वक्तव्य ::
अमितेश कुमार

Amitesh Kumar hindi writer
अमितेश कुमार | क्लिक : नीरज उपाध्याय

‘अँधेर नगरी’ में भारतेंदु हरिश्चंद्र लिख गए हैं :

छेदश्चन्दनचूतचंपकवने रक्षा करीरद्रुमे
हिंसा हंसमयूरकोकिलकुले काकेषुलीलारतिः
मातंगेन खरक्रयः समतुला कर्पूरकार्पासियो:
एषा यत्र विचारणा गुणिगणे देशाय तस्मै नमः

मैंने अपने एक अध्यापक से सवाल किया कि ‘अँधेर नगरी’ आज के समय में हम क्यों पढ़ें? अध्यापक ने पलटकर सवाल दाग़ा, ‘‘मैं पूछता हूँ कि क्यों न पढ़ें?’’ यह बात तो सही है : क्यों न पढ़ें।

‘अँधेर नगरी’ के अँधेर का अर्थ अगर आप केवल उजाले की अनुपस्थिति से लगाएँगे तो उसे ठीक-ठीक समझ नहीं पाएँगे। यहाँ अँधेर का मतलब एक ऐसी स्थिति का होना है, जिसमें वह सब होता है जिसे नहीं होना चाहिए, जहाँ अव्यवस्था ही व्यवस्था के रूप में स्वीकृत है, एबनॉर्मल न्यू नॉर्मल के रूप में प्रतिष्ठित है।

भारतेंदु हरिश्चंद्र ने ‘अँधेर नगरी चौपट्ट राजा’ नाटक अँग्रेज़ी शासन के दौर में लिखा था। यहाँ याद रखना चाहिए नाटक के नाम में ‘चौपट्ट राजा’ जुड़ा है। भारतेंदु नाटक के इर्द-गिर्द हिंदी समाज मे राजनीतिक और समाज-सुधार की चेतना के प्रसार को केंद्रित रखे हुए थे। वह ‘भारत दुर्दशा’ लिख चुके थे, सन् 1876 में ड्रामेटिक परफ़ॉर्मेंस एक्ट भी लागू हो चुका था, और नाटककार सीधे-सीधे अँग्रेज़ी शासन की आलोचना करने के बजाय रूपकात्मकता से अँग्रेज़ी शासन के सच को बयाँ करने की युक्तियाँ खोज रहे थे… ‘अँधेर नगरी’ भी ऐसी ही युक्ति है। इस युक्ति के ज़रिए भारतेंदु ने लोक प्रचलित प्रहसन को अपनी प्रतिभा से समसामयिकता में ढाल कर आधुनिक नाटक में तब्दील किया जिससे लोककथा को भी एक नई जीवंतता मिली, वरना पारसी रंगमंच के तमाम प्रहसनों के ग़ुबार में अन्य प्रहसनों के साथ यह भी उड़ जाता।

अभी जैसा अँधेर हमारे सामने उपस्थित है, क्या उसमें ‘अँधेर नगरी’ जैसा एक भी सामयिक-साहित्यिक प्रयास हमारे सामने है जिसमें आज के सच का निरूपण हो और वह जनता तक संप्रेषणीय भी हो? अगर नहीं है तो हमें ‘अँधेर नगरी’ को पढ़ना होगा, मंचित करना होगा… क्योंकि वह बाज़ार और राज्य दोनों की हक़ीक़त बयान करता है। ये दोनों ही नियामक शक्तियाँ हमारे जीवन पर हावी होने की लगातार कोशिश कर रही हैं और बहुत हद तक कामयाब भी हो रही हैं। इस प्रसंग में यह बात भी दुरुस्त है कि इस पाठ को हमें अपने समय के भाष्य में बदलने के लिए कुछ बदलाव भी करने होंगे।

‘अँधेर नगरी’ अपने प्रकाशन और मंचन के बिल्कुल बाद से ही बेहद लोकप्रिय हुआ, आज की भाषा में कहें तो बेस्टसेलर। महेश आनंद अपने शोध में बताते हैं कि ‘अँधेर नगरी’ को ‘छापने के लिए प्रकाशकों में होड़ रही, क़ानूनी विवाद भी हुआ और अधिक माँग होने के कारण भारतेंदु ने कई बार ख़ुद भी छापा। याद कीजिए कि यह नाटक रंगकर्मियों के एक दल ‘हिंदू नेशनल थिएटर’ की ज़रूरत के लिए महज़ एक दिन में लिखा गया, मंचित हुआ और इसके बाद से अनगिनत बार भारतीय रंगमंच पर लौटा।

‘अँधेर नगरी’ को एक ऐसे दौर में पढ़िए जहाँ बाज़ार में हर चीज़ बिकाऊ है और वस्तु का मोल उसकी गुणवत्ता के हिसाब से नहीं है। राजा की निरकुंशता और अविवेक इतना चरम पर है कि वह अपने कोतवाल को फाँसी पर चढ़ाने के लिए तैयार है, और इस अँधेर नगरी में—जो पश्चिम दिशा की ओर है—गोवर्धन दास जैसे सुविधाजीवी और लालची फँस गए हैं। बुनियादी सवालों को कोई सुनने वाला नहीं है कि ग़रीब की बची-खुची संपत्ति को कौन लूट रहा है? बकरी मर गई तो उसका दोषी कौन है? कहाँ तो राजा का दावा है, ‘‘उसके यहाँ ऐसा न्याव होगा जैसा जम के यहा भी नहीं…’’ लेकिन इस न्याय-व्यवस्था में राजा के ‘न्याव’ के डर से कोई मुटाता ही नहीं। ऐसी है ‘अँधेर नगरी’ जिसमें साधु-महात्मा लोगों की दुर्दशा है, इसकी तुलना आज बुद्धिजीवियों के बढ़ते विरोध से कीजिए और देखिए कि उनकी स्वतंत्र चेतना की क़ीमत उनको कैसे चुकानी पड़ी है, पड़ रही है।

‘अँधेर नगरी’ का राजा कब क्या फ़ैसला ले ले और लोगों को क़तार में खड़ा कर दे, इसकी आशंका नागरिकों में तो है ही, राज्य के नुमाइंदों में भी है।

नाटक में बहुत सारे नीति-उपदेश हैं जो समय-समय पर महंत अपने चेलों को देते हैं और प्रकारांतर से भारतेंदु जनता को। यहाँ शुरुआत में ही संस्कृत का एक नीति-श्लोक है। इसका ही विस्तार नाटक में है। इस श्लोक का आशय है :

जिस देश में चंदन, आम और चंपक वन में कुल्हाड़े से काट-पीट की जाती है, और शाखोटक अर्थात् तुच्छ वृक्षों की रक्षा की जाती है; हंस, मोर और कोकिलों के समुदाय में हिंसा की जाती है और कौओं का सदा आदर होता है, हाथियों को बेचकर गधे ख़रीदे जाते हैं, कपूर और कपास जहाँ एक समान हों, जिस देश वालों के ऐसे विचार हैं, उस देश को दूर से ही नमस्कार है!

मतलब यह कि जहाँ व्यक्तियों और वस्तुओं के बीच गुणों के आधार पर विभेद नहीं किया जाए और सबको एक ही माना जाए, जहाँ मूर्खों में अभूतपूर्व एकता हो और बुद्धि का विरोध हो, जहाँ ट्रोलर्स किसी विद्वान को बिना पढ़े ख़ारिज कर दें और अपनी कल्पना में महानता को रच लें, ट्रुथ से इतर पोस्ट-ट्रुथ निर्मित कर लें, जहाँ सत्य की तलाश सबसे दुष्कर हो और सत्य सबसे उपेक्षित हो… ऐसे देश मे रहने से दुख ही होगा और रहना प्राणघातक भी हो सकता है।

मुश्किल यह है कि आप ट्विटर छोड़ सकते हैं, फेसबुक छोड़ सकते हैं (ये ऐसी जगहें हैं, जहाँ आज अँधेर नगरी के राजा के दरबारी अपना दरबार सजाते हैं और फ़ैसला सुनाते हैं), लेकिन देश कैसे छोड़ेंगे? महंत और उनके चेलों को यह सुविधा है कि वे ऐसे देश से पलायन कर जाएँ, लेकिन क्या हमें ऐसी सुविधा है? भारतेंदु रहते तो इस उपदेश को बदल सकते थे।

लोकतंत्र का मूलभूत सिद्धांत है कि एक स्तर पर हम सभी बराबर हैं, और क़ानून तथा प्रशासन गुणवत्ता के आधार पर जनता में विभेद नहीं कर सकता। इसमें न्याय भी एक सिद्धांत है, लेकिन यह सिद्धांत क्या व्यावहारिक धरातल पर है? ‘अँधेर नगरी’ में भी महिला की बकरी के मरने और उसे इंसाफ़ दिलाने का सवाल अनसुलझा ही रह जाता है, और स्वर्ग जाने के लालच में राजा फाँसी की राह पर चल देता है।

‘अँधेर नगरी’ का राजा आरामतलब हैं, उसमें इंसाफ़ का विवेक नहीं, लेकिन आज राजा लोगों के काम करने के रफ़्तार की मिसाल दी जाती है और कर्मठता के इस घटाटोप में इंसाफ़ निरंतर हाशिए पर जाता रहता है। शासक वर्ग अपने अकंटक राज्य के लिए किसी को भी अपराधी मुकर्रर कर उसे फाँसी पर चढ़ा सकता है। आज शासक ख़ुद स्वर्ग जाने के लालच में शायद ही फँसे, क्योंकि ‘अँधेर नगरी’ की स्वर्ग-कल्पना, उसकी ललक पूर्व-आधुनिक समाज की चाह है। आधुनिक नवउदारवादी समाज में तो स्वर्ग एक निरंतर विकसित होती अवधारणा है, जिसे विकास के ज़रिए हासिल किया जाना है और इसके लिए नागरिकों को हर तरह के त्याग के लिए तैयार रहना है, जो तथाकथित राष्ट्र और प्रभु-वर्ग के हित में हों।

‘अँधेर नगरी’ एक ऐसे राज्य का मॉडल है जो मरीचिका में है, यथार्थ में नहीं है, जिसमें अच्छे दिन गुज़ारने के लालच में तमाम गोवर्धन दास फँस गए हैं… विडंबना यह है कि राजा को उन्होंने स्वयं चुना है।

‘अँधेर नगरी’ की रंग-परिकल्पना भारतेंदु ने छह दृश्यों में की है—प्रहसन के व्याकरण के अनुकूल। दृश्य क्रमशः बाह्य प्रांत, बाज़ार, जंगल, राजसभा, आरण्य और श्मशान का है। दृश्य और पात्रों के नियोजन से स्पष्ट है कि मंच पर अलग-अलग धरातल के निर्माण से और क्षणिक परिवर्तन से सभी दृश्य उपस्थित किए जा सकते हैं। इस परिकल्पना से प्रस्तुति एक त्वरा में संपन्न हो सकती है और इसका दर्शकों पर प्रभाव भी पड़ेगा। भारतेंदु नाटक के दर्शकों पर पड़ने वाले प्रभाव के लिए भी चिंतित हैं। नाटक के दो दृश्यों पर विशेष रूप से ध्यान जाता है—एक बाज़ार का दृश्य और दूसरा राजसभा का। बाज़ार में क्या है? व्यापरियों की जमात है—कबाबवाला, चनावाला, नारंगीवाली, हलवाई, कुँजड़िन, मुगल, पाचकवाला, मछलीवाली, जातवाला… यहाँ रुकने की ज़रूरत है, क्योंकि जातवाले के आगे रंग-संकेत हैं—ब्राह्मण… यही एक जाति है जिसका नाम है। भारतेंदु के निबंध ‘भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है’ को पढ़ें तो साफ़ समझ आएगा कि ‘अँधेर नगरी’ का यह पात्र ब्राह्मण इसलिए है, क्योंकि वह उस समाज और वर्ग का प्रतिनिधि है जिसने समाज की व्यवस्था भी बनाई है और उसकी ‘उन्नति’ को बाधित भी किया है। जो टके के वास्ते झूठ को सच करने, ब्राह्मण से मुसलमान, हिंदू से क्रिस्तान बनने, धर्म और प्रतिष्ठा दोनों बेचने को बाज़ार में खड़ा है… जिसके लिए वेद, धर्म, मर्यादा सत्य सब बिकाऊ हैं और कितने पर?—टके सेर।

ब्राह्मण शब्द से आशय आज के संदर्भ में व्यवस्था बनाने और चलाने वाली नियामक शक्तियों और वर्ग से लें तो इस वर्ग के लिए भी सत्य, धर्म, मर्यादा सब बिकाऊ हैं और अपनी सुविधा के हिसाब से वे व्यवस्था को तोड़-मरोड़ रहे हैं।

बाज़ार के दृश्य में भारतेंदु की भाषा सबसे पैनी है। नवीन उद्भावना जिसे कहते हैं, वह भाषा के ज़रिए इस बाज़ार के हिस्से में ही मुखर है, जैसे—अँग्रेज़ी राज्य में टैक्स की व्यवस्था :

चना हाकिम सब जो खाते।
सब पर दूना टिकस लगाते॥

और न्याय-व्यवस्था—जैसे काजी वैसे पाजी। रैयत राजी टके सेर भाजी॥ ले हिन्दूस्तान का मेवा फूट और बेर॥

और समाज का व्यवस्थापक वर्ग चूरन खाकर मगन है। बाज़ार के हलवाई बताते हैं कि उनकी छत्तीस क़ौम हैं, और वे वैसे ही हैं जैसे ‘कलकत्ते के विल्सन मंदिर के भितरिये’ यानी राज्य और बाज़ार के नियंता में कोई फ़र्क़ नहीं। नाटक के उप-पाठ को गहन बनाने वाली यह भाषा उस समय की खड़ी बोली हिंदी है, जिसका स्वरूप अभी विकसित होना है। बाज़ार के दृश्य को पढ़ते हुए भाषा के एक प्रयोग पर विशेष ध्यान जाता है। हलवाई कहता है, “मोयनदार कचौड़ी कचाका, हलुआ नरम चभाका” अब ये स्वाद लेने की क्रियाएँ हैं, जिनका लोक में इस्तेमाल होता है। भारतेंदु ने ‘कचाका’ और ‘चभाका’ का इस्तेमाल केवल तुकबंदी के लिए नहीं किया है, वह क्रियाओं को ठीक से व्यक्त करने वाले शब्द लोक में पाते हैं तो उन्हें ले आते हैं। ‘अँधेर नगरी’ का भाषिक सौंदर्य ऐसे प्रयोगों से और मुखर हुआ है। यहाँ व्यंग्य और विदग्धता का स्रोत भी लोक-भाषा है। नाटक में हरकतों की ऐसी भाषा विन्यस्त है, जो आज भी अभिनेताओं के प्रशिक्षण या परीक्षण के लिए इस्तेमाल की जाती है।

गोवर्धनदास ‘अँधेर नगरी’ के पाँचवें दृश्य में एक गीत गाते हुए प्रवेश करता है। इस गीत को पढ़ें तो आप चौंक सकते हैं कि गोवर्धनदास जो अँधेर नगरी का सच जानता है और इतना चैतन्य है तो अँधेर नगरी में क्यों फँसता है? साधारण-सा उत्तर है कि लोक-रंगमंच में अभिनेता पात्र होते हैं और उससे पहले सूत्रधार भी। सन् 1881 में जब ‘अँधेर नगरी’ नाटक लिखा गया, तब एलियनेशन सिद्धांत के प्रस्तावक जर्मन नाटककार बर्तोल्त ब्रेख्त के जन्म में 17 साल बाक़ी थे। भारतेंदु एलियनेशन के सिद्धांत—जिसमें पात्र अपनी स्थिति को या दृश्य को एक आलोचनात्मक नज़रिए से देखने वाला भी है और भूमिका निभाने वाला भी है—को बख़ूबी अपनी रंग-परिकल्पना में संभव करते हैं। गोवर्धन दास राग काफी में गा रहा है :

साँच कहैं ते पनही खावैं। झूठे बहुविधि पदवी पावै॥
छलियन के एका के आगे। लाख कहौ एकहु नहिं लागे॥

भारतेंदु कह रहे हैं कि सच बोलने वालों को सज़ा मिलती है और झूठे पदवी पाते हैं, छलियों की एकता के ज़ोर के आगे कोई नहीं टिक पाता, अंदर से कलुषता से भरे लोग बाहर से चमकदार दिखते रहते हैं या कोशिश में रहते हैं दिखने की। धर्म और अधर्म सब एक हो गया है, न्याय वही जो राजा कहे, सुप्रीम कोर्ट भी कहे तो उसे चुनौती दी जाए। …और ऐसे हालात में देश पहुँच जाए कि लगे ही न कि शासक यहाँ रहता है। यहाँ यह जो पंक्ति है : “अंधाधुंध मच्यो सब देसा मानहु राजा रहत बिदेसा” उस समय का सच थी, लेकिन आज? राजाओं ने देश में ही अपना विदेश निर्मित कर लिया है। देश के सुचारु संचालन में उनकी रुचि नहीं रह गई। लोकतांत्रिक व्यवस्था के सारे इदारों में घमासान मचा हुआ है। दरबार में जाहिलों का जमावड़ा है। वे जन-विरोधियों के साथ हैं और बुद्धिजीवियों को उन्होंने अपने ख़िलाफ़ मान लिया है।

‘अँधेर नगरी’ के दरबार में क्या होता है? फ़रियादी की बकरी की मौत का ज़िम्मेदार दीवार को तलब किए जाने से सिलसिला शुरू होता है और क्रमशः कल्लू बनिया, कारीगर, चूनेवाला, भिश्ती, क़साई से होते हुए सज़ा की सूई कोतवाल पर टिक जाती है जो कि शहर का ‘इंतज़ाम’ देखने निकले हैं। इस बदइंतज़ामी का जो इंतज़ाम करेगा वह तो गुनहगार है ही। इस दृश्य को पढ़ते हुए जो बात ध्यान देने की है, वह असंगत संवादों की योजना है, जो राजा की मूर्खता को और गाढ़ा करने और हास्य की रचना के लिए है। दृश्य के अंत मे भारतेंदु का रंग-संकेत पढ़िए (लोग एक तरफ़ से कोतवाल को पकड़कर ले जाते हैं, दूसरी ओर से मंत्री को पकड़कर राजा जाते हैं), यानी दृश्य के अंत तक राजा अपने पैरों से नहीं चल पाता, उसे सहारा चाहिए। आज के समय में भी शासक अपने पैरों पर नहीं, बहुत से सहारों पर है।

‘अँधेर नगरी’ का मेरा पाठ राजनीतिक झुकाव लिए हुए है, और ऐसा अनायास नहीं है। भारतेंदु के आरंभिक अध्येता रामविलास शर्मा ने इसे राजनीतिक चेतना फैलाने में सक्षम नाटक कहा है। साठ और सत्तर के दशक में ‘अँधेर नगरी’ को मंच पर प्रस्तुत करने वाले सत्यव्रत सिन्हा उस दशक की राजनीतिक घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में ही अपनी परिकल्पना विकसित करते हैं। सत्तर के दशक के आख़िर में जब ब.व. कारंत इसकी प्रस्तुति करते हैं, तब भी यह राजनीतिक आशयों को ही प्रकट करती है। कारंत इस प्रस्तुति के अंत में महंत को ही चौपट्ट राजा की गद्दी पर बिठा देते हैं—राजा के मरने के बाद। इसकी समीक्षा करते हुए जयदेव तनेजा लिखते हैं, “अंत में महंत को राजा की गद्दी पर बिठाकर प्रथम दृश्य के पहले नाट्य-बिंब की ज़रा-सी पुनरावृत्ति करके तत्कालीन राजनीतिक परिवर्तन से प्रसन्न और उत्तेजित जनता को यह संदेश दिया कि जब तक सत्ता/व्यवस्था के मूलाधार, चरित्रों और मूल्यों में आधारभूत परिवर्तन नहीं होता, तब तक किसी भी व्यक्ति, वर्ग या पार्टी के आने-जाने से वस्तुस्थिति में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला है।’’ क्या विगत सत्ता-परिवर्तन इस आशय को पुष्ट नहीं करता? व्यवस्था और उसके मूल चरित्र की सटीक व्याख्या ‘अँधेर नगरी’ के रूपक के ज़रिए भारतेंदु ने की है, जो अपने रचे जाने के सवा सौ साल बाद भी हमें आगाह कर रहा है, लेकिन हम इसमें व्याप्त नीति-संदेश को पढ़ नहीं पा रहे हैं :

जहाँ न धर्म न बुद्धि नहिं, नीति न सुजन समाज।
ते ऐसहि आपुहि नसे, जैसे चौपटराज॥

हम महंत की चेतावनी को भी अनदेखा कर रहे हैं :

सेत सेत सब एक से, जहाँ कपूर कपास।
ऐसे देस कुदेस में कबहुँ न कीजै बास॥

‘अँधेर नगरी’ के मूर्ख और निरंकुश राजा का अंत स्वर्ग के लालच से होता है, भारतेंदु उसके अंत की युक्ति तलाशते हैं—महंत के ज़रिए और उसके अंत में ही निदान देखते हैं। लेकिन आज की ‘अँधेर नगरी’ और इसके ‘चौपट्ट राजा’ की निरकुंशता का अंत किस युक्ति से होगा, ‘अँधेर नगरी’ का पाठ/पुनर्पाठ हमारे सामने यह सवाल रखता है।

***

यह वक्तव्य 24 नवंबर 2018 को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली में आयोजित हिंदी युवा लेखकों के द्विदिवसीय रज़ा समारोह के ‘अँधेर नगरी’ पर केंद्रित सत्र में दिया गया। अमितेश कुमार हिंदी रंग-आलोचना में सक्रिय इस दौर के सबसे उज्ज्वल हस्ताक्षर हैं। उन्होंने उच्च शिक्षा दिल्ली विश्वविद्यालय से पाई है। ‘हबीब तनवीर का रंगकर्म’ उनके शोध का विषय रहा है। इन दिनों वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ा रहे हैं। वह रंगमंच को पूर्णतः समर्पित हिंदी के पहले ब्लॉग ‘रंगविमर्श’ के मॉडरेटर हैं। यहाँ प्रस्तुत वक्तव्य कुछ रोज़ पूर्व मौखिक चर्चा का विषय रहा है। हिंदी जगत में इस प्रकार की चर्चाएँ प्रायः द्विमुखी और मुँहदेखी (कूट)नीतियों से गतिशील होती हैं, और एक उत्कृष्ट, मूल्यमय तथा महत्वपूर्ण कथ्य/पाठ/प्रतिक्रिया के मूल मक़सद, प्रसंग तथा प्रभाव को नष्ट कर देती हैं। प्रस्तुत वक्तव्य के साथ यह न हो, यह प्रस्तुति इस सद्भावना से प्रेरित है। अमितेश कुमार से amitesh0@gmail.com पर बात की जा सकती है। गए बरस ‘सदानीरा’ के 17वें अंक के लिए उन्होंने मशहूर रंगकर्मी संजय उपाध्याय से एक मार्मिक और आत्मीय बातचीत भी की थी, उसे यहाँ पढ़ें :

‘खुद को मैंने संगीत के जरिए तोड़ा’

3 Comments

  1. NAVNEET KUMAR December 6, 2018 at 4:03 am

    Amitesh Kumar का यह सामयिक वक्तव्य न सिर्फ वर्तमान समाज में व्याप्त विसंगतियों को उजागर करता है बल्कि एक नए दृष्टिकोण से सोचने को मजबूर करता है । पहले भी इनके सानिध्य से मैं लाभान्वित होता रहा हूँ । आज एकबार फिर पढ़कर मेरा ज्ञानवर्धन हुआ, इसके लिए धन्यवाद शब्द का प्रयोग करना मेरी धृष्टता होगी । सादर -नवनीत कुमार

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  2. श्याम कुमार सहनी(होरी श्याम) December 6, 2018 at 6:34 am

    इस विशेष लेख के लिए अमितेश भैया जी को धन्यवाद देना चाहूंगा।एक रंगकर्मी के तौर पर इस नाटक के कई मंचन में मेरी सहभागिता रही है ।हर बार एक अभिनेता और निर्देशक के तौर पर भी अलग अलग पक्ष को जानने समझने का मौका मिला।आज फिर एक नये दृष्टिकोण का सूत्र मिला।
    सादर-श्याम कुमार सहनी

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  3. अमरेंद्र त्रिपाठी December 6, 2018 at 7:52 am

    अमितेश कुमार का यह लेख काफी विचारोतेजक है। अंधेर नगरी की नवीन व्याख्या के साथ ही इसमें हमारे समय की भी सटीक व्याख्या की गई है। सत्ता और बाजार के गठजोड़ और उसकी साजिश का पर्दाफाश हमारे समय की सबसे बड़ी चुनौती है।

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