कविताएं ::
अंचित

अंचित

आधी रात को अस्पताल आगमन

बरगद का पेड़ है, नीचे बैठा हूं जिसके, अंधेरा है जिसकी टेक ली है
सामने पोस्टमार्टम विभाग की इमारत है जिधर नजर टिकी हुई है,
इसको कविता नहीं कहता, रुदन कहता हूं, जो महसूस करता हूं उसको प्रेम नहीं घृणा.
नाक सूंघ रही है खुली हुई लाश, मिली हुई उससे सड़ती हुई लाश की गंध,
गाती हुई रात की हवा कानों में जा रही है, मुर्दे चीखते नहीं, मरघट में कोई करतल नहीं होता.

सन्नाटा है उस नए कवि के कमरे में, कान में हेडफोन, फोन की स्क्रीन पर पोर्न
जेब में बॉदलेयर, पेट में ब्रेख्त, नसों में गिन्सबर्ग, दिमाग में फिलिस्तीन, दिल में लोर्का
आंख में नींद और हाथ में उसका पुरुषत्व, सब गतिमान, सन्नाटा है और अंधेरा है
अंधेरा उसकी पीठ पर भी भरा है और उसके बिस्तर के खाली पड़े तकिये पर सोया हुआ है
समेटा जा सकता है उसको, एक डिप्रेशन की गोली से छह घंटे, फिर अगली गोली.

निष्कर्षत:

आधी रात है और स्त्री का प्रेम अकेला है, जगा हुआ, इंतजार करता,
उसकी देह अकेली, हर दाग सहलाए जाने का इंतजार करते हुए,
सिंक की छाप मिट जाने का यत्न करती हथेलियां
उसकी कमर में डूब चुकी मछलियां जागती हैं
आधी रात को दूर कहीं से सुनकर घड़ियाल की आवाज
चूल्हा ठंडा होता हुआ बनता जा रहा है जी.बी. शॉ का कोई नाटक,
धीमे-धीमे, जूठे बर्तनों का गान नेपथ्य लेता रहेगा
सुबह फिर स्टेज के मध्य आ जाएगी वही स्त्री, यही किरदार फिर उसको घेरे हुए,
आधी रात को भाषा का न होना वरदान है.

शहर एक पिंजरा है आधी रात को, सिर्फ महसूस किए जा सकते हैं सींखचे,
मेरे उन पर चोंच मारते रहने से भी
उनका क्या बिगड़ेगा, पानी की आवाज पोस्टमार्टम वार्ड के सामने सिर्फ मेरी जुगुप्साओं का तुष्टीकरण करती है
प्यास लगेगी तो इस मरघट पर ये बरगद है, इस पर घड़ीघंट टंगे हैं,
उनसे पानी निकालकर पिया जा सकता है,
दुनिया की परिक्रमा करना है यहां जीवन जीना, श्राद्ध करते हुए परिक्रमा करना, उसकी जड़ों में डालना मटके से पानी बार-बार, अप्रतिम तौर से पानी का सूखना,
विचार आधी रात को नागफनी के पौधे हो जाते हैं,
लिपटे रहते हैं उससे क्षुधा के नाग

आधी रात को रो रहे हैं, आंसू कहते हैं अखबार से, आधी रात को हंस रही है सरकार
कहता है अखबार उनसे.

प्यार कॉल होल्ड पर रखकर सो चुका है, उसकी संसद में मेरे खिलाफ कोई निंदा-प्रस्ताव पारित हुआ है, घृणा आवेश को जन्म देती है, धिक्कार पैदा करती है रोने से सिकुड़ गई आंखों की चमड़ी, एक ही बल्ब जल रहा है बस, उस पर इतना बड़ा बोझ… जागो, बेताल, उस छोटी रोशनी के अंदर छिपे हुए तुम झूठी उम्मीद के भूत, अवरुद्ध कर दो मेरी सांस की नली, चीखता हूं आधी रात को, दो हजार चौदह की गर्मियों में सूरज पूरा खर्च हो चूका, धरती की धुरी एक नोक की तरह चुभती है विश्व बाजार को.

अंतत:

जो हो रहा है— समालोचन, संभोग, शिष्टाचार, सबका संविधान सुबह तक समाविष्ट हो जाता है रात की सैर से बचने के संकल्प में और समय होने तक सुदृढ़ रहता है.

प्यार के लिए अढाई कोस धूप

धूप के अढाई कोस शहर और वर्णमाला के अढाई अक्षरों के बीच
स्पष्टता का वीराना पड़ता है. मेरी जगह कौन सी है?
कौन-सा कोना है जहां से बिना किसी को निकाले खुद को फिट कर सकता हूं?

सवाल इंतजार करते हैं कविता का, जैसे तुम्हारे इंतजार में खड़ा रहता हूं
उड्हुल के एक गाछ के पास, सामने सड़क है, कीचड़ है, पानी है,
एक मोटर गुजरी है अभी और तुम्हारी गंध थामे हवा ने रुख किया है मेरी ओर.

गंगा में घाट उतरते ही घात लगाए बीस-बीस फीट के गढ़हे हैं
पानी को एक मौका मिला और आपका माथा फिर धूप में कभी नहीं चमकेगा.
उजाड़ है सब, बसते हुए भी, जहां से देखता हूं, हम कहां बचते हैं भागने से प्रेम करते हुए भी.

तुम्हारे हाथ पर जले हुए के निशान हैं, तुम्हारी आंखें नींद से भारी हैं, तुम सोच रही हो मुझको
जिया जा सकता है इतनी ही दूर में, इतना आसमान काफी है चमकने के लिए
कवि उन्मुख हो प्रेम करने के लिए और दिन के सब पहरों में कम से कम एक पहर मुख मोड़ सके त्रासदियों से.

बादशाह की गद्दी से बादशाह की कब्र के बीच में जाने कितनी लाशें हैं
देख सको तो ईश्वर के महल से ईश्वर के किले के बीच भी देखना तुम
लंबी-घनी सुरंगें विचारधारा की, मशालें ढाई-ढाई कोस पर. किधर मुड़ गए?

पूरा दिन सरकता है मिलते हुए प्रदूषण से पेड़ों के झुरमुटों में, तुम बंधी मेरी कलाई पर
आज रात तुम्हारी आवाज नहीं आएगी, न कल रात, और मैं तुम्हारे न होने में कविता खोजूंगा,
अपने अंधेरे में खोजते हुए बिजली का स्रोत, हम सूरज की चिरौरी करेंगे जब तक जिएंगे.
इसका कोई मतलब नहीं बनता

मैं भूल जाता हूं मुझे क्या लिखना है— असंतुष्ट-सा, जलता हुआ, स्लिगल और सरल के बीच झूलता हुआ

शवयात्रा के आगे झुकते हुए याद आता है ईश्वर खेत हो गया, त्रासदियों का युद्ध कई बार खेला गया इसके बाद.

सब शोर थम जाता है, तुम गाती हो जब फुसफुसाती हुई-सी, मेरे कानों में.

***

अंचित की कविताएं इधर के हिंदी कविता-समय में अपनी अस्मिता अर्जित करने में लगी हुई हैं. वे बहुत नजर आने की सुविधाओं के बीच कहीं-कहीं नजर आ रही हैं. प्रशंसा या उपेक्षा— दो तरीकों से रचनाकारों को मारने का चलन भाषाओं में बसता आया है. अंचित का कवि इन दिनों प्रशंसा के बीच है, उसे अपने लंबे रास्ते के लिए इस प्रशंसा को समझते हुए आगे बढ़ना होगा. बहुत ताजगी के बावजूद अंचित की कविताओं में एक वयस्क–सृजन है. इस सृजन को पांडित्य के उस प्रदर्शन से बचना होगा, जिसने इन दिनों उन सारे कवियों को अश्लील और बोझिल बना दिया जिन्हें कभी एक बड़ी संभावना के रूप में पहचाना गया था. अंचित से anchitthepoet@gmail.com पर बात की जा सकती है. कवि की तस्वीरें अमन और सत्यम सोलंकी के सौजन्य से.

1 Comment

  1. प्रदीप शुक्ल February 27, 2018 at 7:48 am

    अंचित की कठिन कवितायेँ मुझ जैसे अकिंचन पाठक के लिए दुरूह हैं l

    Reply

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