कवितावार में सच्चिदानंद राउतराय की कविता ::
ओड़िया से अनुवाद : राजेंद्र प्रसाद मिश्र

सच्चिदानंद राउतराय

लेनिन

सारी जनता का निशान है लेनिन
लेनिन है जीवन-ज्योति
(और) वास्तविकता का टीका है
स्वप्न से बढ़कर वह जो दूर की
वास्तविकता के निकट है
वह मानव-समाज की
अंतर से अंतरतम
विस्तृति चेतना की
लेनिन ध्वजा है सारे विश्व की मेहनतकश जनता की
लेनिन! लेनिन! पुकारती है मेरी लेखनी
जब चाहे जितनी बार—

तृप्त नहीं होता, छू नहीं पाता, मैं
कभी भी देशांश रेखा उसकी
लेकिन हठात् दिखाई देता है वह जो
अकारण ही फिर कभी
खेत, और खलिहान, कारखानों में
किसान और श्रमिक जब
कभी मुकाबला करते हैं
स्थायी स्वार्थ-पुंज के किसी चमचमाते हथियार से

रात्रि के अंतिम पहर की एक आवाज
शहर की तलहटी के किनारे
जंगलों और पहाड़ों पर
किसानों के जयघोष में
किसान स्त्रियों की भौंहों पर
वह काजल की रेखा तो सांवले बादल के इंतजार में है
लेनिन, लेनिन वह एक सरणी है,
वह एक पथ की संज्ञा है,
अतीत के संपूर्ण मानचित्र पर
वह एक नया पहलू
मनुष्य की नई सीमा!
वह जिसने लिखे हैं सारी उम्मीदों के नवीनतम शीर्षक
लेनिन हमारा साथी है
लेनिन जो हमारे जीवन की ज्योति है
हटाकर भय और वश्यता
नए मूल्यों की ध्वजा
आज वह हर हाथ में सौंपकर
दूर करता है सारी गलतफहमियां

आज लेनिन के नाम से
नई धड़कनें उठने लगती हैं सुदूर वियतनाम में
सुदूर भारत में आज भी वह चमक रहा है
हर शहर-गांव में
लाल तारे की तरह ही वह जल रहा है
अफ्रीका के घने जंगलों में
लाखों मील लांघकर वह जल रहा है
मलयद्वीप के आकाश में
उसी प्रगति के अग्रदूत को आज मैं स्मरण करता हूं
बुलाता हूं ले उसका नाम
उसी के नाम से जागता है कोरापुट, पुरी और गंजाम
वह तो सुबह का स्वर है
लेनिन! लेनिन! पुकारती है मेरी लेखनी
जब चाहे जितनी बार
तृप्ति नहीं होती, फिर भी मैं पुकारता हूं,
हर युग में उसे बार-बार.

***

[ वर्ष 1986 के ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित शीर्षस्थ ओड़िया साहित्यकार सच्चिदानंद राउतराय (13 मई 1916 – 21 अगस्त 2004) ओड़िया साहित्य में काव्य-मुक्ति के अग्रदूत माने जाते हैं. यहां प्रस्तुत कविता भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित उनकी कविताओं के संकलन ‘वसंत के एकांत जिले में’ (1988) से ली गई है.]

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