मैरी ऑलिवर की कविताएँ ::
अँग्रेज़ी से अनुवाद : रीनू तलवाड़

mary oliver poems in hindi
मैरी ऑलिवर

आज और शायद कल भी

सोच से, पश्चाताप से, टूटी और अब तक अनटूटी
उम्मीद से भरा,
भरा स्मृतियों से, गर्व से, आधिक्य में छलके
निजी दुःख से,
शुरू करती हूँ मैं एक और पन्ना, एक और कविता।

कितने विचारों से भरा होता है दिन! कभी पहनाती हूँ
मैं उन्हें शब्दों के जामे, कभी
क़ाफ़ियों के मिलते-जुलते जूते।

क्या ठाठ भरा जीवन है!

जबकि कहीं कोई किसी रोते हुए चेहरे को चूम रहा है।
जबकि कहीं औरतें जाग रही हैं रात के दो बजे, निकल
रही हैं घरों से, मीलों दूर चलकर पानी लाने
जबकि कहीं कोई बम फटने के लिए तैयार हो रहा है।

‘रेड बर्ड’ से

वसंत

और देखो साँप फिर प्रकट हुआ है,
अँधियारे के अपने नीड़ से,
काली चट्टानों तले स्थित अपनी गुफा से,
अपनी शीत-मृत्यु से
स्वयं को बाहर खींच लाया है।
वह चीड़ के नुकीले पत्तों पर फिसलता है।
घास के उगते गुच्छों के आस-पास घुमाव
बनाता, वह सूरज की तलाश में है।

लंबी सर्दियों के बाद धूप कौन नहीं चाहेगा भला?
मै रास्ते से हट जाती हूँ,
वह अपनी लंबी जिह्वा से हवा को परखता है,
अपनी हड्डियों के चारों ओर वह तेल-सा तरल है,
और पहाड़ी की ढलान उतर
वह बढ़ता है काले शीशे-सी सतह वाले तालाब की ओर।
कल रात ठंड कम नहीं थी।
मेरी नींद टूटी तो मैं उठ कर बाहर आँगन में आई थी,
और चाँद भी नहीं था।

बस, वैसे ही खड़ी रही थी मैं, मानो शून्य के जबड़ों में भिंची हुई।
कहीं दूर एक उल्लू बोला था,
और मैंने सोचा था जीसस के बारे में, कि कैसे वह
दुबका रहा होगा अँधेरे में दो रात,
और पुनः क्षितिज के ऊपर तैर आया होगा।

कितनी कथाएँ हैं
जो हैं उत्तरों से कहीं सुंदर।
मैं साँप के पीछे-पीछे तालाब की ओर चल पड़ती हूँ,
ठोस, कस्तूरी-सी गंध लिए
वह उम्मीद-सा गोलाकार है।

‘हाउस ऑफ़ लाइट’ से

ब्लैकवाटर तालाब पर

रात भर बारिश के बाद
ब्लैकवाटर तालाब में पानी की हलचल थम चुकी है।
मैं अंजुरी भरती हूँ। बहुत देर तक
पीती हूँ पानी। उसका स्वाद है
पत्थर जैसा, पत्तों और आग जैसा। मेरी देह में
ठंडे सोते-सा गिरता है वह, जगाता है मेरी हड्डियों को।
अपने भीतर गहरे कहीं सुनती हूँ मैं
उन्हें फुसफुसाते हुए
ओह! यह जो अभी हुआ, इतना दिव्य,
यह क्या था?

‘न्यू एंड सिलेक्टेड पोएम्ज़’ से

स्वप्न वृक्षों का

मुझमें कुछ है जो वृक्षों का स्वप्न देखा करता था,
एक शांत-सा घर, कुछ हरी-भरी ज़मीन,
हर परेशान करने वाले शहर से ज़रा दूर,
ज़रा दूर कारख़ानों, स्कूलों, विलापों से।
केवल बहती धाराओं और पंछियों का साथ होगा,
मेरे पास समय होगा, मैं सोचती थी,
और बचेगा भी
कि मैं रच पाऊँ अपने जीवन से कुछ अद्भुत छंद।
और फिर समझ आया,
कि मृत्यु भी ऐसी ही होती है,
हर जगह से बस ज़रा दूर।

कुछ है मुझमें
जो अभी भी देखता है वृक्षों के स्वप्न।
फिर जाने देता है। संयम को तरसते,
दुनिया के आधे कलाकार
ख़ुद को समेट लेते हैं या सबसे दूर हो जाते हैं।
अगर मिला है किसी को कोई तोड़,
तो वह सभी को बताए।

इस बीच मैं फिर मोड़ती हूँ अपना मन को उसी विलाप की ओर,
जहाँ, जैसे कि समय विनती करता है हमारी सच्ची सहभागिता की,
हर संकट की धार हमें राह दिखाती है।
मैंने बहुत चाहा कि ऐसा न होता, मगर ऐसा ही है।
किसी सौम्य-से दिन भला किसी ने संगीत रचा है?

‘नो वॉयेज एंड अदर पोएम्ज़’ से

दुःख का लाभ

जिसे कभी प्रेम करती थी
उसने मुझे दिया
अंधकार से भरा एक बक्सा।

वर्षों लग गए
मुझे यह समझ पाने में
कि यह भी एक उपहार था।

‘थर्स्ट’ से

मैं चाहती थी

…मैं चाहती थी
कि मेरा अतीत कहीं चला जाए, मैं चाहती थी
उसे छोड़ देना, किसी बेगाने देश की तरह; मैं चाहती थी
कि मेरा जीवन बंद होकर, फिर खुल जाए
क़ब्ज़े की तरह, पंख की तरह, गीत के उस हिस्से
की तरह जहाँ वह गिर जाता है
नीचे पड़े पत्थरों पर : एक विस्फोट, एक खोज;
मैं चाहती थी
अपने जीवन के कार्य में जल्दी आना; मैं जानना चाहती थी,
जो कोई भी मैं थी, मैं

जीवित थी
थोड़ी देर के लिए।

…और मैं चाहती थी
कि मैं प्रेम कर पाऊँ। और यह हम सब जानते हैं
ऐसी इच्छाओं का क्या होता है,
नहीं जानते क्या?

‘डॉगफिश’ शीर्षक कविता से काव्यांश, ‘ड्रीम वर्क’ से  

ब्लैकवाटर वन में

देखो, ये पेड़
परिवर्तित कर रहे हैं
अपनी ही
देह को
रोशनी के स्तंभों में,
बिखेर रहे हैं सघन सुगंध
दालचीनी और
पूर्ण संतुष्टि की,
सरकंडों की
लंबी बत्तियाँ
चटख रही हैं
तिर रही हैं
तालाबों के नीले
काँधों के ऊपर,
और हर तालाब,
चाहे जो भी हो
उसका नाम, अब
गुमनाम है।

हर वर्ष
वह सभी कुछ
जो मैंने सीखा है
अपने जीवनकाल में
मुझे यहीं लौटा लाता है : खोने
की ज्वालाओं के पास जिसकी
काली नदी के उस पार
मुक्ति है,
जिसका अर्थ
हम में से कोई कभी नहीं जान पाएगा।
इस दुनिया में रहने के लिए
तुम्हें करनी होंगी
ये तीन क्रियाएँ :
जो नश्वर है उससे प्रेम करना;
उसको स्वयं से
यूँ चिपटा कर रखना
मानो तुम्हारा जीवन उसी पर निर्भर हो,
और, जब समय हो जाने देने का,
जाने देना उसे।

‘अमेरिकन प्रिमिटिव’ से

जंगली बतख़ें

तुम्हें अच्छा होने की आवश्यकता नहीं है।
नहीं है आवश्यकता तुम्हें प्रायश्चित करने के लिए
रेगिस्तान में घुटनों के बल सौ मील चलने की।
तुम केवल अपनी देह के नर्म
जीव को करने देना प्रेम
उसे जिससे वह प्रेम करता है।
बताओ मुझे अपनी निराशा के बारे में
और मैं तुम्हें अपनी निराशा बताऊँगी।
इस बीच दुनिया चलती रही है।
इस बीच चलता जा रहा है सूर्य और
चल रहे हैं बारिश के पारदर्शी पत्थर भू-दृश्यों के पार,
गुज़र रहे हैं घास के मैदानों और गहरे पेड़ों के ऊपर से,
पर्वतों और नदियों पर से।
इस बीच, ऊँचे आकाश की स्वच्छ नीली हवा में,
जंगली बतख़ें फिर देश लौट रही हैं।
तुम जो कोई भी हो, कितने भी अकेले,
स्वयं को भेंट करता है यह संसार
तुम्हारी कल्पना को,
इन जंगली बतख़ों की तरह बुलाता है तुम्हें,
एक कर्कश और उत्तेजित स्वर में,
बार-बार, बताता है तुम्हें तुम्हारा स्थान
इन सब चीज़ों के परिवार में।

‘सलेक्टेड पोएम्ज़’ से

पतझड़ गीत

लगभग बीत ही गया है एक और वर्ष, छोड़ गया है
चारों ओर अपने उत्साही उर्वर अवशेष : बेलें, पत्ते,
अँधेरे सीलन-भरे कोनों में पड़े झुर्रियों वाले
बिन खाए फल, बीते ग्रीष्म के
विशेष द्वीप से अपदार्थित होता यह पल, यह
वर्तमान जो और कहीं नहीं,
केवल पैरों के तले है, सड़ता हुआ
उस अँधेरे भूमिगत महल में,
जहाँ हैं अलक्ष्य रहस्य—जड़ें और मुहरबंद बीज
और पानी की घुमक्कड़ी। यह याद रखने का
प्रयत्न करती हूँ मैं जब समय का परिमाण
रगड़ कर छीलता है, दुखता है, उदहारण के लिए
जब पतझड़ जाते-जाते अंत में भड़कता है,
प्रचंड और हमारी ही तरह
हमेशा रहने की इच्छा लिए—
कैसे जीता है सब कुछ, हमेशा
इन क्षणिक चरागाहों में, एक उज्ज्वल
दृश्य से दूसरे की ओर पलटता हुआ।

‘अ थाउजेंड मॉर्निंगज़’ से

एक हज़ार प्रभात

किसी तरह
रात भर राह बनाता है मन
अनिश्चितताओं की ऊबड़-खाबड़
ज़मीन पर,
मगर केवल तभी तक
जब प्रभात से मिलती है रात
और फिर अभिभूत हो जाती है,
गहराने लगता है उजाला
हवा शांत होने लगती है
और करने लगती है केवल प्रतीक्षा,
जैसे कि मैं करती हूँ
(और क्या कभी निराश भी हुई हूँ?)
ललमुनिया के गीत की।

‘अ थाउजेंड मॉर्निंगज़’ से

मैं ऐसा क्या कह सकती हूँ

मैं ऐसा क्या कह सकती हूँ
जो मैंने पहले नहीं कहा होगा?
तो दुबारा कहती हूँ।
हर पत्ते में एक गीत होता है।
पत्थर का चेहरा सहनशील होता है।
नदी में होती है अंतहीन एक कहानी
और उसमें कहीं तुम होते हो
और वह रहेगी अंतहीन
जब तक न हो जाए सब कुछ का अंत।

अपने व्यस्त हृदय को कला-संग्रहालय ले जाओ
और ले जाओ व्यापार-मंडल
मगर उसे जंगल भी ले जाओ।
पत्ते का जो गीत सुना था तुमने
अपने बचपन में
पत्ता वह गीत अभी भी गा रहा है।
मैंने जी लिए हैं, अब तक, चौहत्तर साल,
और पत्ता अब भी गा रहा है, गाता जा रहा है।

‘स्वान : पोएम्ज़ एंड प्रोज़ पोएम्ज़’ से

कवि पर्वत का स्वप्न देखता है

कभी-कभी मैं ऊब जाती हूँ
दिनों से, उनकी मनमौजी चाल से।
मैं चढ़ना चाहती हूँ धीमे-धीमे किसी बूढ़े धूसर पर्वत पर,
बाक़ी का जीवन यूँ ही बिताती, अक्सर सुस्ताती,
सोती चीड़ के पेड़ों तले, या और ऊपर, निर्वस्त्र चट्टानों पर।
जिस आकाश का दम हमने बरसों से घोंट रखा है,
देखना चाहती हूँ कि उसमें कितने तारे अभी भी बाक़ी हैं,
सब माफ़ करना चाहती हूँ, शांत होना चाहती हूँ,
जानना चाहती हूँ जो है जानने को अंतिम बात।
यह सब भाग-दौड़! धरती इस वास्ते तो नहीं है!
कितने मौन हैं पेड़, उनकी कविता उन्हीं की होती है,
मैं धीमे क़दम उठाना चाहती हूँ, और सोच यथोचित चाहती हूँ।
दस हज़ार सालों में, शायद, गिर जाएगा पर्वत का एक टुकड़ा।

‘स्वान : पोएम्ज़ एंड प्रोज़ पोएम्ज़’ से

उतावली कविता

आज फिर मैं अपने आप में नहीं हूँ।
ऐसा कई बार होता है।
लगता है जैसे कुछ दैवी है।

नीली लहर-सी
बहती है मुझ में।
हरे पत्ते—शायद तुम न मानो—
फूट आए हैं
एक-आध बार मेरी उँगलियों के पोरों से
वसंत की उतावली में
कहीं
घने जंगल में।

हालाँकि, बेशक, जानती हूँ मैं वह दूसरा गीत भी,
एक-ता का मधुर आवेश।

अभी कल ही मैंने एक चींटी को रास्ता पार करते देखा,
नीचे गिरे चीड़ के पत्तों में से राह बनाते।
और मैंने सोचा :
वह इस जीवन के सिवा कोई दूसरा जीवन कभी नहीं जिएगी।
और मैंने सोचा :
अगर पूरे जी-जान से वह अपना जीवन जीती है
तो क्या वह अद्भुत रूप से बुद्धिमान नहीं है?
और इस चमत्कारी पिरामिड पर मैं तब तक चढ़ती रही,
सब चीज़ों से होकर गुज़रती रही
जब तक स्वयं तक न पहुँच गई।

और फिर भी, इन उत्तरीय वनों में,
और इन रेत के टीलों पर,
मैं अपने होने की दूसरी खिड़की में से उड़ निकली हूँ
सफ़ेद बगुला बनने, या फिर नीली व्हेल मछली,
लाल लोमड़ी, या साही।
आह, कभी-कभी तो पहले से ही मेरी देह को होता है
किसी फूल की देह होने का एहसास!
कितनी बार पहले ही से हो जाता है मेरा मन एक लाल तोता,
घने विचित्र पेड़ों पर बैठा,
अपने पंख फड़फड़ाता और चिल्लाता हुआ।

‘न्यू एंड सिलेक्टेड पोएम्ज़ : वॉल्यूम टू’ से

यात्रा

एक दिन तुम जान गईं
कि आख़िर तुम्हें करना क्या है
और बस निकल पड़ीं।
आस-पास की आवाज़ें
चिल्ला-चिल्ला कर
देती रहीं बिन माँगी सलाहें,
पूरा घर थरथरा उठा,
पैरों की बेड़ियों ने फिर
खींचा एक बार,
हर आवाज़ चीख़ उठी—
मेरे जीवन का क्या?
पर तुम नहीं रुकीं।
तुम जानती थीं कि तुम्हें क्या करना है।
तेज़ हवा अपनी सख़्त उँगलियों से
खोदती रही
गहरी उदासी में डूबी तुम्हारी जड़ें।
पहले ही बहुत देर हो चुकी थी
और तूफ़ानी रात में रास्ता
पत्थरों और टूटी टहनियों से भरा था।
फिर धीरे-धीरे
सब आवाज़ें पीछे छूट गईं।
बादलों की चादर के पीछे
तारे फिर जलने लगे
और चलने लगी तुम्हारे साथ
एक नई आवाज़
जो तुम्हारी अपनी ही थी।
और तुम लंबे डग भरती
दूर तक चलती गई
बहुत दूर तक
ठाने हुए मन से
वह एक चीज़ करने
जिस पर तुम्हारा बस था
बस एक जीवन का उद्धार।

‘ड्रीम वर्क’ से

***

मैरी ऑलिवर (10 सितंबर 1935-17 जनवरी 2019) सुप्रसिद्ध अमेरिकी कवयित्री हैं। उन्होंने साठ के दशक में कविताएँ लिखना आरंभ किया। उनके पच्चीस से अधिक कविता-संकलन प्रकाशित हो चुके हैं और उनमें से कुछ बहुत सराहे गए हैं। उन्हें अमेरिका के श्रेष्ठ सम्मान ‘नेशनल बुक अवार्ड’ व ‘पुलित्ज़र प्राइज़’ भी प्राप्त हो चुके हैं। उनकी कविताएँ प्रकृति की गुपचुप गतिविधियों के बारे में हैं, जैसे वह धरती और आकाश के बीच खड़ी सब देख रही हैं। उनकी कविताओं में अकेलेपन के प्रति उनका प्यार, एक निरंतर आंतरिक एकालाप और स्त्री और प्रकृति के बीच का गहरा संबंध भी दिखाई देता है। रीनू तलवाड़ सुपरिचित हिंदी लेखिका, अनुवादक और अध्येता हैं। वह चंडीगढ़ में रहती हैं। उनसे reenutalwar@gmail.com पर बात की जा सकती है। उनके अनुवाद में यान कप्लिंस्की, रने शार और आलेहांद्रा पिज़ारनीक की कविताएँ ‘सदानीरा’ पर शाया हो चुकी हैं। इस यह प्रस्तुति ‘सदानीरा’ के 21वें अंक में पूर्व-प्रकाशित। इस प्रस्तुति की फ़ीचर्ड इमेज़ : tricycle

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