क्लाउडिया रैंकिन की कविताएं ::
अनुवाद और प्रस्तुति : यादवेंद्र

क्लाउडिया रैंकिन

जमैका से आकर अमेरिका में बस जाने वाली 52 वर्षीय ब्लैक एक्टिविस्ट, प्रोफेसर और कवि क्लाउडिया रैंकिन की गए दिनों एक विचारोत्तेजक किताब आई है ‘सिटीजन : ऐन अमेरिकन लीरिक’ जिसे न केवल नेशनल बुक क्रिटिक्स अवार्ड से सम्मानित किया गया बल्कि बुद्धिजीवियों और पाठकों की भरपूर प्रशंसा भी मिली. इस किताब को लिखने की प्रेरणा उन्हें पिछले कुछ सालों में अमेरिका में गोरों के बीच कालों को लेकर बढ़ रही असहिष्णुता, घृणा और हिंसा की प्रवृत्ति से मिली है. बगैर किसी अपराध के अकारण मार दिए गए काले नौजवान माइकल ब्राउन और एरिक गार्नर हों या सेरेना विलियम्स या जिनेदिन जिदान या फिर टाइगर वुड्स हों… इन सेलिब्रिटीज के साथ रंगभेदी बर्ताव किए जाने को लेकर रैंकिन बेहद मुखर हैं, पर अपनी नई किताब में वह अमेरिकी समाज में गहरे रूप में व्याप्त कालों के प्रति जिस घृणा को दस्तावेजी तौर पर रेखांकित करती हैं, उसको वह ‘माइक्रो एग्रेशन’ नाम देती हैं.

‘सिटिजन : ऐन अमेरिकन लीरिक’ में वह सेरेना विलियम्स के एक मैच का प्रसंग बयान करती हैं : ‘‘बगल में बैठे एक गोरे अमेरिकी को बार-बार सेरेना के प्रतिद्वंद्वी को शाबाशी देते हुए देख कर जब रहा नहीं गया तो मैंने उससे पूछा कि वह अमेरिकी नहीं है क्या? हां में उसके सिर हिलाने पर आगे पूछा कि वह एक देशवासी के मुकाबले बेलारूस की खिलाड़ी को क्यों चीयर कर रहा है? उसने जवाब दिया कि वह मैच में बराबरी का मुकाबला चाहता है… जब दोनों खिलाड़ी एक-एक सेट जीत गए और तीसरे सेट में सेरेना का पलड़ा भारी दिखा तो मैंने पूछा कि अब बोलो, क्या जवाब है? यह सुनते ही वह बंदा बगैर एक शब्द बोले वहां से खिसक लिया.’’

एक इंटरव्यू में रैंकिन हंस-हंस कर यह किस्सा सुनाती हैं, पर अगले ही पल बाहरी विदेशी गोरेपन के समर्थन की बात को ‘बिल्कुल साफ दिखाई देने वाला रंगभेदी छद्म’ कहती हैं. रैंकिन के उस लेख के बारे में सेरेना विलियम्स एक इंटरव्यू में कहती हैं : ‘‘उनका लेख मेरा अब तक पढ़ा हुआ सर्वश्रेष्ठ लेख है, यह किसी घटना के बारे में नहीं है बल्कि सच के बारे में है… उस कविता में मैं शामिल हूं यह मुझे बहुत बल देता है. उनमें सच को सच कहने का साहस है, इसीलिए मुझे रैंकिन बेहद पसंद हैं.’’

‘‘मुझे लगता है रंगभेद अलगाव का सबसे कम समझा गया, घातक और कपटी रूप शब्द है.’’ यह क्लाउडिया रैंकिन की बहुउद्धृत उक्ति है.
यहां ‘सिटिजन : ऐन अमेरिकन लिरिक’ से रंगभेद की क्रूरता को रेखांकित करते कुछ अंश प्रस्तुत हैं, जिन्हें रैंकिन का आग्रह है कि कविता कहा जाए.

*

जगह बनाना

ट्रेन में खड़ी स्त्री आपको फौरन समझा देती है कि बैठने के लिए सीट खाली नहीं है.
हालांकि सीट खाली है—एक सीट.
क्या इस स्त्री को अगले स्टेशन पर उतरना है?
बिल्कुल नहीं, उसको आखिरी यूनियन स्टेशन तक जाना है
और वह भी ऐसे ही खड़े-खड़े.
सामने बैठे आदमी के बगल की जगह वैसे ही खाली है
जैसे बातचीत के बीच अक्सर चुप्पियां आकर बैठ जाती हैं
और तुम उसको भरने की कोशिश करने लगते हो.
तुम उस स्त्री के मन में बैठे भय को कुचलकर आगे बढ़ जाते हो
उस भय को जो वह इतनी देर से तुम्हारे साथ साझा करती आ रही है
तुम हो कि उस भय को यथावत दुबके बैठे रहने देते हो उसके मन के अंदर.
इस बीच दूसरा आदमी छोड़ देता है अपनी सीट
कि काफी देर से खड़ी आ रही स्त्री बैठ जाए.
तुम घूरते हो उस ढीठ आदमी को.
जो अपलक देखता जा रहा है खिड़की से बाहर
जैसे निहार रहा हो कालापन.

लाइन में खड़े-खड़े जैसे ही आपकी बारी आती है पीछे से एक आदमी इस तरह आगे बढ़कर अपना सामान काउंटर पर रखता है जैसे उसने किसी की बारी का अतिक्रमण नहीं किया, अनदेखा करके किसी को लांघा नहीं.
कैशियर कहती है : ‘‘सर, आपसे पहले से ये खड़ी थीं.’’
वह पीछे मुड़कर देखता है और अचरज की मुद्रा में अंजान बनकर बोलता है : ‘‘ओ माय गॉड, मैंने इन्हें देखा ही नहीं.
‘‘कोई बात नहीं, हो सकता है कि आपको जल्दी हो.’’ यह आपने कहा.
‘‘नो नो नो… मैंने सचमुच तुम्हें देखा ही नहीं.’’

उसे बखूबी मालूम था कि छुट्टी (सबैटिकल) का आपका भी वैसा ही शेड्यूल है जैसा दूसरों का होता है, वह बोला : ‘‘जब देखो तब तुम सबैटिकल पर रहती हो… चलो दोस्त हो इसलिए चल जाता है… इजी.’’
‘‘आप कहना क्या चाहते हो, साफ-साफ बोलो.’’
‘‘बिल्कुल वही… पर आखिर तुम क्या कहना चाहती हो?’’

कॉन्फ्रेंस रूम से बाहर खड़े दो लोग औरों के आने का इंतजार कर रहे हैं, उनमें से एक दूसरे से बोलता है : ‘‘इन काले लोगों को अपने आस-पास देखकर लगता है कि जैसे हम कोई विदेशी फिल्म देख रहे हों जिसे समझना मुश्किल—हमारे सामने अनुवाद जो उपलब्ध नहीं है.’’

रोशनी के फ्लैश… सायरन… देर तक खिंचा जाता कोलाहल…

तुम वह नहीं हो जिसकी तलाश है
पर उसके हुलिए में फिट हो जाती है तुम्हारी सूरत

कोई अदद शख्श तो होगा ही बेशक इस धरती पर
जिसका मिलता-जुलता हो उससे हुलिया

बाहर निकलो, खड़े हो… जमीन पर ठीक से खड़े हो.

हो सकता है मेरी कार लिमिट से बाहर जाकर दौड़ रही हो.
नहीं, तुम्हारी कार ज्यादा तेज नहीं थी.

अच्छा तो मैं तेज ड्राइव नहीं कर रहा था?
नहीं, पर साफ-साफ बताओ
तुमने सचमुच कुछ गलत नहीं किया?

फिर आप मुझे इस तरह घसीट क्यों रहे हैं?
आखिर किस जुर्म में इस तरह घसीटा जा रहा है मुझे?

अपने हाथ वहां रखो जहां से हमें साफ दिखायी दे
हां, हवा में लहराओ… अपने हाथ हवा में उठाओ…
अपने दोनों हाथ उठाओ.

इसके बाद तुम्हें खींच लिया जाता है बोनट पर
मुक्के मार-मारकर फिर धक्के से फेंक दिया जाता है
जमीन पर, नीचे.

यह कविता अगस्त 2014 में फर्ग्युसन में माइकल ब्राउन को किसी अन्य अपराधी से शक्ल-सूरत मिलने का बहाना बनाकर गोरे पुलिस वालों द्वारा गोली मारे जाने की घटना के संदर्भ में लिखी गई. इस मृत्यु के दो महीने बाद क्लाउडिया रैंकिन स्वयं घटना-स्थल पर भी गईं और उन्होंने एक बेहद मार्मिक पर आक्रोशित संस्मरण भी लिखा.

***

[ यादवेंद्र सुपरिचित अनुवादक हैं. मुंबई में रहते हैं. उनसे yapandey@gmail.com पर बात की जा सकती है. यह प्रस्तुति ‘सदानीरा’ के 19वें अंक में पूर्व-प्रकाशित.]

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