गद्य ::
सुमेर

टाइमलेप्स मोड पर आंखें

वह सोचता है कि दुनिया की सारी प्रेमिकाएं पागल होती हैं. वे ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चलते हुए प्रेमियों के हाथ कसकर पकड़ लेती होंगी. वे चौंककर उन्हें बांहों में भर लेती होंगी, और प्रेमी आंखों को टाइमलेप्स मोड पर डालकर चांद को भागते हुए देखते रहते होंगे. चांद जब डूब जाता तो उन्हें लगता होगा कि अब दुनिया के लिए वे ब्लर हो चुके हैं ओर चूम सकते हैं प्रेमिकाओं को.

उस शाम ठंड अपने कपड़े आसमान में टांग चुकी थी. उसे लगा माथे पर पसीने की पतली-सी डोरी खिंच गई है. जब उसने पूछा कि तुम्हारे माथे पर पसीना क्यों आ रहा है तो वह हंसने लगा. जबकि उसे मालूम था कि उसके पांवों की डोर सूरज से बंधी है. सूरज ढलते ही उसे चले जाना होता है अपनी दुनिया में.

यह पसीना उस डोर की खिंचावट का था.

उसे भी चले जाना चाहिए था सूरज ढलने से पहले ही. क्योंकि उसे जाना होता है अछोर शहर के किसी ओर-छोर. जहां के रास्तों में भर जाता है सांझ ढलते ही डरावना अंधेरा. नशे में हर बार वह जाने क्यों होंठों को ताकने लगती. वह हंसकर कह देता, ”यू नो कंसेंट” और हंसने लगता. उसने फिर वही बात कही, ‘‘तुम कतई रोमांटिक नहीं हो इसीलिए वह लड़की तुमसे मुहब्बत नहीं करती है. तुम छोड़ दो यूं फिरना.’’ उसे लगा वह कह दे, ‘‘माथे पर लिखा है क्या.’’ पर वह यह बात हर किसी से नहीं कह सकता था.

उसने विदा लेते हुए हल्के से कान को छूते हुए कहा, ‘‘तुम्हें पता है बंजारे श्रापित थे.’’ और उसने जाते हुए आज पहली बार गाली नहीं दी थी. क्योंकि वह भी जानती होगी श्रापित होने का अर्थ.

दीवारों में उगते होंगे जरबेरा के फूल

वह दीवारों को खुरचता और उनमें जरबेरा के फूलों के बीज चिपका देता. उसे लगता है दीवारों में भी उग आते होंगे फूल. उसे यह भी लगता कि शहर में लोगों से ज्यादा जान पत्थरों और दीवारों में होती है. किसी भी जगह पर सबसे ज्यादा प्रेम उसने रास्तों से किया— उन रास्तों से जिन पर चलते हुए उसे खुद के होने का एहसास हुआ.

वह गर्मियों के जाने के दिन होते थे. गांव हरे हो जाते और निगाहें आसमान में उग आतीं. उन दिनों एकाध हल्की बारिशें हो चुकी होतीं. खंडहरों की कंकरीली छतें हरी हो जातीं. मोगरे की हरी पत्तियों पर बूंदें तिर आती थीं.

ये वही दिन थे जब वह ‘सामाजिक’ की किताब में ‘सरस सलिल’ छिपाकर पढ़ने लगा था और उसमें पढ़ी रंगीन कहानियों के हिस्से वह उस दो चोटियों वाली लड़की को खंडहरों में सुनाया करता. उसको कहानियां सुनना बहुत पसंद था. सुनते हुए वह खिलखिलाकर हंसने लगती थी. वह उन खिलाखिलाते होंठो को देखने लगता और चुप हो जाता.

उसने कहा, ‘‘कल मैं तुम्हें एक किताब लाकर दूंगा, तुम छिपकर पढ़ना उसे.’’ लेकिन वह किसी भी कोर्स की किताब में छिपाकर दूसरी किताब नहीं पढ़ सकती थी. लड़के पकड़े जाते थे तो चेतावनियों भरी डांट खाकर बच जाते थे, लेकिन लड़कियां पिट जातीं और अगले दिन से उनका स्कूल जाना भी बंद हो जाता था.

जब दुपहर को खिड़कियों से छनकर आती धूप में खिलकर उनकी गर्दनों के निशान नीले हो जाते तो दोनों छत पर भाग जाते और मोगरे की जड़ें खोदकर उन जड़ों में उगे गेहूं जितने छोटे-छोटे दाने खोजते.

उसे कोई पूछता है कि गांवों में मुहब्बत कैसे होती है. वह सोचने लगता मुहब्बत कैसे होती होगी? वहां आक की झाड़ियां होती हैं और सीलन से भरी खंडहरों की दीवारें.

उन दिनों उसे लगता था कि हम जब मुहब्बत में होते हैं, कहीं भी कुछ भी उगा सकते हैं और अब वह रात को नींद में भयावह सपने देखते हुए चिल्लाता है, ‘‘संघर्ष हमारा नारा है.’’

एंटीना और नीले निशान

तब भी मार्च आता था. अखबारों पर जॉर्ज बुश की बड़ी-बड़ी तस्वीरों के साथ इराक का नाम छपा रहता था. बच्चे रविवार को या तो किताबों में घुसे रहते या खंडहरों में नाक पर हाथ रखे चमगादड़ों को ढूंढ़ते थे. वह चुपचाप इंतजार करता था, बारह बज जाने का. वह टी.वी. में झांकता रहता था. गांव में कुछ ही घरों में टी.वी. थे. लेकिन रविवार को टी.वी. देखने वाला सिर्फ वह होता था.

उन दिनों वह नई-नई दुल्हन बनकर आई थीं. सब औरतें दुपहरों में ऊंघ रही होतीं या कहीं चौकियों पर मखौल कर रही होतीं. वह जब भी कमरे में आती मुस्कुरा देतीं और आलों में से कुछ ढूंढ़कर चली जातीं. उस दुपहर जाने कौन-सी फिल्म आ रही थी. तेज हवा से एंटीना घूम गया था.

‘‘आप टी.वी. देखते रहिए मैं एंटीना ठीक करता हूं, सही से आ जाए तो खिड़की से बता देना.’’

‘‘ठीक है. पीछे के तरफ जो पत्थर रखे हैं, उन्हें एंटीना से लगा देना फिर वह हवा से हिलेगा नहीं.’’

सेट करके वह वापस से चारपाई पर आकर बैठ गया. वह कुछ सी रही थीं. वह वहीं बैठकर टी.वी. देखने लगीं. वह जाने क्या बातें कर रही थीं. उन दिनों पत्रिका के साथ रविवारीय अंक आता था जिसमें कहानियां होती थीं. टी.वी. पर ऐड आया तो वह अंक के पन्ने को टटोलने लगा. उन्होंने बालों में हाथ फेर कर कहा, ‘‘तुम इतने चुप क्यों रहते हो.’’ उसने देखा और हंसने लगा.

‘‘मुझे पढ़ना नहीं आता, ये इसमें क्या लिखा है.’’ वह कहानी सुनाने लगा. उन्होंने खिड़की बंद करते हुए कहा, ‘‘कितनी धूल आती है.’’

‘‘देखो तो मेरी पीठ पर क्या चुभ रहा है.’’

‘‘कुछ भी नहीं है.’’

‘‘वहां डोरी के नीचे देखो.’’

उसने डोरी के नीचे उंघली फिराई. उसे स्कूल के शैतान बच्चे याद आ गए जो मई तक का महीना गिनते हुए उंगली कर देते थे. डोरी में पतली-सी भुरट की सिळी लगी थी. निकालते हुए उसके मुंह से जाने क्यों जनवरी… फरवरी… निकलने लगा. मई पर आते-आते उन्होंने छाती में भींच लिया. ढीली-सी टी-शर्ट खिसक कर उसकी बांहों में झूल गई. उसने दांत छाती के नीचे गड़ा दिए.

‘‘कितने भोले बच्चे बनकर रहते हो. क्या कर रहे हो ये.’’

उसने ओढ़ण खींचकर चेहरा छुपा लिया.

हवा खिड़कियों के सुराखों से टकराकर आलों में बिछे अखबारों को बिखेर रही थी. उसने टी-शर्ट ठीक की और भाग गया. यह गायों की रखवाली का वक्त था.

बच्चों की गर्दनों पर मंड गए निशानों पर किसी की नजर नहीं जाती थी. वह पीलू खाने ऊंची डालों पर लटकता था या चमगादड़ों को पकड़ते हुए खंडहरों में कई बार घिसट जाता था. उस नीले निशान पर किसी ने शक नहीं किया.

अब भी मार्च आने वाला है. अखबार नहीं देखा उसने जाने कितने दिनों से. उसे रोते हुए देखकर किसी ने सलाह दी, ‘‘तुमने कभी आंखों में आंखें डालकर कहा है.’’

‘‘नहीं, डर लगता है मुझे.’’

वह कोई खास दिन था. उसने सोच लिया था कि वह आज आंखों में देखेगा. वह नहीं देख पाया. नजर फेरकर आसमान देखते हुए वह बोलता रहा और फिर रोने लगा. पता नहीं कब वह किसी के सामने ऐसे रोया था.

‘‘मैंने कह दिया.’’

‘‘उसने क्या कहा.’’

‘‘वही जो हमेशा कहती है.’’

रोती-सी आवाज में उसने कहा, ‘‘ऐसा क्यूं होता है मेरे साथ.’’

‘‘तुम रोमांटिक नहीं हो.’’

वह हंसने लगी, और खामोश हो गई. यह सब कुछ शांत होने का एक छोटा-सा पल था.

वह चेहरा देखती रही और बोली, ‘‘कैन वी किस?’’

‘‘नो.’’

‘‘वॉव, कंसेट!”

उसने कहा, ”शुक्रिया.’’ और हंसने लगा.

‘‘इस मुहब्बत ने मुझे कितना ‘पवित्र’ बना दिया है.’’

‘‘तो फिर क्यों नहीं चले जाते हो तुम टूर पर?’’ उसने आंख मारते हुए कहा. दोनों हंसने लगे.

सारी कहानियां उसकी आंखों के आगे फिरने लगी. जैसे किसी ने एंटीना घुमा दिया था और साफ सिग्नल आने लगे थे. स्क्रीन पर नीले निशानों से भरी गर्दन और कंधे चमक रहे थे. बचपन में कोई ऐसा हुआ होगा क्या.

वह डरने लगा था लोगों से, रोशनी से.

वह चिल्लाने लगा खाली कमरे में, ‘‘मैं कहां जाऊंगा अगर हार गया तो. कोई घर चला जाएगा, कोई शहर चला जाएगा. मैं भी चला जाऊंगा कहीं न कहीं. कोई तो जगह होगी जहां मैं जा सकूंगा. खो जाऊंगा मैं एक दिन. दूर कहीं, बहुत दूर.’’

वह बोलती रही. समझाती रही. उसे सिर्फ इतना सुनाई दिया, ‘‘यह भी एक फेज होता है, उम्र का फेज… निकल जाता है तो कुछ भी याद नहीं रहता.’’

वह उठकर चला आया था. यह भी एक फेज है जिसे सिर्फ खाली कमरे समझ सकते हैं.

***

बहुत विधिवत ढंग से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद सुमेर ने कुछ महीनों तक बहुत गैर विधिवत ढंग से पत्रकारिता की है. एक अनिवार्य युवा-आवेग और बेचैनियों और भटकनों के साथ उनके दिखाए-लिखे ने इधर देखने-पढ़ने वाले संसार को अचरज से भरा है. सुमेर फिलहाल दृश्यों और गद्य में खुद को और अपने समीप को व्यक्त कर रहे हैं. वह हिंदी की गुरु-शिष्य परंपराओं, झोलाउठाऊ मानसिकताओं और कैसे भी एक रोजगार पाकर खुद को उसमें बर्बाद कर देने के अभ्यास से दूर हैं. जैसलमेर में रहते हैं और दिल्ली आते रहते हैं. सुमेर से sumerjaisalmer@gmail.com पर बात की जा सकती हैं. उनकी तस्वीरें उनके फेसबुक अलबम से ली गई हैं.

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