कुंवर नारायण के अंतिम काव्य ‘कुमारजीव’ पर ::
पंकज बोस

कुंवर नारायण का अंतिम वक्तव्य

भारतीय साहित्य में, विशेष रूप से हिंदी में कुमारजीव पर जो भी सामग्रियां उपलब्ध हैं, वे केवल सूचनाओं के रूप में या आंशिक हैं. राहुल सांकृत्यायन, काशीप्रसाद जायसवाल, परशुराम चतुर्वेदी और गजानन माधव मुक्तिबोध जैसे विद्वानों-विचारकों ने अपनी पुस्तकों में कुमारजीव का उल्लेख अवश्य किया है, लेकिन ये प्रासंगिक होते हुए भी पर्याप्त नहीं हैं. इनके आधार पर कुमारजीव से संबंधित जिज्ञासाओं का समाधान हो पाना मुश्किल है. जिन विद्वानों ने इतिहास की पुस्तकों में उनके बारे में लिखा है उन्होंने कुमारजीव के समय और जीवन पर उपलब्ध सूचनाओं का ऐतिहासिक स्रोत के रूप में उपयोग किया है. जिन्होंने दर्शन के ग्रंथों में उन पर लिखा है उन्होंने केवल महान दार्शनिक या विचारक कहकर उनकी प्रशंसा कर दी है. इन दोनों ही स्रोतों से हम कुमारजीव को समग्रता में नहीं समझ पाते या उसकी सही-सही तस्वीर हमें नहीं मिल पाती, न तो एक ऐतिहासिक व्यक्ति के रूप में और न ही एक विचारक के रूप में. अंग्रेजी में भी जो थोड़ी-बहुत सामग्रियां हैं, वे सीधे प्राथमिक स्रोतों पर आधारित न होने के कारण भ्रम की स्थिति पैदा करती हैं.

ऐसे में कुंवर नारायण द्वारा कुमारजीव को काव्य-विषय बनाकर उस पर एक पूरी कृति की रचना को एक क्षतिपूर्ति के रूप में देखा जा सकता है. इस कृति में कवि ने इतिहास की टूटी-बिखरी कड़ियों को एक सूत्र में पिरोकर जिस ‘वैक्यूम’ को पाटा है और जैसी कविता संभव की है उससे इतिहास और कविता के अंतःसंबंधों पर फिर से सोचने के लिए एक नई दृष्टि मिलती है.

कुंवर नारायण और उनकी कविताओं की आलोचना के प्रसंग में अब तक जाने-अनजाने जिस मिथकीय पक्ष को वरीयता दी गई है, उस पर भी यह कृति पुनर्विचार का प्रस्ताव करती है. उनके आलोचकों द्वारा प्रचलित आलोचना-पद्धति को चुनौती देती है और मूल्यांकन के नए औजारों की मांग करती है. उक्त अंतःसंबंधों को ध्यान में रखते हुए इस कृति को इतिहास के रेशम-मार्ग पर कविता की एक लंबी यात्रा भी कहा जा सकता है.

कुमारजीव का जन्म 344 ई. में चीन के कूछा प्रांत में हुआ. उसके पिता कुमारायण भारतीय मूल के थे और कश्मीरी राजपरिवार से संबद्ध थे. मां जीवा तुर्की-चीनी राजवंश की राजकुमारी थीं. ‘कुमारजीव’ शब्द कुमारायण और जीवा के शब्दांशों से मिलकर बना है. इस रूप में यह नाम सांकेतिक है और अर्थवान भी कि माता-पिता के संस्कारों और शिक्षाओं का सारभूत अंश कुमारजीव के व्यक्तित्व में विकसित होता गया. अपनी मां के साथ विभिन्न यात्राओं के क्रम में कुमारजीव की प्रारंभिक और उच्च शिक्षाएं पूरी होती हैं. कश्मीर में आचार्य बंधुदत्त, काश्गर में गुरु सूर्यसोम और कूछा में आचार्य विमलाक्ष के सान्निध्य में कुमारजीव क्रमशः बौद्ध परंपरा की महायान शाखा का अध्ययन करता है. यहां यह बतलाना जरूरी है कि बौद्ध परंपरा में दीक्षित होने के कारण भी महज बौद्ध विचारक या भिक्षु के रूप में ही उसका महत्व नहीं है, बल्कि वह अपनी साधनाओं और तैयारियों के दायरे से बाहर निकलकर उन्हें साधन के रूप में बरतता है, अंतिम लक्ष्य या साध्य के रूप में नहीं. प्रस्तुत कृति की भूमिका में स्वयं कवि ने विस्तार से अपने काव्य-विषय के जीवन से जुड़े विभिन्न पहलुओं की चर्चा की है.

किजिल (प्राचीन छांग-आन, चीन) में कुमारजीव की प्रतिमा

इस कृति को कुमारजीव के जीवन की प्रमुख घटनाओं के आधार पर छह खंडों में संयोजित किया गया है. पहला खंड ‘मैं तथागत के साथ’ एकालाप की शैली में है जिसे कुमारजीव की ओर से कहा गया है. एक तरह से यह स्वयं कुंवर नारायण की ओर से भी कहा गया है. इसमें कवि ने तथागत और कुमारजीव के समय के ‘ऑरबिट’ को फैलाकर आज के हमारे समय के ‘ऑरबिट’ से मिला दिया है. इस रूप में यह खंड ‘समय’ की एक ऐसी व्यापक और परस्पर संबद्ध संकल्पना को हमारे सामने प्रस्तुत करता है जिसमें निरंतर आवाजाही है :

वह एक विचार का जीवन है
उसे जिया जा सकता है कभी भी
उसके समय में जा कर
या उसे अपने समय में लाकर…

दूसरा खंड कुमारायण और जीवा के संवाद के रूप में है जो पारिवारिक मूल्यों के प्रति कवि की निरंतर प्रगाढ़ होती हुई भावना का परिचय देता है. माता-पिता के संवाद में पुत्र के भविष्य के प्रति एक आशावादी नजरिए को लक्षित किया जा सकता है. कुमारायण कहता है :

वह तुम्हारा पुत्र है तभी तक
जब तक तुम्हारी गोद में है
पृथ्वी पर पांव रखते ही :
पूरी पृथ्वी उसकी मां हो जाती है.

अगले खंड में काश्गर में बिताए एक वर्ष का पूरा प्रसंग है जिसमें कुमारजीव को गुरु सूर्यसोम से एक प्रबोधन मिलता है. यहां से क्रमशः उसके व्यक्तित्व का विकास होता है, एक तरह से उसका शैक्षणिक या बौद्धिक प्रशिक्षण होता है. आगे जब कुमारजीव की विद्वता और कीर्ति देश-देशांतर में फैलने लगती है, तो उसे विषम राजनीतिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है. चीन के प्राचीन छांग-आन प्रांत का शासक फू-च्येन राजनीतिक उद्देश्यों से कुमारजीव को अपने दरबार में सम्मानित करना चाहता है. असफल होने पर सेनापति ल्वी-क्वांग को कूछा पर आक्रमण के लिए भेजता है. कुमारजीव कूछा नरेश को सलाह देता है :

यह युद्ध साक्षात विनाश का आह्वान है
इसे अस्वीकार कर दीजिए
छांग-आन के प्रति मैत्री और शांति का हाथ बढ़ाइए
इसमें दोनों देशों का कल्याण है.

छांग-आन पहुंचने पर याओ-शिंग द्वारा कुमारजीव के स्वागत का रेखांकन

यहीं पर हमें राजनीति या सत्ता के प्रति बुद्धिजीवियों की वास्तविक नैतिक भूमिका का संज्ञान होता है, जिसके बारे में एडवर्ड सईद ने अपने प्रसिद्ध व्याख्यान में ‘स्पीकिंग ट्रुथ टू पावर’ कहा था. कुमारजीव यही करता है. इस खंड में एक पूरा हिस्सा है जो आज की भारतीय परिस्थितियों का क्रिटीक प्रस्तुत करता है.

कुमारजीव के लिए एक परीक्षा की घड़ी आती है जब सम्राट उसके पास सुंदर युवतियों और राजकुमारियों को भेजता है. वह इस चाल से बेदाग बाहर निकल आता है. पांचवें खंड में राजनीतिक विडंबनाओं और सम्राट मात्र की विस्तारवादी नीतियों की काव्यात्मक समीक्षा है. कुमारजीव सत्रह वर्ष के लिए ल्वी-क्वांग की हिरासत में डाल दिया जाता है. ये वर्ष उसके लिए सर्वोत्तम वर्ष साबित होते हैं. वह अपनी जिम्मेदारियों को निश्चित करते हुए चीनी भाषा और साहित्य का सांगोपांग अध्ययन करता है. कुछ पंक्तियां द्रष्टव्य हैं :

कुमारजीव कक्ष की दीवारों को
ग्रंथों से ढक देता है…

…एक कारागार में भी संभव है
प्रतिदिन एक नया जीवन.

गुरु सूर्यसोम से’पुंडरीक-सूत्र’ पर विचार-विमर्श

वैसे हमारे यहां तो कारागार में रहकर लिखने की बहुत लंबी और समृद्ध परंपरा है, लेकिन कुमारजीव के काम को महज ‘प्रिजन राइटिंग्स’ के बने-बनाए खांचों में नहीं रखा जा सकता, उसका एक व्यापक महत्व है.

राजनीतिक उलट-फेर के बाद जब कुमारजीव छांग-आन (अंतिम खंड) पहुंचता है, तब उसे अपनी साधना को समूची दुनिया के सामने रखने का नया अवसर मिलता है. यह सब विपरीत राजनीतिक परिस्थितियों को अपने अनुकूल मोड़ लेने की उसकी नैतिक क्षमता के कारण ही संभव होता है. वह अपने शिष्यों के साथ लगभग तीन सौ ग्रंथों का संस्कृत से चीनी में अनुवाद करता है. कालांतर में वह एक मर्यादित और स्वस्थ गृहस्थ जीवन भी जीता है. इस खंड में वह अपने शिष्यों को प्रबोधित करता है और इसका उदाहरण प्रस्तुत करता है कि जो व्यक्ति जितना महान और प्रतिष्ठित होता है, उतना ही विनम्र और उदार भी होता है. यों कुमारजीव को हम ‘वसुधैव कुटुंबकम’ और ‘विद्या ददाति विनयम’ के एक भारतीय बोध के अनुरूप व्यवहार करते हुए पाते हैं. धीरे-धीरे यह कृति भौतिक नश्वरता और करुणा की मार्मिक परिणति की ओर मुड़ जाती है. अंत तक आते-आते कुंवर नारायण एक चक्र पूरा कर लेते हैं. भौतिक जीवन के अवसान को विचारों के जीवन में पर्यवसित कर देते हैं :

वे मरेंगे नहीं
नए-नए रूपों में लौटते रहेंगे हमारे बीच
विकसित होते रहेंगे
सृष्टि के नियमों के अनुसार
जिन्हें हम भाषा में रोपित कर जाएंगे.

***

[ ‘आत्मजयी’ (1965) की अर्धशताब्दी और ‘कुमारजीव’ (2015) के प्रकाशन के अवसर पर 4 मार्च 2016 को राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के ‘अभिमंच’ ऑडीटोरियम में ‘आरंभ’ और ‘भारतीय ज्ञानपीठ’ के एक आयोजन में प्रस्तुत वक्तव्य.
यह अंतिम बार था जब किसी पब्लिक डोमेन में कुंवर नारायण स्वयं उपस्थित थे. पंकज बोस दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में पोस्ट डॉक्टोरल रिसर्च के साथ-साथ कुंवर नारायण से संबंधित कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं. उनसे parikshit.du@gmail.com पर बात की जा सकती है.]

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