ओल्गा तोकार्चुक की कहानी ::
अनुवाद : उदय शंकर

Olga Tokarczuk story

ईश्वर ने एक परिशिष्ट के रूप में ड्रग्स की रचना की. शनिवार की आधी रात के कुछ ही मिनट बाद रविवार को उसने इस रचनात्मक कार्य को अंजाम दिया. सृष्टि-रचना समाप्त हो चुकी थी, करने को कुछ शेष नहीं था. यह कहा ही जा सकता है कि ईश्वर द्वारा नशीले पदार्थ की यह सृष्टि कानून और व्यवस्था दोनों का उल्लंघन थी.इस तरह के बहाने में कोई दम नहीं है कि वह अपने छह दिन की परियोजना की वजह से थक गया था.

आधी रात से ठीक पहले, कुछ कड़वे घूंट लेने जब वह रसोईघर में गया तो अचानक किसी संशय के मारे वह स्थिर हो गया. इसके बाद किसी अजीब और अपरिभाष्य बेचैनी ने गर्व और संतुष्टि के उसके बोध पर कब्जा कर लिया.

उसने अपनी उंगलियों के जोड़ों से पाइप को खटखटाया. कुछ क्षण बाद ही उसे दरवाजे पर पड़ोसन की खटपट सुनाई दी. वह कई दिनों से परियोजना की प्रगति देखने आती रही है, इस समय भी वह यही करने आई है.

“तुम्हारी तबियत ठीक नहीं लग रही है?” यह कहते हुए वह अंदर आ गई, दिखावे की विनम्रता उसके व्यवहार का हिस्सा नहीं थी, “तुम ऐसे दिख रहे हो जैसे चला-चली की बेला का इंतजार कर रहे हो! क्या तुम अपनी तरफ से निश्चिंत हो लिए हो?”

“हां, हो गया हूं.” ईश्वर मुस्कुराया और उसके लिए कुर्सी को खींचकर आगे किया. वे दोनों एक-दूसरे को बहुत समय से जानते थे, यहां तक किसी समय एक-दूसरे की चाह भी रखते थे, लेकिन इस तरह की चाहनाओं के लिए अब दोनों की उम्र नहीं बची थी.

“अच्छा? कैसा रहा?”

“मैं बुरी तरह थक गया हूं.” सावधानी बरतते हुए ईश्वर ने आगे कहा, “और इसके साथ ही कुछ समाप्त हो गया है, ऐसा लगता है.”

पड़ोसन ने प्यार से उसके हाथ को सहलाया, और फिर खड़ी हो गई. उसने खिड़की के पल्ले को बाहर, संसार की तरफ खोल दिया और नीचे झांकने लगी. संसार के नीचे से आने वाली रोशनी की चकाचौंध से उसका सांवला चेहरा चंचल हो गया. वह काफी देर से शांत थी और मन ही मन सब कुछ आत्मसात कर रही थी.

आखिर वह ईश्वर से बोल बैठी, “यह अच्छा नहीं है… मेरे कहने का मतलब तुम्हें दोष देना नहीं है. इसमें हर चीज की मात्रा थोड़ी ज्यादा ही हो गई है. यह बहुत तीव्र, और एक तरह से भड़कीला है— अत्यंत कुत्सित. अधिकांश लोग इसे सहने में सक्षम नहीं होंगे.”

“वास्तविकता की मौलिक विशेषताओं में से एक यह भी है कि इसे सहन नहीं किया जा सकता, यही कारण है कि मैंने इसमें समय को मिलाया है. सब कुछ क्षण भर में समाप्त होता है— सभी को व्यवस्थित रखने का यह सबसे अच्छा तरीका है.” ईश्वर ने लगभग आहत होते हुए करारा जवाब दिया.

खिड़की के पल्ले को सटाकर पड़ोसन फिर से टेबल के पास आ गई. उसने अपने और ईश्वर दोनों के लिए प्रचुर मात्रा में व्हिस्की उड़ेली, “क्या तुम्हें नहीं लगता कि तुमने उन्हें कुछ ज्यादा ही शक्ति दे दी है? मेरा मतलब उन दो पैर वाले नंगे प्राणियों से है. तुम्हें नहीं लगता है कि तुम शायद भावनाओं में बह गए थे? वह भी सिर्फ इसलिए कि वे स्वयं में तुम्हारी छवि देखना चाहते हैं. यह अलग बात है, जरा अपनी तरफ देखो तो सही, कि वे तुम्हारी छवि के अनुरूप बिल्कुल भी नहीं हैं.”

“तुम यह कहना चाह रही हो कि सबसे अच्छा यह होगा कि न कुछ किया जाए और न ही कुछ रचा जाए.” ईश्वर ने हमलावर होते हुए कहा, “तुम कम से कम एक बार तो प्रोत्साहित कर ही सकती हो. मैं हमेशा कठोर परिश्रम करता हूं और कभी भी कोई सकारात्मक साथ नहीं पाता हूं.”

“कभी नहीं.’’ ऐसा कभी मत कहना, या फिर ‘हमेशा’, ऐसा भी मत कहना. तुम्हें अच्छी तरह पता है कि इस तरह की अवधारणाएं अस्तित्व में नहीं हैं.”

ईश्वर असहमतिवश कुछ बोलना चाहता था.

“ठीक है, ठीक है.” अपने लहजे को बदलते हुए पड़ोसन बोली, “बेशक उनमें कुछ बहुत अच्छी चीजें हैं. अभी तक तुमने जो कुछ भी बनाया है, उनमें से मुझे सबसे ज्यादा मशरूम पसंद है. वह सचमुच एक कला-कृति है, कला-कृति कहने का मतलब, पूरी तरह से अनावश्यक फिर भी रमणीय, आनंददायी.”

ईश्वर के चेहरे की रंगत वापस लौटने लगी.

“जब तुमने इसे बनाया तो इसके बारे में क्या सोच रहे थे? मशरूम जैसी चीजें तुमने क्यों बनाईं?”

अब गेंद ईश्वर के पाले में थी, “क्योंकि यह सुंदर है? क्योंकि यह बहुत लाल है और साथ ही इसमें छोटी-छोटी बिंदियां हैं?’’

पड़ोसन ने सांस छोड़ी और गिलास के लिए आगे बढ़ी.

अपनी पड़ोसन की तारीफ से उत्साहित होकर ईश्वर ने साफ तौर पर कहा, “और वैसे भी मशरूम के बारे में किसे पड़ी है? क्या तुमने इसके चचेरे-ममेरे भाइयों-बहनों को देखा है, नुकीले साइलोस्यबींस (जादुई मशरूम), इसके गरीब रिश्तेदार? इनके पैर कितने पतले होते हैं, क्या तुमने इन्हें देखा है? तुम इन्हें नहीं के बराबर ही देख सकती हो. वे बिना पैरों के भी काम चला सकते हैं, जबकि उनके पास पैर हैं.”

ईश्वर उत्साह में बोल रहा था, लेकिन जैसे ही उसने अंतिम वाक्य समाप्त किया, उसका उत्साह शिथिल होने लगा. अंततः उसने गहरी सांस छोड़ी.

“लेकिन आखिरकार वे मशरूम ही हैं. कुल मिलाकर, यह अंततः उतना अच्छा नहीं ही बन पाया, क्यों, क्या लगता है? मैंने सब गड़बड़ कर दिया… सबसे ज्यादा मनुष्यों के साथ. वे अतिव्यग्र हो गए हैं, इतने आक्रामक कि जैसे अभी कुछ कर बैठेंगे और लगातार अतृप्त और लालची बन बैठे हैं. वे सब कुछ बर्बाद करते हैं, और वे खुद ही इसके लिए भुक्तभोगी होंगे. वे हर समय उम्मीद की छांव तले खड़े होकर नीचे से मुझे पुकारेंगे और मैं इससे परेशान हो उठूंगा.”

“रहने दो, तुम सिर्फ यह नहीं कह सकते कि तुमने इसे बर्बाद किया है.” एक लंबे ठहराव के बाद पड़ोसन बोली. ”आखिरकार, मामला यदि यह है तब तुम इसे सुलझा सकते हो. जहां चाह, वहां राह…”

”अब बहुत देर हो चुकी है. आज रविवार है.”

”ओह प्लीज! तुम इसके प्रभारी हो.”

ईश्वर आलस्य से टेबलटॉप को घूरने लगा.

”आह, मशरूम… अभी हम इसी पर विचार करते हैं, जो तुमने वाकई कमाल का बनाया है.” पड़ोसन ने ईश्वर से कहा, “तुम कुछ विशेष औषधियों का निर्माण करते हो और अपनी कला-कृतियों पर उसे थोड़ा छिड़क दो, तब क्या होगा? इसी तरह मनुष्यों को थोड़ा चकित करने के लिए, उन्हें कुछ विशेष पल दो?”

ईश्वर ने एक नजर पड़ोसन के ऊपर फेरी. उसकी आंखों में चमक थी. वह हां में सिर हिलाता है.

“इसीलिए इसे ऐसे बनाते हैं कि वे हर समय इसका सेवन करने को बेताब रहें, इसके बारे में सपने देखें. इसे ऐसा बनाते हैं कि इसके लिए वे खुद को बाध्य महसूस करें, खुद को कमजोर करें और अविकल विचलन के शिकार रहें.” पड़ोसन से ईश्वर ने कहा.

”यह हू-ब-हू वही नहीं है जो मेरे दिमाग में था. मेरा मतलब था…”

”लेकिन इस तरह तो आम के आम और गुठली के दाम मिल गए.” ईश्वर ने पड़ोसन को बीच में ही रोक दिया, “मैं उन्हें निगरानी में रख सकता हूं. इस तरह मेरे नजदीक आने की उनकी इच्छा दम तोड़ती रहेगी. वे अपने आप पर केंद्रित रहेंगे और मुझे किसी भी तरह परेशान नहीं करेंगे. मैंने उन्हें वहीं रखा है, जहां मैं रखना चाहता था. मेरी प्रिय, तुम जीनियस हो, अभी कितना समय हुआ है?”

ईश्वर की पड़ोसन ने गहरी सांस छोड़ी.

“मध्यरात्रि बीते पांच मिनट हो चुके हैं, और आज, अब रविवार है.”

”लानत है! सब नरक जाएंगे!”

“कानूनी नजरिए को ध्यान में रखते हुए तुम समय का एक परिशिष्ट तो बना ही सकते हो. आखिरकार तुम ईश्वर हो.”

“तुम्हें ऐसा लगता है?”

ईश्वर अपने पैरों पर खड़ा हुआ और काम में जुट गया. उसने केतली भरी और फिर खाली डिब्बों और जार में कुछ मिलाने लगा. इस पूरी प्रक्रिया में वह खुद ही बुदबुदाता रहा, जैसे ‘ओपिएट्स’ (opiates), ‘लीसर्जिक एसिड डैथ्यलामैड’ (lysergic acid diethylamide), इसके बाद कुछ सूत्र, जो समझ के परे थे. फिर एक कप में तरह-तरह के अलग-अलग पदार्थ लिए और उन्हें चूर कर अच्छे से उन सबका मिश्रण बनाया.

“इसे अब मैं लोगों के हवाले कैसे करूं? मुझे इसमें क्या डालना चाहिए? तुम क्या सोचती हो? जल्दी करो! ज्ञान-वृक्ष के फलस्वरूप होने वाली प्रतिक्रिया से ज्यादा तेज प्रतिक्रिया शुरू हो जाएगी.”

“खिड़की का पल्ला खोलो और धरती पर उछाल दो. वह किस हिस्से पर गिरता है, यह सब संयोग के हाथ में है. वे लोग ‘संयोग’ शब्द से प्रेम करने लगेंगे. बेहतर होगा कि वे इस ‘संयोग’ को तुमसे नहीं जोड़ें, कम से कम उन्हें यह नहीं पता चलना चाहिए कि तुमने यह जानबूझ कर किया है.’’

“वे मेरे इरादों को बुरी नजरों से देख सकते हैं.” वह सहमत हुआ. उसने नए बने पदार्थ की एक चुटकी ली और उन सारी चीजों पर छिड़क दिया जो खिड़की के बाहर नीचे दिखाई दे रहे थे. यह सब ऐसे लग रहा था, जैसे वह दाल में नमक डाल रहा हो. उसकी पड़ोसन खिड़की से संसार की तरफ झुक कर पाउडर को गिरते देख रही थी.

“वह एसिड सीधे मकई के बीच गिरा, तथा कुछ और उन अद्भुत अफीम के खेतों की ओर उड़ा.”

“ओह! और ग्रास… और मेरा मशरूम! देखो!”

जब यह सब समाप्त हुआ तो ईश्वर ने खिड़की के पल्ले को कस कर बंद कर दिया. वे दोनों एक लंबे अंतराल तक शांत बैठे रहे.

रविवार उनके इर्द-गिर्द उद्दाम तरीके से आच्छादित था.

“यह सब करके हो सकता है कि मैंने गलत किया हो.” अचानक से ईश्वर बोला.

“रहने दो.” उसकी पड़ोसन ने उत्तर दिया और आश्वस्त करने के लहजे में अपने हाथ को उसके हाथ पर रखते हुए बोली, “जीवन के किसी पड़ाव पर तुम्हें यह तथ्य स्वीकार करना पड़ेगा कि ईश्वर कभी गलतियां नहीं करता.”

इसके साथ ही उसने आगे कहा, “अब सोने का समय हो गया है.”

***

[ 29 जनवरी 1962 में जन्मीं ओल्गा तोकार्चुक पोलैंड की समकालीन, बहुचर्चित और बहुअनूदित कथाकार हैं. वह वारसा विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में दीक्षित हैं. उन्हें साल 2018 का बहुचर्चित मेन’स बुकर पुरस्कार प्राप्त हुआ है. यह पहला अवसर है जब किसी पोलिश रचनाकार को बुकर से सम्मानित किया गया है. उन्हें यह पुरस्कार उनके उपन्यास ‘बियेगुनी’ (2007) के अंग्रेजी अनुवाद ‘फ्लाइट्स’ (2017) के लिए दिया गया है. उनकी कहानियों का मारिया पुरी द्वारा अनूदित एक संकलन ‘कमरे और अन्य कहानियां’ (2014) शीर्षक से हिंदी में भी उपलब्ध है. विश्वप्रसिद्ध फिल्मकार अग्नेष्का हॉलेंड की मशहूर फिल्म ‘स्पूर’ ओल्गा की ही किताब पर आधारित है. यहां प्रस्तुत उनकी कहानी जेनिफर क्रॉफ्ट के अंग्रेजी अनुवाद पर आधृत है, ‘फ्लाइट्स’ के अनुवादक भी यही हैं. उदय शंकर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पढ़े हुए हैं. हिंदी के शोधार्थी और आलोचक हैं. कथा-आलोचक सुरेंद्र चौधरी की रचनाओं को तीन जिल्दों में संपादित किया है. उनसे udayshankar151@gmail.com पर बात की जा सकती है.]

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