‘न्यूटन’ पर ::
स्मृति सुमन

Smriti Suman writer

‘न्यूटन’ को हम पहली नजर में ही एक राजनीतिक फिल्म मान सकते हैं, क्योंकि यह लोकतंत्र के सबसे — भारतीय परिस्थिति में और भी — राजनीतिक मुद्दे चुनाव की प्रक्रिया पर है. इससे पहले हिंदी में नेताओं द्वारा चुनाव में धांधली, बाहुबलियों का चुनावी-प्रक्रिया पर बढ़ता असर, हिंदी प्रदेश में चुनावी समीकरण तय करते गैंगस्टर, लोकतंत्र और सत्ता पर हावी होता परिवारवाद, भ्रष्टाचार, अपराध की राजनीति और राजनीति के अपराधीकरण पर बराबर फिल्में बनती रही हैं, लेकिन न्यूटन इन फिल्मों से अलग है.

यह फिल्म अपनी शुरुआत में ही चुनाव-प्रक्रिया और खासकर मतदान-प्रक्रिया को महत्वपूर्ण मुद्दा मानते हुए आगे बढ़ती है, और मतदान-प्रक्रिया जैसे रूटीन काम में संलिप्त अधिकारियों और पदाधिकारियों पर अपनी कहानी को फोकस करती है.

संस्थाओं, विचारधाराओं, सिद्धांतों से अलग प्रक्रियाओं का अपना एक महत्व भी है और उसकी अपनी एक राजनीति भी है. मिशेल फूको कहते हैं कि जैसे अपराधियों को ठीक करने के लिए जेल में होने वाली प्रक्रिया का महत्व है, वैसे ही लोकतांत्रिक राज्य में मतदान की प्रक्रिया का महत्व है जिससे सब कुछ ठीक होने की भावना का सामान्यीकरण हो जाता है.

‘न्यूटन’ में प्रस्तुत किया गया स्पेस छत्तीसगढ़ का सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित क्षेत्र है जिसे फिल्म में लगातार ‘दंडकारण्य’ कहा जाता है. यहां आदिवासियों के एक गांव में 75 के करीब मतदाताओं के लिए मतदान की प्रक्रिया संपन्न करानी है, यह हिंदी सिनेमा के लिहाज से एक असामान्य कथा है, जिसका आभास इस फिल्म की शुरुआत में ही हो जाता है. इसकी शुरुआत में ऐसे लगता है कि जैसे यह फिल्म हत्या के बाद की कोई रहस्य-कथा है, फिर लगता है राज्यसत्ता के अत्याचार पर या नक्सली हिंसा की कहानी होगी, लेकिन ‘न्यूटन’ ऐसा कुछ नहीं करती. इसके आगे बढ़ते ही तमाम अटकलों पर ताला लग जाता है. यह फिल्म मतदान की प्रक्रिया पर फोकस करके बताती है कि दंडकारण्य भी भारतीय लोकतंत्र का हिस्सा है और यहां के लोग क्या चाहते हैं, यह जानने के लिए उनके बीच मतदान कराना उतना ही अहम है जितना देश के अन्य हिस्सों में चुनाव का होना और मतदान के प्रतिशत को जानना. फिल्म विषय निरूपण के लिए एक व्यक्ति को तो चुनती है, लेकिन उसके नायकत्व के बजाए उसकी दयनीयता को अधिक उभारती है.

यह फिल्म अपने मुख्य किरदार न्यूटन (राजकुमार राव) के चरित्र के बारे में बताते हुए खुलती है. ‘नूतन’ से ‘न्यूटन’ बना नायक एक दृढ़ और नियमबद्ध अनुशासित व्यक्ति है. वह सरकारी नौकरी में है और अपने मां-बाप की इच्छा से विवाह भी करना चाहता है, लेकिन लड़की का नाबालिग होना उसे मंजूर नहीं, क्योंकि यह कानून के खिलाफ है. राज्य का जिम्मेदार नागरिक होने के नाते न्यूटन की कानून में पूरी आस्था है.

वैज्ञानिक न्यूटन को इस फिल्म में जिस तरीके से समाजवाद का प्रणेता बनाया गया है, वह शुरू में ही स्थापित कर देता है कि यह फिल्म चीजों को देखने और समझने का एक अलग नजरिया रखती है.

मतदान करने के लिए चुने गए सभी अधिकारी दंडकारण्य में नियुक्त होते ही कोई न कोई बहाना करने लगते हैं, लेकिन रिजर्व में बैठा न्यूटन इस चुनौती को स्वीकारता है. परिस्थिति की गंभीरता को दर्शाने के लिए फिल्म में अनावश्यक कुछ भी भयावह घटित नहीं किया जाता. चुनाव कराने के लिए न्यूटन को राज्य हैलीकॉप्टर से दो अन्य अधिकारियों के साथ वहां पहुंचाता है. यह सब देखकर संशय होने लगता है कि शायद फिल्म राज्य के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को विकास से जोड़ने के लिए आग्रह करने वाली होगी. यह भी लगता है कि राज्य इन क्षेत्रों के प्रति उपेक्षापूर्ण रवैया नहीं रखता. फिल्म यह सत्य स्थापित करना चाहती है कि तभी फिल्म में सीआरपीएफ अधिकारी आत्मा सिंह (पंकज त्रिपाठी) का प्रवेश होता है जो उस क्षेत्र की सुरक्षा अर्थात नक्सलों से सुरक्षा की जिम्मेदारी देखता है. आत्मा सिंह राज्य के उस तंत्र और मानसिकता का प्रतिनिधित्व करता है जिसके अनुसार नक्सली संघर्ष को सामाजिक आंदोलन के बदले राज्य के ऊपर खतरे के तौर पर देखा जाना चाहिए जिसका उल्लेख नंदिनी सुंदर अपने लेख ‘नक्सलाइट मूवमेंट इंडियन स्टेटस बिगेस्ट सिक्योरिटी थ्रेट’ में करती हैं.

आत्मा सिंह दंडकारण्य में चुनाव कराने में रुचि ही नहीं लेना चाहता, वह यांत्रिक ढंग से यह प्रक्रिया बस किसी तरीके पूरी कराना चाहता है. वह बहुत आश्वस्त है कि यहां चुनाव अनुपयोगी है, क्योंकि इस क्षेत्र के लोग वोट देने नहीं आएंगे. आत्मा सिंह एक दिन के लिए या चुनाव के समय के लिए ही न्यूटन के अधिकार को स्वीकार नहीं करा पाता और वह उसके हाथ में अपनी बंदूक देकर यह साबित करने की कोशिश करता है कि उसके कंधों पर देश का कितना भार है. वह और न्यूटन दोनों राज्य के प्रतिनिधि हैं, लेकिन आत्मा सिंह को राज्य की प्रक्रिया पर भरोसा नहीं है, उसे इस क्षेत्र के लोगों पर भी भरोसा नहीं है. पंकज त्रिपाठी अपने अभिनय से इस किरदार की कई परतों को सामने ले आते हैं. यह किरदार एक वक्त में क्रूर और हिंसक है तो कुछ ही समय बाद उदार और कोमल भी.

‘न्यूटन’ में एक किरदार आदिवासी चुनाव अधिकारी महिला मलको का है जिसे अंजलि पाटिल ने निभाया है. मलको उस क्षेत्र के लोगों का प्रतिनिधित्व कराती है, जो नक्सली नहीं पर उस क्षेत्र के विकास की उपेक्षा से आक्रोशित है और राज्य के प्रति विद्रोही भाव भी रखते हैं, लेकिन राज्य की मदद से ही अहिंसक तरीके से आगे बढ़ाना चाहते हैं. मलको के किरदार में यह बात सब-टेक्स्ट की तरह आ ही जाती है कि शांति-प्रक्रियाओं और विकास के रास्ते पर इस क्षेत्र को लाने के लिए राज्य किस तरह से ताकत का इस्तेमाल कर इस इलाके के लोगों का अविश्वास ही अर्जित करता है, और यह भी कि विकास की एक समान प्रक्रिया कम से कम अदिवासी इलाकों में नहीं चलाई जा सकती, जहां के निवासियों के पास जीने की एक प्राचीन शैली है.

रघुवीर यादव सहायक मतदान अधिकारी के तौर पर निष्क्रिय रवैया रखने वाले एक ऐसे अनुभवी अधिकारी का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो सब कुछ देखता-जानता है. यह किरदार एक कहानीकार भी है और किसी तरह नौकरी पूरी करके रिटायर होने में ही बस उसका यकीन है.

सिनमा के ये चार मुख्य किरदार चार अलग-अलग पहलुओं का प्रतिनिधित्व करते हैं. इस क्रम में फिल्म निष्पक्ष तरीके से एक ही मुद्दे पर चार अलग-अलग दृष्टिकोणों को एक ही टाइम और स्पेस में दर्शकों के सामने रख देती है और बहस में अपने तर्कों से शामिल होने की पूरी एजेंसी दर्शकों को सौंपती है, न कि उनको परिप्रेक्ष्य का एक सिरा पकड़ा देती है.

आख्यान की यह रणनीति निर्देशन को विशिष्ट बनाती है. सिनेमाई भाषा में कैमरा जिन चीजों को दायरे में लेता है, वह बिना किसी संवाद का हिस्सा हुए परिप्रेक्ष्य को गहराई देता है. कई बार लगता है कि फिक्शन फॉर्म में दंडकारण्य में चुनाव होने की प्रक्रिया का एक वृत्तचित्र चल रहा हो. गांव के लोग जिनसे मतदान कराया जाना , वे देर तक खुद से नहीं आते हैं. विदेशी-देशी मीडिया के लिए, आत्मा सिंह उनको इकठ्ठा करता है. धमकी पर जमा हुए आदिवासियों के चेहरे के भावों का फिल्मांकन अनूठा है. ये लोग डरे हुए हैं, पुलिस का मतलब इनके लिए आतंक है और कैमरा हमें इस डर को महसूस करवाता है.

आत्मा सिंह जल्दी-जल्दी मतदान की प्रक्रिया खत्म कराना चाहता है : इसके लिए वह झूठ, डर, छल सबका सहारा लेता है, लेकिन न्यूटन तय समयावधि तक यानी तीन बजे तक मतदान कराने के लिए वहां जान पर खेलता है. फिल्म में कोई हीरोइक स्टेप नहीं है, बस यह वर्णित है कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में खुद व्यवस्था को पुनर्स्थापित करने की ताकत है. जरूरत है उन प्रक्रियाओं के महत्व को समझने की.

‘न्यूटन’ में असामान्य परिस्थिति में सामान्यता भी है, जैसे गांव के लोगों से छीना हुआ मुर्गा पकाकर सिपाहियों का खाना. लेकिन साथ ही सुरक्षा का खतरा और भय पैदा किया जाता है, झूठे ब्लास्ट के द्वारा. स्टुअर्ट हाल के शब्दों में इसको ही हम ‘मॉरल पैनिक’ कहते हैं. जैसे अमेरिका ने मुसलमानों को सुरक्षा के लिए का खतरा बनाने का पैनिक क्रिएट किया. जैसे हर बहुसंख्यक समाज, अल्पसंख्यक समाज को अपने लिए खतरा बताने के लिए माहौल बनाता है जिससे एक निर्भीक व्यक्ति के मन में भी संशय पैदा होता है.

आत्मा सिंह समय से पहले चुनाव खत्म कर देना चाहता है और न्यूटन उसे सही तरीके से नियमपूर्वक कराना चाहता है. इसके बीच एक ग्रामीण खड़ा होकर अपनी भाषा में कहता है कि अगर चुनाव का अर्थ नेता चुनना है तो हमारे नेता तो पटेल है जो इस ईवीएम में तो है ही नहीं. दर्शक को हंसी आती है, पर फिल्मकार तफसील में जाए बगैर यह जाहिर कर देता है कि इस क्षेत्र के स्थानीय निवासियों की फिक्र राज्य को नहीं है और साथ ही नक्सलियों और राज्य की इस लड़ाई में वे सबसे शोषित हैं और उपेक्षित भी. इस तरह से फिल्म उस अंतर्विरोध को सामने ले आती है जो संभवतः उसका अभीष्ट भी है.

इस फिल्म के अंत में मलको जब न्यूटन से मिलने आती है, तब यह दर्शाता है कि दंडकारण्य और रायपुर की दूरी कम हो सकती है. वहीं आत्मा सिंह के चेहरे पर ऑलिव आयल खरीदते वक्त शिकन आना, ये इशारे कर देता है कि न्यूटन और आत्मा सिंह तो केवल मोहरे हैं. एक ऐसे वक्त में जब ‘पॉलिटिक्स ऑफ लव’ और ‘पॉलिटिक्स ऑफ हेट’ चरम पर है, इस विषय को ‘न्यूटन’ के निर्देशक अमित वी मसूरकर और पटकथा-लेखक मयंक तिवारी ने जिस निष्पक्षता से रखा है, वह काबिले-तारीफ है.

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[ स्मृति सुमन सिनेमा की शोधार्थी हैं. उनके लेख प्रतिष्ठित प्रकाशन माध्यमों पर प्रकाशित हो चुके हैं. फिलहाल वह दिल्ली के विवेकानंद कॉलेज में राजनीति विज्ञान पढ़ा रही हैं. उनसे ssumamma@gmail.com पर बात की जा सकती है. यह प्रस्तुति ‘सदानीरा’ के 17वें अंक में पूर्व-प्रकाशित है.]

1 Comment

  1. अज्ञेय April 14, 2018 at 1:56 pm

    महिला किरदार मलको की भूमिका निभाने वाली अंजलि पाटिल हैं न कि अंजलि त्रिपाठी ।

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