स्त्रीवाद और स्त्रीवादियों पर  ::
चिमामंडा न्गोजी अदिची
अनुवाद और प्रस्तुति : यादवेंद्र

साल 2003 में मैंने ‘पर्पल हिबिस्कस’ लिखा था जिसका मुख्य किरदार बहुतेरे काम करता है, वह अपनी बीवी को मारता भी है. इस कहानी का अंत मन को बहुत दुख से भर देता है. अपने देश नाइजीरिया में जब मैं इस किताब का प्रचार कर रही थी, तब एक शालीन प्रतिष्ठित पुरुष पत्रकार ने मुझे सलाह देने की पेशकश की. बिन मांगे सलाह देने में नाइजीरियाई लोग बहुत आगे हैं. उसने कहा कि लोगों को यह उपन्यास स्त्रीवादी (फेमिनिस्ट) लगता है और आपको खुद पर फेमिनिस्ट होने का आरोप कतई नहीं लगने देना चाहिए, क्योंकि ऐसी स्त्रियां जीवन भर दुख भोगती हैं. उन्हें शादी करने के लिए लड़के नहीं मिलते…

सो मैंने अपने आपको फेमिनिस्ट नहीं ‘हैप्पी फेमिनिस्ट’ कहना शुरू कर दिया.

इसके बाद एक महिला प्रोफेसर ने कहा कि फेमिनिज्म नाइजीरिया की संस्कृति का हिस्सा नहीं है, यह गैर अफ्रीकी विचार है और मैं खुद को फेमिनिस्ट इसलिए कहती हूं क्योंकि मैं पश्चिमी साहित्य पढ़ते हुए बड़ी हुई हूं… मुझे यह तर्क मजेदार लगा क्योंकि मेरी शुरू की सारी पढ़ाई निर्विवाद तौर पर गैर स्त्रीवादी साहित्य से हुई है. सोलह वर्ष की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते मिल्स एंड बून की रोमांस सीरीज का कोई ऐसा उपन्यास नहीं बचा था जो मेरे पढ़ने से रह गया हो. जब-जब भी मैंने कथित तौर पर क्लासिक फेमिनिस्ट साहित्य पढ़ने की कोशिश की, मैं बुरी तरह बोर हो गई और जैसे-तैसे पन्ने पलटकर मैंने उससे नजात पाई.

जब फेमिनिज्म को गैर अफ्रीकी करार दे दिया गया, तब मैंने खुद को हैप्पी अफ्रीकन फेमिनिस्ट कहने का निश्चय किया. फिर एक दिन मेरे एक प्रिय मित्र ने कहा : ‘‘खुद को फेमिनिस्ट कहने का मतलब ही हुआ कि मैं पुरुषों से घृणा करती हूं.’’ तब मुझे खुद को ऐसा हैप्पी अफ्रीकन फेमिनिस्ट कहना पड़ा जो पुरुषों से घृणा नहीं करती और जिसे लिप-ग्लॉस लगाने का शौक है और जो हाई हील्स पहनती है— मर्दों को खुश करने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए क्योंकि यह उसे अच्छा लगता है.

दुनिया में जहां कहीं भी जाएं, लिंग (जेंडर) बड़ी खास जगह रखता है, लेकिन अब समय आ गया है कि जब हमें एक दूसरी तरह की दुनिया के बारे में सोचना शुरू करना चाहिए, उसका सपना देखना चाहिए— पहले से ज्यादा न्यायपूर्ण दुनिया, ज्यादा खुश पुरुषों और स्त्रियों की दुनिया… जहां वे जैसे दिखते हैं, वैसे ही हों भी.

लैंगिक मुद्दों पर किसी के साथ बात करना आसान नहीं है, बात शुरू करते ही लोग असहज होने लगते हैं, कई बार तो क्रुद्ध भी हो जाते हैं. चाहे पुरुष हो या स्त्री, दोनों ही इस विषय पर बात करने से कतराते हैं, या यों कहें कि यह कहते हुए वहां से उठ जाना चाहते हैं कि बहस का यह कोई मुद्दा ही नहीं है. ऐसा इसलिए होता है कि यथास्थिति को बदलना हमेशा असुविधाजनक होता है.

कुछ लोग कहते हैं : “इस शब्द (फेमिनिस्ट) के लिए इतना आग्रह क्यों? यह क्यों नहीं कहतीं कि तुम मानवाधिकारों (या इससे मिलता-जुलता कोई शब्द) की समर्थक हो.” …मैं ऐसा इसलिए नहीं कर पाती क्योंकि यह सरासर बेईमानी होगी. व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो फेमिनिज्म मानवाधिकारों के अंदर सम्मिलित है, लेकिन मानवाधिकार जैसे अस्पष्ट जुमले को चुनने का मतलब होगा कि लिंग के एकदम स्पष्ट, प्रकट और केंद्रीय मुद्दे से आंखें चुराना. इसका अर्थ हुआ कि सैकड़ों सालों से स्त्रियों को समाज की मुख्यधारा से काटकर वंचित रखा गया… इससे इनकार, इससे इनकार कि लैंगिक समस्या सिर्फ स्त्रियों को निशाना बनाती है और यह स्त्रियों के मनुष्य होने के हक को छीनना था.

सदियों तक मनुष्य-जाति को दो हिस्सों में बांटा जाता रहा है और धीरे-धीरे यह प्रवृत्ति एक वर्ग के अलगाव और दमन में तब्दील हो गई. इस समस्या को जब तक स्वीकार नहीं किया जाता, तब तक न्याय नहीं किया जा सकता.

कुछ पुरुष फेमिनिज्म के विचार से डरते हैं, खतरा महसूस करते हैं. मुझे लगता है कि इसकी जड़ में लड़कों की परवरिश की परिपाटी है— उन्हें बचपन से ही घुट्टी में पिलाया जाता है कि वह भला क्या पुरुष जिसका कुनबे पर स्वाभाविक नियंत्रण न हो.

कुछ दूसरे कहेंगे : “सही, यह बात दिलचस्प है… पर मैं तुम्हारी तरह नहीं सोचता. मेरे लिए तो जेंडर कुछ है ही नहीं.”

हो सकता है यह कोई बात न हो — लेकिन समस्या की जड़ यही है — कि बहुतेरे पुरुष न तो जेंडर की बात सोचते हैं, न उन्हें लैंगिक-विभाजन दिखाई देता है. कइयों को लगता है कि पहले के सालों में ऐसा जरूर था, पर अब सब कुछ ठीक-ठाक हो गया है सो बदलाव की कोशिश अनावश्यक है.
मैं एक मिसाल देती हूं… आप किसी रेस्त्रां में जाते हैं और वेटर सिर्फ आपको नमस्ते करता है तो क्या आपको यह नहीं लगता कि पलटकर उससे पूछें : “तुमने मेरे जो साथ आई है, उसे नमस्ते क्यों नहीं किया?’’ ऐसे तमाम आम और मामूली मौकों पर पुरुषों को खुलकर बोलना चाहिए.

जेंडर का मामला असहज करता है, सो इस पर चुप्पी साध ली जाए यह सबसे सहूलियत वाला रास्ता है. कुछ लोग क्रमिक विकास (इवॉल्यूशन) के सिद्धांत का हवाला दे सकते हैं कि वनमानुष को देखो, मादा नर के सामने सिर झुकाती है. लेकिन मैं कहती हूं कि हम वनमानुष तो नहीं हैं. वे पेड़ों पर रहते हैं, कीड़े-मकोड़े खाते हैं… हम तो ऐसा कुछ नहीं करते.

कुछ ऐसे भी होंगे जो गरीबी का हवाला देकर कहेंगे कि गरीबों को भी भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. सही है, करना पड़ता है. लेकिन यह सारी चर्चा इस मुद्दे पर नहीं है— लिंग (जेंडर) और वर्ग (क्लास) अलग-अलग मुद्दे हैं. गरीब पुरुषों को भले ही आर्थिक विलासिता नसीब न हो, मर्दानगी का विलास तो उनके समीप है ही, रहेगा ही.

अनेक ब्लैक पुरुषों से बात करते हुए मुझे यह अच्छी तरह महसूस हो गया कि एक विषय कैसे दूसरे विषय की एकदम अनदेखी कर सकता है. दमन के इतिहास में यह अक्सर दिखाई देता है. एक बार मैं इस तरह ही बात कर रही थी कि एक ने कहा : “तुम औरतों की बात बार-बार क्यों करती हो… इंसान की बात करो न.’’ ऐसी बातें कहकर आपके निजी तजुर्बों को एक झटके से खारिज कर दिया जाता है.

मुझे इससे इनकार कहां है कि मैं एक इंसान हूं, पर स्त्री होने के नाते मुझे जीवन में जो कुछ झेलना पड़ता है, वह झूठा कैसे हो जाएगा. यही आदमी अपने ब्लैक होने के तमाम तजुर्बों पर भाषण देता फिरता है (मैं भी तो उसको जवाब दे सकती थी : “तुम्हारे तजुर्बों को मर्दों या इंसान के तजुर्बों के तौर पर क्यों न देखा जाए. ब्लैक होने का आग्रह क्यों?”)

खैर, छोड़िए यह सब… यह चर्चा जेंडर को लेकर चल रही है. कुछ ऐसे भी होंगे जो कहेंगे : “जो कुछ भी हो असली ताकत तो औरतों के पास ही रहनी है— कूल्हों की ताकत (नाइजीरियाई स्त्रियों की अपनी सेक्सुअलिटी का उपयोग कर पुरुषों से काम करा लेने की प्रवृत्ति).’’

लेकिन वास्तव में कूल्हों की ताकत कोई वास्तविक ताकत नहीं है, क्योंकि भड़काऊ कूल्हों वाली औरतें भी इस समाज में किसी तरह की ताकत नहीं रखतीं. उनके पास बस यह एक अतिरिक्त रास्ता है कि वह किसी ताकतवर मर्द तक आसानी से पहुंच बना सकती है. लेकिन तब क्या होगा जब सारे प्रलोभन के बाद भी मर्द को लुभाना मुमकिन न हो… हो सकता है कि उसका मूड बिगड़ा हुआ हो… या वह बीमार हो… या कहीं वह नपुंसक हुआ तो?

यह कहने वाले बहुतेरे पुरुष मिल जाएंगे कि हमारी संस्कृति स्त्रियों को पुरुषों के मुकाबले नीचे का दर्जा देती है— अधीनता का दर्जा. लेकिन संस्कृति कोई जड़ विषय नहीं है, यह निरंतर परिवर्तनशील है. मेरी दो जुड़वां खूबसूरत भतीजियां हैं, पंद्रह साल की… अगर आज से सौ साल पहले वे जन्मी होतीं तो आंख खोलते ही उन्हें बाहर ले जाकर मार डाला जाता, क्योंकि सौ साल पहले हमारी इग्बो संस्कृति में जुड़वां बहनों का जन्म लेना अपशगुन माना जाता था. आज लोगों के लिए इसकी कल्पना भी असंभव है.

तब फिर संस्कृति किसलिए? संस्कृति यही तो सुनिश्चित करती है कि आम जन की भावनाएं सतत प्रवाहशील और संरक्षित रहें. अपने परिवार की बात करूं तो मुझे अपनी विरासत और परंपराओं को जानने की उत्सुकता सबसे ज्यादा रहती है, मेरे भाइयों की इसमें कोई रुचि नहीं है. लेकिन जब बड़े पारिवारिक फैसलों के लिए सब मिलकर बैठते और विचार-विमर्श करते हैं तो वहां मेरी कोई जगह नहीं होती. इग्बो रिवाज में ऐसे फैसलों में लड़कियों की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए, भले ही इससे सबसे ज्यादा सरोकार उनका हो… इसलिए बड़े फैसलों में मेरी भागीदारी का निषेध है. यह सिर्फ इसलिए क्योंकि मैं एक स्त्री हूं.

संस्कृतियां इंसानों को पैदा नहीं करतीं, बल्कि इसका उल्टा होता है— इंसान हैं जो किसी संस्कृति का निर्माण करते हैं. अगर हमारी संस्कृति में इंसानों की बिरादरी में स्त्रियों को बराबरी का दर्जा नहीं दिया गया है तो हमें नई संस्कृति बनाने के बारे में सोचना चाहिए. इस प्रकार की संस्कृति का निर्माण करना जरूरी है.

बचपन में जो किस्से मैंने सुने हैं, उनसे मालूम हुआ कि मेरी नानी पक्की फेमिनिस्ट थीं, न चाहते हुए भी जिससे उन्हें ब्याह दिया गया था, उसे छोड़कर उन्होंने अपनी पसंद के मर्द के साथ शादी कर ली और निभाई. स्त्री होने के नाते जब-जब भी उनके साथ नाइंसाफी की गई, वह कभी चुप नहीं बैठीं, उन्होंने खुलकर विरोध किया. यह अलग बात है कि उनका ‘फेमिनिस्ट’ शब्द से दूर-दूर तक कोई परिचय नहीं था. लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं हुआ कि वह फेमिनिस्ट नहीं थीं.

आज हमें इस शब्द और भाव का वरण करना चाहिए. फेमिनिस्ट की मेरी परिभाषा में वह पुरुष या स्त्री शामिल है, जो यह मानता/मानती है : ‘‘हां, आज जो हालात हैं उसमें जेंडर एक समस्या है और हमें उसका समाधान करना है… हमें पहले की तुलना में एक बेहतर समाज बनाना है.’’

हम सबको — स्त्रियों और पुरुषों दोनों को — बेहतर दुनिया बनानी है.

*

साल 1977 में नाइजीरिया में जन्मी चिमामंडा न्गोजी अदिची अफ्रीका की अत्यंत लोकप्रिय और मुखर साहित्यिक आवाज हैं. उन्होंने अपने देश में रहते हुए मेडिकल की शुरुआती पढ़ाई की, लेकिन साहित्य में गहरी रुचि के कारण वह मेडिकल की पढ़ाई छोड़कर साहित्य की ओर मुड़ गईं. देश में गृहयुद्ध के माहौल के चलते उन्नीस वर्ष की उम्र में वह अमेरिका चली आईं और रचनात्मक साहित्य में आगे की डिग्री हासिल करके पूर्णकालिक लेखक बन गईं. जल्दी ही उनकी रचनाओं को प्रमुख पत्रिकाओं में स्थान मिलने लगा और प्रसिद्ध प्रकाशकों ने उनकी कृतियां छापीं. उनके पहले उपन्यास ‘पर्पल हिबिस्कस’ को कॉमनवेल्थ राइटर्स प्राइज प्रदान किया गया. टाइम्स लिटरेरी सप्लीमेंट ने जहां उन्हें अफ्रीकी साहित्य का सबसे महत्वपूर्ण लेखक बताया, वहीं न्यूयॉर्क टाइम्स ने उनके तीसरे उपन्यास ‘अमेरिकाना’ को 2013 की दस सर्वश्रेष्ठ किताबों की सूची में शामिल किया.

2010 में ‘न्यूयॉर्कर’ ने चिमामंडा न्गोजी अदिची को चालीस साल तक के बीस सर्वश्रेष्ठ लेखकों में शुमार किया. बियाफ्रा की मुक्ति के लिए लड़े जा रहे संग्राम पर आधारित उनके दूसरे उपन्यास ‘हाफ ऑफ ए यलो सन’ पर 2014 में ब्लाई बंडेले ने इसी नाम से एक फिल्म बनाई. अफ्रीकी मूल की अमेरिकी फिल्मकार अकोसुआ अदोमा ओवुसू ने हाल में उनकी कहानी ‘ऑन मंडे ऑफ लास्ट वीक’ पर एक लघु फिल्म बनाई, जिसे काफी सराहना मिली.

चिमामंडा ने कहानी और उपन्यास के अलावा कविता और नाटक भी लिखे हैं, लेकिन वह इतने से संतुष्ट रहने वाली प्राणी नहीं हैं. वह अपने आस-पास घट रही घटनाओं पर बहुत स्पष्टता के साथ टिप्पणी करती हैं. गए साल अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव के समय न्यूयॉर्क टाइम्स में उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप की पत्नी मेलेनिया ट्रंप के बारे में कहानी लिखकर बुद्धिजीवियों के बीच अपनी राजनैतिक दृष्टि का खुलासा करते हुए तहलका मचा दिया.

गंभीर विमर्श के वैश्विक मंच TEDx टॉक पर 2009 का चिमामंडा का व्याख्यान ‘द डेंजर ऑफ ए सिंगल स्टोरी’ बेहद लोकप्रिय हुआ और कई करोड़ लोग उसको देख चुके हैं. अब तक इस सीरीज में प्रसारित यह दस सबसे लोकप्रिय व्याख्यानों में शामिल है. इसके कुछ सालों बाद उन्होंने इसी मंच से दूसरा अत्यंत लोकप्रिय व्याख्यान ‘वी शुड ऑल बी फेमिनिस्ट’ दिया. इस व्याख्यान को किताब के रूप में तो छापा ही गया, अमेरिका की अत्यंत लोकप्रिय एक्टिविस्ट गायिका बियोंसे ने अपना प्रसिद्ध गीत ‘फ्लॉलेस’ इस व्याख्यान को आधार बनाकर प्रस्तुत किया.

अपनी रचनाओं में स्त्रीवादी विमर्श को प्रमुखता से जगह देने वाली चिमामंडा न्गोजी अदिची ने अपनी सबसे नई किताब ‘डियर आइजीवेले, ऑर ए फेमिनिस्ट मेनिफेस्टो इन फिफ्टीन सजेशंस’ अपनी एक सहेली को चिट्ठी के फॉर्म में लिखी, जिसने उनसे पूछा था कि अपनी बेटी को फेमिनिस्ट कैसे बनाएं? वह कहती हैं कि मैं दरअसल एक स्टोरीटेलर हूं, पर अगर कोई मुझे स्त्रीवादी लेखक कहता है तो मुझे कोई आपत्ति नहीं, सच यह है कि मैं दुनिया को एक स्त्री की नजर से देखती हूं…

चिमामंडा न्गोजी अदिची फिलहाल अपना समय अपने देश नाइजीरिया और अमेरिका के बीच बांट रही हैं. वह अफ्रीकी लेखन को बढ़ावा देना अपना दायित्व समझती हैं.

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[ यह प्रस्तुति अपने मूल स्वरूप में 17 अक्टूबर 2014 के ‘द गार्जियन’ में प्रकाशित है और साल 2012 के TEDx टॉक का एक अंश है. यादवेंद्र सुपरिचित अनुवादक हैं. मुंबई में रहते हैं. उनसे yapandey@gmail.com पर बात की जा सकती है.]

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