ‘‘दिखाई तो वह दोनों ही दृष्टियों से देता है, लेकिन बाहर से वह कम हिंसक दिखाई देता है, और भीतर से ज्यादा.’’

आस-पास बैठे लोग हमारी बातों से असहज न हों तो हमने ये बातें अंग्रेजी में कीं, और लगभग सभी बातों पर परस्पर सहमत होकर हमने हाथ मिलाया.

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मैंने हर जगह को उस जगह के संगीत से भी समझने की कोशिश छोड़ी नहीं है. कई जगहों के संगीत में मुझे बहुत प्रश्न मिले हैं. जैसे मैं समझ नहीं पाया हूं कि कुछ खाने की जगहों या होटलों में किसी गाने की सिर्फ धुन किस लिहाज से बजा करती है? जैसे गाने के बोल न बजें, बल्कि उन्हें सैक्सफोन या ऐसे ही किसी वाद्य पर बजा देना और फिर उसे एक बड़े स्पेस में प्ले कर देना, यह कैसी अलौकिकता है, समझ में नहीं आता.

हम किस आधुनिकता के हिमायती हैं कि हम उस जैज को बेसाख्ता सुनते रहते हैं, जिसका रत्ती भर भी हमारे पल्ले नहीं पड़ता. इस ओर जाने से हमें क्या हासिल होगा, ये भी कम ही पता है.

…और जब शिवस्तुति सरीखी चीजों का फ्यूजन में अवतरण जब कुछ जगहों पर बजाया जाता है तो मुझे मालूम नहीं होता कि इन्हें किस लिहाज से सुना जाए या समझा जाए. मसलन, दो लोग यदि इस जगह पर आज रात सेक्स करने के बारे में बात कर रहे हों और पार्श्व में अलौकिकता का भ्रम कराती आवाज ‘ओम् नमो भगवते वासुदेवाय’ का गान ड्रम की कुछ बीट्स और लीड गिटार के कुछ नोट्स के साथ कर रही हो तो मैं दूर से इस विरोधाभासी दृश्य को कैसे समझ सकूंगा. एकदम संभव है कि किसी दार्शनिक अवधारणा के आलोक में हम इस दृश्य को समझने के लिए कोई स्थापना कर लें — जैसा मैं कर पाया — लेकिन कई संभावनाओं को साथ में रखकर देखने से हो सकता है कि आपको यह अटपटापन समझ में आ जाए.

अब इन सब मामलों में यह कैफे बेमिसाल है, जहां रोजाना हिंदी फिल्मों के गाने बेमुरव्वत बजाए जाते हैं. अंग्रेजी गाने भी उतने ही सुनाई देते हैं जितना बजाने वाले की समझ में आते हैं. आलम ये है कि बहुत सालों बाद मुझे ‘मोहरा’ फिल्म के गाने यहां सुनाई दिए हैं. गानों की आवाज थोड़ी तेज थी तो मुझे आवाज को कम करने के लिए कहने में कोई असहजता नहीं हुई.

बेहद सहजता से उसे कम भी कर दिया गया. इन गानों के साथ कोई साम्य बिठाने में भी कोई दिक्कत नहीं हुई. किसी टूरिस्ट ने भी नाक-भौं नहीं सिकोड़े— जैसा वे अक्सर फ्यूजन गानों पर करते आए हैं— क्योंकि जहां तक मैं जान पाया हूं, उन्हें संगीत सुनने में साफगोई बेहद पसंद है. संगीत की साफगोई बहुत बड़ी चीज है. मैं संगीत रोजाना सुन तो सकता हूं, लेकिन उसमें कुछ जोड़ना या घटाना बेहद कम ही कर पाता हूं. लंबे वक्त तक ख्याल गाते हुए भी ख्याल या शास्त्रीय संगीत सुनना मेरी प्राथमिकता में कभी नहीं रहा, न ही ऐसी कोई दिखावटी कोशिश ही कर पाया. लेकिन अब जब सुनता हूं, पूरे शौक से, तो खामियाजा भुगतता हूं क्योंकि कानों में क्या और क्यों हो रहा है, उसकी तस्दीक करने में ही पूरा गीत निकल जाता है.

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[ सिद्धांत मोहन हिंदी के कुछ मेधावी व्यक्तित्वों में से एक हैं. पत्रकारिता, सर्जनात्मक गद्य और कविता के संसार में सक्रिय हैं. बनारस में रहते हैं. उनसे ssiddhantmohan@gmail.com पर बात की जा सकती है. लेखक की तस्वीर सुघोष मिश्र के सौजन्य से. यह प्रस्तुति ‘सदानीरा’ के 19वें अंक में पूर्व-प्रकाशित.]

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